अंतिम पंघाल से एशियन गेम्स में गोल्ड मेडल की उम्मीद

अंतिम पंघाल

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    • Author, मनोज चतुर्वेदी
    • पदनाम, वरिष्ठ खेल पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए

भारतीय महिला पहलवान अंतिम पंघाल आजकल सुर्खियों में हैं.

इसकी वजह विश्व कुश्ती चैंपियनशिप में उनका कांस्य पदक जीतना. अब इस पहलवान से हांगज़ो एशियाई खेलों में स्वर्णिम प्रदर्शन की उम्मीद की जा रही है.

अंतिम यह उपलब्धि पाने वाली वह भारत की आठवीं महिला पहलवान हैं. उन्होंने यह पदक फ्रीस्टाइल के 53 किग्रा वर्ग में हासिल किया.

अंतिम इस सफलता से अगले साल पेरिस में होने वाले ओलंपिक खेलों के लिए क्वालिफाई करने वाली भारत की पहली महिला पहलवान बन गई हैं.

इस 19 साल की पहलवान को अब हांगज़ो में पोडियम पर चढ़कर अपनी प्रतिभा को दिखाना है.

विश्व चैंपियनशिप में पदक जीतने के बाद इस युवा पहलवान की आंखों से आंसू बहे जा रहे थे.

और सेमीफाइनल में वेनेसा कलादजिंस्काया के हाथों हारने का भरोसा नहीं हो पा रहा था.

यह मुकाबला हुआ भी जबर्दस्त. मुकाबले में 7 सेकेंड बाकी रहने पर अंतिम एक अंक से पिछड़ी हुई थीं और दो सेकेंड बाद वह एक अंक की बढ़त पा गई पर वह मुकाबला एक अंक से हार गई थीं.

किस्मत ले गई एशियाई खेलों में

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इमेज कैप्शन, 21 सितंबर को वर्ल्ड रेसलिंग के ब्रांज मेडल मैच के लिए स्वीडन की पहलवान एमा जोना से कुश्ती लड़तीं अंतिम पंघाल

अंतिम पंघाल एशियाई खेलों के लिए होने वाले ट्रायल में पिछले खेलों की स्वर्ण पदक विजेता विनेश फोगाट को चुनौती देने की तैयारी कर रही थीं.

पर भारतीय कुश्ती फेडरेशन का कामकाज देखने वाली तदर्थ समिति ने विनेश फोगाट को एशियाई खेलों में भेजने का फैसला कर लिया. अंतिम रिजर्व खिलाड़ी रख दी गईं.

विनेश फोगाट ने घुटने में चोट की वजह से एशियाई खेलों की टीम से नाम वापस ले लिया.

इससे अंतिम को एशियाई खेलों में भाग लेने का मौका मिल गया. अब उनके सामने विश्व चैंपियनशिप की तरह एशियाई खेलों में भी पोडियम पर चढ़ने का मौका है.

वह पेरिस ओलंपिक का टिकट पहले ही कटा चुकी हैं.

नाम पड़ने की भी है दिलचस्प कहानी

अंतिम पंघाल बहनों में सबसे छोटी हैं. उनकी तीन बड़ी बहनें सरिता, मीनू और निशा हैं.

अंतिम के जन्म के समय माता कृष्ण कुमारी और पिता रामनिवास पुत्र होने की उम्मीद कर रहे थे.

पर पुत्री होने पर गांव भगाना के लोगों ने अंधविश्वासी होने की वजह से पुत्री का नाम अंतिम रखवा दिया. पर यह पुत्री अंतिम नहीं प्रथम साबित हो रही है.

अंतिम पहले अपनी बड़ी बहन सरिता की तरह कबड्डी खिलाड़ी बनना चाहती थीं.

पर सरिता ने अपने अनुभव से उसे समझाया कि टीम गेम में भेदभाव होने की गुंजाइश बनी रहती है, इसलिए उसे कुश्ती जैसा व्यक्तिगत खेल अपनाना चाहिए. बहन की इस सलाह के बाद अंतिम ने कुश्ती को अपनाने का फैसला किया.

शुरुआत में अंतिम ने गांव के ही अखाड़े में गुरु पवन कुमार से दांवपेच सीखना शुरू किया, पर पवन कुमार का निधन हो की वजह से यह समस्या आ गई कि अब उसे कहां कुश्ती सिखाई जाए.

पहलवान बनाने में पिता का योगदान

अंतिम पंघाल.

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समाप्त

अंतिम के पिता रामनिवास के पास भले ही दौलत नहीं थी, पर उन्होंने बेटी को चैंपियन पहलवान बनाने की जिद ठान ली थी.

वह बेटी को हिसार के बाबा लाल दास अखाड़े में ट्रेनिंग दिलाने के लिए वह शहर के बाहरी इलाके में रहने लगे. शुरुआत में उन्होंने 5000 रुपये किराए वाला कमरा लिया.

लेकिन उन्हें जल्द समझ में आ गया कि इससे काम चलने वाला नहीं है. इसलिए उन्होंने गंगवा इलाके में घर खरीदने का मन बनाया.

रामनिवास ने घर बनाने के लिए अपनी खेती वाली डेढ़ एकड़ जमीन, ट्रैक्टर और गाड़ी के साथ कई मशीनों को बेच दिया.

उन्होंने गंगवा में तीन कमरे और एक छोटे किचन का निर्माण कराकर पूरा फोकस बेटी की तैयारियों पर लगा दिया. इस मकान में बाहर छोटा हिस्सा खुला है, जिसमें गाय और भैंस बंधती हैं.

रामनिवास इस बात को अच्छे से जानते थे कि बेटी को अंतरराष्ट्रीय पहलवान बनाने के लिए जितने पैसे की जरूरत पड़ेगी, वह उनके पास नहीं है. इसके लिए वह आसपास होने वाले दंगलों में लड़ाने के लिए अपनी बेटी अंतिम को ले जाते थे.

रामनिवास बताते हैं कि बेटी को एक दंगल की कुश्ती जीतने पर 10-20 हजार रुपये का इनाम मिल जाता था. वह कहते हैं कि अंतिम ने करीब 15 दंगलों में भाग लिया. इससे हुई कमाई ने घर की मुश्किलों को थोड़ा आसान किया.

पिता ने आलोचनाओं पर ध्यान नहीं दिया

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इमेज कैप्शन, 23 सितंबर 2023 को वर्ल्ड चैंपियनशिप में गोल्ड जीतने के बाद अंतिम पंघाल की मां दिल्ली एयरपोर्ट पर उनका स्वागत करते हुए

हम सभी जानते हैं कि किसी लड़की के चमक बिखेरने पर भले ही दुनिया उसकी मुरीद बन जाती है, पर वह जब खेल को अपनाती है तो गांव वालों का विरोध होता ही है.

अंतिम के घर वालों को भी इस तरह की स्थिति का सामना करना पड़ा.

अंतिम के पिता गांव वालों द्वारा की जाने वाली आलोचना से कभी विचलित नहीं हुए. वो हमेशा अपने लक्ष्य पर बढ़ते रहे. इस सोच का ही परिणाम है कि आज अंतिम इस मुकाम पर खड़ी है.

अंतिम पंघाल ने कुश्ती को 2012 में अपना लिया था पर उनके करियर को सही शेप मिलनी शुरू हुई 2015 में.

इस साल पहली बार वो विदेश दौरे पर गईं. उन्होंने जापान में हुई एशियाई अंडर-23 चैंपियनशिप में भाग लिया. इस चैंपियनशिप में मिले रजत पदक से उनका करिअर राह पर चलते दिखा. इसके बाद उनका सफलता से नाता लगातार बना रहा.

अंतिम लगातार दो बार अंडर-20 विश्व चैंपियनशिप का खिताब जीतने वाली इकलौती भारतीय हैं. वह विश्व जूनियर खिताब भी जीत चुकी हैं. अब उनके सीनियर स्तर पर चमक बिखेरने का समय है.

बाबा लाल दास अखाड़े के एक कोच भगत सिंह कहते हैं कि पिछले एक-डेढ़ साल में अंतिम के प्रदर्शन में बहुत सुधार हुआ है. अंतिम के पहली बार अंडर-20 का विश्व खिताब जीतने से उसका आत्मविश्वास बढ़ा.

साल 2022 में कॉमनवेल्थ गेम्स के ट्रायल में अंतिम का जब विनेश फोगाट से मुकाबला हुआ तो पता चला कि वह किस स्तर की पहलवान है.

अंतिम पंघाल का डिफेंस है मजबूत

अंतिम पंघाल.

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अंतिम पंघाल के खेल की सबसे बड़ी खूबी उनके डिफेंस का बहुत मजबूत होना है.

इस खूबी की वजह से वो सामने वाले पहलवान को अंक लेने से रोके रखती हैं. वह हमेशा कहती भी हैं कि इस तरह तो वह विपक्षी पहलवान को अंक नहीं लेने देंगी.

डिफेंस में महारत हासिल करने के लिए उन्होंने मेहनत भी जी तोड़ की है.

असल में अखाड़े में अभ्यास करते समय मैट पर तमाम पहलवान उसकी कमजोरियों पर अटैक करते हैं. इससे उन्हें इसमें महारत मिलती जा रही है.

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