दिल्ली अस्पताल हादसाः मृतक बच्चों के पिता मांग रहे हैं इंसाफ़, आख़िर कौन है ज़िम्मेदार?

दिल्ली अस्पताल हादसा
इमेज कैप्शन, अपने बच्चे का शव ले जाते राजकुमार
    • Author, सेराज अली और दिलनवाज़ पाशा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली से

दिल्ली के जीटीबी नगर अस्पताल की मोर्चरी के बाहर कई लोग ख़ामोश बैठे हैं. चढ़ते सूरज की तपिश को झेलना मुश्किल हो रहा है. बीच-बीच में अचानक रोने की आवाज़ आती है.

मोर्चरी के बगल में टीन शेड है, जिसकी छांव गरमी में राहत देने के लिए काफ़ी नहीं है.

राजकुमार बिल्कुल ख़ामोश बैठे हैं, लेकिन विनोद के लिए आंसुओं को थामना मुश्किल है.

ये उन नवजात के पिता हैं, जिन्होंने शनिवार रात दिल्ली के विवेक विहार इलाक़े के एक अस्पताल में लगी आग में जान गंवा दी.

शनिवार रात क़रीब साढ़े 11 बजे दिल्ली के विवेक विहार स्थित बेबी केयर न्यूबोर्न हॉस्पिटल में अचानक आग लगी. जब तक फ़ायर स्टेशन से गाड़िया यहां पहुंचतीं, आग बेकाबू हो गई.

फ़ायर ब्रिगेड ने अस्पताल में भर्ती कुल 12 नवजातों को निकाला और दूसरे अस्पताल में भर्ती कराया. सुबह होते-होते इनमें से 6 नवजातों ने दम तोड़ दिया. सोमवार को इन बच्चों के शव पोस्मॉर्टम के बाद परिजनों को सौंपे गए.

अपने बेटे को खो चुके एक शख़्स की आपबीती

विनोद ने अपने बेटे के जन्म का लंबा इंतज़ार किया था. इससे पहले उनके एक बच्चे की मौत हो चुकी थी.

अब मोर्चरी के बाहर वो बेटे का शव लेने का इंतज़ार कर रहे हैं. विनोद के आंसू सूख चुके हैं, गला रो-रोकर भारी हो गया है.

हर पंद्रह बीस मिनट में वो अचानक बेचैन होते हैं, शेड से उठकर मोर्चरी के दरवाज़े की तरफ़ जाते हैं और फिर वापस आकर शेड में बैठ जाते हैं.

ये सिलसिला सुबह दस बजे से शाम पांच बजे तक चलता है, जब तक बच्चे का शव उन्हें सौंप नहीं दिया जाता.

विनोद की पत्नी बच्चे के जन्म के बाद अस्पताल में भर्ती हैं, बेटे की मौत की जानकारी उन्हें अभी नहीं दी गई है.

विनोद ने अपनी मां को भी नहीं बताया है कि उनका पोता, इस दुनिया को देखने से पहले ही अलविदा हो चुका है. उन्हें डर है कि पोते की मौत की ख़बर उनकी दिल की मरीज़ मां बर्दाश्त कर पाएंगी या नहीं.

शनिवार सुबह पांच बजे विनोद के बेटे ने दिल्ली के झिलमिल इलाक़े के लोकप्रिय नर्सिंग अस्पताल में जन्म लिया था. सांस लेने में दिक़्क़त होने की वजह से उसे बेबी केयर न्यूबोर्न हॉस्पिटल रेफ़र कर दिया गया था.

दिल्ली अस्पताल हादसा
इमेज कैप्शन, अपने बच्चे के शव का इंतज़ार करते विनोद
छोड़कर पॉडकास्ट आगे बढ़ें
कहानी ज़िंदगी की

मशहूर हस्तियों की कहानी पूरी तसल्ली और इत्मीनान से इरफ़ान के साथ.

एपिसोड

समाप्त

शनिवार की सुबह विनोद के लिए ज़िंदग़ी की सबसे बड़ी ख़ुशी लेकर आई थी, लेकिन रविवार होते-होते यही उनकी ज़िंदग़ी के सबसे बड़े ग़म में तब्दील हो गई.

विनोद बात करने से कतरा रहे हैं. उन्हें समझ नहीं आ रहा है कि वो ये जानकारी अपनी पत्नी को कैसे देंगे, अपनी मां को कैसे बताएंगे कि जो ख़ुशख़बरी उन्होंने सुबह सुनाई है वो अब एक न सह सकने वाले दुख में बदल गई है.

विनोद बताते हैं, “शनिवार सुबह ही मेरा बेटा पैदा हुआ, सांस लेने में दिक़्क़त होने के बाद उसे बड़े अस्पताल में भर्ती कराया. दो बजे मैं अपने बेटे से मिला था, उसकी हालत ठीक थी, रात नौ बजे मैंने फिर से उसे देखा था. मुझे बताया गया था कि कल (रविवार) मैं उसे अपने घर ले जा सकता हूँ.”

बेटे की सेहत में सुधार का आश्वासन मिलने के बाद विनोद अस्पताल से घर चले गए थे, उन्हें दूसरे अस्पताल में भर्ती अपनी पत्नी की देखभाल भी करनी थी.

शनिवार रात को हुई आगजनी की घटना की जानकारी उन्हें अगले सुबह क़रीब साढ़े नौ बजे अस्पताल के एक कर्मचारी की तरफ़ से आए फ़ोन कॉल से हुई.

विनोद बताते हैं, “अस्पताल के स्टाफ़ ने कॉल करके बताया कि रात यहां ब्लास्ट हो गया है, आप आकर पता कर लो.” अब तक विनोद को ये नहीं बताया गया था कि उनके बच्चे की मौत हो गई है. विनोद आनन-फानन में अस्पताल की तरफ़ भागे.

विनोद कहते हैं, “अस्पताल जल चुका था, वहां कोई था ही नहीं, वहां से विवेक विहार थाने भेजा, थाने गया तो कहा जीटीबी अस्पताल जाओ.”

विनोद के लिए अपने बच्चे को पहचानना मुश्किल था. दरअसल वो अपने बेटे को जी भरकर देख भी नहीं पाए थे.

रविवार को वो अपने बेटे को पहचान नहीं सके. विनोद ने शव की पहचान के लिए डीएनए टेस्ट की मांग भी की थी.

वो कहते हैं, “शव इस हालत में नहीं थे कि उन्हें पहचाना जा सके.”

हालांकि, सोमवार को शाम पांच बजे के क़रीब जो शव उन्हें सौंपा गया वो उन्होंने स्वीकार कर लिया.

जब मोर्चरी के बाहर उन्हें शव मिला तो वो अपने बेटे को गोद में उठा तक नहीं सके, उनके भाई ने शव को थामा.

उनका भाई नवजात के शव को दोनों हाथों में लिए जब गाड़ी की तरफ़ चलने लगता है तो विनोद काफ़ी पीछे रह जाते हैं, मानों वो अपने क़दमों को उठा ही ना पा रहे हैं.

दिल्ली अस्पताल हादसा
इमेज कैप्शन, विनोद के रिश्तेदार नवजात बच्चे के शव को ले जाते हुए

विनोद जैसी ही है राजकुमार की भी कहानी

अस्पताल में लगी आग ने कई परिवारों को ज़िंदग़ी भर ना भूलने वाला ग़म दिया है. राजकुमार की कहानी भी ऐसी ही है.

उनकी बेटी रूही ने 17 दिनों पहले ग़ाज़ियाबाद के एक अस्पताल में जन्म लिया था. उसे भी तबीयत ख़राब होने के लिए बेबी केयर न्यूबोर्न हॉस्पिटल में रेफ़र किया गया था.

राजकुमार भी बार-बार मोर्चरी के गेट पर जाकर बेटी के शव के बारे में पता करते हैं. बाक़ी वक़्त वो बिलकुल ख़ामोश बैठे रहते हैं.

राजकुमार कहते हैं, “अस्पताल में आग लगने के बारे में हमें कोई ख़बर नहीं दी गई थी. हमने अस्पताल में फ़ोन किया तो किसी ने उठाया नहीं. मैंने अस्पताल में पैसे जमा नहीं किए थे, मुझे लग रहा था कि मैंने पैसे जमा नहीं किए हैं शायद इस वजह से अस्पताल वाले मेरा फ़ोन नहीं उठा रहे हैं. किसी तरह पैसों का इंतज़ाम करके मैं सुबह आठ बजे अस्पताल पहुंचा, देखा तो वहां आग लगी थी. वहां मौजूद पुलिस ने हमें थाने जाने के लिए गया.”

राजकुमार को थाने से उस अस्पताल में भेज दिया गया जहां बचाए गए बच्चों को रखा गया था.

वो भागकर पूर्वी दिल्ली के अस्पताल में पहुंचे, जहां बचाए गए बच्चों को रखा गया था. लेकिन उनकी बेटी यहां नहीं थी.

रविवार को पूरा दिन वो अपनी बेटी की तलाश में भटकते रहे. सोमवार सुबह वो जीटीबी अस्पताल की मोर्चरी के बाहर पहुंचे. यहां दोपहर तक उन्होंने अपनी बेटी के शव के बारे में जानकारी का इंतज़ार किया.

पोस्टमॉर्टम होने के बाद शाम पांच बजे उन्हें अपनी बेटी का शव मिला.

राजकुमार की पत्नी अस्पताल में भर्ती हैं और उन्हें अपनी बेटी की मौत के बारे में जानकारी है.

राजकुमार के लिए ख़ुद को समझाना आसान नहीं हैं. वो अब अपनी बेटी की मौत के बदले न्याय चाहते हैं.

राजकुमार कहते हैं, “लेकिन सिर्फ़ मेरे अकेले के चाहने से कुछ नहीं होगा. मारे गए बाक़ी सभी बच्चों के परिजनों को भी साथ आना होगा.”

राजकुमार कहते हैं, “मरने वाले सभी बच्चे एकजुट होंगे तभी कुछ हो सकेगा नहीं तो हमारे बच्चों की मौत को हादसा समझकर भुला दिया जाएगा.”

दिल्ली अस्पताल हादसा
इमेज कैप्शन, बेबी केयर न्यूबोर्न हॉस्पिटल, विवेक विहार, दिल्ली

कुल छह बच्चों की मौत

हादसे में मारे गए चार बच्चों के शव रविवार देर शाम तक परिजनों को लौटा दिए गए थे. दो नवजात बच्चों के शव सोमवार शाम परिजनों को सौंपे गए.

गुरु तेग बहादुर अस्पताल से क़रीब डेढ़ किलोमीटर दूर घटनास्थल पर शाम क़रीब साढ़े पांच बजे फ़ोरेंसिक टीम सबूत इकट्ठा कर रही थी. अस्पताल में आग कैसे लगी ये अभी स्पष्ट नहीं है, हालांकि दिल्ली फ़ायर सेवा के अधिकारियों ने एक बयान में कहा है कि आग शॉर्ट सर्किट से लगी हो सकती है.

अस्पताल एक रिहायशी इलाक़े की कॉमर्शियल बिल्डिंग में है. जिस इमारत में अस्पताल है, उसी में एक बैंक भी है. अस्पताल का पिछला हिस्सा रिहायशी कॉलोनी में है.

दिल्ली पुलिस इस घटना की जांच कर रही है और अस्पताल के मालिक और अस्पताल का संचालन कर रहे डॉक्टर को गिरफ़्तार कर लिया गया है.

दिल्ली अस्पताल हादसा

इमेज स्रोत, ANI

इमेज कैप्शन, दिल्ली अस्पताल हादसे के पीड़ित

घटना के बाद शाहदरा के डीसीपी सुरेंद्र चौधरी ने बताया, ‘ये अस्पताल 120 गज में बना हैं. इसमें 12 बच्चे भर्ती थे, जिनमें से एक बच्चे की मौत किसी कारण से आग लगने से पहले ही हो गई थी. आग लगने की घटना में 6 बच्चों की मौत हुई है.’

पुलिस ने शुरुआत में दुर्घटना का मुक़दमा दर्ज किया गया था लेकिन जांच के बाद और धाराएं जोड़ी गई हैं.

डीसीपी के मुताबिक़, “अस्पताल की एनओसी 31 मार्च को ही ख़त्म हो गई थी, अस्पताल को सिर्फ़ पांच बेड लगाने की अनुमति थी, लेकिन 11 बेड लगाए गए थे, फ़ायर सिस्टम भी नहीं था, कई और नियमों का उल्लंघन भी पता चला है. आईपीसी 304 और 308 एफ़आईआर में जोड़ी गई हैं.”

पुलिस जांच में सामने आया है कि अस्पताल में एमबीबीएस डॉक्टरों की जगह बीएएमएस (आयुर्वेदिक) डॉक्टर नियुक्त किए गए थे.

किसी शहर में अस्पताल जैसे किसी इंफ्रास्ट्रक्चर को बनाने से पहले नो ऑब्जेक्शन सर्टिफिकेट यानी एनओसी लेना होता है. इसी तरह फायर विभाग की ओर से जारी किए जाने वाला फायर सेफ्टी सर्टिफिकेट भी शामिल होता है.

ये सर्टिफिकेट बताते हैं कि कोई इमारत फायर सेफ्टी नियमों के लिहाज़ से सुरक्षित है या नहीं.

हालांकि विवेक विहार अस्पताल के मामले में फायर विभाग को ये पता करना है कि यहां ऐसे सर्टिफिकेट की ज़रूरत थी या नहीं.

दिल्ली फायर सर्विस के डायरेक्टर अतुल गर्ग ने बीबीसी से कहा, ''दिल्ली नगर निगम से हमने कहा है कि ये पता लगाएं कि अस्पताल की ऊंचाई कितनी है. अगर ऊंचाई 9 मीटर से कम है तो फायर विभाग से एनओसी की कोई ज़रूरत नहीं है.''

हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट में कहा गया है कि अस्पताल का लाइसेंस 31 मार्च को ख़त्म हो गया था. अस्पताल क्षमता से अधिक भरा हुआ था. दो मंज़िला इस अस्पताल में कोई आपातकालीन द्वार नहीं था. अस्पताल को सिर्फ़ 20 सिलेंडर रखने की अनुमति थी पर अस्पताल में 32 सिलेंडर थे.

रिपोर्ट में कहा गया है कि अस्पताल के मालिक तीन अस्पताल बिना लाइसेंस के चला रहे थे.

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में कहा गया है कि आग रात 10.55 पर लगी थी, मगर फायर ब्रिगेड को इस बारे में 11.30 बजे अलर्ट किया गया. यानी क़रीब 35 मिनट की देरी से.

अधिकारी इस बात की जांच कर रहे हैं कि क्या अस्पताल की आग को पहले ख़ुद ही बुझाने की कोशिश की गई और जब आग बढ़ गई तो फायर विभाग को बुलाया गया.

आग लगने की घटना के बाद अस्पताल की कई खामियां सामने आई हैं. सवाल उठ रहा है कि बिना नियमों का पालन किए, ये अस्पताल कैसे चल रहे हैं?

आग लगने की घटना के बाद अस्पताल से जुड़े सभी लोग मौक़े से फ़रार हो गए थे.

गिरफ़्तार मालिक नवीन खीची के तीन और ऐसे ही अस्पताल चल रहे हैं. 2021 में भी अस्पताल के संचालन से जुड़ा मुक़दमा नवीन खीची पर दर्ज किया गया था.

पुलिस के मुताबिक़, इस मुक़दमे में उन पर आरोप तय नहीं हुए थे.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)