सूडान संघर्षः वो तीन संभावनाएं, जिस तरफ़ जा सकता है मुल्क

मिलिटरी हेलीकॉप्टर

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    • Author, जो इनवुड
    • पदनाम, बीबीसी न्यूज़नाइट

सूडान में आंशिक संघर्ष विराम और हिंसा में कमी आने के बावजूद, कुछ लोगों को लगता है कि ये इस लड़ाई का अंत है और अब सवाल ये है कि आने वाले कुछ हफ़्तों और महीनों में हालात किस ओर जाते हैं.

आने वाले समय में देश में क्या होगा, इस पर बीबीसी ने सूडान मामलों के जानकारों से बात की है.

जो संभावनाएं दिखाई दे रही हैं, उनके बारे में कहा जा रहा है कि तीन स्थितियां हो सकती हैं.

ये स्थितियां इस प्रकार हैं-

1. सैन्य विजय

इस संघर्ष में दोनों ही पक्षों में से कोई जीत जाए, इसकी संभावना बहुत कम दिखाई देती है क्योंकि दोनों पक्षों के पास अलग अलग चरणों में बढ़त हासिल है.

देश में शासन कर रहा सैनिक जुंटा दो धड़ों में बँट गया है और हर कोई जल्द विजयी होने का दावा कर रहा है.

सेना अध्यक्ष जनरल अब्देल फतेह अल बुरहान जुंटा के प्रमुख हैं.

जबकि अर्धसैनिक बल 'रैपिड सपोर्ट फ़ोर्स' यानी आरएसएफ के प्रमुख मोहम्मद हमदान दगालो यानी हेमेदती जुंटा के उप प्रमुख हैं.

खार्तूम के सेंट्रल मार्केट में ध्वस्त इमारतें

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इमेज कैप्शन, खार्तूम के सेंट्रल मार्केट में ध्वस्त इमारतें.

जो लोग राजधानी खार्तूम में रह रहे हैं, उनके बयान से ऐसा लगता है कि शहर में आरएसएफ़ को थोड़ी बढ़त हासिल है.

ये चलायमान, गुरिल्ला बल है जो पारंपरिक युद्ध में दक्ष सेना के मुक़ाबले बहुत जल्द हालात में ढल सकता है.

खार्तूम शहर के युद्ध में ये दक्षता आरएसएफ़ के लिए बहुत फ़ायदेमंद साबित हो रहा है.

लेकिन सेना के पास मारक क्षमता अधिक है. उसके पास टैंक, आर्टिलरी और एयरफ़ोर्स है.

राजनयिक और विदेशी नागरिक शहर छोड़ कर जा रहे हैं, इसलिए ये आशंका है कि खार्तूम में युद्ध और तेज़ हो जाए.

थिंक टैंक इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप (आईसीजी) के एल बोसवेल कहते हैं, "शहर के एक बड़े हिस्से में आरएसएफ़ के लड़ाके रिहाइशी इलाक़ों में कब्ज़ा किए हुए हैं."

उनके अनुसार, "असल में वो सेना को चुनौती दे रहे हैं कि वो शहर को तबाह करे. ऐसा लगता है कि सेना खार्तूम को तबाह नहीं करना चाहती, लेकिन ये उनके वजदू की लड़ाई बन चुकी है."

सूडान के एक स्वतंत्र विश्लेषक जोनास हार्नर का मानना है कि दोनों पक्ष अपने बाहरी सहयोगियों को बुला सकते हैं, इससे लड़ाई और लंबी ही खिंचेगी.

माना जा रहा है कि सेना को इलाक़ाई शक्ति मिस्र का समर्थन प्राप्त है. हालांकि अभी तक आधिकारिक स्थिति यही है कि वो निष्पक्ष बना हुआ है.

जबकि आरएसएफ़ की ओर यूनाइटेड अरब अमीरात (यूएई), रूस का वागनर मिशनरी ग्रुप और अन्य इलाक़ाई मिलिशिया ग्रुप हैं.

सूडान युद्ध

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2- युद्ध लंबा खिंच सकता है

दूसरी तरफ़ ये भी संभावना है कि ये युद्ध लंबा चले. ये सूडान के लोगों के लिए अच्छा नहीं है.

बीबीसी के मोहम्मद हाशिम, जो ख़ुद एक सूडानी हैं, कहते हैं, "युद्ध लंबा खिंच जाए, उसके सभी तत्व इस लड़ाई में मौजूद हैं."

उनके मुताबिक, "उन लोगों में बहुत आक्रोश है जो पूर्व ओमर अल बशीर सरकार और उसकी नेशनल कांग्रेस पार्टी के वफ़ादार हैं और जो इस्लामी विचारधारा को मानते हैं."

एक बड़े प्रदर्शन के बाद 2019 में सेना ने बशीर का तख़्तापलट कर दिया था. उनके 30 साल के शासन में देश में कई हथियारबंद कबीलाई मिलिशिया ग्रुपों का उभार हुआ.

हार्नर कहते हैं, "बशीर ने मिलिशिया बनाने के लिए इन कबीलाई समूहों में मतभेद पैदा करने के लिए बहुत कड़ी मेहनत की थी."

"उनके सत्ता से बाहर जाने के बाद जो खालीपन पैदा हुआ उससे मुलिशिया ग्रुपों को मौका मिल गया क्योंकि उन्हें अपनी सुरक्षा खुद करनी थी."

मिलिशिया

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हॉर्नर मानते हैं, "अगर ये मिलिशिया ग्रुप पक्ष लेने लगे तो यह टकराव और ख़तरनाक़ हो जाएगा जोकि इस संघर्ष को और बड़ा कर देगा और पीछे हटने की संभावना को और मुश्किल बना देगा."

इस संघर्ष पर बारीक़ी से नज़र रखने वाले कई विश्लेषक कबीलाई मिलिशिया के संभावित पक्ष को लेकर आशंकित हैं. और दोनों जनरल अपनी बढ़त में इनकी मदद लेना चाहेंगे.

हाशमी कहते हैं, "युद्ध शुरू होने से पहले, हेमेदती और जनरल बुरहान दोनों कबीलाई विभाजन को अपने पक्ष में इस्तेमाल करना चाह रहे थे."

एक थिंक टैंक चैथम हाउस के अहमद सोलीमन के मुताबिक़, "आरएसएफ़ खुद को ग्रामीण इलाक़ों की एकजुट करने वाली शक्ति के रूप में दिखाने की कोशिश करता है. उसके लड़ाकों में अधिकांश ग्रामीण इलाक़ों से आते हैं."

आरएसएफ़ दारफ़ुर के केंद्र की ओर बढ़ने की कोशिश करेगा और अधिक से अधिक लड़ाकों को लामबंद करेगा तो इससे देश बंट सकता है.

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इमेज कैप्शन, सेना प्रमुख अब्देल फ़तह अल बुरहान और अर्द्धसैनिक बल रएसएफ़ लीडर मोहम्मद हमदान दगालो, हेमेदती.

3-एक शांति समझौता

हालांकि दुनिया भर के राजनयिक दोनों जनरलों को मनाने की कोशिश में हैं कि वे संघर्ष विराम की अवधि को बढ़ाएं लेकिन जहां तक शांति समझौता वार्ता की बात है, किसी को नहीं लगता कि ये जल्द शुरू होने वाला है.

ये ऐसा सवाल नहीं है कि आम सूडानी नागरिकों को क्या स्वीकार्य हो सकता है और क्या नहीं.

2019 की क्रांति के दौरान हाशिम खार्तूम में ही थे और उन्होंने देखा कि कैसे दोनों जनरल नागरिकों को सत्ता सौंपने में लगातार विफल रहे, जिसका नतीजा रहा 2021 का तख़्तापलट.

वो पूछते हैं, "ओमर बशीर के तख़्तापलट के बाद दोनों जनरलों के पास डेढ़ साल का समय था लेकिन वो देश नहीं चला सके. ऐसे किस समझौते पर ये पहुंच सकते हैं जो सभी सूडानी नागरिकों के लिए स्वीकार्य हो?"

हर कोई इस बात सहमत दिखता है कि कोई भी समझौता बाहरी दबाव से ही संभव है.

बोसवेल कहते हैं, "जब तक मिस्र, यूएई, सऊदी अरब जैसी इलाक़ाई ताक़तें राजनीतिक और आर्थिक दबाव नहीं डालेंगी तबतक पूरी तरह शांति आना मुश्किल लगता है."

समस्या ये है कि इसमें बहुत सारे हित टकरा रहे हैं, इनमें से बुहत से दोनों पक्षों के लिए अति विशेष हैं.

हॉर्नर का मानना है कि "सत्ता के शीर्ष पर बिठाने के मामले में इलाक़ाई ताक़तें किसी एक सैन्य ग्रुप या व्यक्ति को तरजीह दे सकती हैं. ये नागरिक समाज के लिए बुरी ख़बर है."

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हालांकि ये भी आशंका है कि जल्द ही शांति वार्ता नहीं शुरू हुई तो संघर्ष और बढ़ेगा और इसका हल निकालने में और मुश्किल आएगी. अभी दक्षिणी सूडान में शांति वार्ता प्रस्तावित है.

चैथम हाउस के सोलीमन का कहना है, "अभी भी शांति वार्ता का मौका है. चुनौती ये है कि दोनों पक्ष पीछे हटने को राजी नहीं हैं. और दुर्भाग्य से फिलहाल कूटनीतिक ध्यान इस बात पर टिका है कि लोकतांत्रिक इच्छाओं की क़ीमत पर दोनों जनरल क्या चाहते हैं."

और समस्या ये भी है कि दोनों जनरल जो चाहते हैं वो एक दूसरे के विरोध से ज्यादा आम सूडानी के खिलाफ़ अधिक है.

ये सत्ता, नियंत्रण और संपत्ति की लड़ाई है और दोनों पक्ष इसे अपनी वजूद की लड़ाई समझ रहे हैं.

दो लोगों की महत्वकांक्षा की भारी क़ीमत चुकाई जानी बाकी है और ये सूडान की जनता को चुकाना है.

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