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योगेंद्र यादव ने बिहार चुनाव के नतीजे को लेकर कहा- 'मैं हैरान नहीं हूं', और क्या कहा?
बिहार विधानसभा चुनाव नतीजों के रुझान में एनडीए गठबंधन 200 से अधिक सीटों का आंकड़ा पार कर चुका है. वहीं विपक्षी महागठबंधन सिर्फ़ 35 सीटों पर आगे चल रहा है.
इन रुझानों के बाद एक बार फिर एनडीए गठबंधन पूर्ण बहुमत की सरकार बनाने की ओर बढ़ रहा है.
इसको लेकर चुनावी विश्लेषक योगेंद्र यादव ने कहा है कि वो इन चुनावी परिणामों से हैरान नहीं हैं.
योगेंद्र यादव से बीबीसी न्यूज़ हिन्दी के संपादक नितिन श्रीवास्तव ने विस्तार से बात की है.
एनडीए की बढ़त की क्या हैं वजहें?
योगेंद्र यादव से पहला सवाल यही पूछा गया कि वो इन चुनावी नतीजों के रुझान को कैसे देखते हैं?
इस पर उन्होंने कहा, "बिहार चुनाव के परिणाम से मैं मायूस और निराश हूं लेकिन हैरान नहीं हूं. मार्जिन से ज़रूर चौंका हूं. मायूस इसलिए हूं क्योंकि इस देश का नागरिक और बिहार का शुभचिंतक होने की हैसियत से बहुत उम्मीद रही है कि बिहार में बदलाव हो, जो नहीं हो रहा है."
"हैरान नहीं हूं क्योंकि पहले दिन से स्पष्ट था कि बिहार का यह चुनाव एनडीए के पक्ष में है. इसकी वजह यह है कि महागठबंधन की तुलना में एनडीए एक बड़ा गठबंधन है और कम से कम पांच प्रतिशत बढ़त उसको पहले दिन से थी. दूसरा एनडीए का सामाजिक गठबंधन बहुत बड़ा है."
"बिहार के जातीय गणित को देखें तो महागठबंधन कुल मिलाकर 40 फ़ीसदी की 'जातिगत तालाब' में से अपने वोट लेता है जबकि एनडीए का कम से कम 50 प्रतिशत का है. तीसरा पिछले कई सालों से एनडीए और ख़ासकर नीतीश कुमार ने महिलाओं के वोटों को अपने पक्ष में करने का सफल प्रयास किया है."
"इस बार 10 हज़ार की रिश्वत से तो बिलकुल पक्का हो गया. और चौथा यह जो पूरा तंत्र है जिसमें सरकारी तंत्र, पैसा, मीडिया और चुनाव आयोग शामिल हैं ये भी एक वजह है. इन सबकी वजह से एनडीए आगे है और जीतेगा, इसमें मुझे कोई संदेह नहीं था. हां ये जो अब 200 सीट आती दिख रही हैं, उससे मैं थोड़ा चौका हूँ और मन में थोड़ा सा शक होता है कि जीते तो ज़रूर है लेकिन कहीं साथ में स्टिरोइड भी तो नहीं था."
क्या नीतीश की छवि ने किया कमाल?
एनडीए गठबंधन इस चुनाव में नीतीश कुमार की 20 साल के कार्यकाल की छवि को लेकर गया क्या उसका फ़ायदा एनडीए को मिला?
इस सवाल पर योगेंद्र यादव ने कहा, "आज के परिणाम से साफ़ है कि नीतीश फ़िलहाल बिहार के इस चुनावी राजनीतिक परिदृष्य में एक केंद्रीय फ़िगर हैं और बीजपी उनके बग़ैर काम नहीं चला सकती. इसमें कोई छिपी हुई बात नहीं है कि बीजेपी मौक़ा तलाश रही है कि कब नीतीश कुमार की जगह बिहार में भी कोई देवेंद्र फडणवीस ला सके."
लेकिन क्या एक राजनीतिक दल जिसे चुनावी बढ़त हासिल करनी है उसके लिए यह सही रणनीति नहीं है? इस पर योगेंद्र यादव ने कहा, "बीजेपी को फ़िलहाल नीतीश कुमार के साथ गुज़ारा करना पड़ेगा. यह कब तक चलेगा हम नहीं जानते."
"मैं ख़ुद हैरान था कि बिहार की जितनी बदहाली है, बिहार के जो बिल्कुल बुनियादी मुद्दे हैं जिन्हें बिल्कुल नहीं देखा गया है, उस सबके बावजूद ज़मीन पर नीतीश कुमार को लेकर ग़ुस्सा या उतनी अलोकप्रियता नहीं थी, जैसा मैं हरियाणा और मध्य प्रदेश में देखता था, क्योंकि वहां सड़क पर लोग कहते थे कि बहुत टाइम हो गया, अब इनके जाने का वक्त आ गया है."
10 हज़ार रुपये देना कैसा रहा?
महिलाओं को 10 हज़ार रुपये देने का जो कार्यक्रम था क्या वो भी एक ट्रंप कार्ड था जिसकी काट विपक्ष नहीं ला पाया?
योगेंद्र यादव ने कहा, "इसमें कोई शक नहीं है पिछले कई चुनाव से बीजेपी महिलाओं को अपने पक्ष में करती रही है, चाहे वो लड़कियों को साइकिल देने की स्कीम हो या नशाबंदी की स्कीम हो. यह उसी प्रक्रिया का हिस्सा था. तो पहली बार नहीं है कि बीजेपी महिलाओं को पक्ष में कर रही है, लेकिन ये जो 10 हज़ार रुपये देने की स्कीम है, ये शुद्ध रिश्वत है, इसका और कोई नाम हो ही नहीं सकता."
लेकिन हर राज्य में राजनीतिक दल फ़्रीबीज़ की स्कीम चलाते रहे हैं. तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और उत्तर प्रदेश में ऐसे प्रयोग हुए हैं. इस सवाल पर योगेंद्र यादव ने कहा, "मध्य प्रदेश में भी जो बीजेपी ने किया वो कम से कम एक स्कीम थी, जिसकी घोषणा की गई थी और कहा गया कि उसकी पहली किस्त आपको चुनाव से पहले दे रहे हैं, वो भी गलत था, लेकिन कम से कम इतना नाटक तो था कि हम एक परमानेंट स्कीम बना रहे हैं, जो बिहार में हुआ है वो कोई स्कीम नहीं है, चुनाव से पहले दस हज़ार दे दिया. यह सब मॉडल कोड ऑफ़ कंडक्ट लागू होने के बाद किया गया."
सत्ताधारी राजनीतिक दल चुनाव से पहले कोई वादा कर देती हैं कि वो चुनाव की घोषणा के बाद भी यह लाभ देती रहेंगी जिसका मक़सद सामाजिक सशक्तीकरण है तो क्या उसके बाद भी उसको रिश्वत कहना ठीक होगा?
इस सवाल पर योगेंद्र यादव ने कहा, "अगर कोई पार्टी चुनाव से पहले सरकारी खजाने का इस्तेमाल करते हुए किसी एक वर्ग के पास इतना रुपया पहुंचा देता है तो उसके बाद लेवल प्लेइंग फ़ील्ड है वो तो खत्म हो जाता है, मॉडल कोड ऑफ़ कंडक्ट का लेटर ऑफ़ स्पिरिट है लेकिन मैं आपको दावे से कह सकता हूं कि अगर किसी विपक्षी पार्टी की सत्ता वाले राज्य ने ऐसा किया होता तो चुनाव आयोग रातोंरात खड़ा हो जाता. वो नियम बनाता और कहता कि ये स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव के ख़िलाफ़ है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.