बिहार: नीतीश की नई सरकार पर क्या बीजेपी का अधिक असर दिखाई देगा

    • Author, अभिनव गोयल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

बिहार की राजनीति में एक बार फिर लगभग वही पुराने चेहरे हैं, लेकिन इस बार मंच और किरदार बदल चुके हैं.

नीतीश कुमार भले ही 10वीं बार मुख्यमंत्री बने हों, लेकिन उनके आसपास खड़े पात्र और शक्ति-संतुलन पहले के मुक़ाबले बदला हुआ नज़र आता है.

वे ऐसे राजनीतिक समीकरण का हिस्सा बन गए हैं, जहाँ कुछ अहम पद उनके हाथों से निकलकर सहयोगी दल बीजेपी की ओर खिसक गए हैं.

सवाल है कि नए मंत्रिमंडल में बीजेपी की बढ़ी हुई हिस्सेदारी क्या नीतीश कुमार के कार्यकाल में फ़ैसलों की दिशा तय करेगी?

बीजेपी का बढ़ता प्रभाव

बिहार में नई सरकार के गठन में सबसे बड़ा बदलाव ये हुआ है कि बीजेपी की हिस्सेदारी इस बार मंत्रिमंडल में कहीं अधिक बढ़ गई है.

नई कैबिनेट में कुल 26 मंत्री शामिल किए गए हैं. इनमें 14 मंत्री बीजेपी से और आठ जेडीयू से हैं.

इतना ही नहीं इस बार बिहार का गृह विभाग भी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के पास नहीं है. यह विभाग बीजेपी नेता और डिप्टी सीएम सम्राट चौधरी को दिया गया है.

वहीं बदले में जेडीयू को वित्त के साथ वाणिज्य कर विभाग मिला है.

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और चर्चित वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने आरोप लगाया कि 'बिहार की नई कैबिनेट असल में बीजेपी कैबिनेट' है, जहाँ सभी महत्वपूर्ण पोर्टफ़ोलियो और विभाग बीजेपी के हाथों में हैं.

उनका कहना है, "सीएम के तौर पर नीतीश के आख़िरी कार्यकाल के बाद जेडीयू शायद एक पार्टी के तौर पर न बचे. बिहार में गठबंधन का धर्म केवल नाम का है, यहाँ बीजेपी का दबदबा है."

वहीं बीजेपी नेता और मंत्री दिलीप जायसवाल का कहना है, "हमारी प्राथमिकता क़ानून का राज है. नीतीश कुमार ने भरोसा करके ये विभाग (गृह) बीजेपी को दिया है. हम क़ानून का राज लाएँगे."

इन बदलते समीकरणों पर बिहार के वरिष्ठ पत्रकार नवेंदु कहते हैं, "बिहार की राजनीति में ऐसे सिर्फ़ दो मौक़े आए हैं, जब मुख्यमंत्री के पास गृह विभाग नहीं रहा. पहला मौक़ा 1967 में आया, जब महामाया प्रसाद सिन्हा के नेतृत्व में ग़ैर-कांग्रेस सरकार बनी."

नवेंदु कहते हैं, "उस समय गृह विभाग को पुलिस विभाग कहा जाता था और इसकी ज़िम्मेदारी तब रामानंद तिवारी को दी गई थी."

"दूसरी बार 1970 में ऐसा हुआ, जब कर्पूरी ठाकुर मुख्यमंत्री बने. उस सरकार में भी पुलिस विभाग रामानंद तिवारी को ही मिला था. इतिहास में उन दो मौक़ों को छोड़ दें, तो गृह विभाग हमेशा मुख्यमंत्री के पास ही रहा है."

नवेंदु कहते हैं, "बिहार में अभी जिस तरह की पुलिस और प्रशासनिक व्यवस्था चलती है, उसे कलेक्टरेट व्यवस्था कहा जाता है. इस सिस्टम में ज़िले की कमान ज़िलाधिकारी यानी डीएम के हाथ में होती है. डीएम ही पूरे ज़िले का प्रशासन चलाते हैं."

"एसपी और डीएसपी जैसे पुलिस अधिकारी उन्हीं को रिपोर्ट करते हैं. यह पूरा ढाँचा सामान्य प्रशासन विभाग के नियंत्रण में आता है, जो सीधे मुख्यमंत्री के अधिकार क्षेत्र में होता है."

माधुरी कुमार ने 28 वर्षों तक टाइम्स ऑफ इंडिया में पत्रकारिता की है. फिलहाल वे पटना विमेंस कॉलेज के मास कम्युनिकेशन विभाग से जुड़ी हैं.

उनका मानना है कि बीजेपी की कोशिश अब यह होगी कि बिहार में उसका एक अलग राजनीतिक चेहरा तैयार हो.

माधुरी बताती हैं कि फिलहाल जनता का समर्थन नीतीश के साथ है, इसलिए आने वाले दिनों में बीजेपी ऐसी कोई गलती नहीं करेगी जिससे टकराव की स्थिति बने.

बदलाव के सवाल पर बिहार के वरिष्ठ पत्रकार संतोष कहते हैं, "नीतीश सरकार में कोई बहुत ज़्यादा बदलाव नहीं होगा. अधिकारियों की पोस्टिंग, तबादले और प्रमोशन जैसी चीज़ें अभी भी उनके पास ही हैं."

"बीजेपी के पास गृह विभाग चले जाने के कारण आने वाले समय में बुलडोज़र मॉडल की झलक कहीं-कहीं दिखाई दे सकती है."

बजट में भारी जेडीयू

भले जेडीयू के कोटे में फ़िलहाल आठ मंत्री आए हों, लेकिन बजट के मामले में वह बीजेपी पर भारी है.

बिहार सरकार ने वित्तीय वर्ष 2025-26 के लिए क़रीब 3 लाख 16 हज़ार करोड़ रुपए का बजट पेश किया था. इसमें सबसे ज़्यादा पैसा शिक्षा विभाग (क़रीब 60 हजार करोड़) को दिया गया है.

बजट के मामले में शिक्षा के बाद स्वास्थ्य (क़रीब 20 हज़ार करोड़), गृह (क़रीब 17 हज़ार करोड़), ग्रामीण विकास (क़रीब 16 हज़ार करोड़), ऊर्जा (क़रीब 13 हज़ार करोड़) और नगर विकास (क़रीब 11 हज़ार करोड़) जैसे विभाग आते हैं.

इनमें स्वास्थ्य, गृह और नगर विकास जैसे विभाग को छोड़कर बड़े बजट वाले सभी विभाग जेडीयू ने अपने पास रखे हैं.

वरिष्ठ पत्रकार नवेंदु कहते हैं, "भले ही जेडीयू के मंत्री संख्या में कम हों, लेकिन बड़े बजट वाले विभागों के नियंत्रण से जेडीयू अभी भी ड्राइविंग सीट पर है."

वे कहते हैं, "इस बार उद्योग विभाग बीजेपी को मिला है. बदलते राजनीतिक माहौल और निवेश को बढ़ाने की ज़िम्मेदारी अब ज़्यादा बीजेपी के कंधों पर है. पहले ही कुछ बड़ी कंपनियों को बिहार में निवेश के लिए लाया गया है. इसलिए इस कार्यकाल में यह मंत्रालय रणनीतिक रूप से बहुत वज़न रखता है."

बड़ी पार्टी बनने की लड़ाई

243 सीटों वाली बिहार विधानसभा में इस बार बीजेपी और जेडीयू के प्रदर्शन ने राज्य की राजनीति का पूरा समीकरण बदल दिया है.

89 सीटों के साथ बीजेपी राज्य में सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी. वहीं जेडीयू के हिस्से 85 सीटें आईं. एनडीए गठबंधन ने महागठबंधन को 50 का आँकड़ा भी नहीं छूने दिया. आरजेडी मात्र 25 सीटों पर सिमट गई.

साल 2020 में एनडीए गठबंधन में जेडीयू ने 115 सीटों पर जबकि बीजेपी ने 110 सीटों पर चुनाव लड़ा था, लेकिन 2025 विधानसभा चुनावों में सीट शेयरिंग फ़ॉर्मूले के मुताबिक़, जेडीयू और बीजेपी दोनों ने ही 101-101 सीट पर चुनाव लड़ा.

बीते दो दशकों से 'बड़े भाई' का स्टेटस इंजॉय कर रहे जेडीयू कार्यकर्ताओं के लिए ये एक बड़ा झटका था.

बिहार के वरिष्ठ पत्रकार संतोष का कहना है, "भले चुनाव नतीजे आ गए हों, लेकिन दोनों पार्टियों के बीच सबसे बड़ी पार्टी बनने की लड़ाई ख़त्म नहीं हुई है. आप देखिए कि नीतीश ने अपने मंत्रिमंडल में जेडीयू के मंत्रियों की संख्या काफ़ी कम रखी है."

कौन होगा विधानसभा अध्यक्ष?

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि बिहार में विधानसभा अध्यक्ष पद को लेकर बीजेपी और जेडीयू में खींचतान हो रही है.

नवेंदु कहते हैं, "बिहार में पिछले कार्यकाल में विधानसभा अध्यक्ष का पद बीजेपी के पास था, जबकि गृह विभाग जेडीयू के पास था. इस बार गृह विभाग के बदले विधानसभा अध्यक्ष का पद जेडीयू को मिल सकता है. इससे सत्ता संतुलन भी बना रहेगा."

वे कहते हैं, "राजनीतिक रूप से विधानसभा अध्यक्ष का पद किसी भी सरकार के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है. बहुमत परीक्षण, विधायकों की सदस्यता रद्द करना, दल-बदल के मामलों पर फ़ैसला और अविश्वास प्रस्ताव जैसे बड़े कामों की अंतिम कमान स्पीकर के हाथ में होती है."

उनका कहना है, "गठबंधन सरकारों में स्पीकर की कुर्सी को 'सुरक्षा कवच' की तरह देखा जाता है. कई राज्यों में ऐसे उदाहरण हैं जहाँ स्पीकर के फ़ैसलों ने सरकार बचाई भी है और गिराई भी. इसलिए राजनीतिक दल कोशिश करते हैं कि यह पद उनके भरोसे के व्यक्ति के पास रहे."

ऐसी ही बात वरिष्ठ पत्रकार संतोष भी कहते हैं. उनका कहना है कि बिहार में इस समय जेडीयू और बीजेपी के बीच इस पद को लेकर खींचतान भी इसी वजह से है.

वे कहते हैं, "राजनीति में कुछ भी स्थाई नहीं होता. समीकरण कभी भी बदल सकते हैं, इसलिए स्पीकर की कुर्सी भविष्य की किसी भी अस्थिरता में सबसे निर्णायक हथियार साबित हो सकती है."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.