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बिहार चुनाव के नतीजे पीएम मोदी की छवि और राष्ट्रीय राजनीति पर कितना डालेंगे असर?
भारत में दस साल से केंद्र और अधिकतर राज्यों में सरकार चला रही बीजेपी जब लोकसभा चुनाव 2024 में 240 सीटें जीतकर और पहले से कुछ कमज़ोर होकर तीसरी बार केंद्र की सत्ता में आई तो कई विश्लेषकों को लगा था कि यहां से भारतीय राजनीति में शायद बीजेपी ढलान पर आ जाए.
लेकिन उसके बाद से देश के कई राज्यों में हुए चुनावों में जीत दर्ज कर बीजेपी ने साबित किया है कि ये आकलन कहीं न कहीं ग़लत थे.
बीजेपी ने महाराष्ट्र में नवंबर 2024 में एनसीपी और शिवसेना से अलग हुए धड़ों के साथ महायुति गठबंधन के तहत चुनाव लड़ा और गठबंधन ने 288 में से 235 सीटें जीतकर विपक्ष के महाविकास अघाड़ी गठबंधन को राज्य में बेहद कमज़ोर कर दिया.
भारत के सबसे बड़े राज्यों में शामिल और आर्थिक रूप से मज़बूत इस राज्य की सत्ता पर बीजेपी ने फिर से अपनी पकड़ मज़बूत की.
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इससे कुछ ही महीने पहले हुए आम चुनावों में महाराष्ट्र में बीजेपी ने 48 में से सिर्फ़ 9 सीटें जीती थीं और कांग्रेस के नेतृत्व वाले विपक्ष को राज्य में 30 लोकसभा सीटें मिलीं थीं.
इसी के साथ हरियाणा में हुए विधानसभा चुनावों में भी बीजेपी ने 90 में से 48 सीटें जीतकर लगातार तीसरी बार सत्ता हासिल की. हालांकि 37 सीटें जीतने वाली कांग्रेस का वोट प्रतिशत बीजेपी के मुक़ाबले बहुत ज़्यादा कम नहीं था.
अब भारत के अहम हिंदी भाषी राज्य बिहार में भी बीजेपी, जेडीयू और कई क्षेत्रीय दलों के एनडीए गठबंधन ने अप्रत्याशित और बेमिसाल जीत दर्ज की है.
विश्लेषक मान रहे हैं कि बिहार विधानसभा चुनाव का नतीजा भारत की राष्ट्रीय राजनीति पर गहरा और बहुआयामी प्रभाव डाल सकता है.
'और मज़बूत हुई बीजेपी'
यह नतीजा बीजेपी के लिए एक बड़ी जीत और सकारात्मक संकेत के रूप में देखा जा रहा है, जिसने केंद्र की सरकार और उसके नेतृत्व को मज़बूती दी है.
वहीं विपक्ष के लिए यह चुनौती और ज़मीनी स्तर पर संगठन को मज़बूत करने का अलर्ट है.
विश्लेषक मान रहे हैं कि विपक्ष को अपनी नीतियों, नेतृत्व और रणनीति में व्यापक सुधार करना होगा ताकि वह राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावी चुनौती पेश कर सके.
विश्लेषक मान रहे हैं कि इससे बीजेपी और मज़बूत होकर उभरेगी और इसका असर कई आगामी चुनावों तक दिखाई देगा.
विश्लेषक ये भी मान रहे हैं कि बीजेपी के भीतर भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह और अधिक मज़बूत होंगे.
वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक विश्लेषक हेमंत अत्री कहते हैं, "बिहार चुनाव परिणाम ने बीजेपी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह के नेतृत्व को फिर से मज़बूत किया है."
हेमंत अत्री के अनुसार, बिहार चुनाव ने केंद्र सरकार की स्थिति को मज़बूती दी है, जो 2024 के लोकसभा चुनावों में अल्पमत की स्थिति का सामना कर रही थी.
वह कहते हैं, "अब बीजेपी और उसकी रणनीति पर विपक्ष के हमले कम होंगे और बीजेपी दलितों, पिछड़ों और अन्य वर्गों से समर्थन हासिल करने की अपनी क्षमता को एक बार फिर प्रदर्शित करेगी. बीजेपी अध्यक्ष की नियुक्ति में भी तेज़ी आने की संभावना है, जो संगठन के लिए एक नई ऊर्जा लेकर आएगा. यह साफ़ दिखाता है कि बीजेपी राष्ट्रीय स्तर पर अपने नियंत्रण को मज़बूत करने में लग जाएगी."
अत्री के अनुसार, अब फिर से इस धारणा को मज़बूत किया जाएगा कि मोदी इन्विंसिबल यानी अजेय हैं, उन्हें कोई सत्ता से हिला नहीं सकता है.
वह कहते हैं, "बीजेपी मीडिया के ज़रिए ये नैरेटिव गढ़ने में शायद अब कामयाब हो जाए कि उसे हराया नहीं जा सकता है, इससे विपक्ष के मनोबल पर असर पड़ सकता है."
'नेशनल पॉलिटिक्स अपने ढर्रे पर चलेगी'
सीएसडीएस के निदेशक प्रोफ़ेसर संजय कुमार मानते हैं कि भारतीय राजनीति पर बीजेपी का एकक्षत्र राज मज़बूत हो रहा है.
संजय कुमार कहते हैं, "लोकसभा चुनाव के बाद ऐसा लगने लगा था कि शायद बीजेपी का जो प्रभाव है भारतीय राजनीति पर वह कम हो रहा है, लेकिन इसके बाद कई राज्यों में जो उसकी राजनीतिक जीत हुई है, उसने इसे ग़लत साबित कर दिया है. चाहे वह महाराष्ट्र की बात हो, हरियाणा की बात हो या फिर दिल्ली और अब बिहार में भी जहां चुनाव के पहले कई तरह के संभावनाओं की बात की जा रही थी. बिहार चुनाव में एनडीए गठबंधन की बड़ी जीत ने इन सभी संभावनाओं को विराम दे दिया है."
संजय कुमार कहते हैं, "जब दिल्ली के नतीजे आए तो कहा गया कि मार्जिनल विक्ट्री है, हरियाणा के नतीजे आए तो कहा गया कि बीजेपी किसी तरह बस जीत गई है. लेकिन अब बिहार के चुनाव के नतीजे ये बिलकुल स्पष्ट कर रहे हैं कि भारतीय राजनीतिक में बीजेपी का जो प्रभाव है, वह कम नहीं हुआ है बल्कि और बढ़ता हुआ नज़र आ रहा है."
द हिंदू की राजनीतिक संपादक निस्तुला हेब्बार भी ऐसी ही राय रखती हैं. निस्तुला का मानना है कि बिहार के चुनाव नतीजों से बीजेपी का आत्मविश्वास और बढ़ेगा.
हेब्बार कहती हैं, "बीजेपी के लिए यह एक उत्साह बढ़ाने वाला परिणाम है. ख़ासकर असम, तमिलनाडु, केरल और वेस्ट बंगाल के चुनावों से पहले."
हालांकि हेब्बार ये भी मानती हैं कि इसका राष्ट्रीय राजनीति पर बहुत अधिक असर नहीं होगा और वह अपने पुराने ढर्रे पर ही चलेगी.
हेब्बार कहती हैं, "नेशनल पॉलिटिक्स तो अपने ढर्रे पर ही चलेगी. किसी एक राज्य से कुछ सबक तो सीखे जा सकते हैं लेकिन इससे पूरे देश का मिज़ाज नहीं बदल सकता है."
महिला मतदाताओं का महत्व बढ़ेगा
बिहार में चुनावों के दौरान सरकार ने महिलाओं के खाते में दस-दस हज़ार रुपये भेजे और ये माना जा रहा है कि महिला मतदाता एनडीए के लिए एक अहम समर्थक वर्ग के रूप में उभरी हैं.
विश्लेषक मान रहे हैं कि बिहार नतीजों ने ये साबित किया है कि महिलाओं को अब अलग मतदाता वर्ग के रूप में देखा जाएगा.
निस्तुला हेब्बार कहती हैं, "बिहार नतीजों का एक अहम सबक़ यह है कि राजनीतिक दल महिला मतदाताओं की अहमियत समझेंगे और ये समझ बढ़ेगी कि महिलाओं को अपने साथ रखना है. नीतीश कुमार ने साल 2005 से ही महिलाओं के लिए कल्याणकारी योजनाएं चलाकर उन्हें अपने साथ जोड़ना शुरू किया. महिलाएं ब्रेड एंड बटर मुद्दों पर वोट करती हैं."
"नीतीश ने सामाजिक आधार पर मतदाताओं को जोड़ने का एक मॉडल पेश किया है. उनके पास अपनी जाति का कोई मज़बूत आधार वोट नहीं था, बावजूद इसके उन्होंने समाज कल्याण योजनाओं से लोगों को ख़ुद के साथ जोड़ा और एक मज़बूत वर्ग तैयार किया. बिहार में सरकार का समाज कल्याण पर ख़र्च बहुत अधिक है. ये मॉडल अब दूसरे राज्यों में भी दिखाई दे सकता है."
वहीं संजय कुमार कहते हैं, "इन चुनवों में एनडीए की एक रणनीति ये दिखी कि जीत के लिए गठबंधन से आगे बढ़कर भी कुछ करना होगा, सिर्फ़ गठबंधन के मूल समर्थक मतदाताओं के दम पर चुनाव नहीं जीता जा सकता."
वह कहते हैं, "आख़िरकार चुनाव में 20-22 प्रतिशत जो अनिश्चित मतदाता होते हैं, वही निर्णायक होते हैं. एनडीए गठबंधन ने ये दिखाया कि वह ऐसे वादे करते हैं, जिन्हें पूरा कर सकें."
विश्लेषक मानते हैं कि आने वाले समय में भारतीय राजनीति पर वेलफ़ेयर यानी समाज कल्याण योजनाओं का असर और ज़्यादा नज़र आ सकता है.
इंडिया गठबंधन पर क्या होगा असर?
बिहार में महागठबंधन को बड़ी हार का सामना करना पड़ा है. राष्ट्रीय राजनीति के नज़रिए से बिहार हमेशा अहम रहा है. ये सबसे ज़्यादा सीटों वाले हिंदी भाषी राज्यों में से एक है.
ऐसे में ये सवाल उठ रहा है कि बिहार के नतीजों का इंडिया गठबंधन पर क्या असर हो सकता है.
इसे लेकर विश्लेषकों की राय बंटी हुई है. हेमंत अत्री मानते हैं कि इस स्थिति में इंडिया गठबंधन शायद और मज़बूत होकर उभरे क्योंकि इंडिया गठबंधन के घटक दलों के सामने अब अस्तित्व का सवाल खड़ा हो सकता है.
वह कहते हैं, "मुझे लगता है इंडिया अलायंस यहां से और ज़्यादा मज़बूत होकर उभरेगा क्योंकि अब स्थिति यह हो गई है कि जिस तरीके़ से तेजस्वी को निपटाया गया है, अगला नंबर ममता बनर्जी का और उसके बाद अखिलेश यादव और फिर स्टालिन वगैरह का हो सकता है."
"विपक्षी नेताओं में ये धारणा बन सकती है कि मज़बूत केंद्र सरकार राज्य के नेताओं को निशाने पर ले सकती है. ऐसे में ये कहा जा सकता है कि इंडिया अलायंस के दलों की मजबूरी होगी और मज़बूती से साथ आना और अधिक मज़बूती के साथ अपने मुद्दों को उठाना. अब इंडिया अलायंस के दलों के सामने सवाल सर्वाइवल का होगा."
वहीं निस्तुला हेब्बार मानती हैं कि इंडिया अलायंस को भी अब अपनी आंतरिक कमज़ोरियों और नेतृत्व के मुद्दों पर ध्यान देना होगा.
हेब्बार कहती हैं, "इंडिया ब्लॉक में अब अंदर से लड़ाइयां हो सकती हैं, आपको याद होगा लोकसभा चुनाव के दौरान बिहार में पप्पू यादव वगैरह को लेकर जो कंट्रोवर्सी हुई थी, आरजेडी ने उनको स्वीकार नहीं किया और कांग्रेस ने टिकट नहीं दिया, वह इंडिपेंडेंट लड़े और जीते. ऐसे में अब बिहार में तेजस्वी की रणनीति को लेकर भी सवाल उठ सकता है."
बंगाल के लिए संदेश?
निस्तुला हेब्बार यह भी मानती हैं कि इंडिया ब्लॉक में अब कोई सीताराम येचुरी जैसा नेता नहीं है जो सभी को साथ लाने का प्रयास कर सके.
हेब्बार कहती हैं, "इंडिया अलायंस में सीताराम येचुरी ने सभी को साथ लाने में अहम भूमिका निभाई थी. उस खेमे में अभी उस तरीके़ का कोई आदमी आया नहीं है. ऐसे में इंडिया ब्लॉक को एकजुट रखने की चुनौती भी होगी."
लेकिन अत्री मानते हैं कि मौजूदा स्थिति में इंडिया अलायंस से जुड़े नेताओं के लिए अलग होना आसान नहीं होगा. वह कहते हैं, "सभी को अपने सर्वाइवल की लड़ाई लड़नी है. अगर आज कोई भी अलग होता है तो एक ही स्थिति में हो सकता है कि वह बीजेपी के साथ आए."
"आज की तारीख़ में इंडिया अलायंस से जुड़े दलों में से कोई बीजेपी के साथ नहीं आ सकता, चाहे वह तेजस्वी हैं, चाहे वो अखिलेश हैं, चाहे वो स्टालिन हैं और यहां तक कि ममता बनर्जी भी इंडिया अलायंस के ख़िलाफ़ कुछ बोलने से पहले सोचेंगी."
बिहार के बाद अब अगले साल पश्चिम बंगाल में विधानसभा चुनाव होने हैं. ऐसे में विश्लेषक ये मान रहे हैं कि बीजेपी और मज़बूती के साथ पश्चिम बंगाल चुनावों में जाएगी.
हेमंत अत्री कहते हैं, "केंद्र सरकार आगामी बंगाल चुनाव तक अपना प्रभुत्व दर्ज कराएगी और विपक्ष को घेरने का माहौल बनाएगी."
निस्तुला हेब्बार कहती हैं, "बीजेपी के लिए यह एक हाई मोराल बढ़ाने वाला परिणाम है, ख़ासकर असम, तमिलनाडु, केरल और पश्चिम बंगाल के चुनावों से पहले."
हालांकि हेब्बार ये भी मानती हैं पश्चिम बंगाल में बीजेपी के सामने कई चुनौतियां भी हैं और पार्टी भी ये जानती है.
वह कहती हैं, "वहां पार्टी के सामने डेमोग्राफ़िक चुनौती है, बीजेपी में ये आम समझ है कि पश्चिम बंगाल को जीतना एक मुश्किल चुनौती है. वहां भाषा भी एक मुद्दा है, बीजेपी को हिंदी भाषी लोगों की पार्टी समझा जाता है जबकि ममता बनर्जी वहां लेंग्वेज कार्ड खेल सकती हैं. पिछली बार भी टीएमसी ने यही मुद्दा उठाया था."
'अपने मुद्दों पर और आगे बढ़ेगी बीजेपी'
हिंदुत्व की राजनीति को अपना आधार बनाने वाली भारतीय जनता पार्टी अपने तीन प्रमुख एजेंडों में से दो पूरे कर चुकी है. 2019 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण हुआ और उसी साल बीजेपी ने जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाकर उसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित कर दिया.
अब बस एक प्रमुख वैचारिक एजेंडा बचा है- यूनिफ़ॉर्म सिविल कोड यानी समान नागरिक संहिता.
बीजेपी लंबे समय से देश में रहने वाले सभी नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता का मुद्दा उठाती रही है. हालांकि पार्टी अभी राष्ट्रीय स्तर पर इस मुद्दे पर आगे नहीं बढ़ी है बल्कि राज्यों के ज़रिए इसे लाने का प्रयास किया जा रहा है.
विश्लेषक मानते हैं कि पार्टी अब इस दिशा में भी आगे बढ़ सकती है.
हेमंत अत्री कहते हैं, "बीजेपी भले ही इसे राष्ट्रीय स्तर पर लागू न करे क्योंकि इसके सामने कई चुनौतियां हैं लेकिन मीडिया के ज़रिए ये संदेश ज़रूर दिया जा सकता है कि पार्टी इस पर आगे बढ़ रही है."
वहीं निस्तुला हेब्बार कहती हैं, "भले ही इस कार्यकाल में बीजेपी 240 सीटों के साथ केंद्र की सत्ता में आई हो लेकिन वह ऐसा कोई काम करने से पीछे हटती नहीं दिखी है जो वह करना चाहती है. जहां तक यूसीसी का सवाल है, जो बीजेपी-आरएसएस के लिए एक अहम मुद्दा है, बीजेपी को पहले ही समझ आ गया था कि इसे लेकर कई चुनौतियां हैं, जैसे कि आदिवासियों का मुद्दा और इसलिए ही पार्टी अपने इस वैचारिक एजेंडे को राज्यों के ज़रिये पूरा कर रही है."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.