लता मंगेशकर की आवाज़ के जादू पर कितना था शास्त्रीय संगीत का असर

लता मंगेशकर

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    • Author, अर्णब बनर्जी
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

रागों और सुरों की समझ रखने वाला कोई इंसान हो, या फिर संगीत का कोई आम शैदाई. अगर वो तन्हा बैठकर, लता मंगेशकर का सीमा फिल्म में गाया भजन, 'मनमोहना बड़े झूठे…' सुन ले, तो उसके मन में ये जानने की ख़्वाहिश ज़रूर पैदा होगी कि आख़िर इतनी पेंचदार तानों को इतनी सहजता से कैसे गाया जा सकता है.

हल्के फुल्के संगीत को पसंद करने वाले भी सोच में पड़ जाएंगे कि कोई गायक बिना लटक-झटक दिखाए, रागों की माला इतनी ख़ूबसूरती से सुरों में कैसे पिरो सकता है.

ये लता मंगेशकर ही थीं, जिन्हें अपने अपनी क़ाबिलियत की नुमाइश करने की ज़रूरत नहीं होती थी. वो तो शास्त्रीय रागों पर आधारित, पेचीदा से पेचीदा संगीत की धुनों को बड़ी सहजता से अपने सुरों में ढाल लेती थीं.

लता मंगेशकर अब 93 बरस की हो गईं हैं. मैं जान-बूझकर उनके लिए ये जुमला इस्तेमाल कर रहा हूं. क्योंकि, लता जी भले ही इस दुनिया से विदा ले चुकी हैं. लेकिन, हम उस महान गायिका को यूं ही अपनी यादों से ओझल नहीं होने दे सकते.

आप सुर साम्राज्ञी लता का नाम लीजिए तो उनकी उपलब्धियों का बेहिसाब विस्तार याद आता है.

अगर हम संगीत के कुछ जुनूनी मुरीदों और जानकारों को छोड़ दें, तो किसी आम इंसान को लता मंगेशकर की उपलब्धियों को समझने के लिए एक थीसिस की ज़रूरत होगी.

वैसे तो उनके सुर, तान, आलाप और संगीत के बारे में लगभग सब कुछ लिखा जा चुका है. मगर, शास्त्रीय गायन के उनके हुनर, उनकी दक्षता पर उतना ज़ोर नहीं दिया गया है.

जबकि लता मंगेशकर ने 13 साल की उम्र में एक्टिंग के ज़रिए फिल्मी दुनिया में क़दम रखने से पहले, शास्त्रीय संगीत की गायिका बनने की ही कोशिश की थी.

उम्र के साथ जब शास्त्रीय संगीत के सुर, लय, ताल और तान को लेकर आपकी समझ बढ़ती है. अगर आप तब लता मंगेशकर के गाने दोबारा सुनें, तो उनकी आवाज़ के जादू पर और भी मंत्रमुग्ध होते जाते हैं.

इसकी वजह से संगीत के शौक़ीनों को लता की आवाज़ के जादू के दूसरे पहलुओं को तलाशने, उनको समझने और उनके सुरों की गहराइयों को नए सिरे से महसूस करने की प्रेरणा देते हैं.

इससे संगीत का आनंद लेने का तजुर्बा भी बेहतर होता है.

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एक सुर में पिरोने वाली आवाज़

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लेकिन, सवाल ये है कि लता को आज़ाद भारत की सबसे सम्मानित गायिका और देश के सबसे प्रभावशाली कलाकारों में से एक क्यों माना जाता है?

ऐसा इसलिए है क्योंकि उनकी आवाज़ में एक ऐसी अनूठी ख़ूबी है, जो सरहदों से परे जाकर दक्षिण एशिया के लोगों को एक सुर में पिरोती है.

और यही वजह है कि आठ दशक लंबे अपने करियर में भारत के संगीत उद्योग को अतुलनीय योगदान देने की वजह से उन्हें ‘सुरों की महारानी’, ‘भारत की स्वर कोकिला’ और सदी की 'सबसे सुरीली आवाज़ की मलिका' जैसी उपाधियों से नवाज़ा गया.

अपने शुरुआती दिनों में लता मंगेशर ने पश्चिमी संगीत के सभी चार सप्तकों में गाया. फिर चाहे वो मंद हो, मद्धम हो या फिर उच्च स्वर. गाने के अलग अलग हिस्सों में उनके गाये सप्तक अलग ही एहसास कराते हैं.

जैसे कि नूरी फिल्म के गाने 'चोरी चोरी कोई आए..' में दिल से उठने वाला मंद सुर, पाकीज़ा फिल्म के गाने, 'चलते चलते में…' या अन्नदाता फिल्म के गीत, 'रातों के साये घने' में मद्धम सप्तक का उभार और चोरी चोरी फिल्म के गाने, 'रसिक बलमा… दिल क्यूं लगाया तोसे…' में ज़हन पर गहरा असर करने वाला उच्च सप्तक.

बहुत से सुरीले गानों में लता ने अपनी क़ुदरती या शुद्ध, बदली हुई या कोमल या फिर ज़रूरत के मुताबिक़ तीव्र तान का भी बख़ूबी इस्तेमाल किया है. ये उनके हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के सबक़ से वाक़िफ होने का असर है.

लता मंगेशकर

सुरों का उतार चढ़ाव

ये सच है कि संगीत की धुनों का श्रेय, उसको तैयार करने वालों को जाता है. जैसे कि एस डी बर्मन, नौशाद, सलिल चौधरी, शंकर-जय किशन या फिर आर डी बर्मन.

लेकिन, अगर उन धुनों की अदायगी, लता मंगेशकर ने अपने सुरों में उसी उतार चढ़ाव के साथ न की होती, उनके साथ सुरीला इंसाफ़ न किया होता, तो शायद उन पर ऐसे पेंचदार रागों वाले गीत गाने का भरोसा न किया जाता.

उनके गानों में सुरों के बारीक़ उतार चढ़ाव का फ़र्क़ साफ़ महसूस होता है. लता के गीतों में श्रुति कहे जाने वाले एक ही स्वर की अलग अलग तानें सुनने को मिल जाती हैं.

राग रागिनी के ये पेंच-ओ-ख़म आम तौर पर विदुषी किशोरी अमोनकर जैसे विशुद्ध शास्त्रीय गायन गाने वालों के कौशल में ही दिखाई देता.

हिंदुस्तानी रागों पर आधारित किसी ख़ास गीत की धुनें मुख्य रूप से दो हिस्सों में बंटी होती हैं, आलाप और स्थायी. लेकिन, लता मंगेशकर के गाये गीतों की ऐसी कई मिसालें हैं, जो शास्त्रीय बंदिशों का हिस्सा बन गई हैं.

मिसाल के तौर पर सौतेला भाई फिल्म का गीत, 'जा मैं तोसे नाहीं बोलूं' या फिर दस्तक फ़िल्म का गाना, 'बैयां ना धरो…'

वीडियो कैप्शन, लता मंगेशकर का बीबीसी के साथ ख़ास इंटरव्यू

हर गीत से किया इंसाफ़

गायिका शुभा मुद्गल कहती हैं, "लता जी तो ऐसी मुकम्मल कलाकार थीं कि वो कुछ भी गा सकती थीं. फिर चाहे वो किसी राग पर आधारित ग़ज़ल हो, या पेंचदार तराना, वो कुछ भी गा सकती थीं."

कुछ साल पहले लता जैसी ही प्रतिभाशाली गायिका उनकी बहन आशा भोसले से बात करते हुए मुझे पता चला कि मंगेशकर परिवार हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के प्रति पूरी तरह समर्पित है.

इसीलिए, उनके परिवार के सदस्य, ठीक उसी तरह रोज़ाना गाने का रियाज़ करते हैं, जैसे किसी और हिंदुस्तानी संगीत घराने के जाने-माने गायक करते हैं.

लता मंगेशकर के पिता पंडित दीनानाथ मंगेशकर, गोवा और मराठी थिएटर के जाने-माने कलाकार थे. पंडित दीनानाथ वैसे तो मुख्य रूप से नाट्य संगीत के संगीतकार थे.

लेकिन वो ख़ुद भी हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत के पक्के गायक थे. लता मंगेशकर उनकी सबसे बड़ी संतान थीं. इसीलिए, उन्हें भी शास्त्रीय गायिका बनने की ट्रेनिंग दी गई थी. लेकिन, हालात ऐसे बने कि उन्हें फिल्मों में प्लेबैक सिंगर बनना पड़ा.

हालात के इस मोड़ ने हम सबको उनकी कला का लुत्फ़ उठाने का मौक़ा दिया, जिसके लिए हमें ऊपरवाले का शुक्रगुज़ार होना चाहिए.

फिल्मी संगीत के हल्की फुल्की धुनों ने लता मंगेशकर के शास्त्रीय अंदाज़ को फ़ीका भले कर दिया. लेकिन नियमित रूप से रियाज़ करने की वजह से, लता ने जब भी शास्त्रीय रागों वाले गीत गाए, तो उन्होंने उन गीतों के साथ भी पूरा इंसाफ़ किया.

लता मंगेशकर के बारे में ग़ज़ल गायिका राधिका चोपड़ा कहती हैं कि उनको बयान करने के लिए तो सिर्फ़ एक लफ़्ज़ काफ़ी है, 'संस्थान'.

वो कहती हैं, "लता मंगेशकर अपने आप में संगीत का एक घराना हैं, जिनका अनुसरण हल्के फुल्के संगीत के हर कलाकार को उसी तरह करना चाहिए, जिस तरह मैं करती हूं. भजन हो, ग़ज़ल हो, रागों पर आधारित गीत हों, हल्की फुल्की धुनों पर आधारित चुहलभरे गाने हों या फिर दुख की गहराई में डूबे गीत."

"लता जी ने जिस तरह अलग अलग गीतों को उनके मिज़ाज के हिसाब से पहली से लेकर आख़िरी पंक्ति तक अपने सुरों की नेमत बख़्शी है, उनसे आने वाली तमाम पीढ़ियों को सीख मिलती रहेगी. वो धुनों के बारीक़ से बारीक़ उतार चढ़ाव को जिस तरह खुले गले और बड़ी सहजता के साथ सुरों के मिज़ाज के मुताबिक़ अदा किया करती थीं, उनकी नक़ल तो आने वाली न जाने कितनी नस्लें करती रहेंगी."

लता मंगेशकर

जब पंडित जसराज और भीमसेन जोशी ने की तारीफ़

कई बरस पहले जब एक बार पंडित जसराज से उनकी उस वक़्त की पड़ोसन के बारे में पूछा गया था, तो उन्होंने कहा था कि, ‘हम जैसे शास्त्रीय संगीत के गायक जिन रागों को 45 से 55 मिनट में अपने सुरों में साधने की कोशिश करते हैं, वही काम वो अपने चार मिनट के गाने में करके दिखा देती हैं.’

पंडित जसराज संगीत के मेवाती घराने से ताल्लुक़ रखते थे. उन्होंने शास्त्रीय और दूसरे तरह के भक्ति संगीत को अमर बना दिया है.

जब उनके जैसे महान कलाकार, लता मंगेशकर के बारे में ऐसी बातें करें, तो ज़ाहिर है लता मंगेशकर के लिए इससे बढ़कर कोई और तारीफ़ क्या होगी.

शास्त्रीय संगीत के एक और महान गायक पंडित भीमसेन जोशी ने भी अपने एक इंटरव्यू में लता मंगेशकर के बारे में ऐसे ही विचार व्यक्त किए थे.

पंडित भीमसेन जोशी ने कहा था, ‘उन्होंने अपनी ज़बरदस्त आवाज़ के जादू से बेशुमार गानों को अमर बना दिया. हम अगर ऐसे गानों की फ़ेहरिस्त बनाने बैठें, तो भी काम अधूरा ही रह जाएगा.’

लता मंगेशकर और संगीत दोनों एक दूसरे के पर्याय थे. फिर चाहे वो किसी भी तरह का संगीत हो. शास्त्रीय संगीत के बहुत से गायकों और वादकों ने उनसे प्रेरणा ली है. फिर चाहे वो युवा हों या बुज़ुर्ग.

इनमें से कुछ नाम तो कौशिकी चक्रवर्ती, पंडित शिव कुमार शर्मा, पंडित हरिप्रसाद चौरसिया, संजीव अभयंकर जैसे मशहूर कलाकारों के भी हैं.

पंडित जसराज का परिवार, मंगेशकर परिवार का बेहद क़रीबी रहा है. उनकी बेटी दुर्गा जसराज ने लता मंगेशकर की एक और ख़ूबी बताई, जिससे शायद उनके मुरीद वाक़िफ़ न हों.

दुर्गा जसराज कहती हैं, "लता मंगेशकर को फोटोग्राफी इतनी पसंद थी कि वो वाइल्ड लाइफ फोटोग्राफी करने के लिए दक्षिण अफ्रीका तक सफर कर आती थीं."

"वो अपने घर में भी हमेशा तस्वीरें खींचती रहती थीं. सुबह अपना रियाज़ करने के बाद उन्हें जब भी वक़्त मिलता, तो वो अपने कैमरे का ट्रायपॉड या फिर उसके लेंस दुरुस्त करने लग जाती थीं."

लता मंगेशकर के साथ भूतपूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी

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इंदिरा गांधी और लता की वो मुलाक़ात

पंडित जसराज की बेटी दुर्गा जसराज, लता मंगेशकर से जुड़ी एक और चर्चित घटना को याद करती हैं, जिसकी वजह से ख़ुद दुर्गा भी मिथकों के सुनहरे इतिहास का एक हिस्सा बन गईं.

वो बताती हैं, "एक बार तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी मुंबई आई थीं. वो भयंकर गर्मियों के दिन थे. लोगों को पता चल गया था कि इंदिरा गांधी मुंबई में हैं."

"तो, जिन इलाक़ों से भी उनकी गाड़ियों का काफ़िला गुज़रता था, वहां सड़क के दोनों तरफ़ लोगों का हुजूम इकट्ठा हो जाता था."

"उस दिन लता मंगेशकर भी अपनी बॉलकनी में ट्रायपॉड और कैमरा लेकर बैठ गई थीं. जैसे ही, प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी का काफ़िला पेड्डर रोड पर प्रभु कुंज (लता मंगेशकर का निवास स्थान) के सामने पहुंचा, तो दोनों मशहूर हस्तियों ने मुस्कुराकर दूर से ही हाथ हिलाते हुए एक दूसरे का अभिवादन किया."

"उस दिन को याद करके तो आज भी मेरे रौंगटे खड़े हो जाते हैं कि किस तरह दो महान हस्तियों ने लम्हे भर के लिए एक दूसरे से नज़रें मिलाई थीं. मेरा आदर एक तरफ़ है."

वो कहती हैं, "मैं उस दिन के बारे में सोचती हूं कि कि किस तरह मैं इतिहास की दो महान और शक्तिशाली महिलाओं की ज़िंदगी का एक अटूट हिस्सा बन गई."

लता मंगेशकर और आरडी बर्मन

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लता को पसंद थे हीरे

लता जी के व्यक्तित्व की एक और ख़ास बात उनकी चुहल करने की आदत थी. वो हमेशा मज़ाक़ करती रहती थीं. उन्हें लोगों को चुटकुले सुनाने की आदत थी.

वो अक्सर अपनी हाज़िर जवाबी और चुटकुलों से लोगों को ठहाके लगाने पर मजबूर कर देती थीं. इसके बदले में वो सामने वाले से भी कोई चुटकुला सुनाने को कहती थीं.

ये बात तो सबको पता है कि लता मंगेशकर हीरों और अच्छे परफ्यूम की भी बहुत शौक़ीन थीं. लता जी के चाहने वालों को, उनकी तमाम ख़ूबियों, उनकी ज़िंदगी के हर पहलू की जानकारी होगी.

लेकिन, लता जी की ऐसी भी कई ख़ूबियां और आदतें थीं, जिनके बारे में शायद उनके बड़े से बड़े प्रशंसक को भी जानकारी नहीं रही होगी. उन्हें क्रिकेट का भी ज़बरदस्त जुनून था और खेल की बहुत सी बारीकियां भी उन्हें पता थीं.

बहुत से लोगों को ये नहीं मालूम होगा कि उन्होंने लंदन में लॉर्ड्स के मैदान के पास एक छोटा सा अपार्टमेंट भी ख़रीद रखा था, ताकि जब भी वहां कोई बड़ा मैच हो तो वो वहां रहकर उसका लुत्फ़ उठा सकें.

लता मंगेशकर को क्रिकेट के मैच देखने का इस क़दर जुनून था कि वो कोई भी मैच देखना नहीं छोड़ती थीं, फिर चाहे वो भारत में हो रहा हो या दुनिया में कहीं और.

लता जी की ये ख़ूबियां उनके दिल में छुपे बच्चे की तमन्नाओं का इज़हार थीं.

उनकी ये आदतें इस बात का भी सुबूत हैं कि लता जी, ज़िंदगी के इन तमाम पहलुओं से भी जुड़ी हुई थीं, जिनसे हम आप वाबस्ता होते रहते हैं. वो इस मामले में कोई अपवाद या कोई अलग इंसान नहीं थीं.

वैसे तो लता मंगेशकर की पहचान सिर्फ़ और सिर्फ़ संगीत बना. क्योंकि वो ऊपरवाले की ख़ास रचना थीं, जिनके गले में सुरों का जादू बसता था.

अपनी कला में प्रवीण ऐसी महान हस्ती की क़ाबिलियत और उनकी उपलब्धियों के बारे में दुनिया के महान लेखकों और संगीत के आलोचकों ने वो सब कुछ लिख डाला है, जो लिखा जा सकता था या लिखा जाना चाहिए था. इसमें कुछ और जोड़ना बाक़ी नहीं रहा.

लता के गाए कुछ मुश्किल गानों को सुनते हुए बस यही एहसास होता है कि ऐसी महान हस्तियां कभी मरती नहीं. वो अमर हो जाती हैं.

और इसीलिए, उन्हें बार बार श्रद्धांजलि अर्पित करते रहना चाहिए. जिससे, संगीत के शैदाइयों की आने वाली नस्लों और आम लोगों के बीच उनकी यादें हमेशा ज़िंदा रहें.

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