You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
भारत में बना इंजेक्शन पुरुषों को पिता बनने से कैसे रोकेगा
- Author, अमन यादव
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
चिकित्सा की दुनिया में इन दिनों इंडियन काउंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च (आईसीएमआर) का एक प्रयोग सुर्खियां बटोर रहा है.
सात साल तक चले शोध के बाद तैयार किए गए रिवर्सिबल इंजेक्टेबल मेल कांट्रसेप्टिव इंजेक्शन का क्लीनिकल ट्रायल पूरा हो गया है.
यानी अब इस इंजेक्शन के इस्तेमाल को मंजूरी मिल गई है.
आईसीएमआर की ओर से दावा किया गया है कि इस इंजेक्शन का कोई गंभीर साइड इफेक्ट नहीं है और यह बहुत ही कारगर है.
कैसे हुए क्लीनिकल ट्रायल?
इसके तीसरे क्लीनिकल ट्रायल के रिज़ल्ट पिछले महीने ही एंड्रोलॉजी जर्नल में प्रकाशित हुए हैं.
रिवर्सिबल इनहिबिशन ऑफ स्पर्म अंडर गाइडेन्स (आरआइएसयूजी) नामक इस इंजेक्शन को मंजूरी पाने से पहले तीन चरणों में हुए ट्रायल से गुजरना पड़ा.
इस ट्रायल में दिल्ली, उधमपुर, लुधियाना, जयपुर और खड़गपुर के लोगों को शामिल किया गया था.
इस परीक्षण में 25 से 40 साल के 303 स्वस्थ, सेक्सुअली एक्टिव शादीशुदा पुरुषों और उनकी सेक्सुअली एक्टिव पत्नियों को भी शामिल किया गया था.
इन जोड़ों को तब ही ट्रायल में शामिल किया गया जब ये परिवार नियोजन के क्लिनिक और यूरोलॉजी विभाग के संपर्क में आए थे.
इन जोड़ों को वैसेक्टमी या नो स्कैल्पल वैसेक्टमी की ज़रूरत थी. सरल शब्दों में कहें तो ये ऐसे परिवार थे जिन्हें अब बच्चे नहीं चाहिए.
इन ट्रायल्स के दौरान पुरुषों को 60 एमजी रिवर्सिबल इनहिबिशन ऑफ स्पर्म अंडर गाइडेंस इंजेक्ट किया गया था.
शोध या ट्रायल का परिणाम
आईसीएमआर ने अपने शोध और ट्रायल में पाया है कि आरआइएसयूजी अभी तक के सभी (पुरुषों और महिलाओं) कॉन्ट्रसेप्टिव में सबसे असरदार है. और इसके कोई भी गंभीर साइड इफ़ेक्ट नहीं दिख रहे हैं.
शोध में पाया गया है कि एज़ुस्पर्मिया का लक्ष्य प्राप्त करने में आरआइएसयूजी 97.3% कामयाब रही. वहीं, प्रेग्नन्सी को रोकने में यह 99.02% प्रभावशाली रही.
एज़ुस्पर्मिया स्पर्म निकलने में अवरोध को कहते हैं. एक बार इन्जेक्शन लगवाने पर यह करीब 13 साल तक प्रभावी रहेगा यानी प्रेग्नेन्सी को रोक सकेगा.
जहाँ कंडोम और कंबाइंड ओरल कंट्रासेप्टिव पिल (OCP) एक सीमित समय तक महिला को गर्भधारण से रोकने में मददगार साबित होते हैं.
वहीं, कॉपर टी एक लम्बे समय के लिए गर्भधारण रोकने में मददगार मानी जाती है.
वैसेक्टमी स्थाई नसबंदी का सर्जिकल तरीका है.
लेकिन कहा जा रहा है कि 13 साल का वक़्त पुरुषों में असमंजस और भ्रम पैदा कर सकता है. क्योंकि इसे न तो स्थाई की श्रेणी में देखा जाएगा और न ही सीमित समय के लिए कारगर तरीके में.
बदलाव के दौर की शुरुआत?
विशेषज्ञ मानते हैं कि गर्ध धारण करने से रोकने के लिए बनी दवाओं ने महिलाओं को परिवार नियोजन की स्वतंत्रता दी.
हालांकि, इसने गर्भ निरोध की ज़िम्मेदारी भी महिलाओं पर ही डाली.
आंकड़ों पर नज़र डालें तो पता चलता है कि भारत में महिलाओं को पुरुषों की तुलना में इसकी ज़िम्मेदारी ज़्यादा उठानी पड़ती है.
जबकि ऐसा नहीं है कि पुरुषों के पास ऐसे साधन नहीं हैं जिनके ज़रिए वे परिवार नियोजन पर काम कर सकें.
पुरुषों के लिए कंडोम उपलब्ध हैं. हाल ही में इसके लिए गोलियों के इस्तेमाल की शुरुआत भी हुई है.
साल 2019-21 के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS-5) के मुताबिक़, 10 पुरुषों में एक से भी कम यानी 0.5% ही कंडोम का इस्तेमाल करते हैं.
ऐसे में अभी भी महिलाओं की नसबंदी समाज में ज़्यादा प्रचलन में रहती है.
जबकि विशेषज्ञ कहते हैं कि पुरुष नसबंदी सुरक्षित और आसान है लेकिन वो ना के बराबर होती है.
इस सर्वे में उत्तर प्रदेश, तेलंगाना और बिहार के 50% पुरुषों ने बताया कि नसबंदी महिलाओं का काम है और पुरुषों को इन सबकी चिंता नहीं करनी चाहिए.
डॉक्टरों के मुताबिक़, पुरुषों में निरोध को लेकर कई मिथक भी जुड़े हुए हैं. जैसे कंडोम के इस्तेमाल को लेकर जहां ये सोच बरकरार है कि इससे यौन सुख कम होता है तो वहीं नसबंदी को लेकर उन्हे शरीर में कमज़ोरी और मर्दाना शक्ति ख़त्म हो जाने का डर लगा रहता है.
'फेडरेशन ऑफ ऑब्स्टेट्रिक एंड गाइनीकोलॉजिकल सोसाइटीज ऑफ इंडिया' की अध्यक्ष डॉक्टर एस शांता कुमारी बताती हैं कि भारतीय समाज में पुरुष नसबंदी या वैसेक्टमी को लेकर कई मिथक और ग़लतफहमियां हैं.
भारतीय पुरुष बच्चे पैदा ना कर पाने को मर्दानगी पर चोट जैसा मानते हैं, जिसके चलते सारा दबाव महिलाओं पर आ जाता है.
'इंस्टिट्यूट फॉर व्हाट वर्क्स टू अड्वान्स जेन्डर इक्वालिटी' (IWWAGE) की रिसर्च फ़ेलो बिदिशा मोंडल बीबीसी से बातचीत के दौरान बताती हैं कि महिलाओं की नसबंदी भारत में सबसे ज़्यादा होती है.
हेल्थ मैनेजमेंट इनफॉर्मेशन सिस्टम जो एक सरकारी संस्थान है. उसके डेटा का हवाला देते हुए बिदिशा बताती हैं कि पुरुषों के मुकाबले 93% नसबंदी महिलाओं की हुई है.
वहीं, पुरुषों का कॉन्ट्रसेप्टिव से डर के लिए इतिहास भी ज़िम्मेदार है.
विशेषज्ञ कहते हैं कि साल 1975 में जबरन नसबंदी ने पुरुषों के भीतर एक डर पैदा कर दिया था, जिसके चलते यह एक सोशल टैबू बन गया. वहीं नसबंदी को पुरुष अपने पौरुष यानी मैनहुड से जोड़ कर भी देखते हैं. उनको लगता है कि नसबंदी करने से उनकी मर्दानगी ख़त्म हो जाएगी.
इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ़ पॉपुलेशन साइंसेज़ के हेड एसपी सिंह ने बीबीसी को बताया है कि ICMR के इस शोध और क्लीनिकल ट्रायल के बारे में हमें जानकारी नहीं है.
लेकिन ये इंजेक्शन भारत की जनसंख्या को नियंत्रित करने में कितना असरदार होगा यह तो वक़्त ही बताएगा.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)