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हिमाचल प्रदेश: ब्यास नदी के आस पास ही सबसे ज़्यादा तबाही क्यों हुई है
अर्चना फुल
वरिष्ठ पत्रकार, शिमला से बीबीसी हिंदी के लिए
पिछले कुछ दिनों से लगातार हो रही बारिश से हिमाचल प्रदेश में भारी तबाही हो रही है.
ब्यास, सतलुज, रावी, चिनाब (चंद्र और भागा) और यमुना नदियां उफान पर हैं. पानी और तेज़ हवाओं से जानोमाल का ख़तरा पैदा हो गया है.
संवेदनशील इलाक़ों में ब्यास नदी के पास घनी आबादी वाले कुल्लू और मनाली में भीषण तबाही हुई है. ये समय के साथ प्रकृति से होते रहे खिलवाड़ का नतीजा है.
मंडी से मनाली तक का हाईवे कई जगह पर बंद है. सड़क के कई हिस्से टूट गए हैं. पिछले दो दिनों में तेज़ रफ़्तार से बह रहा पानी कई जगहों पर पुलों, इमारतों और गाड़ियों को बहा ले गया है.
राज्य के आपदा प्रबंधन विभाग के एक प्रवक्ता के मुताबिक पिछले 60 घंटों में हिमाचल प्रदेश में भारी बारिश की वजह से 17 लोगों की मौत हुई है.
प्रवक्ता के मुताबिक़ हिमाचल प्रदेश में 29 जगहों पर भूस्खलन हुआ है, एक जगह बादल फटा है, 24 जगहों पर बाढ़ आई है, 825 सड़कों को नुक़सान हुआ है और बिजली की 4597 लाइनें ख़राब हुई हैं.
इसके अलावा पानी के 795 पाइप भी टूट गए हैं.
भारी बारिश की वजह से पहाड़ों से बहकर आ रहे पानी के साथ मलबा भी आ रहा है और शिमला कालका हाईवे को बार-बार बंद करना पड़ रहा है. तेज़ पानी के साथ पत्थर गिर रहे हैं और भूस्खलन भी हो रहा है.
भारी बारिश की वजह से कई जगहों पर स्थानीय निवासी और पर्यटक फंसे हुए हैं. एनडीआरएफ़ की टीमों ने कई लोगों को बचाया भी है.
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मंडी में रहने वाले कई बुज़ुर्ग लोगों का कहना था कि उन्होंने पहले कभी इस तरह का पानी ब्यास नदी में नहीं देखा.
वरिष्ठ फोटो पत्रकार बीरबल शर्मा कहते हैं, "ब्यास में पानी ने सभी रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं. प्राचीन पंचवक्त्र मंदिर डूब गया है, ऐसा मेरे जीवनकाल में कभी नहीं हुआ है."
मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू का कहना है कि शुरुआती अनुमान के मुताबिक़ राज्य को तीन से चार हज़ार करोड़ रुपये का नुक़सान हुआ होगा.
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देवभूमि कहे जाने वाले हिमाचल प्रदेश में भारी बारिश की वजह से हो रही बर्बादी अप्रत्याशित नहीं है.
पिछले कई दशकों में पर्यटन का केंद्र इस पहाड़ी राज्य ने विकास के मामले में मैदानी इलाक़ों की राह पर चलने की कोशिशें की हैं और स्पष्ट रूप से इसका नतीजा प्राकृतिक आपदाओं में दिख रहा है.
चाहे कमज़ोर पहाड़ो में चार लेन हाइवे निकालना हो या हाइड्रो प्रोजेक्ट के लिए सुरंगे खोदना. इससे पहाड़ और पत्थर हिलते हैं.
भारी, बेतरतीब और असुरक्षित निर्माण हर जगह हो रहा है और निर्माण का कचरा नदियों और उनकी शाखाओं तक पहुंच रहा है. इन सबने मिलकर बारिश की तबाही को और भी बढ़ा दिया है.
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हिमाचल प्रदेश में नदियों से कथित अवैज्ञानिक खनन ने भी ऐसी आपदाओं का ख़तरा बढ़ने की चिंताएं पैदा की हैं.
पर्यावरणविदों को लगता है कि हिमाचल प्रदेश में उफ़नी नदियों, ख़ासकर ब्यास की वजह से हुई भारी तबाही का एक कारण ख़ास तौर पर स्पष्ट है.
और इसकी तुलना साल 2000 में सतलुज नदी में आई बाढ़ से की जा सकती है. तब रामपुर शहर में इससे भारी तबाही हुई थी, वहां बहुत से लोग नदी के पास बने निर्माणों में रह रहे थे.
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ब्यास नदी की घाटी में भी, निर्माण नदी के बेहद आसपास तक पहुंच गया है, ऐसे में अचानक आई बाढ़ से नुक़सान का ख़तरा और अधिक बढ़ गया है.
ये वास्तव में हुआ भी है, ब्यास में तेज़ रफ़्तार से आ रहे पानी ने रास्ता बदला और मनाली से मंडी के बीच बहुत से मकान, वाहन, जानवर और कई जगहों पर राष्ट्रीय राजमार्ग के हिस्से बह गए.
वैसे भी, ब्यास की रफ़्तार इस क्षेत्र में तेज़ होती है और पानी सड़क से बहुत दूर नहीं होता है.
पर्यावरण विशेषज्ञ संजय सहगल कहते हैं, "अब समय आ गया है जब हम पर्यटन पर चलने वाले इस राज्य में विकास का ऐसा मॉडल अपनाएं जो पर्यावरण के अनुरूप हो. हम एक सीमा के बाद प्रकृति से छेड़छाड़ नहीं कर सकते हैं. अवैज्ञानिक रूप से विकास कार्यों के लिए पहाड़ों में विस्फोट और निर्माण कार्यों के मलबे को बिना योजना के डंप करने और अनियंत्रित संख्या में वाहनों के पहाड़ी सड़कों पर चलने के दुष्परिणाम हो सकते हैं. हम इसका अहसास नहीं कर पा रहे हैं."
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राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन संस्थान के एक 2017 में हुए एक शोध से पता चला था कि हिमाचल प्रदेश में कुल 118 हाइड्रो प्रोजेक्ट हैं जिनमें से 67 पहाड़ खिसकने वाले ज़ोन में हैं.
राज्य के आदिवासी बहुल ज़िले किन्नौर, कुल्ली और कई अलग हिस्सों में जब हाइड्रो प्रोजेक्ट लगाये जा रहे थे तब पर्यावरणविदों और प्रभावित स्थानीय नागरिकों ने उनका विरोध भी किया था और कई जन अभियान भी चले थे.
लेकिन तत्कालीन सत्ताधारी राजनीतिक दलों ने इन्हें नज़रअंदाज़ कर दिया था.
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चर्चित पर्यावरणविद कुलभूषण अभिमन्यु कहते हैं, "पर्यावरणविद जागरूक हैं और पर्यावरण की रक्षा के लिए विकास के परिप्रेक्ष्य को फिर से उन्मुख करके लंबे समय में एक बड़ी भूमिका निभाने के लिए राजनीतिक नेतृत्व की ओर देख रहे हैं."
चंबा ज़िले के रहने वाले और चिपको आंदोलन का हिस्सा रहे अभिमन्यु कहते हैं, "समय आ गया है जब हम प्रकृति के इस आक्रोश से सबक ले, इस संवेदनशील पर्यावरण और पारिस्थितिकी रूप से नाज़ुक क्षेत्र में पर्यावरण की क़ीमत पर हो रहे असंतुलित विकास की वजह से प्रकृति का कोप बढ़ रहा है."
अभिमन्यु कहते हैं कि हिमाचल प्रदेश एक पर्यटन राज्य है और लोग यहां प्राकृतिक सुंदरता को देखने आते हैं.
वो सवाल करते हैं, "देखों, हम प्रकृति के साथ खिलवाड़ करके अपने ख़ूबसूरत पहाड़ों के साथ क्या कर रहे हैं. बदले में प्रकृति भी हमारे लिए ख़तरनाक हो रही है. हमें चार लेन वाली सड़कों की ज़रूरत क्यों हैं, बड़े ढांचागत या हाइड्रो प्रोजेक्ट हमें क्यों चाहिए जो पहाड़ों को भीतर से खोखला कर रहे हैं? हम ऐसे प्रोजेक्ट शुरू करने से पहले पहाड़ों और नदियों की वहन क्षमता का अध्ययन क्यों नहीं करते हैं ताकि पर्यावरण को बचाया जा सके."
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