एक दलित अधिकारी रेलवे में सबसे ऊंचे पद पर होंगे नियुक्त, क्यों हो रही है कांग्रेस की चर्चा

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- Author, चंदन कुमार जजवाड़े
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
रेल मंत्रालय में पहली बार किसी दलित अधिकारी को सबसे उंचे पद पर नियुक्ति मिली है. रेल मंत्रालय में 'चेयरमैन एंड सीईओ' का पद सबसे बड़ा होता है.
यह पद भारत सरकार के सचिव के पद के बराबर होता है. यानी भारत सरकार के अन्य मंत्रालयों के सचिव के बराबर ही रेलवे बोर्ड के चेयरमैन का पद होता है.
भारतीय रेल में मैकेनिकल इंजीनियर्स सेवा के अधिकारी सतीश कुमार रेलवे बोर्ड के नए चेयरमैन और सीईओ बनाए गए हैं. वो 1 सितंबर 2024 को पदभार ग्रहण कर रहे हैं.
किसी दलित अधिकारी के पहली बार इस पद तक पहुँचने के बाद इस पर सोशल मीडिया पर भी काफ़ी चर्चा हो रही है.

सतीश कुमार साल 1986 बैच के आईआरएसएमई अधिकारी हैं.
इससे पहले वो रेलवे में डीआरएम और रेलवे के एनसीआर ज़ोन में जीएम के पद पर भी रहे हैं. सतीश कुमार इसी साल 5 जनवरी को रेलवे बोर्ड में ‘मेंबर ट्रैक्शन एंड रोलिंग स्टॉक’ बने थे.
सतीश कुमार के नए चेयरमैन चुने जाने के बाद से कुछ कांग्रेस समर्थक इसे राहुल गांधी के दबाव का असर भी बता रहे हैं.
कांग्रेस नेता उदित राज ने बीबीसी से बातचीत में दावा किया है कि "यह पूरी तरह से राहुल गांधी और कांग्रेस का दबाव है. वरना सारी योग्यता होने के बावजूद भी उन्हें दबा दिया जाता. पहले मोदी और अमित शाह जिसे चाहते थे उसे बना देते थे."
उनका कहना है कि कांग्रेस के दबाव में ही हाल ही में लेटरल एंट्री से नियुक्ति के विज्ञापन को भी रद्द किया गया है.
हालाँकि इसके जवाब में बीजेपी समर्थक दावा करते हैं कि मोदी सरकार के दौर में दलित और आदिवासी समुदाय को राष्ट्रपति पद तक पहुँचने का अवसर मिला है.
राहुल गांधी का आरोप

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सतीश कुमार की नियुक्ति ऐसे समय में हुई है जब विपक्ष के नेता राहुल गांधी केंद्र की मोदी सरकार पर दलितों के साथ भेदभाव का आरोप लगाते रहे हैं.
राहुल गांधी के आरोपों के मुताबिक़ केंद्र सरकार में महत्वपूर्ण पदों पर दलितों या अन्य कमज़ोर तबकों को काम करने का अवसर नहीं दिया जाता है.
राहुल गांधी ने साल 2024-25 के बजट पर भी आरोप लगाया था कि भारत का बजट 20 लोगों ने तैयार किया है, उनमें केवल एक मुस्लिम हैं और एक ओबीसी.
राहुल गांधी ने आरोप लगाया था कि ऐसे लोगों को फ़ोटो में भी नहीं आने दिया जाता.
राहुल गांधी और अन्य विपक्षी दलों की मांग रही है कि देश में अलग-अलग जातियों को आबादी के आधार पर मौक़ा देना ज़रूरी है, वो इसके लिए जातिगत जनगणना की मांग करते हैं.
वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई कहते हैं, जैसे दो या तीन मुसलमानों के राष्ट्रपति बन जाने से सभी मुस्लिमों का भला नहीं हुआ है, यह वैसा ही है.
रशीद किदवई के मुताबिक़, “विपक्ष आबादी के हिसाब से भागीदारी की मांग करता है. एक व्यक्ति के चेयरमैन बन जाने से पूरे समुदाय का कोई फ़ायदा नहीं होगा.”
“जैसे राहुल गांधी तस्वीरों में दलित के नहीं दिखने जैसी सांकेतिक बात कहते हैं, वैसे ही केंद्र सरकार की तरफ़ से यह नियुक्ति भी सांकेतिक है.”
हालांकि उदित राज मानते हैं कि एक पद से भी फर्क पड़ता है और ख़ासकर सबसे ऊंचे ओहदे पर होने से बहुत फर्क पड़ता है.

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कब तक रहेंगे चेयरमैन
भारत सरकार के पर्सनल और ट्रेनिंग विभाग (डीओपीटी) के मुताबिक़ एसीसी यानी कैबिनेट की एपॉइंटमेंट्स कमेटी ने सतीश कुमार की नियुक्ति को मंज़ूरी दी है.
सतीश कुमार चेयरमैन के पद पर 31 अगस्त 2025 तक यानी एक साल के लिए रहेंगे.
रेलवे बोर्ड के एक पूर्व सदस्य ने नाम न लेने की शर्त पर बीबीसी को बताया, “मुझे भी पहले से सुनने को मिल रहा था कि सतीश कुमार नए चेयरमैन हो सकते हैं क्योंकि मौजूदा चेयरमैन का कार्यकाल समाप्त हो रहा है.”
उनके मुताबिक़, “पहले की सरकारों में रेलवे बोर्ड का चेयरमैन बनाने के लिए किसी अधिकारी को एक्सटेंशन नहीं दिया जाता था. मोदी सरकार जब से आई है ऐसा कई बार किया है और उस आधार पर संयोग से सतीश कुमार का नाम आया होगा, उन्हें कोई रियायत नहीं मिली होगी.”
हालाँकि रेल कर्मचारियों के एक संगठन एआईआरएफ के महामंत्री शिवगोपाल मिश्रा के मुताबिक़ रेलवे बोर्ड में नवीन गुलाटी सबसे वरिष्ठ सदस्य थे, लेकिन उनको पहले ही डीजी (एचआर) बना दिया गया था.
रेलवे बोर्ड में कुल 7 मेंबर होते हैं. यह रेलवे में नीति बनाने और संचालन के लिहाज़ से सबसे बड़ी बॉडी होती है. इसमें सबसे वरिष्ठ ‘चेयरमैन एंड सीईओ’ होते हैं.
रेलवे बोर्ड में किसी भी सदस्य या अध्यक्ष की नियुक्ति के लिए आमतौर पर कुछ तय नियम होते हैं, जिनका पालन किया जाता है.
कैसे होती है नियुक्ति
कोई रेल अधिकारी जो किसी ज़ोन में जीएम यानी महाप्रबंधक हो या उसी लेवल का अधिकारी हो और उसने कम से कम 25 साल नौकरी कर ली हो, वो बोर्ड मेंबर या अध्यक्ष बनने की योग्यता रखता है.
इन अधिकारियों में किसी का चयन उनकी वरीयता, सालाना गोपनीय रिपोर्ट (एसीआर) और परफ़ॉर्मेंस एप्रेज़ल रिपोर्ट (पीएआर) के आधार पर होता है.
रेल मंत्रालय ऐसे अधिकारियों की सूची बनाता है और इसके लिए एक पैनल का गठन करता है.
रेलवे बोर्ड का सदस्य बनने के लिए आमतौर पर किसी अधिकारी के रिटायरमेंट में कम से कम दो साल का समय बचा होना चाहिए.
जबकि बोर्ड का चेयरमैन बनने के लिए किसी अधिकारी के रिटायरमेंट में कम से कम एक साल का समय बचा होना चाहिए.
रेल मंत्रालय के ईडीआईपी दिलीप कुमार के मुताबिक़, सतीश कुमार 4 महीने के बाद रिटायर होने वाले थे और उन्हें 8 महीने का सेवा विस्तार यानी एक्सटेंशन दिया गया है.
रेल मंत्रालय का पैनल चुने हुए नामों को डीओपीटी के पास भेजता है. उसके बाद एसीसी यानी कैबिनेट की एपॉइंटमेंट्स कमेटी इस पर फ़ैसला लेती है.
शिवगोपाल मिश्रा कहते हैं, “मुझे भी नहीं याद आता है कि पहले की सरकारों ने कभी किसी बोर्ड मेंबर को सेवा विस्तार देकर बोर्ड का अध्यक्ष बनाया हो. सतीश कुमार एक अच्छे अधिकारी हैं और उम्मीद है कि वो अच्छा काम करेंगे.”
नए अध्यक्ष के सामने चुनौतियाँ

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अगर आप किसी रेल मुसाफ़िर से पूछें तो पता चलता है कि ट्रेनों में बर्थ या सीट मिलना उनकी पहली ज़रूरत होती है.
इसके अलावा मुसाफ़िर ट्रेनों के समय से चलने और अपने सामान की हिफ़ाज़त चाहते हैं. आमतौर पर मुसाफ़िर रेलवे में अपनी यात्रा को सुरक्षित मानकर ही सफ़र करते हैं.
हालाँकि पिछले कुछ साल से लगातार हो रहे हादसे रेल मुसाफ़िरों और रेल मंत्रालय के लिए बड़ी चिंता की वजह बनी है.
रेलवे बोर्ड के नए अध्यक्ष के सामने रेल अधिकारियों, कर्मचारियों और इसके करोड़ों मुसाफ़िरों की उम्मीदें होंगी जो किसी चुनौती से कम नहीं है.
इस मामले में ट्रेनों का सुरक्षित संचालन सबसे ज़रूरी होगा. हाल के दिनों में कई रेल हादसों के बाद न केवल विपक्ष ने मुसाफ़िरों की सुरक्षा को बड़ा मुद्दा बनाया है बल्कि यह सोशल मीडिया और आम लोगों के बीच चर्चा में रहा है.

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भविष्य में सतीश कुमार की चुनौती इसलिए भी बड़ी हो सकती है क्योंकि ख़बरों के मुताबिक़ उन्होंने फॉग सेफ डिवाइस पर काफ़ी काम किया है.
यह डिवाइस ट्रेनों के इंजन में लगाया जाता है और सर्दियों के दौरान कोहरे के मौसम में ट्रेनों के सुरक्षित संचालन में मदद करता है.
संयोग से संतीश कुमार के पद संभालने के कुछ ही हफ़्तों के अंदर उत्तर भारत में कोहरे का असर शुरू हो जाएगा. कोहरे के बीच ट्रेनों के देरी से चलने और हादसे रेलवे के सामने बड़ी चुनौती होते हैं.
इसके अलावा रेलवे में भर्ती और खाली पदों पर नियुक्ति भी एक बड़ा मुद्दा है. रेलवे यूनियन की तरफ से इसकी मांग लगातार उठाई जाती है और इसके लिए देश के कई इलाक़ों में प्रदर्शन भी होते रहे हैं.
पुरानी पेंशन स्कीम की बहाली भी रेल कर्मयारियों की पुरानी मांग रही है. ख़ासकर क़रीब 13 लाख़ लोगों को रोज़गार देने वाले रेलवे के ऊपर इसका भी एक बड़ा दबाव होता है.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
















