पुणे पोर्श कार हादसा: जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड क्या है? पुलिस और इस पर क्यों उठ रहे हैं सवाल

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- Author, प्राची कुलकर्णी
- पदनाम, बीबीसी मराठी के लिए
पुणे में तेज़ रफ़्तार से पोर्श कार चला रहे एक ड्राइवर ने एक बाइक वाले को टक्कर मार दी. इस घटना में बाइक पर सवार दो लोगों की मौत हो गई.
अभियुक्त शराब के नशे में कार चला रहा था. स्थानीय लोगों ने अभियुक्त को पकड़कर पुलिस के हवाले कर दिया.
अभियुक्त की उम्र 18 साल से कम होने के कारण पुलिस ने उसे जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड या किशोर न्याय बोर्ड के समक्ष पेश किया.
इसके बाद अभियुक्त को कुछ शर्तों के साथ ज़मानत दे दी गई. लेकिन इस तुरंत मिली ज़मानत से कई लोग नाराज़ दिख रहे हैं. लोग पूछ रहे हैं कि अभियुक्त को इतनी जल्दी ज़मानत कैसे मिल गई?
इसके बाद पुलिस ने अभियुक्त को दोबारा हिरासत में लेकर किशोर न्याय बोर्ड के सामने पेश किया.
बोर्ड ने अभियुक्त की ज़मानत रद्द कर दी और उसे बाल सुधार गृह भेजने का आदेश दिया है.
इन सबके बीच कई सवालों और मुद्दों पर चर्चा हो रही है.
पुलिस ने कौन सी धाराएं लगाई हैं? साथ ही मामले के कानूनी पहलुओं और जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के अधिकार क्षेत्र और उसकी कार्यप्रणाली पर भी सवाल उठ रहे हैं.
ऐेसे में हमने कानून के जानकार एडवोकेट असीम सरोदे से ये जानने की कोशिश की कि जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड वास्तव में कैसे काम करता है.
उन्होंने जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड, जुवेनाइल जस्टिस एक्ट, पुलिस की भूमिका और कानूनी मामलों पर विस्तार से बातचीत की है, जानिए कुछ अहम बातें:
जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड क्या है?

जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड उन अभियुक्तों से जुड़े मामलों की सुनवाई के लिए काम करता है जो 18 वर्ष से कम उम्र के हैं.
अभियुक्त की कम उम्र होने के कारण कानूनी मामलों से निपटने के दौरान इन मामलों को अलग तरीके से निपटाया जाता है. जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड इसलिए अस्तित्व में है.
जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड में एक जज और बच्चों से जुड़े मामलों के क्षेत्र में एक अनुभवी सामाजिक कार्यकर्ता शामिल होते हैं.
इसके अलावा महिला एवं बाल कल्याण विभाग के अधिकारी भी होते हैं. ऐसे मामलों में सभी को मिलकर निर्णय लेना होता है.
क्योंकि अभियुक्त कानून से अनभिज्ञ है, इसलिए बच्चों के हित की देखभाल करना, उनके उचित अधिकारों की रक्षा करना और संबंधित सामाजिक मुद्दों की जांच करना, इस जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के काम की पहली शर्त है. वास्तव में काम के पीछे यही मुख्य उद्देश्य होता है.
जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत काम करता है.
ऐसे अभियुक्तों के हितों की रक्षा के लिए अपेक्षा की जाती है कि बोर्ड कानून की सही तरीक़े से व्याख्या करे.
बता दें कि पुणे कार हादसा मामले में राज्य के उपमुख्यमंत्री देवेन्द्र फडणवीस ने कहा है कि वह जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड के फ़ैसले से स्तब्ध हैं.
असीम सरोदे कहते हैं कि जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड एफआईआर दर्ज नहीं करता है. इसे पुलिस दर्ज करती है.
वो पुलिस पर सवाल उठाते हुए कहते हैं, "अगर पुलिस को लगा कि अभियुक्त बालिग है तो जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत मामला दर्ज क्यों किया."
उन्होंने यह भी कहा कि जब जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड में केस शुरू होता है तो इस मुद्दे पर विचार किया जाता है कि क्या वाकई अभियुक्त को पता है कि उसने कितना गंभीर अपराध किया है या क्या अपराध करते वक़्त वो पूरी तरह से सचेत है.
अगर ज़मानत का आवेदन देते वक़्त ये दस्तावेज़ उपलब्ध हों जो साबित कर सकें कि अभियुक्त 18 साल से कम उम्र का है और इसमें कोई संदेह नहीं है, तो जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ये मान लेता है कि अभियुक्त को क़ानून की जानकारी नहीं है और फिर उसे ज़मानत दी जा सकती है.
उम्र के लिए सबूत के तौर पर स्कूल प्रमाणपत्र, जन्म प्रमाणपत्र और समान जन्मतिथि वाले कुछ दूसरे दस्तावेज़ शामिल हैं. इन दस्तावेजों में अभियुक्त की उम्र 18 साल से कम होनी चाहिए.
जुवेनाइल जस्टिस एक्ट कैसे काम करता है?

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एडवोकेट सरोदे के मुताबिक़, "जुवेनाइल जस्टिस एक्ट की संरचना बिल्कुल अलग है. हमारा देश दंडात्मक देश है. यानी सज़ा को महत्व दिया जाता है. एक बार जब किसी व्यक्ति को सज़ा मिल जाती है तो मान लिया जाता है कि समस्या खत्म हो गई है. लेकिन, दुनिया भर में इस सोच को बेहद पिछड़ी सोच माना जाता है."
"तो जुवेनाइल जस्टिस एक्ट जैसे कुछ कानून सुधारात्मक या रचनात्मक सज़ा पर ध्यान केंद्रित करते हैं. इस मामले में ज़मानत देते समय जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड ने जो शर्तें रखी हैं, उन्हें सज़ा नहीं माना जा सकता है. जिन शर्तों के आधार पर ज़मानत दी गई, जैसे-निबंध लिखना, 15 दिन ट्रैफ़िक पुलिस के साथ यातायात रेगुलेट करना."
"इस मामले में महत्वपूर्ण बात यह है कि ज़मानत मिलने के बाद, एक व्यापक गलत धारणा थी कि उसे रिहा कर दिया गया क्योंकि वह अमीर परिवार का बेटा था. लेकिन वास्तव में उसे रिहा नहीं किया गया था, उसे ज़मानत दी गई थी."
वो आगे कहते हैं, "दूसरे शब्दों में, जब उसे जेल भेजने या ज़मानत देने की बात आती है तो ज़मानत दी जानी चाहिए. क्योंकि वह एक संदिग्ध अभियुक्त है. इसलिए, हम जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड द्वारा लिए गए फ़ैसले को अनुचित नहीं कह सकते."
निर्भया केस से तुलना सही या ग़लत?

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सोशल मीडिया पर इस मामले की तुलना दिल्ली के निर्भया केस से भी की जा रही है.
ये पूछे जाने पर कि इन दोनों घटनाओं में क्या समानताएं और अंतर हैं, एडवोकेट सरोदे कहते हैं, "इस घटना में शराब के नशे में एक नाबालिग के लापरवाही से गाड़ी चलाने के कारण दो लोगों की मौत हो गई. यह बहुत गंभीर अपराध है. लेकिन, सबसे पहले ये ध्यान दिया जाना चाहिए कि ये कोई अमानवीय या क्रूर अपराध नहीं है."
उन्होंने कहा, "दिल्ली में निर्भया मामले में फ़ैसला एक क्रूर अपराध के लिए था. उसमें अभियुक्तों ने एक इंसान के साथ, उसके शरीर के साथ वहशी बर्ताव किया, अत्याचार किया था. वो मामला पुणे मामले से अलग है."
सरोदे आगे कहते हैं, "इस मामले में एक शख़्स की ग़ैर-ज़िम्मेदारी की वजह से हादसा हुआ. हालांकि, अभियुक्त पर इस आधार पर मुक़दमा चलाया जा सकता है कि वो वयस्क होने ही वाला है और उसे मामले की गंभीरता का अहसास हो सकता है. वो संज्ञान या समझ की उम्र में है. इस मामले में अभियुक्त की उम्र 17 साल 7 महीने है, इसलिए आप उसे प्राथमिक स्तर पर बालिग नहीं मान सकते."
उन्होंने ये भी कहा कि अगर अभियुक्त की उम्र इतनी है कि समझा जा सके कि उसे बिना लाइसेंस और बिना नंबर प्लेट की गाड़ी चलाने के क्या परिणाम हो सकते हैं, शराब पीकर गाड़ी चलाने के क्या परिणाम हो सकते हैं, ये सब पता हो तो भी उस पर आगे कार्रवाई की जा सकती है."
लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि पुलिस तुरंत हार गयी.
पुलिस ने दो एफ़आईआर क्यों दर्ज की?

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एडवोकेट सरोदे ये सवाल उठाते हैं कि पुणे पुलिस ने एक ही घटना के लिए दो एफ़आईआर क्यों दर्ज कीं?
वे कहते हैं, "इसलिए, यह मामला पूरी तरह से संदिग्ध और विभाजनकारी है."
"इतनी गंभीर घटना के बाद धारा 304 लगाई जाए या धारा 279, क्या पुलिस के पास पर्याप्त प्रशिक्षण नहीं है? लोगों के विरोध के बाद पुलिस कहती है कि हम अतिरिक्त धारा लगा रहे हैं."
सरोदे ने आगे कहा कि "गृह मंत्री देवेन्द्र फडणवीस को इस बात से हैरान होना चाहिए था कि दुर्घटना होने के बावजूद उनका प्रशासन दुर्घटना की धारा का उल्लेख किए बिना बाकी सभी काम कर रहा था."
बोर्ड में हो सकते हैं विशेषज्ञ
पुलिस ने जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड में आवेदन किया होगा.
जुवेनाइल जस्टिस एक्ट विशेषज्ञों की भागीदारी या मार्गदर्शन की अनुमति देता है क्योंकि जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड में लोग कानून के विशेषज्ञ नहीं होते हैं.
इसी तरह, बाल अधिकार बोर्ड बाल मनोचिकित्सकों या बच्चों की उम्र के क्षेत्र में काम करने वाले विशेषज्ञों को शामिल कर सकता है या उनसे मार्गदर्शन ले सकता है.
दूसरी बात यह है कि वे अभियुक्त को ज़िला चिकित्सा अधिकारी (पुणे के ससून अस्पताल) के पास भेजेंगे और ऑसिफ़िकैश टेस्ट कराएंगे.
इस परीक्षण में डॉक्टर अभियुक्त के दांतों और हड्डियों की वृद्धि से उसकी उम्र के बारे में निष्कर्ष निकाल सकते हैं.
क्या इस पर 'निर्भया' जैसा 'अमानवीय' अपराध मानकर मुकदमा चलाया जा सकता है?
इस मामले में अभियुक्त पर यह मानकर मुकदमा चलाया जा सकता है कि वह एक जागरूक व्यक्ति की तरह सोचने या समझने में सक्षम है. लेकिन, फिर भी गंभीर और अमानवीय अपराध में अंतर है. इस मामले में अपराध गंभीर है, लेकिन अमानवीय नहीं. तो अदालत इस अंतर पर क्या निर्णय लेती है? इसे देखना होगा.
असीम सरोदे कहते हैं, "इस मामले में अभियुक्त को सब कुछ पता है, यह सीधा मामला है. वह यह भी जानता है कि इस तरह से गाड़ी चलाने से दुर्घटना हो सकती है. लेकिन फिर भी वो पैसे के अहंकार में दिखता है, वह कार चलाता है इस मानसिकता के साथ कि दूसरे लोगों का जीवन महत्वहीन है और इसमें दो लोगों की मौत हो जाती है."
वो आगे कहते हैं, "इसलिए यह मानकर मुक़दमा आगे बढ़ाया जा सकता है कि अभियुक्त एक बालिग व्यक्ति की तरह सोचने में सक्षम है. साथ ही एक बालिग व्यक्ति की तरह मुक़दमा चलाया जा सकता है."
धारा 304 पहले लागू हुई या बाद में?

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सरोदे ने कहा कि गृह मंत्री देवेन्द्र फडणवीस ने कहा कि धारा 304 बाद में नहीं पहले लगाई गई थी.
वो कहते हैं, "जिन मामलों में मैं पैरवी करने के लिए अदालत में उपस्थित हुआ हूं, वे शराब विक्रेताओं या पब से संबंधित हैं. कल तीन लोगों को अदालत में लाया गया था. उनके ख़िलाफ़ एफ़आईआर में धारा 304 नहीं थी."
"उस वक्त मुझे पहली बार कोर्ट में पता चला कि इस मामले में दो एफ़आईआर दर्ज की गई हैं. तब तक मैंने भी सोचा था कि एक ही एफ़आईआर होगी. क्योंकि घटनाओं का क्रम एक ही है."
"अभियुक्त घर से पब चला गया. वहां उसने शराब पी और नशे में गाड़ी चलाने लगा. इसके बाद तेज़ गति से कार चलाने के कारण हुए हादसे में दो लोगों की मौत हो गई. इसलिए ये सभी घटनाएं एक जैसी हैं. इसे विभाजित नहीं किया जा सकता."
इसलिए उन्होंने सवाल उठाया कि इस मामले में दो एफ़आईआर कैसे दर्ज हो सकती हैं.
"धारा 304 लगाना बाद का विचार है. एक एफआईआर में धारा 304 लगाना और जानबूझकर दूसरे मामले को अलग करना गलत है."
इस मामले में पब मालिक की क्या भूमिका है? उन पर धारा 304 लगाई गई है, क्या उन्हें भी उसी हिसाब से सज़ा दी जाएगी?
सरोदे कहते हैं कि पब मालिक की इसमें ज्यादा भूमिका नहीं है.
आख़िर में सरोदे कहते हैं, "पुलिस ने इस मामले में दो एफ़आईआर क्यों दर्ज कीं? उन्हें ऐसा करने के लिए किसने कहा? मुझे लगता है कि गृहमंत्री देवेंद्र फडनवीस को यह सवाल पूछना चाहिए था. इसमें दूसरा बिंदु यह है कि हमें याद रखना चाहिए कि हर किसी को अपना पक्ष रखने का अधिकार है ."
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