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दिवाली में पटाखों पर लगा प्रतिबंध लागू क्यों नहीं हो पाता
- Author, अभिनव गोयल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
दिवाली के अगले दिन जब केंद्रीय प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड (सीपीसीबी) ने शहरों के एयर क्वॉलिटी इंडेक्स की सूची जारी की तो उसमें राजधानी दिल्ली, देश के टॉप 15 सबसे प्रदूषित शहरों में शामिल थी.
सीपीसीबी के मुताबिक 12 नवंबर शाम चार बजे दिल्ली का एयर क्वॉलिटी इंडेक्स 218 (पिछले 24 घंटे का औसत) था, जो 'ख़राब' श्रेणी में आता है.
कुछ घंटों के बाद यानी दिवाली की रात लोगों ने जमकर पटाखे चलाए और आतिशबाज़ी की. 13 नवंबर की शाम चार बजे केंद्रीय प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड ने आंकड़े फिर से जारी किए.
इस सूची में दिल्ली का औसत एयर क्वॉलिटी इंडेक्स 358 था, जो 'बहुत ख़राब' श्रेणी में आता है. महज 24 घंटे में दिल्ली की हवा 'ख़राब' श्रेणी से 'बहुत ख़राब' श्रेणी में पहुंच गई.
वायु प्रदूषण का यह हाल सिर्फ दिल्ली तक सीमित नहीं था. नोएडा का एयर क्वॉलिटी इंडेक्स 189 से बढ़कर 363 और हरियाणा के रोहतक में 137 से बढ़कर 383 हो गया. ऐसा ही हाल देश के दूसरे शहरों का भी रहा.
सुप्रीम कोर्ट के आदेश का क्या मतलब है?
दिल्ली-नोएडा में यह सब तब हो रहा था, जब यहां के लोग जहरीली हवा में सांस लेने के लिए मजबूर हैं.
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली और नोएडा में किसी भी तरह के पटाखे चलाने पर पूरी तरह से प्रतिबंध है. इसमें ग्रीन पटाखे भी शामिल हैं.
साल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने इसे लेकर सख्त निर्देश दिया था. कोर्ट ने ग्रीन पटाखों को छोड़कर बाकि सब पटाखों को जलाने पर रोक लगा दी थी. ग्रीन पटाखों को जलाने के लिए भी रात आठ बजे से दस बजे का समय तय किया था.
ऐसे में सवाल उठता है कि सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश का क्या मतलब है? क्या कोर्ट को यह आदेश अब वापस ले लेना चाहिए? आखिर क्यों यह आदेश पुलिस लागू नहीं करवा पा रही है? क्या इसके लिए पुलिस जिम्मेदार है या इसके पीछे सरकार की उदासहीनता है?
इन्हीं सब सवालों के जवाब तलाशने के लिए बीबीसी हिंदी ने उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह, सुप्रीम कोर्ट के वकील नितिन मेश्राम और हिमाचल प्रदेश लॉ यूनिवर्सिटी के प्रोफेसर चंचल कुमार सिंह से बात की है.
पटाखों के लिए पुलिस जिम्मेदार
उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह कहते हैं, "सुप्रीम कोर्ट के दिशा निर्देश वैकल्पिक नहीं होते, उनकी अनिवार्यता होती है. इसे लागू करने का काम पुलिस का था, जो इच्छाशक्ति, सुपरविजन और चेकिंग न होने की वजह से नहीं हो पाया."
वे कहते हैं, "पूरी दिल्ली में पटाखे जलाने वालों के सिर्फ सात चालान हुए हैं, जिससे पुलिस की गंभीरता को समझा जा सकता है. पटाखे जलाने वालों के ख़िलाफ़ पुलिस को आईपीसी की धारा 188, 151 और एक्सप्लोसिव एक्ट के तहत कार्रवाई करनी चाहिए थी."
पूर्व डीजीपी कहते हैं, "वे कहते हैं, "पटाखे जलाने जैसा काम जो पूरी तरह से अपराध नहीं हैं बल्कि एक सामाजिक कुरीती है, उसे न सिर्फ सख्ती बल्कि नागरिक सुरक्षा समितियों की मदद से भी रोका जा सकता था."
"पुलिस उनसे संवाद कर लोगों को जागरूक कर सकती थी और उनसे जानकारी लेकर कार्रवाई करती तो यह नहीं होता.”
दिल्ली में पटाखे चलाने के लिए पूर्व डीजीपी विक्रम सिंह पुलिस के साथ साथ उन मजिस्ट्रेट्स को भी जिम्मेदार मानते हैं, जिन्हें ड्यूटी पर लगाया गया था, ताकि पटाखों की खरीद-बिक्री न हो पाए.
वे इसके लिए वे पुलिस को 70 प्रतिशत और मजिस्ट्रेट्स को 30 प्रतिशत जिम्मेदार मानते हैं.
कोर्ट की अवमानना
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद देश में पटाखों के जलाए जाने को हिमाचल प्रदेश नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर चंचल कुमार सिंह कोर्ट की अवमानना मानते हैं.
वे कहते हैं, "कोर्ट के आदेश को लागू करने की दिक्कत है. इसे करने का काम पुलिस या एडमिनिस्ट्रेटिव एजेंसियां करती हैं, जिन्होंने इसे ईमानदारी से नहीं किया है. यह सीधा-सीधा कोर्ट के आदेश की अवमानना है, जिस पर कार्रवाई होनी चाहिए."
प्रो. चंचल कहते हैं, "सुप्रीम कोर्ट को स्वत संज्ञान लेना चाहिए. उसे भारत सरकार और दिल्ली सरकार के चीफ सेक्रेटरी को तलब करना चाहिए और पूछना चाहिए कि आदेश का पालन क्यों नहीं हुआ."
वे कहते हैं, "कोई भी ऐसी चीज नहीं है जिसे सरकार लागू न कर पाए. दूसरे विश्व युद्ध के समय लंदन दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में आता था, वहां की टेम्स नदी दुनिया की सबसे प्रदूषित नदियों में से एक थी, जैसे हमारे यहां यमुना है. जब वो सब ठीक हो सकता है, तो भारत में क्यों नहीं हो सकता है. इसके लिए सिर्फ साफ नीयत चाहिए."
पटाखे जलाना अपराध?
सुप्रीम कोर्ट के वकील नितिन मेश्राम कहते हैं, "सुप्रीम कोर्ट जब पटाखों पर बैन करने की याचिका पर सुनवाई कर रहा था, तब उसे सरकार को कहना चाहिए था कि वह हमें पॉलिसी बनाकर दिखाएं, जो उसने नहीं किया."
वे कहते हैं, "देश में अलग-अलग तरह के प्रदूषण रोकने के लिए कई कानून हैं. सुप्रीम कोर्ट को सरकार से यह कहना चाहिए था कि उन कानूनों में बदलाव कर वह पटाखे जलाने को अपराध बनाए.
मेश्राम कहते हैं, "सुप्रीम कोर्ट में पटाखे बनाने वाली कंपनियां ने तर्क दिए कि दिवाली हिंदू त्योहार है और इस दिन पटाखे न जलाना व्यक्ति के लिए धर्म की स्वतंत्रता का हनन है."
"सुप्रीम कोर्ट ने उन सभी तर्कों को खारिज करते हुए कहा है कि पटाखे फोड़ना किसी धर्म की इंटरनल प्रैक्टिस नहीं है. जब पटाखे नहीं थे तो क्या तब धर्म नहीं था?"
वे कहते हैं, "सुप्रीम कोर्ट को इस तरह के आदेश पारित करने के लिए सरकार को सबसे पहले विश्वास में लेना चाहिए और देखना चाहिए कि वह इसे कैसे लागू करेगी.
"उसे यह भी देखना चाहिए कि आदेश को लागू करने में किन दिक्कतों का सामना करना पड़ सकता है, फिर उसी हिसाब से उसे सुलझाना चाहिए."
सरकारों का टकराव
दिल्ली में आम आदमी पार्टी की सरकार है, वहीं केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की. दिवाली के अगले दिन दिल्ली के पर्यावरण मंत्री गोपाल राय ने दिल्ली के प्रदूषण के लिए हरियाणा और उत्तर प्रदेश को जिम्मेदार बताया, जहां बीजेपी की सरकार है.
प्रोफ़ेसर चंचल कुमार सिंह कहते हैं, "दिल्ली की पुलिस केंद्र के पास है, ऐसे में सुप्रीम कोर्ट के आदेश को लागू करवाने के लिए पुलिस की जरूरत है. अगर वह अपना काम ठीक से नहीं करेगी तो यह आदेश कभी लागू नहीं हो पाएगा."
वे कहते हैं, "पटाखों को रोकने के लिए दिल्ली सरकार को न सिर्फ केंद्र से बल्कि पड़ोसी राज्यों से भी कॉर्डिनेशन करने की जरूरत है, सिर्फ ठिकरा फोड़ने से काम नहीं चलेगा, क्योंकि यह एक गंभीर मामला है, लोगों की जान दांव पर लगी हुई है."
ऐसी ही बात सुप्रीम कोर्ट के वकील नितिन मेश्राम करते हैं. वे कहते हैं, "केंद्र की मोदी सरकार एक तरह से हिंदुत्व की सरकार मानी जाती है. ज्यादातर लोगों को मानना है कि दिवाली एक हिंदू त्योहार है और ऐसे में सरकार कहीं न कहीं खुद नहीं चाहती है कि सुप्रीम कोर्ट का आदेश लागू हो, क्योंकि वह उन्हें नाराज नहीं करना चाहती है."
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