भारत की नई पीढ़ी के क्रिकेटर क्या कोहली और राहुल का विकल्प बन पाएँगे?

इमेज स्रोत, Getty Images
- Author, विमल कुमार
- पदनाम, वरिष्ठ खेल पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
हाल के सालों में 'आपदा में अवसर' वाली बात भारत में काफ़ी लोकप्रिय हुई है.
क्या टेस्ट क्रिकेट में भारतीय मध्य-क्रम को लेकर फ़िलहाल जो आपदा कि स्थिति आई है, उसे युवा प्रतिभाएँ ना सिर्फ़ अपने लिए, बल्कि टीम इंडिया के लिए भी अवसर में बदल सकती हैं?
विराट कोहली जैसे दिग्गज की ग़ैर-मौजूदगी में ऐसे बदलाव के लिए भारतीय क्रिकेट शायद कतई तैयार नहीं था.
लेकिन इतिहास हमें ये बताता है कि ऐसे हालात कई मौक़ों पर टीम के लिए भविष्य के लिहाज़ से फ़ायदेमंद ही साबित होते हैं.
जब बदलाव अच्छे लगते हैं

इमेज स्रोत, Getty Images
वर्ष 1996 में इंग्लैंड दौरे पर अचानक से ही टीम इंडिया के मध्य-क्रम में बदलाव आता है.
नवजोत सिंह सिद्धू तत्कालीन कप्तान मोहम्मद अज़हरुद्दीन से कथित तौर पर किसी मन-मुटाव के चलते नाराज़ होकर भारत लौट आते हैं और एक और मध्य-क्रम के बल्लेबाज़ संजय मांजरेकर चोटिल हो जाते हैं.
सौरव गांगुली और राहुल द्रविड़ जैसे दो युवा बल्लेबाज़ों को अचानक ही चुनौतीपूर्ण हालात में टेस्ट क्रिकेट खेलने का मौक़ा मिलता है. इसके बाद इन दोनों के करियर में क्या हुआ, उस बात से आप सभी शायद वाकिफ़ ही हों.
जल्द ही इस जोड़ी के साथ वीवीएस लक्ष्मण की भी एंट्री होती है.
उसके बाद क़रीब डेढ़ दशक तक टीम इंडिया के मिडिल ऑर्डर को टेस्ट क्रिकेट में किसी तरह की परेशानी नहीं होती है.
साल 2010 के आख़िर में चेतेश्वर पुजारा को भी अनुभवी दिग्गजों के बीच टेस्ट क्रिकेट में मौक़ा मिलता है क्योंकि भविष्य के लिए टीम बनाने की ज़रूरत चयनकर्ताओं को महसूस होने लगती है.
साल 2011 में विराट कोहली भी टेस्ट में एंट्री करते हैं. फिर 2013 के शुरुआत में अंजिक्य रहाणे भी इस जोड़ी का हिस्सा बन जाते हैं.
ये तिकड़ी क़रीब एक दशक तक टेस्ट क्रिकेट में मिडिल ऑर्डर को कमोबेश उसी अंदाज़ में संभालती है, जैसा उनके सीनियर खिलाड़ियों ने किया था.
एक बार फिर संकट में है मिडिल ऑर्डर

इमेज स्रोत, Getty Images
साल 2024 के शुरुआत में भारत को एक बार फिर से 1996 की ही तरह मजबूरी में ही भविष्य के मिडिल ऑर्डर बनाने की राह पर आख़िरकार क़दम उठाने पड़े हैं.
इसे चयनकर्ता और टीम मैनेजमेंट पिछले क़रीब दो साल से टालने की कोशिश कर रहा था.
श्रेयस अय्यर की नाकामी के बाद और फिर केएल राहुल के तीसरे टेस्ट से बाहर होने के बाद चयनकर्ताओं और टीम मैनेजमेंट के पास एक आसान और शायद व्यवहारिक फ़ैसला यही होता कि राजकोट के सबसे बड़े बल्लेबाज़ पुजारा को उनके घरेलू मैदान पर फिर से टेस्ट क्रिकेट में लाइफ लाइन दे दी जाती.
लेकिन, अजित अगरकर, रोहित शर्मा और राहुल द्रविड़ ने ऐसा करने से परहेज़ किया है. एक दशक बाद टेस्ट क्रिकेट में युवा और अनुभवहीन खिलाड़ियों पर भरोसा जताया है.
शायद द्रविड़ और रोहित की इस बात के लिए कोई तारीफ़ ना करे लेकिन इंग्लैंड के ख़िलाफ़ जब वाकई में 12 साल बाद घरेलू टेस्ट सिरीज़ में हार का ख़तरा मँडराता दिख रहा है, तब भी टीम मैनेजमेंट ने टेस्ट क्रिकेट में नई पीढ़ी के मिडिल ऑर्डर पर ही भरोसा जताना फ़िलहाल उचित समझा है.
विराट कोहली निजी कारणों के चलते इस सिरीज़ में नहीं खेल रहे हैं, तो केएल राहुल ने सिर्फ़ पाँच मैचों की सिरीज़ में एक ही मैच खेला है.
शुभमन गिल विशाखापट्टनम से पहले संघर्ष करते दिख रहे थे तो रजत पाटीदार ने एक ही मैच खेला है.
राजकोट में किसे मिलेगा मौक़ा?

इमेज स्रोत, Getty Images
राजकोट में मुमकिन है कि सरफ़राज़ ख़ान और देवदत्त पडिक्कल में से किसी एक को पहला टेस्ट खेलने का मौक़ा मिले.
टीम इंडिया के बल्लेबाज़ी अनुभव पर ग़ौर करें, तो कप्तान रोहित के 56 मैचों को अलग कर दिया जाए तो साथी ओपनर यशस्वी जायसवाल (6), गिल (22), पाटीदार (1), केएस भारत (7) और सरफ़राज़, पडिक्कल और ध्रुव जुरेल ने मिलकर एक भी टेस्ट नहीं खेला है.
यानी रोहित के 56 मैचों के मुक़ाबले बाक़ी सात खिलाड़ियों के पास कुल मिलाकर टेस्ट क्रिकेट का अनुभव 36 मैचों का है!
लेकिन, 1996 और 2010 वाले दशक की शुरुआत के अनुभव से भारतीय क्रिकेट को ये सीख भी मिलती है कि कभी ना कभी आपको भविष्य के खिलाड़ियों के लिए टीम बनाने के समय वर्तमान के साथ हिम्मत दिखानी पड़ती है.
सकारात्मक सोच अक्सर युवा खिलाड़ियों को ऐसा खेल दिखाने के लिए प्रोत्साहित करती है जिसकी उम्मीद करियर के शुरुआत में वो भी नहीं करते हैं.
गांगुली-द्रविड़-लक्ष्मण की तिकड़ी ने तो अतीत में यही किया था.
महेंद्र सिंह धोनी ने अपनी कप्तानी के दौर में भी इन्हीं दिग्गजों के अनुभव को धीरे-धीरे दरकिनार करते हुए पुजारा-कोहली-रहाणे की तिकड़ी पर जुआ खेला था और वो नाकाम फ़ैसला नहीं कहा जा सकता है.
रोहित शर्मा का करियर

इमेज स्रोत, Getty Images
कप्तान रोहित शर्मा जानते हैं कि वो अपने करियर के उस दौर में पहुँच चुके हैं, जहाँ पर शायद उनके लिए दो साल से ज़्यादा टेस्ट क्रिकेट खेलना मुमकिन ना हो.
द्रविड़ का कोच के तौर पर कार्यकाल भी शायद एक और साल तक चले.
अगरकर को ना सिर्फ़ टेस्ट क्रिकेट बल्कि सफ़ेद गेंद के क्रिकेट में भी बदलाव के दौर से भारतीय क्रिकेट को रूबरू कराना ही होगा.
ऐसे में अगर एक घरेलू सिरीज़ में ही, मजबूरी में ही, लाल गेंद की क्रिकेट में ही भविष्य के मिडिल ऑर्डर के शूरवीरों की तलाश हो रही है तो इसमें ग़लत ही क्या?
कौन जाने, पाटीदार-सरफ़राज़-पडिक्कल की तिकड़ी भी भारतीय दिग्गजों की महान विरासत को आगे ले जाने में अपनी अपनी भूमिका भी कायदे से निभा सकती है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)















