बशर अल असद के अचानक पतन से हिल गए सीरिया का क्या है भविष्य

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- Author, जेरेमी बोवेन
- पदनाम, अंतरराष्ट्रीय संपादक, बीबीसी न्यूज़
बशर अल-असद का राज इतना खोखला और भ्रष्ट हो गया कि एक पखवाड़े से भी कम समय में वह ध्वस्त हो गया. मैंने जिन लोगों से बात की, उनमें से कोई भी सरकार के इस गति से धूल में मिलने से हैरान नहीं हुआ.
2011 'अरब स्प्रिंग' विद्रोह का वर्ष था. तब हालात कुछ अलग ही थे. पूरे इलाक़े में मची उथल पुथल के बीच सीरियाई लोगों ने भी उस दौर के 'क्रांतिकारी जादू' को हथियाने का प्रयास किया.
विद्रोह के इस दौर में लोगों ने ट्यूनीशिया और मिस्र के राष्ट्रपतियों को हटा दिया था. लीबिया और यमन के ताक़तवर लोगों के लिए भी ये आंदोलन ख़तरा बन गया था.
साल 2011 के आते-आते बशर अल-असद को अपने पिता हाफ़िज़ अल-असद से विरासत में मिली सरकार पूरी तरह से भ्रष्ट हो चुकी थी.
लेकिन हाफ़िज़ ने अपने तीस सालों के राज में जो मज़बूत व्यवस्था बनाई थी, उसमें अभी भी वही क्रूर, निर्दयी ताक़त थी जिसे वो सीरिया को नियंत्रित करने के लिए ज़रूरी मानते थे.
हाफ़िज़ अल-असद एक ऐसे देश में सत्ता पर काबिज़ हो गए थे जहां तख़्तापलट आम बात थी. ऐसे देश में बिना किसी महत्वपूर्ण चुनौती के वो राजपाट अपने बेटे को सौंप गए.

पहले 11 साल सब ठीक चला लेकिन बशर अल-असद 2011 में अपने पिता वाली रणनीति पर लौट गए. अब यह कल्पना करना थोड़ा कठिन है लेकिन 2011 में सीरिया के कुछ लोगों के बीच उनकी पैठ मज़बूत थी.
बशर अल-असद 2006 के इसराइल के ख़िलाफ़ फ़लस्तीनियों और हिज़्बुल्लाह की जंग के मुखर समर्थक थे. वह पूरे क्षेत्र में सबसे कम उम्र के नेता थे.
अपने पिता की मृत्यु के बाद से ही वे देश में सुधार लाने का वादा करते रहे थे. साल 2011 में जब पूरे अरब जगत में बवाल मचा हुआ था तब भी कुछ सीरियाई लोग उन पर विश्वास करना चाहते थे.
लोगों को लगा था कि सड़कों पर हो रहे प्रदर्शन उन्हें सुधारों के लिए राज़ी कर लेंगे. तब तक बशर अल-असद ने शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों को गोली मारने का आदेश नहीं दिए थे.
सीरिया में एक ब्रिटिश राजदूत ने एक बार मुझसे कहा था कि अगर असद शासन को समझना है तो 'द गॉडफ़ादर' जैसी माफिया फ़िल्में देखनी चाहिए. जो लोग हुकुम की तामील करते हैं उन्हें इनाम दिया जाता है.
लेकिन जो परिवार के मुखिया या उनके करीबी सहयोगियों के ख़िलाफ़ जाता है उसे ख़त्म कर दिया जाता है. सीरिया में इसका मतलब था फांसी, फ़ायरिंग स्क्वॉड या किसी अंडरग्राउंड कोठरी में अनिश्चित काल के लिए क़ैद हो जाना.
ऐसी ही काल कोठरियों में बंद लोग अब दिख रहे हैं. कमज़ोर और पीले पड़े चेहरे रोशनी में पलकें झपकाते हुए, विद्रोही लड़ाकों के मोबाइलों पर फिल्माए जा रहे हैं. हजारों लोग सालों बाद सलाखों के पीछे से निकल आज़ादी में सांस ले रहे हैं.
अमेरिका ने असद को मनाया था...

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बशर अल-असद की सत्ता के धाराशाई होने तक उनकी सरकार भयावह और दमनकारी गुलाग (श्रम कारावास) के दम पर टिकी हुई थी और यही उसकी कमज़ोरी भी थी.
इस बात पर दुनिया भर में आम सहमति थी कि बशर अल-असद कमज़ोर हो चुके थे. वह रूस और ईरान पर निर्भर थे. ये भी तय माना जा रहा था कि वो एक ऐसे देश पर शासन कर रहे थे जिसे उन्होंने अपने परिवार को सत्ता में रखने के लिए बांट दिया था.
इदलिब से विद्रोहियों के दमिश्क की ओर रुख़ करने से पहले अमेरिका, इसराइल और संयुक्त अरब अमीरात, असद को ईरान से अलग करने की कोशिश कर रहे थे.
इसराइल सीरिया के भीतरी इलाक़ों में भारी हवाई हमले कर रहा था. इसराइल का कहना था कि वो ईरान से हिज़्बुल्लाह को भेजे जा रहे हथियारों की सप्लाई को रोकने के लिए ऐसा कर रहा है.
ठीक इसी समय यूएई और अमेरिका भी असद को तेहरान के साथ गठबंधन तोड़ने, प्रतिबंधों में ढील देने और एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्य बनाने का प्रयास कर रहे थे.
बिन्यामिन नेतन्याहू और जो बाइडन, दोनों ने ही असद की सरकार के पतन का श्रेय लिया है. इसकी कोई तो वजह है.
अमेरिकी हथियारों और निरंतर समर्थन से इसराइल ने हिज़्बुल्लाह और ईरान को नुकसान पहुंचाया है और बाइडन ने यूक्रेन को हथियारों की आपूर्ति बढ़ाई. इन दो वजहों से रूस और ईरान के लिए असद को बचाना असंभव होता गया.
लेकिन सच ये भी है कि शायद उन्हें भी ये आभास नहीं था कि अचानक आधी रात को असद फ़्लाइट में सवार होकर रूस भाग जाएंगे.
तो ये कहना सही होगा कि अमेरिका और इसराइल ने असद के ख़ात्मे में योगदान तो दिया लेकिन सीरिया की सरकार का पतन किसी योजना के तहत नहीं हुआ.
ईरान को झटका

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अगर सीरिया के नए शासक ये फ़ैसला करते हैं कि ईरान से गठबंधन की तुलना में दूसरों के साथ उनके समझौते अधिक उपयोगी हैं, तो ईरान की सप्लाई चेन अपने आप समाप्त हो सकती है.
सभी पक्ष इस बारे में गंभीरता से सोच रहे हैं कि आगे क्या होगा. इस बारे में अभी कोई निश्चित निष्कर्ष निकालना जल्दबाज़ी होगी.
सीरियाई, उसके पड़ोसी और व्यापक दुनिया अब एक और भू-राजनीतिक भूकंप का सामना कर रहे हैं जो पिछले साल अक्तूबर में इसराइल पर हमास के हमलों के बाद की श्रृंखला का सबसे बड़ा झटका है.
और यह शायद आख़िरी धमाका नहीं है.
ईरान अपने नेटवर्क के मुख्य स्तंभों का अंतिम पतन देख रहा है. ईरान इसे अपना 'एक्सिस ऑफ़ रेज़िस्टेंस' बताता रहा है. इसके सबसे महत्वपूर्ण सहयोगी यानी हिज़्बुल्लाह और असद अब किसी प्रतिरोध के क़ाबिल नहीं बचे हैं.
ईरान डोनाल्ड ट्रम्प के सत्ता में आने के बाद, एक बार फिर परमाणु समझौते की ओर जाने के संकेत देने लगा है. लेकिन अगर ईरान के लिए हालात और प्रतिकूल हुए तो वे उसे परमाणु हथियारों के निर्माण की ओर धकेल सकते हैं.
लेकिन फ़िलहाल सीरियाई लोगों के पास खुश होने की कई वजहें हैं.
साल 2011 के बाद सरकारी दमन और क्रूरता के बावजूद, असद को ऐसे लोग मिलते रहे जो उनके लिए लड़ने के लिए तैयार थे.
जंग के मोर्चे पर जिन सैनिकों से मैं मिला उनमें से कई ने मुझे बताया कि इस्लामिक स्टेट ग्रुप के जिहादी चरमपंथियों की तुलना में, असद एक बेहतर विकल्प हैं.
इस साल सीरिया की सेना को एक सुव्यवस्थित विद्रोही बल का सामना करना पड़ा. विद्रोहियों ने जोर देकर कहा कि वे राष्ट्रवादी और इस्लामवादी तो हैं लेकिन जिहादी नहीं. इन संकेतों के बाद कई सीरियाई सैनिकों ने लड़ने से इनकार कर दिया और वे अपनी वर्दी उतारकर घर चले गए.
इराक़ और लीबिया जैसा हाल होने का डर

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सीरिया का बेहतरीन भविष्य यह होगा कि वर्षों चले गृहयुद्ध के बाद लोगों के ज़ख्म भरने के लिए 'राष्ट्रीय मेलमिलाप' का माहौल बनाने का तरीक़ा खोजा जाए. अगर ऐसा नहीं हुआ तो लूटपाट और बदले की लहर देश को एक नए युद्ध में धकेल सकती है.
दमिश्क पहुंचने वाले विद्रोही गुट हयात तहरीर अल-शाम के नेता अबू मोहम्मद अल जुलानी ने अपने लोगों और सीरिया के सभी संप्रदायों से एक-दूसरे का सम्मान करने का आह्वान किया है.
जुलानी के लड़ाकों ने ही दमिश्क पहुँच कर पुरानी सरकार को उखाड़ फेंका है. अब उन्हीं के सीरिया के नेता बनने के चांस हैं.
हालांकि सीरिया में दर्जनों सशस्त्र समूह हैं जो ज़रूरी नहीं कि जुलानी से सहमत हों और अपने इलाक़ों को उन्हें सौंप दें.
दक्षिणी सीरिया में कबायली मिलिशिया ने असद के हुक्म को नहीं माना. और अब भी शायद वो दमिश्क के शासकों की उन बातों को न मानें, जो उन्हें पसंद न हों.
सीरिया के पूर्वी रेगिस्तान में तो अमेरिका को कथित इस्लामिक स्टेट समूह के बचे हुए लड़ाकों से इतना बड़ा ख़तरा महसूस हुआ कि उसने वहां हवाई हमलों की झड़ी लगा दी.
अपनी सरहद पर इस्लामिक स्टेट के राज की संभावना से चिंतित इसराइली भी सीरिया के सशस्त्र बलों के सैन्य ठिकानों पर हमला कर रहे हैं.
सीरिया की सेना को भंग करने के बजाय उसमें सुधार करना ज़्यादा अहम होगा. अमेरिका वैसी लापरवाही नहीं करना चाहेगा जो उसने 2003 में इराक़ में वहां की सेना को भंग करके की थी.
सीरियाई लोगों के लिए सबसे ख़तरनाक ये होगा कि उनके देश का हाल लीबिया या इराक़ जैसा हो. लीबिया में गद्दाफ़ी के पतन के बाद से गृहयुद्ध छिड़ा और इराक़ में सद्दाम हुसैन के बाद अराजकता फैली.
उन दोनों तानाशाहों को बिना कोई वैकल्पिक व्यवस्था किए हटा दिया गया था.
तानाशाहों के छोड़े सियासी ख़ालीपन की जगह ये देश गृहयुद्ध की लहरों से भर गए.
सीरियाई लोग कई पीढ़ियों से अपनी तक़दीर के मालिक नहीं रहे हैं. असद ख़ानदान ने उनसे ये अधिकार छीना हुआ था. लेकिन उनके पास अभी भी अपने जीवन पर नियंत्रण नहीं है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित


















