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बीजेपी के पास बिहार में नहीं था कोई चेहरा, इतनी बड़ी सफलता की हैं कई वजहें
- Author, सीटू तिवारी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
बिहार में चुनावों की मुनादी हो चुकी थी. महागठबंधन सीटों के बंटवारे को लेकर आपस में ही उलझा हुआ था. लेकिन बीजेपी दफ़्तर में सारे काम प्लानिंग के तहत हो रहे थे.
हेलिकॉप्टर, आवास, खान-पान जैसी छोटी छोटी लेकिन अहम ज़िम्मेदारियों के लिए कार्यकर्ता छोटे-छोटे कमरों में तैनात कर दिए गए थे.
मुझे उस वक़्त बीजेपी दफ़्तर में दो नागपुर से आए लोग मिले जो टूटी-फूटी हिन्दी में मुझसे ये फीडबैक लेने की कोशिश कर रहे थे कि बिहार बीजेपी की दिक्कतें क्या हैं?
इन दो लोगों में एक मुस्लिम थे. ये लोग बिहार की दलित और मुस्लिम बस्तियों में जाने वाले थे और उनसे संवाद करने वाले थे. उनके साथ स्थानीय स्तर पर एक व्यक्ति की तैनाती की गई थी ताकि भाषाई दिक़्क़त न हो.
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ये बीजेपी के 'माइक्रो मैनेजमेंट' का एक उदाहरण भर था, जिसने 'फेसलेस' यानी बिना किसी चेहरे वाली बिहार बीजेपी को हज़ारों कार्यकर्ताओं के सहारे जीत दिला दी.
1962 में बीजेपी की मातृसंस्था जनसंघ ने महज़ तीन सीट जीतकर संयुक्त बिहार में अपना खाता खोला था. लेकिन 63 साल बाद अपने सोशल बेस का विस्तार करते हुए बीजेपी 89 सीट जीतकर सबसे बड़ी पार्टी बन गई है.
ऐसे में ये सवाल अहम है कि बिहार बीजेपी ने इस जीत का समीकरण कैसे बैठाया, तब जबकि अब तक वो ज़्यादा नंबर लाकर भी एनडीए में जूनियर पार्टनर की भूमिका में ही है.
और क्या एनडीए की इस बंपर जीत के बाद भी मुख्यमंत्री का चेहरा मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ही होंगे और वो पांच साल तक मुख्यमंत्री बने रहेंगें?
24 घंटे सातों दिन काम, जीत का मंत्र
पहले बात बीजेपी की बंपर जीत की.
दरअसल प्लानिंग, माइक्रो मैनेजमेंट और सांगठनिक मज़बूती के लिए लगातार काम करना ये तीन ऐसी चीज़ें हैं जिन्होंने बिहार बीजेपी के लिए काम किया.
पार्टी ने 101 सीट पर अपने उम्मीदवारों को उतारा था जिसमें सवर्ण समुदाय से 49, पिछड़ा-अति पिछड़ा से 40 और 12 दलित थे. इन्हें और अगर विस्तृत तरीके से देखें तो 21 राजपूत, 16 भूमिहार, 11 ब्राह्मण, एक कायस्थ, 13 वैश्य, 12 अति पिछड़ा, 7 कुशवाहा, 2 कुर्मी, 6 यादव और 12 दलित थे. इसमें एक भी मुस्लिम उम्मीदवार नहीं था.
पार्टी बीते कई चुनावों में मुस्लिम उम्मीदवार नहीं उतार रही.
विधानसभा चुनाव के दौरान मैं सीमांचल कवर करने किशनगंज में बीजेपी दफ़्तर भी गई थी. बेहद अंदरूनी हिस्से में बने दो मंज़िला इस दफ़्तर में बहुत चहल-पहल थी.
वहां मौजूद ज़िला मंत्री पंकज कुमार साहा ने मुझसे कहा था, "इलेक्शन आए चाहे जाएं, हम लोग 24X7 (24 घंटे सातों दिन) काम करते हैं. चुनाव महत्वपूर्ण हैं लेकिन हम ये भी जानते हैं कि संगठन सबसे ज़रूरी है."
प्रवासियों को साधा
बीजेपी ने इस चुनाव में प्रवासी बिहारियों को साधा.
पार्टी ने जुलाई माह से ही अपने प्रवक्ता और अन्य पदाधिकारियों को देशभर के सभी राज्यों में भेजा. ख़ासतौर पर उन राज्यों में जहां बिहारी बड़ी संख्या में रहते हैं.
पार्टी प्रवक्ता विनोद शर्मा पर गुजरात के सूरत की ज़िम्मेदारी थी.
बीबीसी से बातचीत में वो बताते हैं, "हम लोगों को हर जगह प्रवासी मज़दूर, बिज़नेसमैन, डॉक्टर या किसी भी पेशे से जुड़े बिहारियों से मिलने और उनसे संवाद करने की ज़िम्मेदारी थी. हम लोगों ने उनसे आग्रह किया था कि वो छठ और दीपावली बिहार में मनाएं और अच्छी सरकार के लिए वोट दें. ज़ाहिर तौर पर हमने अपनी सरकार के अच्छे काम भी बताएं और नतीजा देखिए कि वोटिंग प्रतिशत तो बढ़ा ही, लेकिन बीजेपी को भी बंपर वोटिंग हुई."
इस पूरे काम के लिए अन्य राज्यों में बने 'बिहारी प्रवासी संघ' ने एक तरीक़े से डेटा बैंक का काम किया, जिसकी वजह से बिहार बीजेपी के पदाधिकारियों को काम करने में आसानी हुई. प्रवासी बिहारियों को ये भी भरोसा दिया गया था कि अबकी बार ज़्यादा संख्या में ट्रेन चलाई जाएंगी ताकि उनको घर (बिहार) आने में मुश्किलें ना हो.
राजनीतिक विश्लेषक पुष्पेन्द्र बीबीसी से कहते हैं, "बीजेपी के लगातार विकास की बड़ी वजह बीजेपी का मज़बूत कैडर है. ये कैडर दो ही तरह की पार्टियों में है. या तो घोर दक्षिणपंथी या फिर वामपंथी दल में. जेडीयू और आरजेडी कैडर बेस्ड पार्टी नहीं हैं. सिर्फ़ बीजेपी और लेफ़्ट ही कैडर बेस्ड हैं."
"वामपंथी में कैडर का बिखराव हो रहा है लेकिन बीजेपी ने अपने कैडर को बचाए भी रखा है और उसका लगातार विस्तार भी कर रही है. दूसरा ये कि जब आप कैडर बेस्ड पार्टी होंगे तो धांधली और मोबलाइज़ेशन दोनों ही काम आसानी से कर सकते हैं."
इस मज़बूत कैडर के ज़रिए पार्टी ने बूथ मैनेजमेंट पर काम किया.
बूथ को कैटगराइज़ करके ऊर्जा का सही इस्तेमाल
बिहार विधानसभा चुनाव में पार्टी ने धर्मेन्द्र प्रधान को चुनाव प्रभारी बनाया था. साथ ही केन्द्रीय जलशक्ति मंत्री सीआर पाटिल और उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री केशव प्रसाद मौर्य को सह प्रभारी बनाया था.
धर्मेन्द्र प्रधान बिहार के पहले भी प्रभारी रह चुके हैं और उनकी अगुआई में बीजेपी को ओडिशा में 24 साल से सत्तासीन बीजेडी को हराने में साल 2024 में सफलता मिली थी.
इसी तरह पश्चिम बंगाल में साल 2021 में पश्चिम बंगाल में ममता बैनर्जी की नंदीग्राम सीट पर हार में भी अहम भूमिका निभाई थी.
ओबीसी समुदाय से आने वाले धर्मेन्द्र प्रधान और केशव प्रसाद मौर्य पर ओबीसी वोटर्स को साधने के साथ-साथ जीत की रणनीति तैयार करने की ज़िम्मेदारी थी.
वहीं सीआर पाटिल ने बूथ मैनेजमेंट पर काम किया.
उनकी अगुआई में बिहार की 243 विधानसभा में 8 से 10 लोगों की टीम बनाई गई. इस टीम ने बूथ को चार भागों में कैटेगराइज़ किया- ए, बी, सी और डी. ये कैटगराइज़ेशन, हर बूथ पर समर्थक मतदाताओं के हिसाब से था. यानी पार्टी ने तय किया कि जिस बूथ पर महागठबंधन को पूरी बढ़त हो, वहां पर अपनी ऊर्जा लगाने के बजाए, उन बूथों पर अपनी ऊर्जा का इस्तेमाल हो, जहां मतदाताओं को अपने पक्ष में करना आसान हो.
बता दें सितंबर में ही इन नेताओं को ये ज़िम्मेदारी दी गई थी. इस बार विधानसभा चुनावों में बहुत वक़्त नहीं था, इसलिए पार्टी के कैडर की ऊर्जा का समय बचाते हुए सही इस्तेमाल पर फ़ोकस किया गया.
महिला कार्यकर्ताओं का बिहार में डेरा
बीते कई चुनावों का वोटिंग पैटर्न देखें तो राज्य में महिलाएं, पुरुषों से ज़्यादा मतदान करती हैं.
बीजेपी ने इसको ध्यान में रखते हुए महिला केन्द्रित स्ट्रैटजी पर काम किया. जहां एक तरफ़ नीतीश सरकार महिला केन्द्रित योजनाओं की घोषणा कर रही थी, वहीं बीजेपी ने पांच राज्यों छत्तीसगढ़, झारखंड, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और दिल्ली से 200 महिला कार्यकर्ताओं को बिहार भेजा.
राज्यसभा सदस्य और बिहार बीजेपी की महिला विंग की अध्यक्ष धर्मशिला गुप्ता बीबीसी से बताती हैं, "इन महिलाओं का चयन केन्द्रीय स्तर पर हुआ और ये महिलाएं चुनाव से तीन महीने पहले ही बिहार आ गई थी. पार्टी ने 52 ज़िले (पार्टी के सांगठनिक ज़िले) के 1426 मंडल की महिला अध्यक्षों के साथ दूसरे राज्य की महिलाओं का समन्वय स्थापित करके बूथ स्तर पर काम किया."
बीजेपी ने 5 बूथ को मिलाकर एक शक्ति केन्द्र बनाया. ये केन्द्र महिलाओं के साथ छोटी छोटी बैठकें करके उन्हें केन्द्र और राज्य की योजनाएं ख़ासतौर पर पक्का घर, शौचालय, उज्ज्वला योजना आदि के बारे में बताते. इसके अलावा पार्टी ने हर बूथ पर 'सप्त सखी' यानी 7 महिलाओं का एक समूह बनाया जिन पर महिलाओं को मतदान केन्द्र तक लाने की ज़िम्मेदारी थी.
गठबंधन में तालमेल और आरएसएस का सहयोग
बीजेपी ने ना सिर्फ़ कार्यकर्ताओं के ज़रिए बल्कि कई प्रदेश के मुख्यमंत्रियों जैसे रेखा गुप्ता, योगी आदित्यनाथ, मोहन यादव सहित कई बड़े नेताओं को चुनावी मैदान में उतारा.
जानकार बताते हैं कि गृह मंत्री अमित शाह ने पार्टी से नाराज़ कार्यकर्ता जो निर्दलीय उम्मीदवार के तौर पर खड़े होना चाहते थे, उनसे बातचीत करके मनाया. इसका सबसे अच्छा उदाहरण अलीनगर सीट है जहां से बीजेपी ने लोकगायिका मैथिली ठाकुर को खड़ा किया था.
उस सीट पर कई साल से पार्टी नेता संजय कुमार सिंह तैयारी कर रहे थे जिनका इलाके में अच्छा प्रभाव था. लेकिन पार्टी ने ऐन वक़्त में मैथिली को उम्मीदवार बना दिया.
इससे नाराज़ संजय कुमार सिंह ने नॉमिनेशन से पहले कटने वाली एनआर (नाज़िर रसीद) भी कटा ली थी लेकिन अमित शाह ने उनसे बात करके उनकी नाराज़गी दूर की.
बीजेपी की इस जीत में आरएसएस का भी सहयोग रहा. सहरसा ज़िले से जुड़े एक स्वयंसेवक ने बीबीसी को बताया, "हम लोगों ने प्रत्येक विधानसभा में 400 छोटी बड़ी बैठकें कीं. इसमें हम सीधे तौर पर लोगों से बीजेपी को वोट करने को नहीं कहते. लेकिन हम उन्हें लोकमत परिष्कार के बारे में बताते हैं जिसमें तीन बिंदु है. पहला राष्ट्रहित में मतदान, नोटा नहीं दबाना और सौ फ़ीसदी मतदान."
राष्ट्रहित में मतदान का क्या मतलब है? इस सवाल के जवाब में वो कहते हैं, "हिंदुत्व की राजनीति करने वाले को मतदान."
बीजेपी कब तक रहेगी एनडीए में जूनियर पार्टनर
बीजेपी ने इस जीत के लिए बूथ स्तर पर अलग-अलग फ्रंट के ज़रिए काम किया. यही वजह है कि बीजेपी ने सिर्फ़ 20.08 फ़ीसदी वोट पाकर भी 89 सीट जीती. वहीं आरजेडी को 23 फ़ीसदी वोट मिला लेकिन महज़ 25 सीट जीती.
राजनीतिक विश्लेषक पुष्पेन्द्र बीजेपी की इस बंपर जीत की चार वजह बताते हैं. वो कहते हैं, "पहला तो यही है कि बीजेपी अपना परफ़ॉरमेंस हमेशा बेहतर करती रहती है. लोकसभा की जीत के हिसाब से एनडीए एलायंस को बिहार में 177 सीट मिलनी तय थी लेकिन इसमें भी 25 सीट का इज़ाफ़ा हो गया और उसकी बड़ी वजह ये है कि अबकी बार एनडीए एलायंस में चिराग पासवान और उपेन्द्र कुशवाहा दोनों थे."
"दूसरा ये कि अभी भी बिहार की सरकार का चेहरा नीतीश कुमार हैं. इसलिए सरकार की किसी विफलता की एकांउटिबिलिटी बीजेपी पर ट्रांसफर नहीं होती."
पुष्पेन्द्र तीसरी वजह बीजेपी के मज़बूत कैडर को बताते हुए कहते हैं, "हाल के सालों में बीजेपी ने सांप्रदायिकता की राजनीति को बिहार में तेज़ किया है, जिससे आरजेडी का कोर वोटर यादव भी बहुत हद तक प्रभावित है."
बीजेपी की इस जीत के बाद एक सवाल ये भी है कि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार कब तक मुख्यमंत्री बने रहेंगें? या फिर गठबंधन में ज़्यादा सीट लाकर भी कब तक जूनियर पार्टनर बीजेपी बनी रहेगी? सवाल ये भी है कि बिहार की सत्ता में रहने के लिए अब बीजेपी को जेडीयू की कितनी ज़रूरत है? आंकड़ों में देखें तो एनडीए में जेडीयू को अगर हटा दें तो बीजेपी, हम, एलजेपी (आर) और आरएलएम ने मिलकर 107 सीटें जीती हैं.
इस सवाल पर पुष्पेन्द्र कहते हैं, " ये तब तक रहेगा जब तक बिहार में आरजेडी नहीं टूटे और लोकसभा में जेडीयू सांसद हैं. इन दोनों को जब बीजेपी एक ही वक़्त में अपने पक्ष में कर लेगी तो वो अपने बलबूते और अपने सीएम के साथ सरकार बनाएगी."
बिहार: जनसंघ से अब तक
बीजेपी बिहार में बहुत मज़बूत स्थिति में है लेकिन पार्टी का राज्य में इतिहास देखें तो पार्टी की चुनावी विजय का खाता अविभाजित बिहार में 1962 में खुला था. उस वक्त बीजेपी नहीं जनसंघ अस्तित्व में थी.
बीजेपी का गठन 6 अप्रैल 1980 को हुआ था, लेकिन पार्टी का इतिहास भारतीय जनसंघ से जुड़ा हुआ है. 1952 और 1957 के चुनाव में संयुक्त बिहार में बीजेपी को असफलता मिली.
लेकिन 1962 में जनसंघ के तीन विधायक, नवादा से गौरीशंकर केसरी, हिलसा से जगदीश यादव और सिवान से जनार्दन तिवारी जीते थे. 1967 में बिहार में जब पहली गैर कांग्रेसी सरकार महामाया प्रसाद सिन्हा के नेतृत्व में बनी तो जनसंघ के तीन विधायक मंत्री बने.
बाद में 1980 में बीजेपी के गठन के बाद पहले प्रदेश अध्यक्ष कैलाशपति मिश्र बने. कैलाशपति मिश्र, ताराकांत झा, ठाकुर प्रसाद और जगदंभी यादव ने पार्टी के लिए मज़बूत ज़मीन तैयार की. पार्टी ने सवर्णों और वैश्यों के बीच पार्टी की मज़बूत पैंठ बनाई जो आज भी पार्टी के आधार वोटर हैं.
1990 में जब आरजेडी सत्ता में आई तो बीजेपी ने 39 सीट विधानसभा में जीती और कुछ समय के लिए आरजेडी सरकार को समर्थन भी दिया. पार्टी ने साल 1995 के चुनाव में 41 और साल 2000 में पार्टी ने 67 सीट पर कब्जा जमाया था.
1996 में बीजेपी ने समता पार्टी (अब जेडीयू) के साथ गठबंधन किया था, जो कुछ अंतराल को छोड़कर अब तक कायम है.
बिहार बीजेपी के 'भीष्म पितामह' कहे जाने वाले कैलाशपति मिश्र जेडीयू के साथ गठबंधन पर अपनी नाराज़गी सार्वजनिक मंचों से ज़ाहिर करते रहते थे. उनका कहना था कि इससे पार्टी में 'नेतृत्व के विकास पर बुरा असर' होगा. अगर बीजेपी के लिहाज़ से देखें तो ये बात सच लगती है.
कैलाशपति मिश्र की मृत्यु साल 2012 में हुई थी. उस वक़्त नरेन्द्र मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री थे. कैलाशपति मिश्र की मृत्यु पर बिहार आए नरेन्द्र मोदी उस वक़्त एयरपोर्ट से कैलाशपति मिश्र के घर जाकर वापस लौट गए थे.
मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की नरेन्द्र मोदी को लेकर असहजता उसकी बड़ी वजह थी. लेकिन 13 साल बाद बिहार बीजेपी ने अपनी पोजिशन मज़बूत कर ली है. 18वीं विधानसभा के कार्यकाल में बीजेपी का कोई 'अनाम' सा नेता, बिहार के 1-अणे मार्ग (मुख्यमंत्री आवास) में रहने लगे तो आश्चर्य नहीं होगा.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.