सूडान संघर्षः राजधानी में कई रिहाइशी इलाके बन गए हैं कब्रिस्तान, आंखों देखा हाल
एथर शैलेबी
बीबीसी न्यूज़, अरबी

चेतावनीः इस कहानी में ग्राफ़िक कंटेंट हैं. कुछ तस्वीर और घटनाओं का ब्योरा विचलित कर सकता है.पहचान छुपाने के लिए लिए नाम बदल दिए गए हैं.
ओमर का कहना है कि सूडान की राजधानी खार्तूम में भारी लड़ाई के चलते उन्हें अपने पड़ोस में कम से कम 20 लोगों को उनके घरों में ही दफ़न करना पड़ा.
वो कहते हैं कि ऐसा कम ही होता है कि आप अपना दरवाज़ा खोलें और शव को नोचते कुत्ते न मिलें.
वो कहते हैं, “मैंने तीन लोगों को उनके घरों में फ़र्श के नीचे दफ़न किया और बाकियों को अपने घर के पास सड़क के मुहाने के पास.”
"मेरा पड़ोसी अपने घर में ही मारा गया. मैं कुछ कर नहीं सका इसलिए उसके घर के फर्श की टाइल्स को हटा कर वहां एक कब्र खोदी और वहीं दफन कर दिया."

'आस-पास की जगह कब्रिस्तान में तब्दील हो रही है’
बीच-बीच में संघर्ष विराम के बावजूद खार्तूम में सेना और अर्द्ध सैनिक बल रैपिड सपोर्स फ़ोर्स के बीच भारी लड़ाई के दौरान स्नाइपर छतों पर होते हैं.
हिंसा के कारण ओमर और अन्य लोग शवों को कब्रिस्तान तक पहुंचा नहीं पा रहे, “गर्मी में शव सड़ रहे हैं. हम क्या कह सकते हैं? ख़ार्तूम के कई रिहाइशी इलाक़े कब्रिस्तान में तब्दील हो रहे हैं.”
तीन हफ़्ते पहले, ओमर ने खार्तूम में अल इमतिदाद ज़िले में अपने घर से महज कुछ ही मीटर दूर सड़क के किनारे चार लोगों की कब्र खोदी थी.
उन्होंने बताया कि आस-पास के इलाकों में उन्हीं की तरह ये काम करने वाले कुछ लोगों को वो जानते हैं.
उनके मुताबिक, “मारे गए लोगों में अधिकांश को खार्तूम यूनिवर्सिटी के पास वाले इलाक़े में दफन किया गया है. अन्य शवों को मोहम्मद नागुइब रोड के पास के इलाकों में दफ़नाया गया.”
हालांकि घरों और आस पड़ोस में दफ़नाए गए शवों की संख्या के बारे में आधिकारिक आंकड़ा नहीं है लेकिन ओमर का कहना है कि ‘ये दर्जनों’ हो सकते हैं.

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सैनिकों की कब्र
हामिद ने बीबीसी को बताया कि सेना के एक विमान के क्रैश होने के बाद राजधानी से 12 किलोमीटर दूर बाहरी इलाक़े में सेना के तीन जवानों को दफ़नाया.
उन्होंने कहा, “उस दौरान संयोग से मैं उस इलाक़े में था. विमान के मलबे से शवों को पांच लोग और मैंने मिलकर निकाला और शामबात में एक रिहाइशी इलाक़े में उन्हें दफ़नाया.”
उस इलाके में पिछले 20 साल से रह रहे एक प्रॉपर्टी एजेंट का मानना है कि मरे हुए लोगों को जल्द से जल्द दफ़नाना "मानवीयता का काम" है.
वो कहते हैं, “ये महत्वपूर्ण नहीं है कि हम मरे हुए लोगों को कहां दफ़ना रहे हैं. दफ़नाना प्राथमिकता है. ये मानवीय कार्य है. कब्रिस्तान तक पहुंचने की यात्रा में कई दिन लग सकते हैं और हर जगह स्नाइपर मौजूद हैं.”
उनके अनुसार, “हम समाज को बीमारियों की आपदा से बचाने की कोशिश कर रहे हैं. अगर हम इस तरह शवों को छोड़ दें तो गर्मी की वजह से वो तेजी से सड़ने लगेंगे और आवारा जानवर उन्हें नोचने लगेंगे. यह धार्मिक के साथ नौतिक ज़िम्मेदारी भी है.”
हामिद कहते हैं कि बुरी तरह जले हुए शवों की तस्वीर अभी भी उनके दिमाग में घूम रही है और उन तीन लोगों को दफ़नाने के बाद वो काफ़ी सदमे में रहे, “मेरी नींद उड़ गई थी और मैं दिन में केवल एक बार खाना खा पा रहा था.”

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‘सच्चाई को दफ़नाना’
हालांकि डॉक्टरों की यूनियन के प्रमुख ने घरों और सार्वजनिक स्थानों पर शवों को दफ़नाने की आलोचना की है.
युद्ध अपराध के मुकदमे चलाने में उन्हें कुछ अनुभव है.
सूडान डॉक्टर्स ट्रेड यूनियन की कमेटी के सेक्रेटरी जनर लडॉ. आटिया अब्दुल्ला ने इस तरह दफ़नाने को अपरिपक्व क़रार दिया और चेताया कि इससे ‘सच्चाई भी दफ़्न’ हो जाएगी.
वो कहते हैं कि लावारिस शवों को घरों और रिहाइशी इलाक़ों में दफ़नाने का मतलब है कि मृत्यु के कारणों या सबूतों का पूरी तरह मिट जाना.
उनके मुताबिक, “युद्ध समाप्त होने के बाद ये सवाल सबसे पहले उठेगा कि मौत का क्या कारण था? जो लोग मारे गए उनकी पहचान क्या थी? कौन लूटपाट के दौरान मारा गया और कौन मौजूदा तनाव की वजह से मारा गया? ये सारी चीजें हमें गृह युद्ध के बारे में ज़रूरी सूचनाएं देंगी. इस तरह से तो ये सारे जवाब शवों के साथ ही दफ़्न हो जाएंगे.”
डॉ. आटिया का कहना है कि शवों को पहचान के बाद समय से और सम्मानजनक तरीक़े से दफ़ानाए जाने चाहिए.
उन्होंने इस बात ज़ोर दिया कि दफ़नाने की प्रक्रिया को स्वास्थ्य महकमे जैसे रेड क्रॉस और सूडानी रेड क्रीसेंड पर छोड़ देना चाहिए.
वो कहते हैं, “मरे हुए लोगों को इस तरह दफ़नाना सही नहीं है. दफ़नाने की प्रक्रिया में सरकार के प्रतिनधि, अभियोजन, फ़ारेंसिक एक्सपर्ट और रेड क्रास का होना ज़रूरी है. डीएनए सैंपल भी इकट्ठा किए जाने चाहिए.”

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अंतरराष्ट्रीय दबाव
जब बीबीसी ने पूछा कि ऐसे समय में जब देश में नियम और क़ानून ध्वस्त हो चुका है क्या ये प्रक्रिया निभाना संभव है, उन्होंने कहा कि अन्य देशों को इसमें भूमिका निभानी चाहिए.
डॉ. आटिया का कहना है, “युद्ध को रोकने के लिए दोनों पक्षों पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ाना चाहिए. हमें सारी ज़िम्मेदारी रेड क्रॉस और रेड क्रिसेंट पर नहीं छोड़ देनी चाहिए.”
हालांकि ओमर और हामिद ने कहा कि दफ़नाने से पहले वो मृतकों की तस्वीरें लेते हैं ताकि भविष्य में उनकी पहचान की जा सके.
लेकिन डॉ. आटिया का कहना है कि जो लोग जहां तहां दफ़नाने की प्रक्रिया में शामिल हैं, उनका क़ानून पक्ष कमज़ोर है.
"इस तरह से और इन जगहों पर दफ़नाने को लेकर किसी ने भी उन्हें अनुमति नहीं दी है और आधिकारिक रूप से मृत्यु प्रमाण पत्र नहीं दिए गए. ये क़ानूनी सवाल है."
वो ये भी चिंता ज़ाहिर करते हैं कि इससे बीमारी फैलने का डर है.
उनके मुताबिक़, उथली कब्रों में दफ़नाने से इसकी आशंका ज्यादा है कि उन्हें आवरा कुत्ते खोद निकालें. दफ़नाने के सही तरीके का इस्तेमाल नहीं हो रहा है.
हालांकि हामिद का कहना है कि अधिकांश सूडानी को पता है कि कब्र कैसे खोदें जहां कम से कम एक मीटर नीचे शवों को दफ़नाया जा सके.
शवों को दफनाने का कुछ व्यस्थित कोशिशें भी जारी हैं. हामिद रेड क्रॉस के साथ मिलकर सड़कों से शवों को हटा रहे हैं.

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एक मात्र हल
डॉ. आटिया की आलोचना के बावजूद लोगों को लगता है कि सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रणाली के पूरी तरह ध्वस्त होने की स्थिति में उनके पास कोई और चारा नहीं हैं.
पिछले महीने 11 मई को सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हुआ जिसमें दिख रहा है कि दो सूडानी महिला डॉक्टरों मैगडोलिन और माग्डा यूसुफ़ घाली को उनके बगीचे में दफ़नाया जा रहा है.
उनके भाई ने बीबीसी को बताया कि उस समय केवल यही एक तरीक़ा था, “उनके शव 12 दिनों तक बाहर पड़े हुए थे.”

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आंखों में आंसू लिए वो कहते हैं, “पड़ोसियों ने घर से बदबू आने की शिकायत की थी इसके बाद कुछ लोग आगे आए और उन्हें एक कब्र में दफ़ना दिया.”
सूडान के डॉक्टरों की ट्रेड यूनियन ने 28 मई को 865 लोगों की मौत को दर्ज किया था. लेकिन अगर अनौपचारिक दफ़नाने की घटनाओं को शामिल किया जाए तो ये बहुत ज्यादा है.
स्वास्थ्य विभाग रेड क्रॉस और सुडानी रेड क्रिसेंट के साथ मिलकर शवों को ठिकाने लगाने की कोशिश कर रहे हैं लेकिन लड़ाई से उनके काम में बाधा पहुंच रही है.
इन हालात में युद्ध अपराध ट्रिब्यूनल स्थापित किए जाने की संभावनाएं काफ़ी कम हैं.
उन दो बहनों के भाई ने उस हालात का ज़िक्र किया जिसमें लोग रहने को मजबूर हैं, “मेरी बहने अपने ही बगीचे में एक गड्ढे में दफ़्न की गईं. उनका अंत ऐसा होगा, मैंने कभी सोचा नहीं था.”
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