क़तर की जेल का अनुभव पूर्व नौसैनिक सौरभ वशिष्ठ की जुबानी

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- Author, राजेश डोबरियाल
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
इसी महीने क़तर की जेल से रिहा होकर भारत लौटे सात पूर्व नौसैनिकों में कैप्टन (रिटायर्ड) सौरभ वशिष्ठ भी शामिल हैं.
वह पिछले कुछ सालों से क़तर की दाहरा ग्लोबल नामक कंपनी में काम कर रहे थे.
लेकिन साल 2022 के 30 अगस्त को उन्हें कुछ अन्य लोगों के साथ अचानक गिरफ़्तार कर लिया गया.
इसके बाद क़तर की एक अदालत ने इन लोगों को मौत की सज़ा सुनाई, जिसे बाद में कम कर दिया गया.
लेकिन गिरफ़्तार होने से रिहा होने तक कैप्टन (रिटायर्ड) वशिष्ठ और उनके साथियों को क़तर की जेल में 17 महीने का वक़्त गुज़ारना पड़ा.
‘क्या हो रहा था, कुछ पता नहीं चलता था’

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सौरभ वशिष्ठ ने साल 2019 के फ़रवरी महीने से दाहरा ग्लोबल के लिए काम करना शुरू किया था. उनके क़तर जाने के छह महीने बाद ही उनकी पत्नी और दो बेटियां भी वहाँ आ गईं.
कुछ समय बाद उनकी पत्नी ने वहीं हेल्थ सेक्टर में काम करना शुरू कर दिया. वशिष्ठ और उनके परिवार के लिए 30 अगस्त, 2022 से पहले तक सब ठीक चल रहा था.
लेकिन 30 अगस्त को अचानक हुई गिरफ़्तारी के बाद 17 महीने से ज़्यादा समय तक वो जेल में रहे. वो 11 फ़रवरी, 2024 को जेल से रिहा हुए.
सौरभ कहते हैं, ''मुझे क्यों गिरफ़्तार किया गया, ये आज तक पता नहीं चला. मुझे अब भी इस बारे में पूरी जानकारी नहीं है.''
उन्होंने बताया कि वे लोग क़तर में अदालती कार्यवाही में शामिल तो होते थे लेकिन उन्हें कुछ पता नहीं चलता था कि वहाँ हो क्या रहा है क्योंकि सारी कार्यवाही अरबी भाषा में होती थी.
वशिष्ठ की जब परिवार या दूतावास के अधिकारियों, ख़ासकर राजदूत, से मुलाक़ात हो पाती थी तभी थोड़ी बहुत जानकारी मिलती थी कि अब तक क्या हुआ है.
कैप्टन (रिटायर्ड) सौरभ कहते हैं, "अभी तक इसके बारे में पूरा पता नहीं है कि हमने इतने दिन की सज़ा क्यों काटी..."
वह कहते हैं, "इतनी सी बात है कि हम आज वापस आ गए हैं. बहुत ही सदमे भरा अनुभव था लेकिन अब ख़त्म हो गया है और एक तरह से हमें नई ज़िंदगी मिली है. इसलिए अब भविष्य की योजनाओं पर ध्यान लगा रहे हैं."
टीवी से मिली सज़ा की जानकारी

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सौरभ वशिष्ठ के मुताबिक़, गिरफ़्तारी के बाद बहुत समय तक उन्हें और उनके साथियों को कुछ पता नहीं चल रहा था कि क्या हो रहा है.
जब उन्हें काउंसलर एक्सेस (भारदीय दूतावास के अधिकारियों द्वारा की जाने वाली मदद) और परिवार से मिलने की अनुमति मिली तो कुछ-कुछ पता चलने लगा.
क़तर की अदालत ने 26 अक्टूबर 2023 को भारतीय नौसैनिकों को मौत की सज़ा सुनाई थी.
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कैप्टन (रिटायर्ड) सौरभ कहते हैं कि अदालत की सुनवाई अरबी में होती थी, तो कुछ पता ही नहीं चलता था.
लेकिन तब तक उनके कमरे में टीवी की सुविधा मिल गई थी. उसमें एक भारतीय चैनल का प्रसारण भी होता था. उसी के ज़रिए उन्हें पता चला कि इन आठ पूर्व भारतीय नौसैनिकों को मौत की सज़ा दी गई है.
कैप्टन (रिटायर्ड) सौरभ कहते हैं, "हम लोग सदमे में आ गए थे, यकीन ही नहीं हो रहा था...समझ ही नहीं आ रहा था कि यह हो क्या गया है. पहले लग रहा था कि जिस भी मामले में गिरफ़्तार किया गया है, उसमें कोई छोटी-मोटी सज़ा होगी या देश से निकाल दिया जाएगा, लेकिन कभी-भी, दूर-दूर तक ख़्याल नहीं आया था कि ऐसी सज़ा होगी."
किसी को न मिले काल कोठरी

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कैप्टन (रिटायर्ड) सौरभ ने बताया कि सज़ा का अधिकांश वक़्त उन्होंने कालकोठरी या क़ैद-ए-तन्हाई में गुज़ारा है. बाद में एक सेल में दो व्यक्ति रहने लगे थे.
वो कहते हैं, "आप यह नहीं चाहोगे कि किसी को भी ऐसी सज़ा मिले क्योंकि मुझे लगता है कि यह सबसे मुश्किल और कठोर सज़ा है. आपका एक्सीडेंट हो जाए और आप ऊपर चले जाएं तो फिर भी ठीक है लेकिन कालकोठरी में रहना बहुत मुश्किल होता है, मानसिक रूप से यह बहुत कठिन होता है."
कैप्टन (रिटायर्ड) सौरभ बताते हैं, "तीन-चार चीज़ों से मैंने हिम्मत बनाए रखी. पहली चीज़ तो थीं प्रार्थनाएं. हनुमान चालीसा पढ़ता रहा. दूसरा परिवार से पत्नी-बच्चों से जब भी बात होती थी तो राहत मिलती थी कि वे ठीक हैं."
"तीन-चार चीज़ों से मैंने हिम्मत बनाए रखी. पहली चीज़ तो थीं प्रार्थनाएं. हनुमान चालीसा पढ़ता रहा. दूसरा परिवार से पत्नी-बच्चों से जब भी बात होती थी तो राहत मिलती थी कि वे ठीक हैं.
"पेरेंट्स से हफ़्ते में थोड़ी सी देर के लिए बात होती थी...पापा बोलते थे कि भगवान के घर देर है, अंधेर नहीं है. हर फ़ोन कॉल में यही बात बोलते थे, तो लगता था कि ये देर कब ख़त्म होगी...और उन्होंने भगवान पर भरोसा रखने को कहा और आख़िरी फ़ोन कॉल में कहा था कि ये काले बादल हट जाएंगे. इन सबसे हिम्मत मिलती थी."
वो कहते हैं, "हमने रूटीन बना लिया था. आठ-नौ घंटे प्रार्थना करते थे, थोड़ी एक्सरसाइज़, योग, मेडिटेशन और बाद में जब टीवी मिल गया तो हिंदी चैनल, मूवी देख ली. जो भी चीज़ भारत से संबंधित होती थी, उसे देखकर ख़ुशी होती थी कि एक दिन आप जाकर वहीं पर रहेंगे. कब आएगा वह दिन, यह नहीं मालूम था लेकिन इन सब बातों से हिम्मत बनाए रखी."
भगवान और पीएम का धन्यवाद

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कैप्टन (रिटायर्ड) सौरभ कहते हैं कि वापस आने के लिए सबसे पहले तो वह भगवान का धन्यवाद करते हैं.
यह पता था कि किस्मत में ये बुरा समय लिखा है लेकिन कभी न कभी यह ख़त्म होगा.
भगवान के बाद वो सबसे ज़्यादा शुक्रिया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का अदा करते हैं.
वो कहते हैं, ''अगर वह निजी स्तर पर इसमें रुचि नहीं लेते, दखल नहीं देते तो शायद हम रिहा नहीं होते.''
वो कहते हैं, ''भारतीय विदेश मंत्रालय के अधिकारियों, क़तर में भारतीय दूतावास की कोशिशों और दूतावास का हमारे परिवारों को सहयोग की वजह से यह संभव हो पाया और इन सबका शुक्रिया.''
‘अगले जन्म में भी विदेश नहीं जाना’

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अगर अब विदेश में कोई अच्छा ऑफ़र मिलता है तो क्या जाना पसंद करेंगे?
इस सवाल के जवाब में कैप्टन (रिटायर्ड) सौरभ कहते हैं, "विदेश तो दूर-दूर तक नहीं. इस जन्म में और अगले वाले जन्मों में भी चाहूंगा कि भारत में रहूं ताकि जो डेढ़ साल ज़िंदगी का निकल गया है, उसकी भरपाई हो. बाहर जाने का कोई इरादा नहीं है."
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