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प्रशांत किशोर की जन सुराज पार्टी बिहार चुनाव में क्यों चारों खाने चित हो गई?
- Author, संजय कुमार
- पदनाम, प्रोफ़ेसर और चुनाव विश्लेषक
- Author, विभा अत्री
- पदनाम, लोकनीति में रिसर्चर
2025 का बिहार विधानसभा चुनाव प्रशांत किशोर और उनकी जन सुराज पार्टी के लिए पहली बड़ी चुनावी परीक्षा थी.
यह चुनाव प्रशांत किशोर की ख़ुद की भविष्यवाणी जैसा रहा कि उनकी पार्टी 'या तो अर्श पर होगी या फ़र्श पर होगी.' नतीजों ने पार्टी को फ़र्श पर रखा.
प्रशांत किशोर की छवि के आधार पर तैयार किए गए एक आक्रामक और व्यापक प्रचार अभियान के बावजूद, जन सुराज शुरुआती उत्साह को वोटों में नहीं बदल सकी.
243 में से 238 सीटों पर चुनाव लड़कर, पार्टी एक भी सीट नहीं जीत पाई.
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एक सर्वे के नतीजों से यह समझने में मदद मिल सकती है कि पार्टी मतदाताओं के साथ कितना जुड़ पाई और चुनावी जीत क्यों नहीं हासिल कर पाई.
असर सीमित रहा
ये नतीजा इसलिए भी चौंकाने वाला रहा क्योंकि ऐसा नहीं था कि चुनावी मैदान में जन सुराज नज़र नहीं आई.
प्रशांत किशोर की पदयात्रा ने राज्य भर में पार्टी की मौजूदगी महसूस कराई और पार्टी ने मतदाताओं से जुड़ने के लिए कई तरीक़े अपनाए.
दस में से चार मतदाताओं (39 प्रतिशत) ने बताया कि उन्हें पार्टी से फ़ोन कॉल, एसएमएस, व्हाट्सएप या सोशल मीडिया के ज़रिए कम से कम एक राजनीतिक संदेश मिला, जो बीजेपी के साथ सबसे ज़्यादा था.
इसी तरह, 43 प्रतिशत लोगों ने कहा कि उनसे डोर-टू-डोर संपर्क किया गया. वोटरों से इस तरीक़े से संपर्क करने के मामले में जन सुराज तीसरी सबसे बड़ी पार्टी बनी.
इस स्तर के संपर्क ने पार्टी को एक तरह से बिहार के कई स्थापित दलों की बराबरी पर ला दिया. ऐसी मौजूदगी के बावजूद उसे मिला समर्थन सीमित रहा.
सिर्फ़ 18 प्रतिशत मतदाताओं ने कहा कि पार्टी के पहले 100 दिनों के वादों ने उनके वोट को 'बहुत' प्रभावित किया जबकि 23 प्रतिशत ने कहा कि वे 'कुछ हद तक' प्रभावित हुए.
वहीं ज़्यादातर लोगों ने महसूस किया कि वो वादे मायने नहीं रखते या उन्हें उसकी जानकारी ही नहीं थी.
प्रशांत किशोर ने अपना अभियान विकास केंद्रित रखा और लोगों तक पहुंच बढ़ाई. हालांकि इसके बावजूद जन सुराज लोगों का वोट नहीं पा सकी.
पार्टी व्यापक सामाजिक या पहचान-आधारित समर्थन हासिल करने में सफल नहीं हो पाई, जो अक्सर बिहार में चुनावी नतीजों को प्रभावित करता है.
पार्टी और उसके नेतृत्व को लेकर अस्पष्टता
जन सुराज के लिए एक और चुनौती उसकी पहचान और उद्देश्य को लेकर लोगों में अनिश्चितता रही. जब यह पूछा गया कि क्या पार्टी एक विश्वसनीय नए विकल्प का प्रतिनिधित्व करती है या बस एक और राजनीतिक संगठन है, इस पर मतदाताओं की राय बँटी हुई थी.
47 प्रतिशत मतदाताओं ने इसे एक वास्तविक विकल्प के तौर पर देखा, 30 प्रतिशत मतदाताओं ने इसे ख़ारिज कर दिया और 23 प्रतिशत की कोई राय नहीं थी.
युवा मतदाता पार्टी के पक्ष में ज़्यादा रहे, 18-25 की उम्र के 55 प्रतिशत मतदाताओं ने इसे एक भरोसमंद विकल्प माना, लेकिन यह भरोसा बाकी मतदाताओं में नहीं दिखा.
जहाँ 44 प्रतिशत मतदाताओं का मानना था कि वे बिहार में सार्थक बदलाव ला सकते हैं, वहीं 36 प्रतिशत का मानना था कि ऐसा करने के लिए उनके पास राजनीतिक अनुभव की कमी है.
युवा मतदाताओं (18-25 की उम्र) में, 59 प्रतिशत ने उन्हें सकारात्मक रूप से देखा जबकि 56 वर्ष और उससे अधिक आयु के मतदाताओं में यह संख्या केवल 40 प्रतिशत रही.
इसके अलावा, 243 में से 238 सीटों पर उम्मीदवार उतारने का पार्टी का फ़ैसला, जो कि महत्वाकांक्षी था, ये भी उसके पक्ष में नहीं गया.
एक साथ बहुत से निर्वाचन क्षेत्रों से चुनाव लड़ने से मतदाताओं को अपने उम्मीदवारों को जानने का समय नहीं, जिससे व्यक्तिगत जुड़ाव सीमित हो गया, जो अक्सर मतदाताओं के समर्थन को प्रेरित करता है.
बदलाव की मांग, लेकिन बिखरा हुआ समर्थन
जन सुराज पर राजनीतिक माहौल का भी असर पड़ा. जब मतदाताओं से पूछा गया कि क्या बिहार को एक नए राजनीतिक विकल्प की ज़रूरत है या मौजूदा गठबंधन काफी हैं, तो मतदाता बराबर बँटे हुए थे.
42 प्रतिशत ने नए विकल्प का समर्थन किया और उतने ही प्रतिशत ने मौजूदा गठबंधनों के साथ जाने की बात कही.
यहाँ तक कि जो लोग एक नया विकल्प चाहते थे, उनमें भी जन सुराज को निर्णायक समर्थन नहीं मिला. पार्टी को इस ग्रुप में लगभग छह प्रतिशत वोट मिले, जो बदलाव का पक्ष नहीं लेने वालों से एक प्रतिशत ज़्यादा था, लेकिन फिर भी एक बड़े हिस्से ने दो प्रमुख गठबंधनों में से किसी एक को वोट दिया.
बदलाव की चाहत किसी नई पार्टी को समर्थन देने में तब्दील नहीं हुई. नतीजा यह हुआ कि पार्टी का समर्थन इच्छाओं में ज़्यादा रहा, वोटों में नहीं.
युवा मतदाताओं ने जन सुराज को ज़्यादा पसंद किया, लेकिन इतना नहीं कि कुल नतीजे बदल सकें. युवाओं के बीच पार्टी का वोट शेयर बुज़ुर्ग मतदाताओं की तुलना में कुछ ज़्यादा था.
जन सुराज के डेब्यू से साफ़ पैटर्न जाहिर होता है. पार्टी ने उत्सुकता पैदा की, युवाओं का ध्यान खींचा और खुद को बिहार की राजनीति में नए खिलाड़ी के रूप में पेश किया.
फिर भी, ये मतदाताओं के एक बड़े हिस्से को यह विश्वास नहीं दे पाई कि पार्टी शासन के लिए एक भरोसेमंद विकल्प है.
एक ऐसे राज्य में जहाँ परंपरागत वफ़ादारी, जाति-आधारित गठबंधन और कैडर आधारित कामकाज़ मुख्य भूमिका निभाते हैं, वहाँ इतने बड़े पैमाने पर उम्मीदवार उतारने के चलते मतदाताओं को उम्मीदवारों को जानने का मौक़ा नहीं मिला और पार्टी अपनी मौजूदगी महसूस कराने के बावजूद चुनावी जीत नहीं दर्ज करा सकी.
(इस लेख में व्यक्त विचार लेखकों के व्यक्तिगत विचार हैं. इनका किसी भी संस्था के विचारों से कोई संबंध नहीं है.)
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.