जब एक पाकिस्तानी पायलट ने इसराइल के लड़ाकू विमान को मार गिराया था

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"मेरे मन में न जाने कितने विचार आए कि शायद मिसाइल फंस गई है या कुछ और हो गया है. वो एक सेकेंड मेरे जीवन का सबसे लंबा पल था. फिर अचानक मिसाइल चली और दो-तीन सेकेंड लगे होंगे जब मिसाइल इसराइली मिराज को लगी और मैंने उसे फटते हुए देखा."
ये घटना आज से ठीक 50 साल पहले 26 अप्रैल 1974 की है जब पाकिस्तानी वायु सेना के पायलट फ़्लाइट लेफ़्टिनेंट सत्तार अल्वी ने सीरियाई वायुसेना का युद्धक विमान 'मिग' उड़ाते हुए एक इसराइली 'मिराज' विमान को मार गिराया था.
यह अपनी तरह की अनोखी घटना थी क्योंकि पाकिस्तानी वायुसेना के पायलट एक दूसरे देश की वायुसेना की ओर से इसराइल के ख़िलाफ़ लड़ रहे थे जिसे पाकिस्तान राजनयिक तौर पर स्वीकार नहीं करता है.
लेकिन पाकिस्तान पायलट सीरिया पहुंचे कैसे? इस सवाल का जवाब जानने के लिए हमें पांच दशक पहले जाना होगा.
'क्या तुम सचमुच लड़ोगे?'

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साल 1973 के अक्टूबर में अरब-इसराइल युद्ध छिड़ा तो उस समय युवा पायलट सत्तार अल्वी रसालपुर में ट्रेनिंग कोर्स में शामिल थे.
ट्रेनिंग लेने वाले पायलट शाम के वक़्त अरब-इसराइल युद्ध के विषय पर अक्सर बातचीत करते थे. ऐसी ही बातचीत में एक दिन यह सवाल उठा कि वह ख़ुद क्या कर सकते हैं.
सत्तार अल्वी ने एक इंटरव्यू में बताया, "मैंने कहा कि हम फ़ाइटर पायलट हैं, हम स्वैच्छिक तौर पर जाने की पेशकश कर सकते हैं. किसी ने पूछा कि क्या तुम सचमुच जाकर लड़ोगे? मैंने कहा, हां. मेरे रूममेट ने कहा, मैं भी तुम्हारे साथ हूं. अभी उठो."
सत्तार अल्वी के अनुसार, "आधी रात का समय था जब हम एकेडमी के कमांडेंट के घर जा पहुंचे. वह बाहर निकले तो उनको हमने सारी बात बताई. उन्होंने पूछा कि क्या 'बार' से आ रहे हो? हमने कहा, नहीं. तो उन्होंने कहा कि सुबह ऑफ़िस में मिलो."
अगले दिन कमांडेंट के दफ़्तर में स्वैच्छिक तौर पर सीरिया जाने वाले पाकिस्तानी पायलटों से एक बार फिर सवाल हुआ कि क्या वह अपने प्रस्ताव पर गंभीर हैं.
सत्तार अल्वी बताते हैं, "हमने कहा, बिल्कुल. उन्होंने हमें 10 मिनट इंतज़ार करने को कहा और फिर कहा कि पेशावर पहुंचो, वहां से विमान तुम लोगों को ले जाएगा."
"बाद में हमें पता चला कि वायुसेना के चीफ़ ने भुट्टो साहब से बात की जिन्होंने सीरिया के राष्ट्रपति हाफिज़ अल असद से संपर्क किया और उन्होंने हां कर दी."
सत्तार अल्वी कहते हैं, "मैंने अपना सलवार-क़मीज़ और फ़्लाइंग गियर लिया और पेशावर पहुंचकर हमें मालूम हुआ कि चौदह और लोग भी स्वैच्छिक तौर पर जाने वालों में शामिल हैं. हमें चीफ़ के फ़ोकर जहाज़ में बिठा दिया गया. थोड़ी देर बाद चीफ़ भी आ गए. हमें कुछ पता नहीं था कि हम कहां जा रहे हैं."
'सरकार और वायुसेना ज़िम्मेदारी नहीं लेगी'

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इस दौरान एक और महत्वपूर्ण बात यह हुई कि पाकिस्तानी पायलटों को एक काग़ज़ दिया गया और उनसे कहा गया कि वह इस पर दस्तख़त कर दें.
सत्तार अल्वी के अनुसार, "इस काग़ज़ पर लिखा था कि हम पाकिस्तान से बाहर छुट्टी पर जा रहे हैं और अगर इस दौरान कोई अनहोनी बात हुई तो सरकार या पाकिस्तानी वायुसेना हमारी ज़िम्मेदारी नहीं लेगी. इसका मतलब था कि अगर कोई ऐसी वैसी बात होती तो सरकार और वायुसेना हमें पहचानने से इनकार कर कह देती कि हम इस बंदे को नहीं जानते हैं."
पाकिस्तानी पायलटों को पहले कराची और फिर एक 'सी 130' जहाज़ पर बग़दाद ले जाया गया. बग़दाद से सत्तार अल्वी और दूसरे पायलट पहले जॉर्डन और फिर सड़क के रास्ते दमिश्क़ पहुंचे.
पाकिस्तानी पायलटों की कुल संख्या सोलह थी. इनमें से आठ को मिस्र भेजा गया और आठ को सीरिया में रहने का निर्देश दिया गया. सत्तार अल्वी सीरिया में रह जाने वाले आठ पायलटों में शामिल थे.
सत्तार अल्वी और दूसरे पायलटों को बाद में दमिश्क़ से 30 मिनट की दूरी पर दमीर एयर बेस पर ले जाया गया जहां उनको '67 ए' का नाम दिया गया.
पाकिस्तानी पायलटों को रक्षा की ज़िम्मेदारी

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पाकिस्तानी पायलटों के लिए एक समस्या भाषा की थी. सत्तार अल्वी बताते हैं कि सीरियाई एयर फ़ोर्स के मिग 21 जहाज़ों में रूसी भाषा लिखी थी जबकि रडार और एटीसी अरबी में बात करते थे.
"हमने इस समस्या का हल यह निकाला कि जो ज़रूरी बातें जहाज़ उड़ाने के लिए हमें दरकार थीं, वह हमने लिख लीं और उनको एक काग़ज़ पर अपने फ़्लाइंग सूट में रख लिया जो हम हर समय पहने रहते थे. इसका फ़ायदा यह हुआ कि ज़रूरत भर अरबी भाषा हम एक हफ़्ते में सीख गए."
पाकिस्तानी पायलटों की सीरियाई यूनिट को एयर डिफ़ेंस यानी रक्षा की भूमिका सौंपी गई. इसके तहत यह ज़िम्मेदारी तय की गई कि अगर कोई भी इसराइली जहाज़ सीरिया की वायु सीमा में घुसता हो तो उसको रोकना पाकिस्तानी पायलटों का काम होगा.
इस दौरान मिस्र ने इसराइल के साथ युद्ध विराम करने पर सहमति जता दी थी लेकिन सीरिया और इसराइल के बीच गोलान की पहाड़ियों पर युद्ध जारी रहा.
सत्तार अल्वी के अनुसार, "हम हर दिन सुबह सहरी से पहले तैयार होते और एयर बेस पर पहुंच कर इंतज़ार करते. यह रूटीन सात महीने तक जारी रही."
इस दौरान पाकिस्तानी पायलटों को कई बार आकाश में भेजा गया और कई बार उनका इसराइली जहाज़ों से आमना-सामना तो हुआ लेकिन मुक़ाबला नहीं हुआ.
'शहबाज़ 8' बनाम इसराइली वायुसेना
सत्तार अल्वी के अनुसार, "पाकिस्तानी पायलटों ने सोच रखा था कि चाहे हम किसी इसराइली जहाज़ को गिराएं या ना गिराएं, किसी पाकिस्तानी पायलट को इसराइलियों के हाथ नहीं गिरना चाहिए. हमारी रणनीति इसी दृष्टि से बनी."
26 अप्रैल, 1974 भी किसी आम दिन की तरह ही शुरू हुआ लेकिन दोपहर बाद लगभग साढ़े तीन बजे पाकिस्तानी पायलटों को एक आम रक्षा मिशन सौंपा गया.
सत्तार अल्वी के अनुसार, "जब हम मिशन पूरा करने के बाद बेस की तरफ़ लौट रहे थे तो अचानक रडार ने इसराइली जहाज़ की मौजूदगी के बारे में जानकारी दी."
उस वक़्त सत्तार अल्वी समेत पाकिस्तान पायलटों के जहाज़ में काफी ईंधन इस्तेमाल हो चुका था जबकि अचानक ही रडार जाम होने से उनके बीच संपर्क भी टूट गया था.
आठ पाकिस्तानी पायलट 'शहबाज़ 8' फ़ॉर्मेशन में उड़ रहे थे जिसमें सत्तार अल्वी सबसे आख़िर में थे. उनके अनुसार, संपर्क भंग होने से पहले फ़ॉर्मेशन कमांडर की ओर से सबको उस दिशा में मुड़ने का निर्देश दिया गया था जिस दिशा से इसराइली विमानों के आने की सूचना थी.
यह लेबनान की वायु सीमा थी जहां उसी दौरान सत्तार अल्वी को ज़मीन की तरफ़ एक चमकती हुई चीज़ नज़र आई.
उनके अनुसार, यह एक इसराइली मिराज युद्धक विमान था. सत्तार अल्वी ने उसी पल अपनी फ़ॉर्मेशन से अलग होते हुए अपना रुख़ उस जहाज़ की तरफ़ मोड़ लिया.
उनके अनुसार इस दौरान, "वह जहाज़ मेरे पास से गुज़र चुका था लेकिन मेरी नज़र उसके पीछे एक दूसरे मिराज लड़ाकू विमान पर पड़ी."
"जैसे ही यह दूसरा विमान मेरे पास से गुज़रा तो मैंने उसकी तरफ़ दोबारा मुड़ने के लिए एक ऐसी वायु तकनीक का इस्तेमाल किया जिसमें जहाज़ की गति धीमी हो जाती है."
"मैंने देखा कि विरोधी जहाज़ ने भी उसी तकनीक का इस्तेमाल शुरू कर दिया था जिसे हम 'सीज़र्स' यानी कैंची की तरह जहाज़ उड़ाना कहते हैं. यानी दोनों जहाज़ आगे पीछे हैं और दाएं बाएं मुड़ते हैं ताकि विरोधी के पीछे पहुंचकर उसे निशाना बना सकें."
सत्तार अल्वी के अनुसार इस दौरान उन्होंने ज़ीरो स्पीड पर अपना जहाज़ हवा में एक पल के लिए रोका तो इसराइली मिराज उनके आगे आ गया.
लेकिन अब सत्तार अल्वी के सामने एक समस्या थी.
उनके अनुसार, "वह जहाज़ इतना पास था कि अगर मैं तुरंत फ़ायर करता तो उसका मलबा मेरे जहाज़ पर गिरता. मुझे सुरक्षित दूरी बनाने के लिए थोड़ा इंतज़ार करना पड़ा."
लेकिन वक़्त कम था क्योंकि एक तरफ़ इसराइली लड़ाकू विमान अब सत्तार अल्वी का रुख़ कर रहा था जबकि सत्तार अल्वी के जहाज़ का ईंधन भी ख़त्म होने वाला था और उनको जल्द ही फ़ैसला करना था.
सत्तार अल्वी के अनुसार, इसराइली युद्धक विमान के पायलट कैप्टन लिट्ज़ ने अपनी कमज़ोर पोज़िशन देखते हुए नीचे की ओर भागने की कोशिश की. लेकिन इस कोशिश ने सत्तार अल्वी को वह सुरक्षित दूरी दे दी जो उनको फ़ायर करने के लिए दरकार थी.
सत्तार अल्वी ने जहाज़ की रूसी मिसाइल फ़ायर करने के लिए चुनी और बटन दबाकर फ़ायर कर दिया लेकिन मिसाइल नहीं चली.
वह एक सेकंड से भी कम का वक़्त था जिसमें सत्तार अल्वी कहते हैं, "मेरे मन में न जाने कितने विचार आए कि शायद मिसाइल फंस गई है या कुछ और हो गया है."
असल में मिसाइल बटन दबाने के एक सेकेंड के बाद ही फ़ायर होती है. सत्तार अल्वी के लिए वह एक सेकेंड उनके जीवन का सबसे लंबा पल था.
"दो-तीन सेकेंड और लगे होंगे जब मिसाइल इसराइली मिराज को लगी और मैंने उसे फटते हुए देखा."
यह पूरी झड़प लगभग 30 सेकेंड में ख़त्म हो चुकी थी जिसके बाद सत्तार अल्वी ने जहाज़ को ज़मीन की तरफ़ ले जाकर सुपरसोनिक स्पीड पर ज़मीन से केवल 50 फ़ीट की ऊंचाई पर अपने सीरियाई एयर बेस का रुख़ किया.
जब सत्तार अल्वी के जहाज़ ने रनवे पर लैंड किया तो तब तक फ़्यूल गेज ज़ीरो से भी नीचे जा चुकी थी.
'मेरी टांगों में जान नहीं थी'
सत्तार अल्वी कहते हैं, "जैसे ही मैंने जहाज़ रोक कर स्विच ऑफ़ किया तो मुझे लगा कि मेरी टांगों में से जान निकल चुकी है."
ज़मीन पर मौजूद स्टाफ़ देख चुका था कि जहाज़ से एक मिसाइल गायब है लेकिन सत्तार अल्वी ने कॉकपिट से निकलते ही एक कप चाय तलब की.
सत्तार अल्वी ने सीरियाई सेना को उस जगह के बारे में बताया जहां संभावित तौर पर झड़प हुई थी.
इसके बाद एक हेलिकॉप्टर पर सीरियाई सैनिक उस जगह पहुंचे जहां उन्हें घायल इसराइली पायलट कैप्टन लिट्ज़ मिले जिन्हें गिरफ़्तार कर लिया गया.
सत्तार अल्वी इसराइली पायलट से मुलाक़ात करना चाहते थे लेकिन उससे पहले ही कैप्टन लिट्ज़ की मौत हो गई.
सीरियाई सरकार ने सत्तार अल्वी को देश के सबसे बड़े सम्मान से नवाज़ा जबकि इसराइली पायलट कैप्टन लिट्ज़ का फ़्लाइंग ओवरऑल भी उन्हें ट्रॉफ़ी के तौर पर दिया गया.
सत्तार अल्वी के अनुसार, पाकिस्तान सरकार ने कई साल तक इस घटना को स्वीकार नहीं किया.
"मैं भी चुप रहा. अगर कोई मुझसे पूछता था तो मैं कहता था कि मैं तो कभी सीरिया गया ही नहीं."
लेकिन बाद में पाकिस्तान सरकार की ओर से भी सत्तार अल्वी को 'सितारा-ए-जुर्रत' दिया गया.
नोट: यह कहानी सत्तार अल्वी के इसराइली पायलट से मुक़ाबले पर उनकी ओर से अतीत में दिए गए कई इंटरव्यू पर आधारित है जिनकी बीबीसी से बातचीत के दौरान उन्होंने पुष्टि की है.
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