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इतनी मुसीबतें झेल अमेरिका जाने को क्यों मजबूर हैं ये भारतीय
- Author, बर्नेड डेब्यूसमेन जूनियर
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़
जश्नप्रीत सिंह के लिए पंजाब में एक रुढ़िवादी वातावरण में रहना बहुत मुश्किल था क्योंकि वो समलैंगिक हैं.
34 साल के सिंह कहते हैं कि जालंधर में उन्हें हर दिन भेदभाव का सामना करना पड़ता था. उनके पड़ोसियों ने उनके साथ मारपीट की और परिवार वालों ने भी उनसे मुंह मोड़ लिया. लेकिन पिछले साल जो हुआ वो बहुत बुरा था.
सिंह बताते हैं, "15 से 20 लोगों ने मुझे जान से मारने को कोशिश की. मैं वहां से अपनी जान बचाकर भागा, लेकिन उन्होंने मेरे शरीर के कई अंग काट दिए."
हमले में सिंह ने अपना हाथ खो दिया. उनके अंगूठे पर भी गहरी चोट है. सिंह वहां से भागने के बाद तुर्की और फ्रांस होते हुए अमेरिका के कैलिफ़ोर्निया पहुंचे.
उन्होंने क़रीब 12,800 किलोमीटर की यात्रा की और मेक्सिको बॉर्डर को पार कर अमेरिका में दाखिल हुए.
ऐसा करने वाले वो अकेले नहीं है. सालों से भारत से अवैध प्रवासी अमेरिका पहुंच रहे हैं. इसकी संख्या बहुत अधिक नहीं है लेकिन स्थिर है. हर महीने कुछ दर्जन से लेकर सैंकड़ों लोग अमेरिका आते रहते हैं.
क्या हैं कारण?
लेकिन इस साल ये संख्या बढ़ी है. अक्टूबर 2021 से सितंबर 2022 तक, पिछले एक साल में भारतीय मूल के रिकॉर्ड 16,290 लोगों को मेक्सिको की सीमा पर से अमेरिका ने कस्डटी में लिया है. इसके पहले सबसे अधिक संख्या 2018 में रिकॉर्ड की गई थी जब 8,997 लोग अमेरिका आए थे.
जानकारों का मानना है कि कई कारणों से भारत से लोग यहां आते हैं. इनमें से अहम कारण है भेदभाव का बढ़ता माहौल और महामारी के कारण लगाए गए प्रतिबंधों का ख़त्म होना. इसके अलावा लोगों को लगता है कि अमेरिका की सरकार शरणार्थियों को आने दे रही है और स्मगलिंग के पुराने नेटवर्क फिर से काम करने लगे हैं.
टेक्सस और कैलिफ़ोर्निया में भारतीय लोगों के लिए मुकदमा लड़ चुके दीपक आहलूवालिया का मानना है कि कुछ अवैध प्रवासी आर्थिक कारणों से अमेरिका आते हैं और कई लोग अपने देश में उत्पीड़न से परेशान होकर.
उत्पीड़न के कारण आने वालों में मुस्लिम, ईसाई और "पिछड़ी जाति" के हिंदू और एलजीबीटी समुदाय के लोग हैं जिन्हें अपने ख़िलाफ़ हिंसा का ख़तरा होता है. इनमें वो लोग भी शामिल हैं जो पंजाब में 'अलगावादी आंदोलन' से जुड़े हैं या फिर साल 2020 से हुए विरोध प्रदर्शनों के कारण डरे हुए हैं. अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों का कहना है कि इन समुदायों की हालात हाल के सालों में ख़राब हुई है.
मुश्किल फ़ैसला
सिंह कहते हैं कि देश छोड़ने का फ़ैसला उनके लिए आसान नहीं था. उन्होंने पहले भारत में ही दूसरे शहर में शिफ़्ट होने के बारे में सोचा लेकिन उन्हें डर था कि वहां भी उनके साथ वैसा ही व्यवहार किया जाएगा.
वो कहते हैं, "गे लोगों के लिए माहौल अच्छा नहीं है. साल 2018 में भारत में समलैंगिक यौन संबंधों को अपराध की श्रेणी से बाहर किया गया है. लेकिन अपने ही सेक्स में शादी करना अभी भी गैरक़ानूनी है."
उनके भाई ने उन्हें एक 'ट्रैवल एजेंसी' से मिलवाया. ये एक जटिल और महंगे स्मगलिंग नेटवर्क का हिस्सा है. वो उन्हें पहले तुर्की ले गए. वहां भी "जीवन बहुत कठिन" था. उसके बाद वो फ्रांस पहुंचे, लेकिन वहां उन्हें कोई काम नहीं मिला. इस पूरी यात्रा में छह महीने से ज़्यादा समय लगा. कुछ दिनों बाद "ट्रैवल एजेंट" ने उन्हें एक छोटे ग्रुप से साथ जोड़ा जो अमेरिका जा रहा था. सिंह के मुताबिक़ उस ग्रुप में कई परिवार थे.
सिंह कहते हैं, "उसने बहुत पैसे लिए. फ्रांस से वो कैंकुन लेकर आए, वहां से मेक्सिको सिटी और फिर उत्तर की ओर."
एक मुश्किल सफ़र
आहलूवालिया कहते हैं कि सिंह जैसे कई लोग एक बेहतर ज़िंदगी के लिए अमेरिका को ही अपना 'आख़िरी गेटवे' समझते हैं.
लेकिन इतनी लंबी दूरी तय करना बहुत मुश्किल होता है. आमतौर पर अमेरिका-मेक्सिको सीमा पार करने के लिए 'स्मगलिंग सर्विस' का इस्तेमाल किया जाता है. यात्रा भारत से दक्षिण अमेरिका की होती है. पूरे रास्ते ये लोग छोटे ग्रुप में यात्रा करते हैं, एकदूसरे की भाषा समझने वाले लोग साथ होते हैं. आमतौर पर इन्हें पूरे रास्ते कोई गाइड करता रहता है.
इस नेटवर्क की शुरुआत भारत में "ट्रैवल एजेंट" से होती है और यात्रा का एक हिस्सा लैटिन अमेरिका के 'क्रिमिनल समूहों' के हाथ में दे दिया जाता है.
वॉशिंगटन में रहने वालीं जेसिका बोल्टर माइग्रेशन पॉलिसी इंस्टीट्यूट में एनालिस्ट हैं. उनके मुताबिक़ भारत से आने वाले लोगों की संख्या इसलिए भी बढ़ रही है क्योंकि यहां पहुंचने में सफल रहे रिश्तेदार और दोस्त उन्हें बुला लेते हैं.
वो कहती है, "ये बढ़ता जाता है और ज़्यादा अवैध प्रवासी आने लगते हैं. हालांकि ये तभी होता है जब कोई अपना देश छोड़ना चाहता है."
पंजाब के 20 साल के मनप्रीत ने अपना सरनेम नहीं छापने की शर्त पर हमसे बात की. सत्ताधारी बीजेपी के आलोचक मनप्रीत की मानें तो उन्हें उनकी राजनीतिक विचारधारा के कारण प्रताड़ित किया गया जिसके कारण वो देश छोड़ने के लिए मजबूर हुए.
वो कहते हैं, "इक्वाडर से बस लेकर मैं कोलंबिया पहुंचा और वहां से पनामा की बस ली."
"वहां से एक बोट से मैं निकारागुआ और ग्वाटेमाला और फिर मेक्सिको पहुंचा और वहां से अमेरिका में दाखिल हुआ."
ट्रिप के दौरान एक स्मगलर उन्हें गाइड करता रहता है. हालांकि वो कहते हैं कि बावजूद इसके इस रास्ते में ख़तरे बहुत हैं, जैसे कि चोरी और डकैती, स्थानीय गैंग और भ्रष्ट अधिकारियों की उगाही, ख़राब मौसम, चोट और बीमारी.
इन ख़तरों को 2019 में प्रकाश में लाया गया जब एक छह साल की पंजाब की लड़की की एरिज़ोना के रेगिस्तान में मौत हो गई. इस ख़बर ने भारत में भी सुर्खियां बटोरी. बाद में ये जानकारी सामने आई कि उसकी मौत 42 डिग्री सेल्सियस तापमान में हुई थी. तब उसकी मां एक दूसरे ग्रुप के साथ पानी की तलाश में गईं थीं.
एक अनिश्चित नई शुरुआत
अमेरिका पहुंच जाने के बाद सिंह जैसे अप्रवासी शरण के लिए आवेदन देते हैं. ज़्यादातर समय इसकी शुरुआत "क्रेडिबल फीयर इंटरव्यू" से होती है जिसमें उन्हें अधिकारियों का भरोसा दिलाना होता है कि प्रताड़ित किया गया है और वो देश छोड़ने के लिए मजबूर हुए.
आहलूवालिया कहते हैं, "पहला कदम बहुत ज़रूरी होता है. अगर वहां अफ़सर को लग गया है कि आपको किसी तरह का जायज़ डर नहीं था, तो आपका केस कभी आगे नहीं बढ़ेगा. ये बहुत बुरा होता है."
अगर अफ़सर को लगता है कि डर जायज़ है तो फिर शरण चाह रहे लोगों को एक इमिग्रेशन जज के सामने पेश होना पड़ता है जो उनकी मांग पर विचार करते हैं. ये एक लंबी प्रक्रिया है. इसमें सालों का इंतज़ार करना पड़ता है, उसके बाद भी नतीजे सकारात्मक होंगे इसकी गारंटी नहीं होती.
सिंह जून के अंत से अमेरिका में हैं. इस समय वो वकील को देने के लिए पैसे बचा रहे हैं. वो लंबे समय के लिए अमेरिका में रह पाएंगे या नहीं इसकी कोई गारंटी नहीं है, लेकिन उनका मानना है कि ये उनके पास मौजूद दूसरे विकल्पों से बेहतर है.
वो कहते हैं, "मुझे हमेशा ही अपनी जान का डर रहता था. यहां आने के बाद मुझे कभी ऐसा नहीं लगा."
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