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बिहार में नीतीश कुमार की जीत में, जिसकी रही अहम भूमिका
- Author, संजय कुमार
- पदनाम, प्रोफ़ेसर और चुनाव विश्लेषक
- Author, विभा अत्री
- पदनाम, लोकनीति में रिसर्चर
2025 के बिहार चुनावों का नतीजा लगभग वैसा ही आया जैसी ज़्यादातर लोगों को उम्मीद थी, लेकिन जीत के वज़न ने कई जानकारों को चौंका दिया.
जातीय समीकरण और गठबंधन पार्टियों का महत्व अब भी बना हुआ है, लेकिन कल्याणकारी योजनाओं की डिलीवरी जीत को तय करने सबसे बड़ा कारक, भले की अकेला न हो, बनकर उभरी.
एनडीए सरकार के कामकाज़ के रिकॉर्ड और नेतृत्व के साथ, सही समय पर और बड़े पैमाने पर कल्याणकारी योजनाओं की शुरुआत ने उस रेखा को धुंधला कर दिया जो सामान्य प्रशासन और चुनावों को ध्यान में रखकर की गई पहलों के बीच होती है.
चुनाव के बाद पोल्समैप (PollsMap) के किए चुनाव सर्वे से मिले प्रमाण पुष्टि करते हैं कि बिहार में कल्याणकारी योजनाएं प्रभावशाली पैमाने पर लोगों तक पहुंचीं और मतदाताओं के लिए साफ़ था कि इसका श्रेय किसे देना है और इसी ने उनकी राजनीतिक समझ और चुनावी पसंद को दिशा दी.
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जेडीयू सरकार में कल्याणकारी योजनाओं की पैठ
जेडीयू के नेतृत्व वाली सरकार के दौरान कल्याणकारी योजनाओं की पहुंच व्यापक थी. सर्वे के मुताबिक, हर पांच में से चार से ज़्यादा घरों को 'हर घर बिजली योजना' का फ़ायदा मिला और हर दस में से क़रीब सात घरों तक 'हर घर नल का जल' योजना पहुंची.
महिलाओं पर केंद्रित योजनाएं भी बड़ी संख्या में घरों तक पहुंचीं. लगभग एक-तिहाई घरों को 'बालिका पोशाक योजना', जिसके तहत लड़कियों को स्कूल यूनिफॉर्म उपलब्ध करवाई जाती है, का लाभ मिला और करीब पांचवें हिस्से को 'स्वयं सहायता भत्ता योजना' का फ़ायदा हासिल हुआ, जिसमें नौकरी ढूंढ रहे बेरोज़गार युवाओं को 1,000 रुपये मासिक भत्ता मिलता है.
इस चुनाव में सबसे बड़ा राजनीतिक दांव साबित हुई 'मुख्यमंत्री महिला रोज़गार योजना', जो चुनाव से ठीक पहले शुरू हुई और जिसमें महिलाओं को 10,000 रुपये की सीधी नक़द सहायता दी गई. लगभग पांच में से तीन लोगों के अनुसार, उन्हें या उनके घर में किसी को इस योजना का फ़ायदा मिला.
इससे पता चलता है कि कि यह योजना कितनी तेज़ी से और कितने बड़े पैमाने पर लोगों तक पहुंची. तात्कालिक आर्थिक मदद के साथ इस योजना ने मतदाताओं को याद दिलाया कि नीतीश कुमार लंबे समय से महिलाओं के लिए काम कर रहे हैं— जैसे कि शिक्षा सहायता, साइकिल योजना और अन्य कार्यक्रम. नए और पुराने फ़ायदों ने सत्तारूढ़ गठबंधन के लिए समर्थन को बल दिया, ख़ासकर महिलाओं के.
सर्वे यह भी दिखाता है कि इन योजनाओं की पहुंच व्यापक और समावेशी रही. लाभार्थी हाशिए पर रहने वाले समुदायों, ग्रामीण घरों और कम आय वाले समूहों में फैले हुए थे. इससे यह भी पता चलता है कि इन योजनाओं का वितरण काफ़ी बड़े पैमाने पर हुआ.
योजनाओं का श्रेय
सबसे अहम बात, श्रेय या क्रेडिट के साफ़ बंटवारे ने भी एनडीए गठबंधन को और मज़बूत किया.
इन योजनाओं के ज़्यादातर लाभार्थियों ने इनका श्रेय राज्य सरकार को दिया. लगभग दस में से सात लाभार्थियों ने कहा कि योजनाएं राज्य सरकार की वजह से मिलीं, जबकि करीब एक-चौथाई ने श्रेय केंद्र सरकार को दिया.
यह भी महत्वूर्ण है कि केंद्र सरकार को श्रेय देने से एनडीए को कोई नुक़सान नहीं हुआ क्योंकि जेडीयू राज्य और केंद्र दोनों स्तरों पर एनडीए का हिस्सा है. इस स्पष्टता की वजह से कल्याणकारी योजनाओं की डिलीवरी का सत्तारूढ़ गठबंधन को बड़ा राजनीतिक फ़ायदा मिला.
लाभार्थियों ने मतदान कैसे किया
डेटा बताता है कि योजनाओं और मतदान के बीच सीधा संबंध था. जिन लोगों को योजनाओं से फ़ायदा मिला, उन्होंने एनडीए को उन लोगों की तुलना में ज़्यादा समर्थन दिया जिन्हें इनका फ़ायदा नहीं मिला था. उन योजनाओं का असर सबसे ज़्यादा दिखा जो सबसे ज़्यादा लोगों तक पहुंचीं.
महिला रोज़गार योजना, जिसकी लाभार्थी 57% थीं, में से 54% लाभार्थियों ने एनडीए को वोट दिया जबकि ग़ैर-लाभार्थियों में यह आंकड़ा 35% था- यानी कि 19 प्रतिशत अंक का बड़ा अंतर.
इसी तरह हर घर बिजली योजना के 83% लाभार्थियों में से 49% लाभार्थियों ने एनडीए को समर्थन दिया, जबकि ग़ैर-लाभार्थियों में यह 34% था- जिससे एनडीए को 15 प्रतिशत अंक का फ़ायदा मिला.
हर घर नल का जल योजना के 69% लाभार्थियों में से 51% ने एनडीए को वोट दिया, जबकि ग़ैर-लाभार्थी 37 फ़ीसदी थे- इसमें 14 प्रतिशत अंक का अंतर रहा.
भविष्य के वादे और संभावित कल्याण योजनाएं
मौजूदा योजनाओं के अलावा, मतदाताओं के फ़ैसले पर भविष्य में मिलने वाले फ़ायदे के वादों का भी असर पड़ा, जिन्होंने एक तरह से संभावित कल्याणकारी पहल की तरह काम किया.
सर्वे के मुताबिक, तेजस्वी यादव के 'हर घर में एक सरकारी नौकरी' के वादे ने बड़ी संख्या में लोगों को प्रभावित किया.
लगभग एक-तिहाई (36%) ने कहा कि इस वादे ने उनके वोट को 'बहुत ज़्यादा' प्रभावित किया और 23% ने कहा 'कुछ हद तक' असर हुआ.
तेजस्वी के नौकरी वाले वादे ने सभी जातियों में असर किया. यह सिर्फ मुस्लिम और यादव तक सीमित नहीं रहा. एमजीबी (महागठबंधन) के मुख्य समर्थकों- यादवों के 52% और मुसलमानों के 60% ने कहा कि इस वादे ने उनके वोट को 'बहुत ज़्यादा' प्रभावित किया.
वहीं ग़ैर-एमवाई समुदायों में भी इसका असर दिखा: कुरमी-कोरी और अन्य ओबीसी समुदायों के एक-चौथाई से ज़्यादा और दलितों के तीन में से एक वोटर ने कहा कि इस वादे का उन पर गहरा असर हुआ. हालांकि ऊंची जातियों में संख्या कम थी लेकिन 13% ने माना कि इस वादे ने उनके वोट को 'बहुत ज़्यादा' प्रभावित किया.
कुल मिलाकर, जिन पर इस वादे का गहरा असर था, उनमें से लगभग दो-तिहाई (62%) ने एमजीबी को वोट दिया, जबकि करीब एक-चौथाई ने एनडीए को.
जैसे-जैसे वादे का असर कम हुआ, एमजीबी का समर्थन तेज़ी से घटता गया और एनडीए का बढ़ता गया, ख़ासकर उन लोगों में जिन्होंने कहा कि इस वादे का उन पर कोई असर नहीं पड़ा.
जाति-वार वोटिंग पैटर्न बताता है कि जिन यादवों और मुसलमानों पर इस वादे का गहरा असर था, उनमें से 86% यादव और 75% मुसलमानों ने एमजीबी को वोट दिया.
ग़ैर-एमवाई समुदायों में भी इसका असर दिखा: इस वादे को अहम मानने वाले, कुरमी-कोरी में से 22% और दलितों में से लगभग आधे ने महागठबंधन को समर्थन दिया.
यह दिखाता है कि इस वादे ने सिर्फ़ मुख्य समर्थकों को ही मज़बूती के साथ नहीं खड़ा किया, बल्कि पारंपरिक आधार के बाहर से भी कुछ वोट खींचे.
'बहुत अहम' वादा
इसी तरह, जेडीयू के 'युवाओं के लिए एक करोड़ सरकारी नौकरियां' के वादे ने भी लोगों को खूब लुभाया. इसने हर दस में से छह लोगों को प्रभावित किया (28% 'बहुत ज़्यादा' और 32% 'कुछ हद तक').
ये नतीजे बताते हैं कि मतदाताओं ने मौजूदा योजनाओं का तो आकलन किया ही, चुनावी वादों ने भविष्य के लाभ के संकेत के रूप में एक सहायक की भूमिका भी निबाही, जिससे सत्तारूढ़ गठबंधन की अपील और मज़बूत हुई.
जिन मतदाताओं ने कहा कि जेडीयू का रोज़गार का वादा उनके लिए 'बहुत अहम' था, उनमें पांच में से तीन से कुछ ज़्यादा ने एनडीए को वोट दिया, जबकि पांच में से करीब एक ने एमजीबी को.
जैसे-जैसे इस वादे का असर घटा, एनडीए का समर्थन थोड़ा कम हुआ- लेकिन यह गिरावट उतनी तेज़ नहीं रही जितनी महागठबंधन के समर्थन में तेजस्वी के वादे को लेकर हुई थी.
यह बताता है कि तेजस्वी का वादा जहां एमजीबी की ओर झुकाव वाले समर्थकों को जुटाने में मददगार रहा, वहीं जेडीयू का वादा एनडीए के आधार को मज़बूत करने में काम आया.
कल्याणकारी योजनाओं का विरोधाभास
सर्वे यह भी दिखाता है कि लोग कल्याणकारी योजनाओं को कैसे देखते हैं, और इससे एक दिलचस्प पहेली सामने आती है. आधे से थोड़ा ज़्यादा (53%) लोगों को लगा कि सरकारी योजनाएं सिर्फ़ चुनाव के समय बांटे जाने वाली रेवड़ियां हैं, जो लोगों की ज़िंदगी में कोई बड़ा बदलाव नहीं लातीं.
वहीं लगभग चार में से एक (37%) ने इन्हें नागरिकों का अधिकार माना. और फिर भी उन्होंने माना कि इन योजनाओं से उन्हें फ़ायदा हुआ है. चुनाव से ठीक पहले कैश ट्रांस्फ़र पर राय और भी आलोचनात्मक थी: 70% से ज़्यादा लोगों ने कहा कि वोटिंग से पहले पैसे देना ग़लत है, हालांकि पांच में से एक को इसमें कोई बुराई नहीं लगी.
लेकिन जब हम असली वोटिंग पैटर्न देखते हैं, तो इन योजनाओं का असर साफ़ दिखता है. जिन लोगों ने कल्याण योजनाओं को चुनावी रेवड़ियां माना, उनमें से ज़्यादातर ने उन पार्टियों को वोट दिया जो ये योजनाएं दे रही थीं: 34% ने एमजीबी को और 54% ने एनडीए को वोट दिया.
जिन्होंने कल्याण योजनाओं को नागरिकों का अधिकार माना, वे थोड़ा बराबर संख्या में बंटे: 39% ने एमजीबी को और 41% ने एनडीए को वोट दिया.
इससे यह अंदाज़ा लगता है कि जो लोग योजनाओं के पीछे की राजनीतिक मंशा को समझ रहे थे, वे भी अक्सर उन पार्टियों का समर्थन कर रहे थे जो ये योजनाएं लागू कर रही थीं.
यह विरोधाभास 10,000 रुपये वाली महिला रोज़गार योजना में भी दिखता है, जो चुनाव से ठीक पहले शुरू हुई थी. इसके 69% लाभार्थियों ने माना कि चुनाव से पहले पैसे देना गलत है, इससे पता लगता है कि हालांकि उन्हें इसका फ़ायदा तो मिला, लेकिन वे इसके पीछे के राजनीतिक इरादे को समझ रहे थे. ग़ैर-लाभार्थियों की राय भी ऐसी ही थी, जिससे पता चलता है कि चुनावी तिकड़मों को लेकर चिंता सभी समूहों में थी, चाहे उन्हें निजी रूप से फ़ायदा मिला हो या नहीं.
कुछ महत्वपूर्ण योजनाओं का सही तरीके से लागू होना 2025 के बिहार चुनाव की राजनीति में एक महत्वपूर्ण आयाम जोड़ता है. यह एनडीए की जीत का अकेला कारण नहीं था, लेकिन कल्याणकारी योजनाओं की प्रभावी डिलीवरी ने सत्तारूढ़ पक्ष की स्थिति मज़बूत की.
भले ही मतदाताओं ने नई घोषणाओं के समय या मंशा पर सवाल उठाए हों, उन्होंने यह भी माना कि इनके फ़ायदे उन तक पहुंचे. योजनाओं की व्यापक पहुंच और श्रेय का साफ़ बंटवारा मौजूदा राजनीतिक समर्थन को मज़बूत करने में मददगार रहा और एनडीए की जीत में योगदान दिया.
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