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दिल्ली-एनसीआर में ग्रीन पटाखों के इस्तेमाल को हरी झंडी, जानिए क्या होते हैं ग्रीन पटाखे
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कुछ पाबंदियों के साथ दिल्ली-एनसीआर (दिल्ली राजधानी क्षेत्र) में दिवाली मनाने के लिए ग्रीन पटाखों को चलाने की अनुमति दे दी.
दिल्ली एनसीआर में दिल्ली के अलावा नोएडा, ग़ाज़ियाबाद, गुरुग्राम, फ़रीदाबाद समेत कई और इलाक़े आते हैं.
लाइव लॉ और बार एंड बेंच के मुताबिक़ कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि 15 अक्तूबर (बुधवार) से 21 अक्तूबर तक दिल्ली एनसीआर में ग्रीन पटाखों को बेचा जा सकता है. अदालत के मुताबिक़ ये पटाखे कुछ निर्धारित जगहों से ही बेचे जा सकते हैं. इन जगहों का निर्धारण पुलिस के साथ विचार विमर्श करके संबंधित डिस्ट्रिक्ट कलेक्टर्स और कमिश्नर करेंगे.
उत्तर भारत के कई राज्य खासकर पंजाब, हरियाणा और दिल्ली वायु प्रदूषण के खतरे से जूझ रहे हैं. ऐसे में कई लोग दिवाली का त्योहार मनाते समय पटाखों से उठने वाले धुएं को लेकर चिंतित हैं.
एक ओर जहां कई लोगों का मानना है कि दिवाली का त्योहार बिना पटाखों के अधूरा है तो वहीं कुछ लोग पर्यावरण संबंधी चिंताओं के कारण इनसे दूरी बनाने की सलाह देते हैं.
ऐसे में कम धुआं छोड़ने वाले और पर्यावरण को कम नुकसान पहुंचाने वाले ‘ग्रीन पटाखे' कुछ हद तक समस्या का समाधान करने में मदद कर सकते हैं.
इस लेख में हम ग्रीन पटाखों के बारे में बात करेंगे कि ये पारंपरिक पटाखों से कैसे अलग हैं?
दरअसल 'ग्रीन पटाखे' राष्ट्रीय पर्यावरण अभियांत्रिकी अनुसंधान संस्थान (नीरी) की खोज हैं जो पारंपरिक पटाखों जैसे ही होते हैं पर इनके जलने से कम प्रदूषण होता है.
नीरी एक सरकारी संस्थान है, जो वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद (सीएसआईआर) के अंदर आता है.
ग्रीन पटाखे क्या हैं?
ग्रीन पटाखे दिखने, जलाने और आवाज़ में सामान्य पटाखों की तरह ही होते हैं, लेकिन इनसे प्रदूषण कम होता है.
सामान्य पटाखों की तुलना में इन्हें जलाने पर 40 से 50 फ़ीसदी तक कम हानिकारक गैस पैदा होती हैं.
नीरी के चीफ़ साइंटिस्ट डॉक्टर साधना रायलू का कहना है कि इनसे हानिकारक गैसें हम निकलती हैं, लेकिन ऐसा भी नहीं है कि इनसे प्रदूषण बिल्कुल नहीं होगा.
डॉक्टर साधना बताती हैं कि सामान्य पटाखों के जलाने से भारी मात्रा में नाइट्रोजन और सल्फ़र गैस निकलती है, लेकिन उनके शोध का लक्ष्य इनकी मात्रा को कम करना था.
ग्रीन पटाखों में इस्तेमाल होने वाले मसाले बहुत हद तक सामान्य पटाखों से अलग होते हैं. नीरी ने कुछ ऐसे फ़ॉर्मूले बनाए हैं जो हानिकारक गैस कम पैदा करेंगे.
कैसे-कैसे ग्रीन पटाखे
डॉक्टर साधना बताती हैं कि उनके संस्थान ने ऐसे फॉर्मूले तैयार किए हैं जिसके जलने के बाद पानी बनेगा और हानिकारक गैसों में घुल जाएगा.
इन ग्रीन पटाखों की बेहद ख़ास बात है जो सामान्य पटाखों से उन्हें अलग करती है. नीरी ने चार तरह के ग्रीन पटाखे बनाए हैं.
पानी पैदा करने वाले पटाखेः ये पटाखे जलने के बाद पानी के कण पैदा करेंगे, जिसमें सल्फ़र और नाइट्रोजन के कण घुल जाएंगे. नीरी ने इन्हें सेफ़ वाटर रिलीज़र का नाम दिया है. पानी प्रदूषण को कम करने का बेहतर तरीका माना जाता है.
सल्फ़र और नाइट्रोजन कम पैदा करने वाले पटाखेः नीरी ने इन पटाखों को स्टार क्रैकर का नाम दिया है, यानी सेफ़ थर्माइट क्रैकर. इनमें ऑक्सिडाइजिंग एजेंट का उपयोग होता है जिससे जलने के बाद सल्फ़र और नाइट्रोजन कम मात्रा में पैदा होती है. इसके लिए ख़ास तरह के केमिकल का इस्तेमाल होता है.
कम एल्यूमीनियम का इस्तेमालः इस पटाखे में सामान्य पटाखों की तुलना में 50 से 60 फ़ीसदी तक कम एल्यूमीनियम का इस्तेमाल होता है. इसे संस्थान ने सेफ़ मिनिमल एल्यूमीनियम यानी SAFAL का नाम दिया है.
अरोमा क्रैकर्सः इन पटाखों को जलाने से न सिर्फ़ हानिकारण गैस कम पैदा होगी बल्कि ये बेहतर खुशबू भी बिखेरेंगे.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित