अमरारामः सात बार हारने के बाद आठवीं बार सीकर से लहराया वामपंथ का परचम

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- Author, त्रिभुवन
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी के लिए
राजस्थान की सभी 25 लोकसभा सीटों में से एक क्षेत्र बहुत ही अद्भुत है, जिसने देश को सिर्फ़ प्रधानमंत्री पद को छोड़कर बाकी सभी पदों के लिए शख़्सियतें दी हैं. यह लोकसभा क्षेत्र है सीकर.
भारत की राष्ट्रपति प्रतिभा देवीसिंह पाटील सीकर की पुत्रवधू थीं. उपराष्ट्रपति भैरोसिंह शेखावत का पैतृक गाँव खाचरियाबास सीकर में ही है. शेखावत तीन बार राजस्थान के मुख्यमंत्री भी रहे.
सातवीं और आठवीं लोकसभा के स्पीकर रहे बलराम जाखड़ भी सीकर से जीते थे. चौधरी देवीलाल देश के उपप्रधानमंत्री बने, वे भी सीकर से चुनकर लोकसभा पहुंचे थे.
अब इसी सीकर ने राजस्थान से मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का दूसरा सांसद चुनकर लोकसभा में भेजा है. नाम है अमराराम. वे कॉमरेड अमराराम के नाम से मशहूर हैं और उनकी पहचान ज़मीन से जुड़े और बहुत ही शालीन किस्म के संघर्षशील किसान नेता की है.
भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के उम्मीदवार के रूप में कॉमरेड अमराराम ने भारतीय जनता पार्टी के दो बार के सांसद और आर्यसमाज के राष्ट्रीय नेता स्वामी सुमेधानंद सरस्वती को 72,896 वोटों से पराजित किया. कॉमेरड अमराराम को 6,59,300 वोट मिले, जबकि स्वामी सुमेधानंद को 5,86,404 वोट.

सीकर में सीपीएम की पहली जीत

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सीकर लोकसभा क्षेत्र में दशकों से भाजपा और कांग्रेस का ही वर्चस्व रहा है.
लेकिन 1952 से ही भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की सक्रियता के बावजूद आज तक कभी कोई कम्युनिस्ट मुख्य टक्कर में भी नहीं रह सका था.
आम तौर पर सीपीएम यहाँ चुनाव लड़ती रही और वह भी हमेशा तीसरे या इससे भी नीचे के स्थान पर रही. सीकर से कॉमरेड त्रिलोकसिंह ने 1957 में पहला चुनाव लड़ा था और वे तीसरे नंबर पर रह थे.
वे 1962 में फिर चुनाव लड़े, लेकिन तीसरे स्थान पर ही रहे. कॉमरेड त्रिलोक सिंह 1967, 1971 और 1977 में भी लड़े, लेकिन वामदलों के लिए लोकसभा पहुंचना एक दिवास्वप्न ही रहा, जो इस बार पूरा हो गया.
लेकिन प्रेक्षकों की मानें तो यह सीधी-सीधी माकपा की जीत नहीं है; क्योंकि विधानसभा चुनावों में राज्य की सरकार खोने के बाद कांग्रेस ने अन्य दलों से समझौते किए और उनमें एक लोकसभा क्षेत्र सीकर भी था.
कांग्रेस ने सीकर सीट समझौते में माकपा को दी तो नागौर सीट पर राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी के हनुमान बेनीवाल और बांसवाड़ा सीट भारतीय आदिवासी पार्टी के राजकुमार रोत के लिए छोड़ी. ये तीनों जीत गए हैं.
पूरे शेखावाटी इलाके में माना जा रहा है कि कांग्रेस के सियासी समर्थन के बिना कॉमरेड अमराराम नहीं जीत सकते थे.
कॉमरेड अमराराम 1996 से अब तक आठ चुनाव लड़ चुके हैं और पिछले सात चुनावों में कांग्रेस ने कभी भी उन्हें समर्थन या सहयोग का छाता नहीं दिया तो कॉमेरड हर चुनाव में उतरते ज़रूर; लेकिन भीग-भागकर निकल जाते.
शेखावाटी ज़बरदस्त शिक्षा और राजनीतिक चेतना वाला इलाक़ा रहा है. लेकिन 1996 में पहला चुनाव लड़ने वाले कॉमरेड अमराराम सिर्फ़ औपचारिक चुनाव लड़ने वाले काग़ज़ी नेता नहीं हैं.
वे 80 के दशक से ही छात्र और किसान आंदोलनों में सक्रिय रहे हैं.किसान आंदोलनों की आँच में बार-बार तपते हुए उन्होंने जाने अपने कितने ही ख़्वाबों को ख़ाक़ किया.
हज़ारों-हज़ार किसानों को बिजली, पानी और अन्य मुद्दों पर बार-बार जुटाकर उन्होंने अपने सियासी पसीने को बार-बार आब किया है.
किसान आंदोलन का चेहरा

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कॉमरेड अमराराम के नेतृत्व में राजस्थान के कितने ही बड़े किसान आंदोलन लड़े गए हैं. भले वह 2004-05 का घड़साना किसान आंदोलन हो या 2006 का बिजली की माँग से संबंधित आंदोलन या 2017 का राज्यव्यापी किसान आंदोलन, अमराराम हमेशा ही थकन समेटकर महीनो-महीने डटे रहे हैं.
मोदी सरकार के ख़िलाफ़ हुए सबसे बड़े किसान आंदोलन के दौरान भी वे साल भर साझापुर बॉर्डर पर डटे रहे और कभी घर नहीं गए.
साल 2017 में उन्होंने मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे की सरकार के ख़िलाफ़ बड़ा आंदोलन खड़ा किया और वे मांगें मनवाने में कामयाब रहे.
साल 2006 में कॉमरेड अमराराम के नेतृत्व में राजस्थान की किसान सभा ने मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के ख़िलाफ़ ऐतिहासिक आंदोलन किए और हज़ारों किसानों ने जयपुर को लगभग घेर ही लिया तो राजे ने वरिष्ठ माकपा नेता प्रकाश कारत के हस्तक्षेप से आंदोलन को समाप्त करवाया.
इससे पहले 1989 में बीकानेर से माकपा नेता श्योपतसिंह मक्कासर लोकसभा में पहुंचे थे.
श्योपतसिंह, कॉमरेड योगेंद्रनाथ हांडा, प्रोफेसर केदार, हेतराम बेनीवाल जैसे कितने ही नेताओं के बीच छात्र जीवन से ही रहे अमराराम के प्रेरणास्रोत माकपा नेता कॉमरेड त्रिलोक सिंह रहे थे.
जैसे त्रिलोक सिंह हार से नहीं हारे, वैसे ही अमराराम भी हारों से परेशान नहीं हुए.
24 साल की उम्र से राजनीति

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बायोलॉजी के छात्र अमराराम को उनका परिवार डॉक्टर बनाना चाहता था. लेकिन वे छात्र जीवन से ही वाम आंदोलनों से जुड़ गए थे.
वे सीकर के कल्याण कॉलेज पहुँचे तो एसएफ़आई से जुड़ गए और 24 साल की उम्र में 1979 में छात्र संघ के अध्यक्ष चुन लिए गए.
यह जानकारी दिलचस्प है कि वे उस मूंडवाड़ा पंचायत के सरपंच 1983 में चुन लिए गए, जिसमें प्रसिद्ध स्वतंत्रता सेनानी और महात्मा गांधी के बेहद करीबी रहे जमनालाल बजाज ने जन्म लिया था.
अमराराम 1993 तक मूंडवाड़ा के चर्चित सरपंच रहे. इस बीच उन्होंने 1985 में धौद विधानसभा से चुनाव लड़ा, लेकिन बुरी तरह हार गए. उन्हें सिर्फ़ 10,281 वोट मिले.
अमराराम आम जीवन में बहुत साधारण, ज़मीन से जुड़े और शालीन व्यवहार के हैं, लेकिन कई आंदोलनों में उनके साथ रहे किसान नेता संजय माधव कहते हैं, "उनके भीतर लक्ष्य को बेधने की एक विचित्र ज़िद काम करती है."
वे बताते हैं कि अमराराम 1983 से लगातार चुनाव लड़ रहे हैं. वोट भले उन्हें कितने ही कम आए हों. हार जाने के बाद भी वे उसी उत्साह से किसानों के बीच काम करते रहे.
अमराराम 1990 में विधानसभा चुनाव हारे; लेकिन 1993 में उन्होंने कांग्रेस के दिग्गज नेता और शेखावाटी की एक बड़ी राजनीतिक शख़्सियत रामदेवसिंह महरिया को धौद सीट से पटखनी दे दी. महरिया 1957 से लगातार जीतते आ रहे थे.

अमराराम 1993, 1998 और 2003 में धौद और 2008 में दांतारामगढ़ से विधायक चुने जाते रहे.
वे साल 2013 से लगातार चुनाव हार रहे थे. 2013 के चुनाव में वे 30,142 वोटों के साथ तीसरे नंबर पर रहे.
अमराराम ने साल 2017 में किसानों का ऐतिहासिक आंदोलन खड़ा किया और किसानों के समर्थन में सरकार को झुकाया; लेकिन 2018 के विधानसभा चुनाव में वे एक बार फिर 45,186 वोट के साथ तीसरे नंबर रहे.
अमराराम मोदी सरकार के ख़िलाफ़ हुए राष्ट्रीय किसान आंदोलन और उसके साथ राजस्थान के विभिन्न इलाकों में बेहद सक्रिय रहे; लेकिन 2023 में हुए विधानसभा चुनाव में माकपा नेता अमराराम को 20,891 वोट मिले.
यही नहीं, अमराराम 1996 से लोकसभा का चुनाव सीकर से लगातार लड़ रहे थे.
उन्होंने 1996, 1998, 1999, 2004, 2009, 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव सीकर से लड़े और हमेशा ही तीसरे नंबर पर रहे.
पिछले तीस साल से अधिक समय से माकपा और उसके नेताओं की गतिविधियों को बहुत नज़दीक से देखने वाले उनके बारे में अक्सर अनुकूल ही सोचते हैं. भले वे उनके विरोधी ही क्यों न हो.
वे भाषणों से कटु बोलने से हमेशा बचते हैं.
इस बार का समीकरण

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शेखावाटी के एक बुजुर्ग भाजपा नेता बताते हैं, "वे जितनी बार हारे हैं, उतनी हारों को बर्दाश्त करना अन्य किसी नेता के लिए मुमकिन नहीं."
लेकिन अमराराम अपने चेहरे से निराशा और हार की भावना को मिटाते हुए आज अपनी पार्टी के लिए बारिश नहाए जंगल का प्रसन्न मौसम लेकर खड़े हैं.
अमराराम को नज़दीक से जाने वालों का कहना है कि वे न तो कभी अपने विरोध में चल रही उन्मत्त हवाओं में पीछे हटे और न ही बदहवास कर देने वाले पुलिस अत्याचारों से कभी डरे.
अलबत्ता, उनके विरोधियों का उन पर आरोप है कि यह उनकी जीत नहीं; जातिगत समीकरणों और कांग्रेस के समर्थन की जीत है.
ख़ुद अमराराम भी बताते हैं, "इस चुनाव में कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष गोविंद सिंह डोटासरा पूरी तरह चुनाव में उनके समर्थन में डटे रहे. रोड शोज़ में शामिल रहे."
पार्टी के प्रमुख नेता सचिन पायलट ने सभाएं कीं और पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी इलाक़े में आकर सभाएं तो की ही, खुलकर समर्थन दिया.
अमराराम बताते हैं, "कांग्रेस के सभी विधानसभा क्षेत्रों में कांग्रेस की स्थानीय लीडरशिप ने एकजुटता से साथ दिया."
अमराराम के विरोधी कहते हैं, "वे भले ही ऊपर कितना ही शालीन और किसान पैरोकार दिखें; लेकिन शेखावाटी इलाक़े में अराजक तत्त्वों को वे शह देते हैं."
"ये लोग सरकारी नौकरशाही और सरकारी तंत्र पर अवांछित दबाव डालते हैं और इलाके़ में जलसा-जुलूस और हड़तालों का सिलसिला शुरू हो जाता है."
विपक्षी क्या कहते हैं?

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अमराराम पर यह आरोप भी है कि वे साल 2008 से 2013 की कांग्रेस की सरकार के समय भाजपा नेता जब विरोधी दल के विधायकों को दिल्ली में राष्ट्रपति के पास ले गई तो अमराराम उनके साथ चले गए थे.
इस मामले में कुछ विरोधी उनकी सेक्युलर साख पर सवाल उठाते हैं.
कुछ लोग उन पर जातिवाद का लाभ उठाने का भी आरोप लगाते हैं. लेकिन अमराराम समर्थक इन सवालों को सिरे से ख़ारिज कर देते हैं.
अमराराम समर्थकों का कहना है कि इस तरह के आरोप इस बार सबसे पहले भाजपा उम्मीदवार स्वामी सुमेधानंद सरस्वती ने लगाए थे और लोगों ने उन्हें सही से चुनाव में जवाब दे दिया है.
सीकर से 20 किलोमीटर दूर धौद तहसील के मूंडवाड़ा में किसान दलाराम और रामदेवी के घर 5 अगस्त 1955 को जन्मे अमराराम चार भाइयों में तीसरे हैं.
नौवीं से लेकर बीएससी और बाद में एमकॉम सीकर के एसके कॉलेज से की. एलएलबी की डिग्री भी ली.
1975 में गोरखपुर विश्वविद्यालय से बीएड किया. 1980 में वे सरकारी शिक्षक लगे और पहले धौद के प्राथमिक स्कूल और बाद में उन्होंने नागवा में शिक्षक की भूमिका निभाई.
लेकिन गाँवों वालों ने उन्हें कहा कि वे नौकरी छोड़कर सरपंच का चुनाव लड़ें. वे सरपंच बने और इसी के साथ उनका राजनीतिक जीवन शुरू हो गया.
अमराराम और कांग्रेस का यह रिश्ता?

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अमराराम आज भले कांग्रेस के समर्थन से सांसद पहुंच रहे हों; लेकिन यह विचित्र सच है कि वे उन आंदोलनों की उपज हैं, जिनमें कांग्रेस की तत्कालीन सरकारों पर किसानों और छात्रों के उत्पीड़न का आरोप लगाया गया था.
इसमें सीकर के किसान छात्रावास पर 22 अप्रैल, 1987 की शाम का गोली कांड कुख्यात है.
अमराराम बताते हैं कि इस कांड में सैकड़ों लोग घायल हुए थे और पुलिस हमले के बाद हजारों लोगों को जेलों में ठूंस दिया गया था.
पुलिस का यह दमन एक साल से अधिक समय तक चला.
इस मामले में सीपीएम के वरिष्ठ नेता प्रोफ़ेसर वासुदेव बताते हैं कि "साल 1987 में हरिदेव जोशी के आदेशों के बाद पुलिस ने सीकर के युवाओं पर ज़ुल्म ढाए थे. खुद उन्हें भी अनेक महिला कार्यकर्ताओं और विद्यार्थियों के साथ जेल में डालकर पीटा गया था और कठोर यातनाएं दी गई थीं."
इस आंदोलन के केंद्र किसान छात्रावास को 12 साल तक बंद रखा गया.
लेकिन इससे माकपा को राजनीतिक फायदा हुआ और उसने शेखावाटी के गाँव-गाँव में अपनी पैठ बना ली.
प्रोफ़ेसर वासुदेव याद करते हैं कि यह छात्रावास भाजपा नेता और नेता प्रतिपक्ष भैरोसिंह शेखावत के समर्थन से खुला.
आरएसएस के विरोध के बावजूद शेखावत ने इस मुद्दे पर माकपा के आंदोलन का समर्थन किया था और कांग्रेस सरकार के अत्याचारों का विरोध.
सीकर में गैरकांग्रेसी नेताओं की एक सभा रखी गई तो उसमें प्रोफ़ेसर केदार, सुमित्रा सिंह, श्योपत सिंह जैसे नेता आए थे.
शेखावत के कहने पर की गई इस बैठक में आने से आरएसएस समर्थक नेताओं ने शेखावत को रोक दिया तो उन्होंने कहा कि वे इस मुद्दे को विधानसभा में उठाएंगे और उन्होंने उठाया.

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अमराराम बताते हैं कि शेखावत के शासनकाल में भी बहुत आंदोलन लड़े गए थे. आज के समय पर वे कहते हैं कि जनता से जुड़े मुद्दों पर आंदोलन करने वालों के प्रति ऐसी बेरुखी पहले कभी नहीं देखी थी.
अमराराम अखिल भारतीय किसान सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष रहे हैं, जिसके दो करोड़ सदस्य हैं. अभी वे इसके उपाध्यक्ष हैं.
अमराराम इस समय माकपा के राज्य सचिव हैं और माकपा की केंद्रीय कमेटी के सदस्य हैं.
वे कबड्डी के नेशनल चैंपियन रहे हैं. एक बहुत लंबी लड़ाई लड़कर संसद पहु्ँचने वाले अमराराम आने जाने के लिए सरकारी बस का भी इस्तेमाल करते हैं और जयपुर में मेट्रो में भी चलते मिल जाते हैं.
राजस्थान में अब वामदलों की राजनीति चुक सी गई है और उनके कार्यालयों में एक अजब वीरानापन सा है. लेकिन इसके बावजूद अमराराम के जिद्दी संघर्षों ने सीकर में वामपंथ का परचम लहाराया है.
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