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नीतीश कुमार के लिए मुख्यमंत्री की कुर्सी इस बार कई चुनौतियों से भरी क्यों
- Author, चंदन कुमार जजवाड़े
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
बिहार विधानसभा चुनाव में जनता दल यूनाइडेड (जेडीयू) और भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने बड़ी जीत हासिल की है.
बीजेपी की 89 और जेडीयू की 85 सीटों वाले गठबंधन के किसी भी फ़ैसले को राजनीतिक तौर पर चुनौती देना विपक्षी दलों के लिए आसान नहीं होगा.
243 सदस्यों वाली बिहार विधानसभा में इसी प्रचंड बहुमत में नीतीश कुमार के लिए कई मुश्किलें भी छिपी हो सकती हैं. बिहार के वोटरों ने जिन वादों के आधार पर नीतीश पर भरोसा जताया है, जनता की उम्मीदें उन वादों को लेकर होगी.
ख़ासकर नौकरी, रोज़गार, उद्योग, पेंशन, मुफ़्त बिजली जैसे कई वादे हैं, जिन्हें पूरा करना और बनाए रखना बिहार जैसे आर्थिक तौर पर कमज़ोर राज्य से लिए आसान नहीं होगा.
कहा जाता है कि नीतीश के सामने एक बड़ी मुश्किल उनकी सेहत और बढ़ती उम्र को लेकर हो सकती है.
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हिन्दी भाषी राज्यों में बिहार ही एकमात्र राज्य है, जहाँ बीजेपी अब तक अपना मुख्यमंत्री नहीं बना पाई है. इस बार भी सबसे बड़ी पार्टी होकर बीजेपी नीतीश कुमार के सहयोगी की भूमिका में है.
यह स्थिति भी भविष्य में राजनीतिक तौर पर भी उनके सामने चुनौती खड़ी कर सकती है.
वरिष्ठ पत्रकार नचिकेता नारायण कहते हैं, "नीतीश कुमार के सामने वादों की एक लंबी सूची है. जिस तरह से बीते कुछ समय में बिहार का ख़ज़ाना अलग-अलग योजनाओं के लिए खोल दिया गया, जिसमें 1.5 करोड़ महिलाओं को दस हज़ार रुपये देना शामिल है. यह बड़ी परेशानी बन सकता है."
वादों की लंबी सूची
बिहार विधानसभा चुनाव से पहले एनडीए ने जो बड़े वादे किए हैं, उनमें ग़रीबों को मुफ़्त राशन, 125 यूनिट मुफ़्त बिजली, पांच लाख तक के मुफ़्त इलाज की सुविधा देंगे. 50 लाख नए पक्के मकान और सामाजिक सुरक्षा पेंशन देने के वादे शामिल हैं.
नचिकेता नारायण कहते हैं, "जैसे महाराष्ट्र में 'लाडली बहन योजना' में बदलाव किया गया वैसे हो सकता है बिहार में नीतीश सरकार अपनी योजनाओं में बदलाव कर दें. 125 यूनिट मुफ़्त बिजली जैसी योजना चला पाना आसान नहीं होगा. हम सब जानते हैं कि बिहार की वित्तीय स्थिति क्या है. उसके बाद राजस्व जुटाने का कोई नया ज़रिया भी नहीं है."
हालाँकि नीरजा चौधरी इसे अलग तरीके से देखती हैं.
वह कहती हैं, "मेरा मानना है कि जनता की उम्मीदें नीतीश कुमार से ज़्यादा बीजेपी से होंगी. जनता जानती थी कि यह नीतीश का अंतिम चुनाव है, इसलिए उन्हें जनता ने एक तरह से सम्मान और विदाई में वोट दिया है."
नीरजा चौधरी का मानना है कि नीतीश कुमार की उम्र और सेहत की वजह से इस बार वादे पूरे करने का दबाव बीजेपी पर होगा.
बीजेपी नेताओं की महत्वाकांक्षा
नीतीश कुमार ने जब पहली बार अपने पूरे कार्यकाल के लिए बिहार की सत्ता संभाली थी, उस वक़्त केंद्र में मनमोहन सिंह के नेतृत्व में यूपीए की सरकार चल रही थी.
बिहार में साल 2006 में साइकिल योजना, साल 2006 के अधिनियम के तहत पंचायत में महिलाओं को 50% आरक्षण और 2007 में जीविका योजना शुरू हुई.
इन तमाम योजनाओं ने नीतीश को महिलाओं के बीच में लोकप्रियता दी. इसके दम पर नीतीश की पार्टी जेडीयू ने साल 2010 के बिहार विधानसभा चुनावों में बड़ी जीत हासिल की.
लेकिन ये योजनाएं पुरानी हो चुकी हैं. बीजेपी और जेडीयू ने जनता से अब कई नए वादे किए हैं, जिसका बिहार की जनता हर गु़जरते दिन के साथ इंतजार करेगी.
नीतीश कुमार के दौर में बिहार में जो एक और बदलाव देखने को मिला, वह लॉ एंड ऑर्डर को लेकर था.
माना जाता है कि इस दौरान नीतीश कुमार ने राजनीतिक तौर पर भी एक काम किया और बीजेपी को कभी ख़ुद से आगे नहीं निकलने दिया. बिहार में बीजेपी जेडीयू से कई बार बड़ी पार्टी होकर भी नीतीश कुमार की सहयोगी की भूमिका में रही.
लेकिन क्या बीते 20 सालों में ज़्यादातर समय तक मुख्यमंत्री की कुर्सी पर बने रहने वाले नीतीश कुमार के लिए इस बार कई चुनौती खड़ी हो सकती है.
वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी कहती हैं, "अमित शाह ने चुनाव के पहले कहा था एनडीए नीतीश कुमार के नाम पर चुनाव लड़ रही है और मुख्यमंत्री का फ़ैसला चुनाव के बाद विधायक करेंगे. एक तरह से उन्होंने बीजेपी के लिए दरवाज़ा खुला रखा."
"बिहार का मुख्यमंत्री भविष्य में कौन बनेगा यह बीजेपी और जेडीयू के बीच का मुद्दा नहीं है. मुझे लगता है कि इसका फ़ैसला बीजेपी बनाम बीजेपी ही होगा. बीजेपी के नेता ही आपस में इसका फ़ैसला करेंगे."
वहीं नचिकेता नारायण मानते हैं कि संभव है कि नीतीश कुमार को लेकर कोई भी फ़ैसला साल 2027 में होने वाले उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के बाद हो और इस बीच बीजेपी शायद कोई जोखिम नहीं लेना चाहेगी.
वह कहते हैं, "यह तय है कि इस सरकार में ड्राइविंग फ़ोर्स बीजेपी होगी और उसी की वजह से चिराग पासवान पहली बार विधानसभा में अपनी पार्टी को 19 सीटों तक पहुँचा पाए हैं, जीतन राम मांझी और उपेंद्र कुशवाहा को भी बीजेपी की वजह से फ़ायदा हुआ है."
अपराध
बिहार में लालू प्रसाद यादव और राबड़ी देवी के मुख्यमंत्री रहते राज्य में अपराध की कई घटनाएं सुर्खियों में रही थीं.
बीजेपी अक्सर इस दौर को 'जंगलराज' कहकर आरोप लगाती है कि उस समय बिहार में क़ानून व्यवस्था के हालात बहुत ख़राब थे.
नीरजा चौधरी कहती हैं, "बीजेपी जिसे 'जंगलराज' कहती है, इन चुनावों में आरजेडी को उसकी वजह से बहुत नुक़सान हुआ है. बीजेपी ने जिस तरह से इसे मुद्दा बनाया तो लोगों को लगा कि बिहार में कहीं फिर से अपराध का वही दौर वापस न आ जाए."
नीतीश कुमार के दौर में बिहार में जातीय जनसंहार थमा.
हालांकि नीतीश के राज में भी बिहार में अपराध की कई घटनाएँ देशभर में सुर्खियाँ बनीं.
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) की साल 2022 में अंतिम प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक़, साल 2006 से 2022 तक के आंकड़ों के मुताबिक राज्य में 53,057 हत्याएं हुईं.
नीतीश कुमार और बीजेपी भले सालों से साथ में हैं लेकिन दोनों पार्टियों के बीच वैचारिक मतभेद भी रहे हैं.
नचिकेता नारायण कहते हैं, ''अगर बीजेपी अपने हिन्दुत्व के एजेंडे पर आगे बढ़ती है तो यह नीतीश कुमार के लिए आसान नहीं होगा. ''
हालांकि नीतीश कुमार बीजेपी की हिन्दुत्व की राजनीति को लेकर अब बहुत आक्रामक नहीं रहते हैं.
पलायन
नीतीश कुमार के सामने एक बड़ी चुनौती यह भी है कि क़रीब दो दशक तक मुख्यमंत्री रहने के बावजूद बिहार को ग़रीबी से बाहर नहीं निकाल पाए हैं.
रोज़गार की तलाश में राज्य से लोगों का पलायन एक बड़ी समस्या है. बिहार में कई इलाक़ों में तो आबादी के लिहाज से बहुत कम युवा लोग दिखाई देते हैं, क्योंकि रोज़ी-रोटी के लिए लोग कहीं और पलायन कर चुके हैं.
1970 के दशक तक बिहार में कई उद्योग चल रहे थे और राज्य के कई इलाक़े औद्योगिक नगरी की तरह देखे जाते थे.
इनमें फतुहा, मुज़फ़्फ़रपुर, बिहटा, डालमियानगर, डुमराँव वगैरह शामिल हैं. बिहार के शुगर मिल उस वक़्त तक काम कर रहे थे. लेकिन इन बंद पड़े उद्योगों को लेकर भी अक्सर विपक्ष सवाल खड़े करता रहा है.
अंग्रेज़ी अख़बार टाइम्स ऑफ़ इंडिया की एक रिपोर्ट के मुताबिक़ साल 1981 में, केवल 10-15 फ़ीसदी परिवारों में ही कोई प्रवासी मज़दूर था लेकिन 2017 तक ये आंकड़ा बढ़कर 65 फ़ीसदी हो गया.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
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