पीएम मोदी के भाषण, विपक्ष की आलोचना, मीडिया की टिप्पणियाँ और ख़ामोश चुनाव आयोग

लोकसभा चुनाव 2024

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इमेज कैप्शन, चुनाव प्रचार के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी
    • Author, विनीत खरे
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

सात चरणों वाला 2024 लोकसभा चुनाव जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा है, चुनावी भाषणों में इस्तेमाल हो रही 'मुस्लिम विरोधी' भाषा से देश और विदेश के कई हलकों में फिक्र बढ़ी है.

ये भाषण ऐसे वक्त में सामने आ रहे हैं, जब कई जानकार प्रधानमंत्री मोदी के लगातार तीसरी बार आम चुनाव जीतने की भविष्यवाणी कर रहे हैं.

हाल के चुनावी भाषणों पर एक पूर्व चुनाव आयुक्त ने अपना नाम न छापने की शर्त पर कहा, "मैंने कभी भी चुनावी भाषणों के इस स्तर को नहीं देखा. भाषण इतने ज़हरीले कभी न थे. ये अकल्पनीय है."

'भविष्य के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं'

1993 मुंबई दंगों के बाद शांति को बढ़ावा देने के उद्देश्य से बने मुंबई के सेंटर फॉर स्टडी ऑफ़ सोसाइटी एंड सेक्युलरिज़्म के इरफ़ान इंजीनियर के मुताबिक, भाषणों से ध्रुवीकरण बढ़ेगा और ये भविष्य के लिए अच्छे संकेत नहीं हैं.

वो कहते हैं, "2014 और 2019 का चुनाव जहां भ्रष्टाचार, अच्छे दिन और राष्ट्रीयता पर लड़ा गया, 2024 का चुनाव “मुस्लिम विरोध” पर लड़ा जा रहा है."

अमेरिका में विल्सन सेंटर के साउथ एशिया इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर माइकल कुगेलमैन के मुताबिक, 400 सीटों का लक्ष्य पाने के लिए जो कुछ भी किया जा सकता है, शायद प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा वो सब कर रहे हैं.

प्रधानमंत्री मोदी के राजस्थान के बांसवाड़ा में दिए गए भाषण पर अख़बार इंडियन एक्सप्रेस ने एक संपादकीय लिखा था, जिसकी हेडलाइन थी – "नहीं, प्रधानमंत्री."

दरअसल, राजस्थान की एक चुनावी रैली में प्रधानमंत्री मोदी ने पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के एक पुराने भाषण का हवाला देते हुए मुसलमानों पर टिप्पणी की, जिसमें उन्हें 'घुसपैठिए' और 'ज़्यादा बच्चे पैदा करने वाला' कहा गया था.

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एक के बाद एक कई बयान आए सामने

लेकिन बात यहां तक सीमित नहीं रही.

कर्नाटक बीजेपी का आरक्षण को लेकर किया गया एक ट्वीट, 'मुस्लिम विरोधी' चुनावी विज्ञापन विवादों में घिरा रहा.

कांग्रेस के घोषणापत्र को आधार बनाते हुए भाजपा नेता जो दावे कर रहे हैं, विपक्ष उन दावों को झूठ और विभाजनकारी बता रहा है.

इसके अलावा उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने कहा कि "कांग्रेस कहती है कि हम पर्सनल लॉ के ज़रिए शरिया कानून को लागू करवा देंगे."

भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा ने समाचार एजेंसी एएनआई से कहा, "जब मैंने कांग्रेस के मैनिफेस्टो को देखा, मुझे आश्चर्य हुआ कि ये कांग्रेस पार्टी का मैनिफेस्टो है या मुस्लिम लीग का मैनिफेस्टो है."

भाजपा के सोशल मीडिया के प्रभारी अमित मालवीय ने प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा, "ये साफ़ है कि कांग्रेस हमारी संपत्ति, छोटी बचत को नियंत्रण में ले लेगी और उसे मुसलमानों में दोबारा बांट देगी."

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रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने एक भाषण में कहा, "इस बार के घोषणापत्र में फिर कांग्रेस ने सरकारी नौकरियों में धार्मिक अल्पसंख्यकों के लिए आरक्षण का संकेत दिया है, जो अगर लागू किया गया, तो उसमें सशस्त्र सेनाओं को भी इसके दायरे में लिया जा सकता है."

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केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर ने एक रैली में कहा, "कांग्रेस के घोषणापत्र में कांग्रेस के हाथ के साथ विदेशी ताकतों का हाथ नज़र आता है. जो आपके संतान की संपत्ति मुसलमान को देना चाहते हैं."

कांग्रेस के घोषणापत्र में 'शरिया', 'तालिबान' जैसे शब्द कहीं नहीं हैं.

प्रधानमंत्री मोदी के बांसवाड़ा के भाषण पर बीजेपी प्रवक्ता गौरव भाटिया ने एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में कहा था कि "जो भारत में ग़ैर-कानूनी ढंग से घुसते हैं, वो इंडी अलायंस के लिए देश की जनता से ज़्यादा महत्वपूर्ण हैं."

अलग-अलग विचारधारा के लोग क्या कह रहे हैं?

भाषणों की आलोचनाओं पर दक्षिणपंथी सुव्रोकमल दत्ता कहते हैं, "इस देश में क्या सिर तन से जुदा नहीं हुआ है? इस देश में क्या गज़वा-ए-हिंद की विचारधारा नहीं आई? इस देश में क्या वोट जिहाद नहीं आ रहा है? ये सारी बातें सच्चाई हैं. इन सच्चाइयों को अगर प्रधानमंत्री उजागर कर रहे हैं तो कौन सा गुनाह कर रहे हैं?"

बीजेपी अल्पसंख्यक मोर्चा प्रमुख जमाल सिद्दीकी ने प्रधानमंत्री मोदी के भाषण पर हो रही आलोचनाओं को खारिज करते हुए कहा, "मोदी जी ने हमेशा मुसलमानों के भले के लिए सोचा है."

वो कहते हैं, "घुसपैठिए का मतलब मुसलमान नहीं होता. क्यों हम उसको मुसलमान पर लाद रहे हैं. पाकिस्तान से आए हुए लोग देश को तोड़ने की कोशिश कर रहे हैं. बांग्लादेश से आए हुए लोग, यहां के लोगों के रोज़गार पर डाका डाल रहे हैं. ज़्यादा बच्चा पैदा करने वाले हिंदू भी होते हैं, मुसलमान भी होते हैं."

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चुनाव आयोग क्यों है 'खामोश'?

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16 अप्रैल को चुनाव आयोग ने आचार संहिता लगने के एक महीना पूरा होने पर बयान जारी किया था.

चुनाव आयोग के मुताबिक़, क़रीब 200 शिकायतें आयोग के पास आई हैं. इनमें से 169 पर एक्शन लिया गया है. 51 शिकायतें बीजेपी की तरफ़ से करवाई गईं, जिनमें 38 मामलों में कार्रवाई की गई. कांग्रेस की तरफ से 59 शिकायतें आईं, जिनमें 51 मामलों में कार्रवाई की गई.

लेकिन "ज़हरीले" चुनावी भाषणों के इस दौर में चुनाव आयोग पर लगातार आरोप लग रहे हैं कि वो जितनी सख्ती विपक्षी नेताओं पर दिखा रहा है, सत्तारूढ़ बीजेपी नेताओं पर वो सख्ती नहीं दिख रही है, ऐसे वक्त जब भाजपा नेता भाषणों में हिंदू प्रतीक चिह्नों की बात कर रहे हैं.

टीएमसी के डेरेक ओब्रायन ने आरोप लगाया कि कि चुनाव आयोग "पक्षपातपूर्ण अंपायर" की तरह व्यवहार कर रहा है.

चुनाव आयोग के एक अधिकारी ने इन आरोपों पर किसी भी टिप्पणी से इनकार किया.

प्रधानमंत्री के भाषण पर मद्रास हाईकोर्ट में गुहार लगाने वाले तमिलनाडु कांग्रेस नेता सेल्वापेरुंथगाई ने बीबीसी से बातचीत में पूछा कि जाति, धर्म और समुदायों पर हो रहे भाषणों पर चुनाव आयोग चुप क्यों है.

एक पूर्व चुनाव आयुक्त के मुताबिक़, अगर चुनाव आयोग ने पूर्व में दिए गए भाषणों पर सख्ती दिखाई होती तो आज ऐसी नौबत नहीं होती.

चुनाव आयोग की ओर से लागू आदर्श आचार संहिता के मुताबिक़, चुनाव प्रचार के दौरान न तो धार्मिक प्रतीकों का इस्तेमाल किया जा सकता है और न ही धर्म, संप्रदाय और जाति के आधार पर वोट देने की अपील की जा सकती है. आचार संहिता के मुताबिक़, किसी भी धार्मिक या जातीय समुदाय के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाने वाले भाषण देने या नारे लगाने पर भी रोक है. इन नियमों का हवाला देते हुए विपक्ष पीएम मोदी पर कार्रवाई की मांग कर रहा है.

सवालों की तीव्रता और बढ़ी जब प्रधानमंत्री मोदी के बांसवाड़ा भाषण के लिए पार्टी प्रमुख जेपी नड्डा को नोटिस भेजा गया, न कि प्रधानमंत्री मोदी को. इसी तर्ज पर राहुल गांधी के एक भाषण पर पार्टी प्रमुख मल्लिकार्जुन खाड़गे को नोटिस भेजा गया, न कि राहुल गांधी को. ऐसा पहली बार हुआ था.

कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने ट्वीट किया, "ये साफ़ है कि प्रधानमंत्री की अपमानजनक टिप्पणी से पैदा हुए आम लोगों के दबाव ने चुनाव आयोग के हाथ बांध दिए. लेकिन बराबरी के व्यवहार के तहत क्या चुनाव आयोग का राहुल गांधी की टिप्पणी पर नोटिस भेजना ज़रूरी था?"

याद रहे कि चुनाव आयोग ने कांग्रेस नेता रणदीप सुरजेवाला की भाजपा नेता हेमा मालिनी पर की गई एक आपत्तिजनक टिप्पणी पर उन्हें फटकार लगाई थी और 48 घंटे तक उनकी रैलियों पर रोक लगा दी थी.

इससे अलावा भाजपा उम्मीदवार कंगना रनौत पर सोशल मीडिया पर की गई टिप्पणी पर चुनाव आयोग ने कांग्रेस प्रवक्ता सुप्रिया श्रीनेत की निंदा की थी.

भाषणों में इस तीखेपन की वजह क्या है?

प्रधानमंत्री मोदी का बांसवाड़ा वाला भाषण दूसरे चरण से पहले आया था. दूसरे चरण में केरल, कर्नाटक, राजस्थान, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, असम, बिहार, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों की कई सीटों पर मतदान हुआ था.

अमेरिका के जॉर्जटाउन विश्वविद्यालय में भारतीय राजनीति के प्रोफ़ेसर इरफ़ान नूरुद्दीन के मुताबिक, "पिछले 10 सालों के कार्यकाल में प्रधानमंत्री मोदी ने पार्टी के कोर बेस को रिझाने के लिए कई बार इशारों से काम लिया है, और टेढ़ी, तीखी बातों को कहने का काम दूसरे नेताओं पर छोड़ दिया था. लेकिन इस बार उनका इस तरह बात करना एक बड़ा बदलाव है. याद रहे कि पूर्व में कब्रिस्तान और श्मशान घाट का जिक्र करने वाला भाषण विवादों में घिरा था."

प्रोफ़ेसर नूरुद्दीन कहते हैं कि ये एक इशारा है कि बीजेपी को लगता है कि अर्थव्यवस्था से जुड़ी बातें मतदाता को अपील नहीं कर रही हैं क्योंकि गांवों और शहरों में बेरोज़गारी, नौकरियां पैदा करने की चुनौती महत्वपूर्ण विषय हैं.

प्रोफ़ेसर इरफ़ान नूरुद्दीन कहते हैं कि बीजेपी में ये भी आभास है कि चुनाव के पहले अरविंद केजरीवाल की गिरफ़्तारी 'हिट-विकेट' या अपना ही नुकसान करने जैसा था. उस कदम ने हाथ-पैर मार रहे विपक्ष को एकजुट कर दिया जिससे वो 'लोकतंत्र ख़तरे में है' के नारे को ज़ोर से उठाने लगे.

वो केजरीवाल की गिरफ़्तारी को अतिआत्मविश्वास का नतीजा मानते हैं. उनके मुताबिक बीजेपी को राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा समारोह का चुनावी फ़ायदा उम्मीद के मुताबिक़ नहीं मिला.

प्रधानमंत्री मोदी के हाल के चुनावी भाषण में राहुल गांधी पर हमले के लिए अदानी, अंबानी के ज़िक्र पर वो पूछते हैं कि जिन व्यक्तियों के बारे में माना जाता है कि वो बीजेपी के नज़दीक हैं, उनका ज़िक्र करने का क्या तर्क है. वो पूछते हैं, "कौन इस बात पर विश्वास करेगा?"

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अमेरिका के एक विश्वविद्यालय में पढ़ा रहे भारतीय मूल के एक प्रोफ़ेसर के मुताबिक़, महाराष्ट्र में पार्टियों के टूटने से भी कई लोग बीजेपी से दूर गए.

माइकल कुगेलमैन मानते हैं कि प्रधानमंत्री मोदी को विश्वास है कि वो और उनकी पार्टी चुनाव में अच्छा प्रदर्शन दिखाएंगे और वो अपने कोर समर्थकों से आगे जाकर और लोगों को जोड़ने की कोशिश कर रहे हैं.

माइकल कुगेलमैन कहते हैं, "अगर ऐसा है तो ये स्मार्ट नीति नहीं है. जो बात उनके लिए ज़्यादा बेहतर होगी वो ये कि अगर वो मुसलमान वोटरों, स्वतंत्र सोच वाली सोच के वोटरों, उन वोटरों को जो बहुत राजनीतिक नहीं हैं या फिर जो भाजपा के नज़दीक नहीं हैं, उन्हें अपनी ओर खींचना चाह रहे हैं तो बेहतर होगा कि वो जिस तरह की भाषा का इस्तेमाल कर रहे हैं, उससे परहेज़ करें."

वो भाषणों की भाषा को 'दुर्भाग्यपूर्ण' मानते हैं.

बीजेपी की नीतियों के समर्थक डॉ. सुव्रोकमल दत्ता के मुताबिक, "प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा नेताओं के भाषण बांटने वाली राजनीति नहीं है और ये देश की संप्रभुता, सुरक्षा, अखंडता, रणनीति से जुड़ी बातें हैं."

वो कहते हैं, "प्रधानमंत्री मोदी लगातार ये कह रहे हैं कि कांग्रेस ने ये सारी चीज़ें कीं, इस तरह का ख़तरा मंडरा रहा है, और उसे देखकर देश को, समाज को चौकस रहना चाहिए. प्रधानमंत्री को ये शब्द मजबूरी में कहने पड़ रहे हैं. क्या ये ऐतिहासिक सच्चाई नहीं है कि पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कहा था कि इस देश के राष्ट्रीय रिसोर्सेज़ पर प्रथम अधिकार अल्पसंख्यकों का, खासकर मुसलमानों का है."

आलोचकों के मुताबिक, भाजपा नेता और समर्थक जिस संदर्भ में मनमोहन सिंह के भाषण को पेश करते हैं, वो गलत है.

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कैसे देख रहा है अमेरिका और पश्चिमी देश?

अमेरिका के एक विश्वविद्यालय में पढ़ा रहे भारतीय मूल के एक प्रोफ़ेसर के मुताबिक, पश्चिमी मीडिया में भारत और भारतीय राजनीति के बारे में जो कुछ लिखा जा रहा है, वो अच्छा नहीं है.

वो कहते हैं कि भारतीय लोकतंत्र, बीजेपी नेताओं के भाषणों को लेकर आ रही रिपोर्ट, निज्जर हत्याकांड के भारत से कथित संबंधों से जुड़ी रिपोर्टों के साथ आ रही हैं, और अगर इन दोनों को जोड़ दिया जाए तो ये कहना गलत नहीं होगा कि अमेरिका में इसे लेकर फ़िक्र है.

चाहे न्यूज़ रिपोर्ट हों, लेख या फिर कुछ और, पश्चिमी मीडिया में लगातार लिखा जा रहा है कि भारत में लोकतंत्र कमज़ोर हो रहा है और अल्पसंख्यकों की स्थिति अच्छी नहीं है. याद रहे है चीन और पश्चिमी देशों के बीच संबंधों में बढ़ती तल्ख़ी की वजह से हाल के सालों में वैश्विक राजनीति में भारत का महत्व बढ़ा है.

प्रोफ़ेसर इरफ़ान नूरुद्दीन कहते हैं, "इस वक्त दुनिया का ध्यान भारत और भारतीय लोकतंत्र की नकारात्मक बातों की ओर है."

वो हाल ही में निज्जर हत्याकांड मामले में अमेरिकी अख़बार वॉशिंगटन पोस्ट में छपी रिपोर्ट और ऑस्ट्रेलिया में कथित भारतीय जासूसों को लेकर छपी रिपोर्ट की ओर इशारा करते हैं. भारत निज्जर मामले में किसी भी भूमिका से से इनकार करता रहा है.

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प्रोफ़ेसर नूरुद्दीन कहते हैं, "अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया वो देश हैं जो वैश्विक स्टेज पर भारत के बड़े समर्थक हैं."

वो प्यू रिसर्च की पिछले साल अगस्त की एक सर्वे रिपोर्ट की ओर भी इशारा करते हैं जिसके मुताबिक़, यूरोप में वक्त के साथ भारत को लेकर नकारात्मकता बढ़ी है.

माइकल कुगेलमैन के मुताबिक़, "प्रधानमंत्री के तौर पर नरेंद्र मोदी के भाषण और चुनावी भाषण को अलग-अलग करके देखने की भी ज़रूरत है. लेकिन जहां कई मुसलमान बीजेपी की नीतियों से चिंतित हैं, प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में मध्यपूर्व के देशों से भारत के संबंध जितना मज़बूत हुए हैं, वैसे किसी भी पूर्व भारतीय नेता के दौर में नहीं हुए. ये देश भारतीय परिस्थितियों पर कुछ नहीं कहेंगे क्योंकि भारत उनके लिए महत्वपूर्ण व्यापारिक पार्टनर है. इसके अलावा बड़ी संख्या में भारतीय मध्य-पूर्व के देशों में काम करते हैं."

माइकल कुगेलमैन के मुताबिक, पाकिस्तान, चीन को छोड़ दें तो उन्हें नहीं लगता किसी देश का राष्ट्राध्यक्ष भारत के चुनाव भाषणों आदि विषयों पर कोई आलोचना करेगा, लेकिन हालात उस वक्त बदलते हैं जब विदेशी धरती पर निज्जर हत्याकांड में आरोपों जैसी बात सामने आती है.

वो कहते हैं कि काफ़ी वक्त से फिक्र रही है कि भारत धर्मनिपेक्षता से दूर हो रहा है और चुनावी सभाओं की बातों से भारत की दिशा को लेकर वो फिक्र और बढ़ेगी क्योंकि भाषणों में कही गई बातें आसानी से "हेट-स्पीच" कही जा सकती हैं.

भाजपा नेता आरोपों से इनकार करते रहे हैं

भाजपा नेता इन आरोपों से लगातार इनकार करते रहे हैं. अंतरराष्ट्रीय मामलों के दक्षिणपंथी जानकार सुव्रोकमल दत्ता के मुताबिक़, अंतरराष्ट्रीय देश या पश्चिमी देश भारत को लेकर क्या बोलते हैं, भारत को इसकी चिंता नहीं है.

वो कहते हैं, "वो खुद अपने गिरेबां में झांककर देखें. स्वीडन, फ्रांस में गैर-कानूनी प्रवासियों ने दंगे किए हैं, पेरिस जला है, जिस तरह से लंदन में बम हमले हुए हैं, मॉस्को थिएटर में जिस तरह आईएस के हमले में लोग मारे गए, अमेरिका में काले, स्पैनिश लोगों के साथ जिस तरह का पक्षपात होता है, कितने भारतीय की वहां हत्या कर दी गई है. अमेरिका किस मुंह से ये सारी बातें कहेगा. अमेरिका और यूरोप को पहले अपने गिरेबां में झांककर देखना चाहिए."

बीजेपी अल्पसंख्यक मोर्चा के प्रमुख जमाल सिद्दीकी के मुताबिक़, "जब प्रधानमंत्री के सामने प्रश्न आते हैं, कांग्रेस जब अपना मैनिफ़ेस्टो देती है, जब कांग्रेस के शहज़ादे राहुल भैया अपनी बात रखते हैं, जब वो मोदी जी पर हमला करते हैं, तो मोदी जी को अपनी बात रखनी पड़ती है."

हाल ही में टाइम्स नाऊ टीवी चैनल से बातचीत में मुसलमानों पर पूछे सवाल के जवाब में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा, "आत्ममंथन करिए सोचिए, देश इतना आगे बढ़ रहा है. अगर कमी आपके समाज में महसूस होती है, तो क्या कारण है? सरकार की व्यवस्थाओं का फ़ायदा कांग्रेस के ज़माने पर आपको क्यों नहीं मिला?"

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