नीतीश कुमार के लिए क्या एनडीए से बाहर जाने का विकल्प अब ख़त्म हो गया है?

बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों में राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन यानी एनडीए ने प्रचंड बहुमत हासिल किया है.

बीजेपी ने 89 सीटें और जेडीयू ने 85 सीटें जीतीं और एक तरह से पूरा चुनाव क्लीन स्वीप कर लिया. वहीं महागठबंधन के सभी दलों की सीटें मिलकर 50 का आंकड़ा भी नहीं छू सकीं. आरजेडी मात्र 25 सीटें ही जीत सकी.

चुनाव संपन्न होने के बाद कई सवाल उठ रहे हैं, क्या जेडीयू के पास साइड बदलने के विकल्प अब ख़त्म हो गए हैं? क्या महिलाओं को लुभाना अब एक फ़ॉर्मूला बन गया है? तेजस्वी यादव बिहार के लोगों को आश्वस्त क्यों नहीं कर पा रहे हैं? इस जीत के राष्ट्रीय स्तर पर क्या मायने हैं?

सवाल ये भी हैं कि प्रशांत किशोर की कोशिशों में कहां कमी रह गई? क्या नीतीश कुमार मुख्यमंत्री बनेंगे और अगर बने तो क्या अपना कार्यकाल पूरा कर पाएंगे? इसके साथ सवाल यह भी है कि प्रधानमंत्री मोदी आख़िर अपना करिश्मा कैसे क़ायम रख पा रहे हैं? राहुल गांधी के लिए इस हार के क्या मायने होंगे?

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'द लेंस' के इस विशेष एपिसोड में बिहार चुनाव और दोनों गठबंधनों में शामिल पार्टियों के प्रदर्शन और अन्य मुद्दों पर चर्चा की गई.

इस चर्चा में कलेक्टिव न्यूज़रूम के डायरेक्टर ऑफ़ जर्नलिज़म मुकेश शर्मा के साथ शामिल हुए आंकड़ों पर नज़र रखने वाले संस्थान सी-वोटर के संस्थापक यशवन्त देशमुख, द हिंदू की सीनियर डिप्टी एडिटर शोभना नायर, वरिष्ठ पत्रकार स्मिता शर्मा और बीबीसी संवाददाता प्रेरणा.

चुनाव की सबसे चौंकाने वाली बात

बिहार चुनाव के नतीजों पर ज़्यादातर एक्सपर्ट्स हैरानी जता रहे हैं. कई एक्सपर्ट्स के मुताबिक़ इस चुनाव में उन्हें एनडीए की वापसी तो नज़र आ रही थी, लेकिन इस तरह के क्लीन स्वीप की उम्मीद उन्हें नहीं थी.

वरिष्ठ पत्रकार स्मिता शर्मा कहती हैं, "नीतीश कुमार के लिए ग्राउंड पर कोई नाराज़गी नहीं थी. हमें ये तो पता था कि एनडीए लीड कर रही है, लेकिन ये इस तरह का स्वीप होगा, इसका आइडिया नहीं था. ये थोड़ा चौंकाने वाला भी था क्योंकि उनके स्वास्थ्य को लेकर और पाला बदलने को लेकर बातें हो रही थीं."

वो कहती हैं, "हमें लग रहा था कि जेडीयू की परफ़ॉर्मेंस बेहतर होगी. लेकिन बीजेपी इतनी सीटों पर जीत हासिल कर पाएगी इसकी उम्मीद नहीं थी. ये चौंकाने वाला है."

बीबीसी संवाददाता प्रेरणा कहती हैं, "हर किसी के लिए आरजेडी का ख़राब प्रदर्शन और एनडीए की क्लीन स्वीप, यही सबसे अधिक चौंकाने वाली बात है. ये बात साफ़तौर पर नज़र आ रही थी कि एनडीए वापसी करेगा और नीतीश कुमार काफी पॉपुलर थे. थोड़ी बहुत नाराज़गी थी- बेरोज़गारी और पलायन जैसे मुद्दे पर भी, लेकिन नीतीश के ख़िलाफ़ कोई लहर नहीं थी."

वरिष्ठ पत्रकार शोभना नायर भी इस बात से इत्तेफ़ाक रखती हैं. वो कहती हैं कि "बीजेपी का प्रदर्शन काफ़ी बेहतर रहा जिसकी उम्मीद नहीं की गई थी."

हालांकि वो ये कहती हैं कि पिछली बार के मुक़ाबले बीजेपी के वोट शेयर में बहुत अधिक इज़ाफ़ा नहीं हुआ है.

वहीं सी-वोटर के संस्थापक यशवन्त देशमुख कहते हैं कि उन्हें चुनाव नतीजों से कोई हैरानी नहीं हुई.

यशवन्त देशमुख कहते हैं, "आंकड़ों के अनुसार एनडीए और महागठबंधन के पुरुष मतदाताओं के बीच फर्क़ सिर्फ दो प्रतिशत का ही है. इसलिए जो केवल पुरुष मतदाताओं से बात करके आए होंगे, जिनकी नज़र केवल पुरुष मतदाताओं, जातिगत समीकरण और धार्मिक समीकरण पर रही होगी, उनको ये चुनाव बहुत कांटे का, बराबरी का लगा होगा."

वो कहते हैं, "लेकिन जो आंकड़े हम देख रहे हैं, उसके अनुसार एनडीए के पक्ष में महिला मतदाताओं का गैप 18 फ़ीसदी का है. ये बहुत बड़ा और अभूतपूर्व गैप है जिसे अलग तरह से समझने की ज़रूरत होगी."

क्या नीतीश कुमार के लिए महिला वोटर बड़ा फ़ैक्टर साबित हुईं?

बीबीसी संवाददाता प्रेरणा कहती हैं कि जिस तरह बीजेपी का अपना एक कैडर है, वाम दलों का अपना एक कैडर है, उसी तरह नीतीश कुमार के लिए बीते सालों में महिलाएं उनकी लॉयल वोटर बन गई हैं.

वो कहती हैं कि पोशाक योजना, साइकिल योजना, 10वीं, 12वीं और ग्रेजुएशन के बाद पैसे देने जैसी योजना हो, पंचायत में उनके लिए 50 प्रतिशत का आरक्षण हो या फिर पुलिस भर्ती में 35 प्रतिशत आरक्षण देने की बात हो, महिलाओं का नीतीश कुमार के प्रति एक मज़बूत कनेक्ट है.

वहीं यशवन्त देशमुख कहते हैं, "जो वोटर्स हैं, उसमें महिलाएं पुरुष से ज़्यादा निकल गईं, ये एक अभूतपूर्व घटना है. अब तक के आंकड़ों के मुताबिक़ एनडीए और महागठबंधन के बीच पुरुष मतदाताओं का गैप सिर्फ़ दो फ़ीसदी का है, वहीं महिला मतदाताओं का गैप 18 फ़ीसदी का है."

वह समझाते हैं, "महिला मतदाताओं के साथ नीतीश कुमार का समीकरण जनरेशनल पॉलिसी का था."

"जिस लड़की को उन्होंने स्कूल जाते समय 20 साल पहले साइकिल दी थी, वो लड़की आज की तारीख़ में गृहस्थ है, दो-तीन बच्चों की मां है, अपनी बेटियों को स्कूल भेज रही है. जिसके अकाउंट में उन्होंने जब 10 हज़ार डाले, तो वो ट्रांज़ेक्शनल या लाभार्थी योजना के नहीं थे, वो इस विश्वास को रीबूट करने के लिए थे कि मैं हूं और मैं लंबा सोचने वाला इंसान हूं और मैं तुम्हारे जीवनयापन की व्यवस्था कर रहा हूं."

यशवन्त देशमुख कहते हैं, "भारत के राजनीतिक इतिहास में ये एक ऐसा वॉटरशेड इलेक्शन है जिसके बाद इस देश की राजनीति पहले जिन मुद्दों पर चल रही थी जैसे जाति और धर्म, उनसे हटकर अलग मुद्दों पर चलने के लिए विवश होगी. क्योंकि महिलाओं के वोटबैंक ने अपने आपको स्थापित कर लिया है."

क्या महिलाओं को लुभाना विनिंग फ़ॉर्मूला बन जाएगा?

ये भी सवाल उठता है कि क्या महिलाओं को लुभाना, ख़ासकर डायरेक्ट बेनिफ़िट ट्रांसफ़र की तरह की योजना लाकर, अब एक विनिंग फ़ॉर्मूला बन जाएगा?

यशवन्त देशमुख मानते हैं कि आने वाले चुनावों में भी ये एक विनिंग फॉर्मूला बन सकता है.

वहीं वरिष्ठ पत्रकार स्मिता शर्मा के मुताबिक़ महिलाओं को लुभाना राजनीतिक दलों के लिए पहले ही एक फ़ॉर्मूला बन चुका है.

वो कहती हैं, "आप तेलंगाना, झारखंड, मध्य प्रदेश या फिर पश्चिम बंगाल देख लें, महिलाओं के लिए पहले ही कई योजनाएं चलाई जा रही हैं, चुनाव नज़दीक आने पर और योजनाओं की घोषणा भी की जा सकती है."

स्मिता शर्मा कहती हैं, "राजनीतिक दलों के भीतर भले ही महिलाओं का प्रतिनिधित्व न बढ़ा हो, लेकिन महिलाएं अब एक अहम राजनीतिक वोट बैंक बन चुकी हैं."

वो कहती हैं, "अभी भी बिहार में आप देखें तो ऐसा नहीं है कि महिला नेताओं की संख्या बहुत ज़्यादा बढ़ी हो या राजनीतिक दलों ने बहुत ज़्यादा महिला उम्मीदवारों को टिकट दिया हो. वो प्रतिनिधित्व अभी भी बढ़ता हुआ नहीं नज़र आ रहा है."

स्मिता शर्मा चुनाव के बीच कैश ट्रांसफ़र का ज़िक्र करते हुए इसे चिंता वाली बात बताती हैं.

वह कहती हैं, "जो पार्टी सत्तारूढ़ है वो चुनाव के बीच में कैश ट्रांसफ़र करने की स्थिति में है, लेकिन उसके सामने जो विपक्ष है वो सिर्फ़ वादे ही कर सकती है. ये निश्चित रूप से चिंताजनक है. अगर चुनाव आयोग यहां कोई कदम नहीं उठाता है तो सवाल ये है कि इसे कौन रोकेगा."

वरिष्ठ पत्रकार स्मिता शर्मा कहती हैं, "ऐसे नियम होने चाहिए कि आप चुनाव के पांच-छह महीने पहले तक कैश ट्रांसफर कर सकते हैं. लेकिन चुनाव जारी है और आप कैश ट्रांसफ़र कर रहे हैं, भले ही नीयत अच्छी हो, स्कीम अच्छी हो, लेकिन ये मुझे समस्या वाली बात ज़रूर लग रही है."

प्रशांत किशोर की कोशिशों में कहां कमी रह गई?

महिला वोटरों और उनकी प्रतिनिधित्व की बात से अलग बिहार में शिक्षा, रोज़गार और पलायन काफ़ी प्रभावशाली मुद्दे हैं.

जन सुराज के प्रशांत किशोर पिछले तीन साल से बिहार में इन तीनों ही मुद्दों को उठा रहे हैं. उन्होंने पदयात्रा करके और घर-घर जाकर ये मुद्दे उठाए. लेकिन उनकी ये कोशिश वोटों में तब्दील नहीं हो सकी.

उनकी कोशिशों में कहां कमी रह गई? और लोगों को ख़ुद से जुड़े मुद्दे क्यों समझ नहीं आए?

इस सवाल के जवाब में द हिंदू की सीनियर डिप्टी एडिटर शोभना नायर का कहना है कि प्रशांत किशोर कई कारणों से वो जनता के बीच क्लिक नहीं कर पाए.

वो कहती हैं, "ख़ासतौर से ग्रामीण इलाक़ों में, चाहे आप किसी से बात करिए सबका यही मानना था कि उनको अभी उस लेवल पर पहुंचने में समय लगेगा. जब तक वो ज़मीन से जुड़ेंगे नहीं, तब तक नहीं होगा. प्रशांत किशोर का प्रभाव सोशल मीडिया या टीवी पर ज़्यादा नज़र आ रहा था. "

वो कहती हैं, "उन्होंने कई ग़लत कदम लिए. उनका ख़ुद चुनाव न लड़ना ग़लत फ़ैसला साबित हुआ. इस घोषणा के बाद से उनका कैंपेन गिरने लगा. कैंपेन एक तरह से ख़त्म हो गया. यहां तक कि कई लोग जो महीनों से उनके साथ अलग-अलग विधानसभा क्षेत्रों में काम कर रहे थे, उनको टिकट नहीं मिला. एक तो ग्रामीण इलाके़ में लोग नए उम्मीदवारों को पहचान नहीं रहे थे और न ही उनके साथ कनेक्ट कर पा रहे थे."

हालांकि शोभना नायर कहती हैं कि "प्रशांत किशोर ने जो मुद्दे उठाए वो गंभीर थे और अगर वो और पांच-दस साल काम करेंगे तो एक गंभीर राजनेता के रूप में उभरेंगे."

तेजस्वी लोगों को क्यों भरोसा नहीं दिला पाए?

चुनाव में विपक्ष ने 'जंगलराज' का मुद्दा उठाया था. इसके बाद ये चर्चा शुरू हुई कि जिस 'जंगलराज' के दौर की बात की जा रही है वो 90 के दशक की बात है. उस वक्त तेजस्वी नहीं थे, तो फिर उन्हें इससे जोड़ना सही नहीं है.

क्या तेजस्वी खुद इस परछाई से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं? वो क्या कारण है कि वो जनता को भरोसा नहीं दिला पा रहे हैं?

सी-वोटर के संस्थापक यशवन्त देशमुख कहते हैं, "मुझे लगता है कि पांच साल पहले वो इससे लगभग बाहर आ गए थे, जब उन्होंने युवाओं के लिए रोज़गार देने का वादा किया था. वो लगभग एमवाई प्लस में चले गए थे. बिहार की जनता ने बड़ी तादाद में उनको स्वीकार भी कर लिया था. जो अंतर पड़ा है वो ये कि जब हम आज के बाद से कोई वोट बैंक देखेंगे तो हमें ये समझना होगा कि उसका आधा हिस्सा महिलाएं हैं."

वो समझाते हैं, "युवा पुरुष ने जंगलराज नहीं देखा था, उन्होंने बढ़कर तेजस्वी यादव को वोट दिया. लेकिन युवा महिलाओं ने आगे आकर नीतीश को वोट दिया. युवा महिलाओं ने जंगलराज नहीं देखा, लेकिन शायद उनकी मांओं ने उन्हें पहले के दौर के बारे में बताया होगा. इसलिए उनके साथ नीतीश का अलग तरह का कनेक्ट था."

बीबीसी संवाददाता प्रेरणा कहती हैं, "2020 में तेजस्वी सत्ता हासिल करने के काफी क़रीब आ गए थे, उनके वादे लोगों के साथ कनेक्ट कर रहे थे. लेकिन इस बार उनके मुद्दे एनडीए ने ले लिए, वो नौकरी की बात हो या फिर कृषि की और जनता की ज़रूरतों की. इसका उन्हें नुक़सान झेलना पड़ा."

वो कहती हैं, "महागठबंधन की सीट शेयरिंग में देरी का भी कुछ असर पड़ा और इसका ख़ामियाज़ा तेजस्वी को भुगतना पड़ा."

चुनावी वादे

यशवन्त देशमुख कहते हैं, "चुनाव के ठीक पहले कैश ट्रांसफ़र और वोटर लिस्ट में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) को लेकर मेरी आपत्ति ये थी कि ये चुनाव से ठीक पहले नहीं होना चाहिए था."

कैश ट्रांसफ़र के मामले पर वो कहते हैं, "क़ानून बने या इसे लेकर कोई फ़ैसला हो तो ठीक है, वरना इसकी नक़ल की जा सकती है. एक अच्छी स्कीम का इस्तेमाल चुनाव जीतने के लिए किया जाएगा तो ये आप कह सकते हैं कि सत्ता में बैठे लोगों को इसका ग़लत लाभ पहुंचेगा. इस बात से मैं इनकार नहीं करता."

वो कहते हैं, "इसका ख़तरा है कि महिलाओं के वोट पाने के लिए, और लोग इस तरह की स्कीम लाने की कोशिश करेंगे."

हालांकि वो विपक्ष की बात करते हुए कहते हैं कि "विपक्ष की उसकी काउंटर वाली जो स्कीम थी वो थोड़ी अविश्वसनीय थी. हर घर में सरकारी नौकरी देने की बात पर उनके समर्थकों को भी विश्वास नहीं हो पा रहा था कि ये संभव है. ये सामान्य व्यक्ति भी बता देगा कि ये असंभव है."

यशवन्त देशमुख कहते हैं, "अगर तेजस्वी ने 'हर घर' न कहा होता तो शायद विश्वसनीय होता. हर घर में सरकारी नौकरी देने का वादा उसकी ग्रैविटी को कम कर रहा था."

यशवन्त कांग्रेस के वोट चोरी अभियान के बारे में कहते हैं कि "चुनाव से पहले तेजस्वी का लगभग डेढ़ महीने का वक्त वोट चोरी अभियान के कारण ख़राब हो गया. ये वक्त वो अपने अभियान में लगा सकते थे."

क्या जेडीयू के पास पलटने के विकल्प ख़त्म हो गए?

आंकड़ों को देखें तो बिहार में जेडीयू अकेले सरकार नहीं बना सकती. ऐसे में क्या नीतीश कुमार के लिए अब पलटने का विकल्प ख़त्म हो गया है.

यशवन्त देशमुख कहते हैं, "आंकड़ों से इतर देखें, तो मुझे लगता है कि नीतीश अब कहीं जाने के मूड में नहीं दिखेंगे. हर व्यक्ति अपनी जाती हुई पारी में अच्छी विरासत छोड़कर जाना चाहता है. वो जानते हैं कि उन्हें काम करने के लिए जो आर्थिक मदद चाहिए होगी वो केंद्र में मोदी सरकार से ही होनी है."

वो कहते हैं, "15 साल पहले वो प्रधानमंत्री पद की उम्मीदवारी के लिए विपक्ष से नरेंद्र मोदी के बराबरी के प्रतियोगी थे, लेकिन अब उन्होंने अपनी भूमिका डिफ़ाइन कर ली है. एक बात तो तय है कि अब नीतीश कुमार जब चाहेंगे तभी रिटायर होंगे."

क्या बीजेपी के पास बिहार में नीतीश के अलावा कोई विकल्प है?

चुनाव से पहले इस तरह के कयास लगाए जा रहे थे कि अगर बीजेपी को जेडीयू से अधिक सीटें मिलीं तो हो सकता है कि बीजेपी पार्टी से कोई चेहरा सीएम पद के लिए आगे करे और नीतीश फिर मुख्यमंत्री न बन सकें.

यशवन्त देशमुख कहते हैं, "जहां तक बीजेपी की बात है तो वो नीतीश की छवि को समझती है और नीतीश के पद से जाने के बाद की स्थिति में उस छवि को अपने साथ लेकर चलेगी. नीतीश को महिला वोटरों का बड़ा समर्थन है और महिलाओं के वोट के चक्कर में बीजेपी अपनी छवि ये नहीं रखना चाहेगी कि बीजेपी ने उन्हें धोखा दिया. बीजेपी अब इस तरह का रिस्क लेने की स्थिति में नहीं होगी."

वरिष्ठ पत्रकार स्मिता शर्मा कहती हैं कि फ़िलहाल तो ऐसा कुछ नहीं दिखता कि बीजेपी ऐसा कुछ करना चाहे.

वो कहती हैं, "भले ही सीएम के चेहरे के लिए बीजेपी ने सीधे तौर पर नीतीश का नाम नहीं लिया, लेकिन वो बार-बार कहते रहे कि नीतीश के नेतृत्व में चुनाव लड़ रहे हैं. मुझे लगता है कि नीतीश कुमार खुद को तब कंफ़र्टेबल महसूस करते जब बीजेपी का स्ट्राइक रेट इस चुनाव में थोड़ा कमज़ोर होता."

"नीतीश पलटना भी चाहें तो महागठबंधन के पास वो आंकड़े नहीं हैं कि वो उनके सहारे सत्ता पर काबिज़ हो सकें. जहां तक बीजेपी की बात है तो वो सरप्राइज़ देती है. हो सकता है अभी नहीं लेकिन आने वाले वक्त में वो अपना सीएम चेहरा आगे बढ़ाना शुरू करें."

बिहार चुनाव में एआईएमआईएम और चिराग का फ़ैक्टर

सीमांचल में असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम का फ़ैक्टर देखने को मिला. पार्टी ने यहां पांच सीटें जीतीं.

पिछली बार भी उन्होंने पांच सीटों पर जीत हासिल की थी. लेकिन अमौर छोड़कर बाकी के विधायकों ने आरजेडी का हाथ थाम लिया था.

स्मिता शर्मा कहती हैं, "उन्होंने रैली-दर-रैली ये बात की और नैरेटिव बनाया कि मैं महागठबंधन के पास हाथ मिलाने गया था लेकिन उन्होंने मुझे रिजेक्ट किया. यहां मैंने लोगों में ये नाराज़गी देखी कि महागठबंधन उन्हें प्रतिनिधित्व नहीं देना चाहता. अगर वो हाथ मिला लेते तो ये सीटें महागठबंधन के पक्ष में जा सकती थीं."

वरिष्ठ पत्रकार शोभना नायर कहती हैं कि "चिराग पासवान को जो 29 सीटें दी गई थीं उनमें से 27 महागठबंधन के पास थीं. केवल दो सीट ऐसी थीं जो एनडीए के पास थीं. उन्होंने खुद को एक कॉन्ट्रिब्यूटर के तौर पर साबित किया है."

वो कहती हैं, "चिराग ने काफी संयमित तरीके से चुनाव लड़ा. सीटों के बंटवारे के वक्त काफी बातें चल रही थीं लेकिन उनकी तरफ से ऐसी कोई टिप्पणी नहीं आई जिससे ये इशारा मिले कि वो नाराज़ हैं. चुनाव के दौरान भी एलजेपी और जेडीयू, दोनों ने साथ काम किया और कदम उठाए. छठ के वक्त नीतीश किसी के घर नहीं गए लेकिन चिराग पासवान के घर गए. ऐसा कर के उन्होंने अपने समर्थकों को इशारा दिया कि साथ में काम करना है."

कांग्रेस और पश्चिम बंगाल की चुनौती

वरिष्ठ पत्रकार स्मिता शर्मा कहती हैं, "इसमें कोई दो राय नहीं है कि पश्चिम बंगाल अमित शाह के लिए प्रतिष्ठा का मुद्दा बन चुका है. बिहार के बाद बीजेपी अब और आत्मविश्वास के साथ उतरेगी."

वो कहती हैं कि ममता बनर्जी ऐसे भी कदम उठा सकती हैं जैसे बिहार में बीजेपी न उठाए.

स्मिता शर्मा कहती हैं, "कांग्रेस के लिए बड़ा सवाल ये है कि जहां-जहां क्षेत्रीय दलों के साथ कांग्रेस मिलकर लड़ रही है, वहां वो एक लायबिलिटी की तरह नज़र आ रही है."

वहीं यशवन्त देशमुख कहते हैं कि बिहार के बाद पश्चिम बंगाल में कांग्रेस को ममता बनर्जी एक अहम किरदार के रूप में देखेंगी ये कहना मुश्किल है.

वो कहते हैं कि पश्चिम बंगाल ही नहीं, उत्तर प्रदेश में भी कांग्रेस की बारगेनिंग पावर अब कम हो जाएगी.

यशवन्त देशमुख कहते हैं, "कांग्रेस की बड़ी समस्या अभियान से जुड़ी दिशा और दशा को लेकर है. सवाल ये है कि क्या कांग्रेस का नेतृत्व अपनी खामियां देख रहा है. लोकसभा चुनाव के बाद ये तो समझ आ रहा है कि बीजेपी तेज़ी से अपनी ग़लतियां देखकर उन्हें सुधारती है. वहीं कांग्रेस अपनी ग़लती सुधारने की बात तो दूर उन्हें पहचानने में उसे वक्त लगता है. एसआईआर के ख़िलाफ़ अभियान साफ तौर पर नाकाम साबित हुआ है."

"राहुल गांधी जब-जब कैंपेन पर उतरते हैं उसका लाभ कांग्रेस को होता है लेकिन बीच यात्रा में या बीच कैंपेन में अगर वो आएंगे तो उसका असर नहीं पड़ेगा. कांग्रेस को इन चीज़ों पर काम करने की ज़रूरत है और ये मौलिक बात है."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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