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मैथिली ठाकुर, अनंत सिंह, तेज प्रताप, ओसामा और खेसारी की सीटों पर ये हाल
बिहार की कुछ चर्चित विधानसभा सीटों पर सबकी नज़र है. इनमें अलीनगर और मोकामा जैसी सीटें शामिल हैं.
दरभंगा की अलीनगर सीट पर बीजेपी की ओर से लोकप्रिय गायिका मैथिली ठाकुर चुनाव जीत गई हैं. दूसरे नंबर पर आरजेडी के बिनोद मिश्र हैं.
वहीं, मोकामा से जेडीयू के उम्मीदवार अनंत सिंह को मतदान से ठीक पहले गिरफ़्तार किए जाने की वजह से ये सीट चर्चा में है. अनंत सिंह ने इस सीट पर 28,206 मतों से आरजेडी की उम्मीदवार वीणा देवी पर जीत हासिल की है.
मोकामा से जनसुराज पार्टी के उम्मीदवार पीयूष प्रियदर्शी के समर्थक दुलारचंद यादव की हत्या के मामले में उन्हें मुख्य अभियुक्त बनाया गया है.
वीणा देवी इलाक़े के बाहुबली नेता सूरजभान सिंह की पत्नी हैं. मोकामा से अनंत सिंह की पत्नी नीलम देवी विधायक थीं लेकिन इस बार ख़ुद अनंत सिंह चुनावी मैदान में हैं.
58 साल के अनंत सिंह और उनके परिवार का मोकामा विधानसभा क्षेत्र में पिछले 35 सालों से दबदबा है. इस दबदबे को साल 2000 के बिहार विधानसभा चुनाव में सूरजभान सिंह ने तोड़ा था जब उन्होंने अनंत सिंह के बड़े भाई दिलीप सिंह को मोकामा से हराया था.
सूरजभान सिंह कभी दिलीप सिंह के साथ रहा करते थे लेकिन साल 2000 के बाद चीज़ें तेज़ी से बदलीं.
दिलीप सिंह राबड़ी देवी की सरकार में मंत्री भी रहे थे. दिलीप सिंह साल 1990 और 1995 में मोकामा विधानसभा क्षेत्र से चुनाव जीते थे.
इसके बाद साल 2005 से अनंत सिंह मोकामा से जीत रहे हैं. अनंत सिंह इस दौरान जेडीयू और आरजेडी में भी रहे. निर्दलीय भी चुनाव लड़े लेकिन कोई उन्हें हरा नहीं पाया.
2020 में अनंत सिंह आरजेडी के टिकट पर मोकामा से विधायक बने थे लेकिन आर्म्स एक्ट केस में उन्हें अयोग्य घोषित कर दिया गया था.
पुलिस के मुताबिक नदावां स्थित उनके गाँव से एके-47 राइफल, ग्रेनेड और विस्फोटक बरामद हुए थे. साल 2024 में अनंत सिंह इस मामले में रिहा हुए और इस बार के चुनावों के लिए जेडीयू ने उन्हें अपना टिकट दिया.
आरजेडी ने सूरजभान सिंह की पत्नी वीणा देवी को उम्मीदवार बनाया है. सूरजभान सिंह चुनाव नहीं लड़ सकते हैं क्योंकि उन्हें साल 2008 में हत्या के एक मामले में दोषी ठहराया गया था.
सूरजभान सिंह साल 2004 में बेगूसराय के बलिया से लोकसभा सांसद बने थे. इसके बाद उनकी पत्नी वीणा देवी 2014 में लोक जनशक्ति पार्टी के टिकट पर मुंगेर लोकसभा क्षेत्र से चुनाव जीतीं.
साल 2019 में सूरजभान सिंह के छोटे भाई चंदन सिंह नवादा से एलजेपी के टिकट पर विधायक बने. 2024 में सूरजभान सिंह राष्ट्रीय जनता दल में आ गए.
महुआ
वैशाली ज़िले की महुआ विधानसभा सीट से बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी के बड़े बेटे तेज प्रताप यादव उम्मीदवार थे.
तेज प्रताप यादव अपनी पार्टी जनशक्ति जनता दल के प्रत्याशी थे जबकि आरजेडी ने मुकेश रौशन को उम्मीदवार बनाया था.
तेजस्वी यादव ने महुआ में अपने भाई के ख़िलाफ़ और अपनी पार्टी के उम्मीदवार के पक्ष में रैली भी की थी. इसके जवाब में तेज प्रताप ने भी राघोपुर में अपने उम्मीदवार प्रेम कुमार के समर्थन में रैली की थी.
लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद महुआ सीट से तेज प्रताप यादव तीसरे नंबर पर रहे हैं. उन्हें सिर्फ़ 35,703 वोट मिले.
यहां से एनडीए में शामिल लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) के उम्मीदवार संजय कुमार सिंह हैं 44,997 के अंतर से आरजेडी के मुकेश कुमार रौशन को हराया है.
तेज प्रताप 2015 में इस सीट से चुनाव जीत चुके थे लेकिन 2020 में उन्हें आरजेडी ने समस्तीपुर ज़िले की हसनपुर सीट पर भेज दिया था.
राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि तेज प्रताप हसनपुर नहीं जाना चाहते थे लेकिन उन्हें पार्टी के दबाव में जाना पड़ा था.
जब तेज प्रताप को इसी साल मई में आरजेडी से बाहर किया गया तो उन्होंने जनशक्ति जनता दल (जेजेडी) नाम से अलग पार्टी बनाई और हसनपुर के बदले महुआ से उम्मीदवार बने.
दरअसल तेज प्रताप ने बिहार में कुल 43 सीटों पर अपने उम्मीदवार उतारे हैं. इनमें से ज़्यादातर सीटें वे हैं, जो यादव बहुल हैं और जिन पर आरजेडी जीतती रही है.
चुनाव के दौरान बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी ने एक इंटरव्यू में कहा था कि तेज प्रताप पार्टी से निकले हैं लेकिन उनके मन से नहीं निकले हैं.
कुम्हरार
पटना की कुम्हरार विधानसभा सीट से बिहार में गणित के चर्चित प्रोफ़ेसर केसी सिन्हा जन सुराज पार्टी से उम्मीदवार हैं लेकिन वह तीसरे नंबर पर रहे हैं.
इसी सीट पर बीजेपी के संजय कुमार ने 47,524 वोटों से जीत हासिल की है. दूसरे नंबर पर कांग्रेस के इंद्रदीप कुमार चंद्रवंशी रहे हैं.
साल 2005 तक यह सीट पटना सेंट्रल नाम से जानी जाती थी और 2008 में परिसीमन के बाद इसका नाम बदलकर कुम्हरार कर दिया गया था.
पटना सेंट्रल से सुशील कुमार मोदी 1990, 1995 और फिर 2000 में विधायक बने थे. इसके बाद फ़रवरी 2005 में यहां से अरुण कुमार सिन्हा जीते थे. लेकिन जीत के बाद सरकार नहीं बन सकी और अक्तूबर 2005 में दोबारा चुनाव करवाए गए. इस बार भी यहां से अरुण कुमार सिन्हा को जीत मिली.
साल 2008 में कुम्हरार सीट बनने के बाद भी यहां से अरुण कुमार सिन्हा ही चुनाव जीतते रहे. इस बार बीजेपी ने सिन्हा के बदले संजय कुमार को उम्मीदवार बनाया है. इस सीट पर सवर्ण मतदाता ज़्यादा हैं. सवर्णों में कायस्थ ज़्यादा हैं. अरुण कुमार सिन्हा कायस्थ ही थे लेकिन बीजेपी ने इस बार बनिया जाति से ताल्लुक रखने वाले संजय कुमार को उम्मीदवार बनाया है.
वैसे ये सीट बीजेपी का मज़बूत गढ़ रही है. नब्बे के दशक में लालू यादव की लोकप्रियता जब उफान पर थी, तब भी इस सीट से बीजेपी को ही जीत मिलती थी.
अलीनगर
दरभंगा की अलीनगर सीट से बीजेपी ने इस बार लोकप्रिय गायिका मैथिली ठाकुर को उम्मीदवार बनाया था. मैथिली ठाकुर इस सीट से 11,730 वोटों से जीत गई हैं.
दूसरे नंबर पर आरजेडी के विनोद मिश्रा रहे हैं. उन्हें 73,185 वोट मिले हैं. तीसरे स्थान पर सैफ़ुद्दीन अहमद रहे हैं. अहमद आज़ाद उम्मीदवार थे.
जनसुराज पार्टी के बिप्लव कुमार चौधरी चौथे स्थान पर रहे हैं.
इस सीट से 2020 के विधानसभा चुनाव में वीआईपी के मिश्री लाल यादव ने आरजेडी के विनोद मिश्रा को हरा दिया था.
2015 में यहाँ से राष्ट्रीय जनता दल से अब्दुल बारी सिद्दीक़ी को जीत मिली थी और दूसरे नंबर पर मिस्री लाल यादव रहे थे. 25 साल की मैथिली ठाकुर अपनी मिथिला पहचान को लेकर काफ़ी मुखर रही हैं.
छपरा
छपरा विधानसभा सीट से इस बार राष्ट्रीय जनता दल ने लोकप्रिय भोजपुरी गायक खेसारी लाल यादव को उम्मीदवार बनाया था.
इस सीट से बीजेपी उम्मीदवार छोटी कुमारी ने 86,845 वोटों के साथ जीत हासिल की है.
खेसारी लाल को 79, 245 वोट मिले और वह दूसरे स्थान पर रहे. इस सीट पर आज़ाद उम्मीदवार राखी गुप्ता को 11,488 वोट मिले.
2020 के विधानसभा चुनाव में बीजेपी के सीएन गुप्ता को जीत मिली थी और दूसरे नंबर पर राष्ट्रीय जनता दल के रणधीर कुमार सिंह थे. पहली बार छपरा लोकसभा सीट से ही 29 साल की उम्र में लालू यादव 1977 में लोकसभा सांसद बने थे.
रघुनाथपुर
सिवान की रघुनाथपुर सीट से बाहुबली नेता और राष्ट्रीय जनता दल से सांसद रहे सैयद शहाबुद्दीन के बेटे ओसामा शहाब ने जेडीयू के विकाश कुमार सिंह को 9248 मतों से हरा दिया है.
ओसामा पहली बार चुनाव लड़ रहे हैं.
शहाबुद्दीन की 2021 में मृत्यु हो गई थी. शहाबुद्दीन की मौत के बाद उनका परिवार राजनीतिक ज़मीन की तलाश कर रहा है लेकिन अभी तक उस तरह से कामयाबी नहीं मिली है.
2024 के लोकसभा चुनाव में शहाबुद्दीन की पत्नी हिना शहाब सिवान से निर्दलीय उम्मीदवार थीं लेकिन हार गई थीं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.