आंखों के सामने छुपी हुई... मुंबई की आर्ट डेको शैली की इमारतों में क्या है ख़ास

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- Author, निखिल इनामदार
- पदनाम, बीबीसी न्यूज़, मुंबई
1925 में पेरिस में हुई एक मशहूर आर्किटेक्चर प्रदर्शनी में पहली बार आर्ट डेको स्टाइल ने सबका ध्यान खींचा था.
तब से, पिछले 100 सालों में, नियोन लाइट वाले जैज़ बार और बड़ी फिल्मों के सुनहरे दौर की याद दिलाने वाला यह ग्लैमरस बिल्डिंग स्टाइल पूरी दुनिया में फैल गया.
मियामी के साउथ बीच के मशहूर पेस्टल रंगों वाले होटलों से चलकर यह मुंबई के मरीन ड्राइव के समुद्र किनारे फैले आलीशान अपार्टमेंट्स तक पहुंच गया.
आर्ट डेको की ख़ास पहचान रही - ज्योमैटेरी के डिज़ाइन वाले ज़िगुरैट (सीढ़ीनुमा टावर), गोल घुमावदार आकृतियां, सूरज की किरणों जैसे पैटर्न, समुद्री थीम और गोल या बुर्ज़नुमा छतें. यह स्टाइल पुराने समय से अलग होने का एक साफ़ ऐलान था और युद्ध के बाद के नए, बेबाक, आधुनिक युग का प्रतीक था.
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थोड़े ही समय में यह स्टाइल सिर्फ़ इमारतों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि घरों के इंटीरियर, फर्नीचर,फॉन्ट, ज्वैलरी और दुनिया के मशहूर सिनेमा हॉल्स तक पहुंच गया- जैसे न्यूयॉर्क का रेडियो सिटी म्यूज़िक हॉल और मुंबई के रीगल, लिबर्टी और इरोस सिनेमा.
'उम्मीद, आशावाद और तेज़ी का प्रतीक'

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आर्ट डेको मुंबई ट्रस्ट के संस्थापक और आर्ट डेको की शताब्दी पर शहर में लग रही एक नई प्रदर्शनी के क्यूरेटर अतुल कुमार ने बीबीसी से कहा, "यह उम्मीद, आशावाद और तेज़ी का प्रतीक था. उस समय मोटर कार का दौर शुरू हो रहा था और कंक्रीट एक नया बिल्डिंग मैटेरियल बन गया था, जो पत्थर की तुलना में दस गुना जल्दी तैयार होने वाला और पांच गुना सस्ता था."
वह कहते हैं, "यह विक्टोरियन गोथिक डिज़ाइन जितना भारी-भरकम नहीं था. इसमें क्लासिक लुक और सादगी थी, जो समय की कसौटी पर खरी उतरी."
और यह बात सबसे ज़्यादा नज़र आती है मुंबई में, जो कुमार के अनुसार, दुनिया में आर्ट डेको इमारतों का सबसे बड़ा दस्तावेज़ी संग्रह रखने वाला शहर माना जाता है. वैसे कुछ अनुमान इसे मियामी के बाद दूसरे स्थान पर रखते हैं."
मुंबई का आर्ट डेको से रिश्ता इसलिए खास है क्योंकि इस शहर ने इसे पूरी तरह अपनाया.
मियामी की तरह, यह स्टाइल मुंबई में उस समय आया जब शहर आर्थिक उतार-चढ़ाव और बदलाव के दौर से गुजर रहा था जिसके पीछे इसकी आधुनिक, व्यापारिक बंदरगाह के शहर वाली ऊर्जा थी.
कुमार कहते हैं, "लेकिन मियामी में जहां यह सिर्फ़ ऐशो-आराम और दिखावे का प्रतीक था, वहीं मुंबई में यह स्टाइल स्कूलों, सिनेमा हॉल, बंगलों, पेट्रोल पंपों और बैंकों तक सब में फैल गया."
'सांस्कृतिक अहमियत से अनजान'

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मुंबई में आर्ट डेको की इमारतें आज भी मौजूद हैं, लेकिन अक्सर लोग उनकी सांस्कृतिक अहमियत से अनजान रहते हैं. फिर भी, इन इमारतों की मौजूदगी इतनी गहरी है कि यह मुंबई की पहचान और भावनाओं का हिस्सा बन गई है.
मुम्बई में आर्ट डेको इमारतें पहले, और आज भी, आमतौर पर छिपी सी रहती हैं. यहां तक कि उनमें रहने वाले लोग भी अक्सर उनकी सांस्कृतिक जड़ों से अनभिज्ञ रहते हैं.
कुमार कहते हैं कि शहर पर उनकी सभी जगह मौजूद स्थापत्य कला की छाप ही शायद वह कारण है जिसके कारण आर्ट डेको "व्यापक जन कल्पना में बसा हुआ है, और मुंबई के भावनात्मक जुड़ाव में उसकी अहमियत बनी हुई है".
यह स्टाइल मुंबई में उस समय आया जब भारत पर औपनिवेशिक शासन था.
भारत के वास्तुकारों या आर्किटेक्ट्स के पहले समूह- जैसे चिमनलाल मास्टर, लक्ष्मण विष्णु साठे और गोपालजी मुलजी भुटा- लंदन के रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ ब्रिटिश आर्किटेक्ट्स से पढ़ाई करके लौटने के बाद- इसे अपने डिज़ाइन में शामिल करने लगे.
आर्ट डेको का भारतीयकरण

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अतुल कुमार कहते हैं, "अचानक उनका सामना नई यूरोपीय अनुभूतियों से हुआ था और वह उन्हें अपने देश में वापस लाना चाहते थे, जो विक्टोरियन इमारतों के थोपे जाने से बहुत ज़्यादा उपनिवेश लगने लगा था."
लेकिन उन्होंने आर्ट डेको को अपनाया और उसे स्थानीय भाषा में ढाला, इसमें देसी डिजाइन पैटर्न को शामिल किया, और मुंबई के बंदरगाहों पर खड़े समुद्री जहाजों, यहां तक कि मुगल वास्तुकला के विशिष्ट जालीदार परदे सहित विभिन्न स्थानीय तत्वों से प्रेरणा ली.
ब्रिटिश शुरू में इसे खारिज कर रहे थे और आर्ट डेको को "निम्नस्तरीय वास्तुकला" कह रहे थे. लेकिन, कुमार कहते हैं कि वे संभवतः इससे भयभीत थे, क्योंकि यह एक नए युग और नई पहचान के उदय का संकेत था, जो भारत के सार्वजनिक स्थलों को बदल रहा था.
यह केवल समय की बात थी कि दक्षिण मुंबई का क्षितिज भारतीय-अरबी, गोथिक और आर्ट डेको इमारतों का एक समृद्ध संगम बन जाए.
बदलाव से ख़तरा

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आज मुंबई फिर से तेज़ बदलाव के दौर में है. बिल्डिंग कोड रियल एस्टेट डेवलपर्स के हिसाब से तय हो रहे हैं, जो फ्लोर स्पेस इंडेक्स बढ़ाने पर ध्यान दे रहे हैं. नतीजा यह है कि स्टाइल की बजाय उपयोगिता को प्राथमिकता दी जा रही है.
आज, मुंबई एक बार फिर तेजी से बदलाव का शहर है - इसकी भवन निर्माण संहिता को रियल एस्टेट के दिग्गज संचालित कर रहे हैं, जो फ्लोर स्पेस इंडेक्स को अधिकतम करने की कोशिश में हैं. उनके लिए प्राथमिकता उपयोगिता है, शैली या स्टाइल नहीं.
कई आर्ट डेको इमारतें तोड़कर कांच और स्टील की ऊंची इमारतें बनाई जा रही हैं और सैकड़ों और खतरे में हैं.
पिछले दस सालों में अतुल कुमार ने 1,500 से ज़्यादा ऐसी इमारतों को डॉक्यूमेंट किया है जो इस स्टाइल की असली पहचान हैं, लेकिन इनमें से सिर्फ़ 70 के आसपास ही संरक्षित हैं.

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सरकारी तंत्र को इन इमारतों के सरंक्षण में कोई रुचि नहीं है इसलिए उनकी संस्था सीधे लोगों से जुड़ रही है. वे मुफ़्त में मरम्मत और बहाली और जीर्णोद्धार का प्रस्ताव देते हैं ताकि लोग अपनी प्रॉपर्टी रीडेवलेप करने के लिए बिल्डरों को न दे दें.
कुमार कहते हैं कि, "लोगों का रिस्पॉन्स अच्छा रहा है क्योंकि रेनोवेशन के बाद उनकी प्रॉपर्टी की कीमत बढ़ जाती है."
इसके अलावा, कुछ लोग जैसे कि आर्किटेक्ट और डिज़ाइनर निधि टेकवानी आर्ट डेको ऑब्जेक्ट्स को नए अंदाज़ में पेश कर रही हैं और उन्हें आज के समय के हिसाब से ढालने की कोशिश कर रही हैं.
उदाहरण के लिए, आर्ट डेको फर्नीचर पहले बहुत भारी होता था, इसकी लाइट फिटिंग ऊंची छतों के लिए बनाई जाती थी, और ड्रेसिंग टेबल आज के छोटे अपार्टमेंट्स के लिए बहुत बड़ी होती थीं. निधि का लक्ष्य ऐसे प्रोडक्ट डिज़ाइन करना है जो पतले और कॉम्पैक्ट हों, लेकिन आर्ट डेको की मूल भावना को बनाए रखें.
एक ऐसे शहर में जो पलक झपकते ही बदल रहा है, टेकवानी आर्ट डेको को एक जीवंत परंपरा बनाए रखने की कोशिश कर रही हैं. वह कहती हैं, "आशा है कि इसे आधुनिक रूप दिया जा सकेगा और यह हमारी मौजूदा जीवनशैली की ज़रूरतों के अनुकूल होगा."
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.












