लकड़ी के खंभों का वो सिस्टम जिसने इस शहर को 1600 साल से धंसने से बचा रखा है

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- Author, अन्ना ब्रेस्सनीन
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
हर स्थानीय व्यक्ति जानता है कि वेनिस असल में उल्टा जंगल है.
1604 साल पुराना यह शहर लाखों छोटे लकड़ी के खंभों की नींव पर बना है, जिन्हें ज़मीन में इस तरह गाड़ा गया है कि उनकी नुकीली नोक नीचे की ओर हो.
लार्च, ओक, एल्डर, पाइन, स्प्रूस और एल्म जैसे पेड़ों की लकड़ियों से बने ये खंभे, जिनकी लंबाई 3.5 मीटर (क़रीब 11.5 फ़ीट) से लेकर एक मीटर (3 फ़ीट) से भी कम होती है, सदियों से पत्थर के महलों और ऊंचे घंटाघरों को संभाले हुए हैं.
यह इंजीनियरिंग का ऐसा अद्भुत उदाहरण है जिसमें प्रकृति और भौतिकी (फ़िज़िक्स) की ताक़तों का बेहतरीन इस्तेमाल किया गया है.
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आजकल की आधुनिक इमारतों में जहां मज़बूत नींव के लिए स्टील और कंक्रीट का इस्तेमाल किया जाता है, वहीं यह 'उल्टा जंगल' सदियों से वेनिस को थामे हुए है.
आज की ज़्यादातर नींव वेनिस जितने लंबे समय तक नहीं टिक सकतीं.
स्विट्ज़रलैंड की ईटीएच यूनिवर्सिटी में जियोमैकेनिक्स और जियोसिस्टम इंजीनियरिंग के प्रोफे़सर अलेक्ज़ांडर प्यूज़्रिन कहते हैं, "आजकल कंक्रीट या स्टील की नींव लगभग 50 साल तक टिकने की गारंटी के साथ बनाई जाती हैं. ज़रूर, वे इससे ज़्यादा भी चल सकती हैं, लेकिन जब हम घर या औद्योगिक ढांचे बनाते हैं, तो मानक यही होता है- 50 साल की उम्र."
वेनिस की लकड़ी की नींव की तकनीक अपनी बनावट, सदियों तक टिके रहने की क्षमता और अपने विशाल पैमाने के कारण बेहद रोचक है.
किसी को ठीक-ठीक नहीं पता कि शहर के नीचे कुल कितने खंभे हैं, लेकिन सिर्फ़ रियाल्टो ब्रिज के नीचे ही 14 हज़ार लकड़ी के खंभे गड़े हुए हैं और सन् 832 में बनी सेंट मार्क बेसिलिका के नीचे 10 हज़ार ओक के पेड़ इस्तेमाल हुए थे.

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खंभे कैसे लगाए गए?
वेनिस की इमारतों की नींव बनाने के लिए लकड़ी के खंभे जितना गहराई तक जा सकते थे, उतने नीचे तक गाड़े गए थे.
यह काम ढांचे के बाहरी हिस्से से शुरू होकर केंद्र की ओर बढ़ता था. आमतौर पर एक वर्ग मीटर में नौ खंभे गोलाकार (स्पाइरल) पैटर्न में गाड़े जाते थे.
इसके बाद खंभों के सिरों को काटकर उन्हें एक समान सतह में बदल दिया जाता था, जो समुद्र के स्तर से नीचे होती थी.
फिर इस पर लकड़ी की क्षैतिज (हॉरिज़ॉन्टल) संरचनाएं रखी जाती थीं - इन्हें ज़त्तेरोनी (लकड़ी की पट्टियां) या मादीएरी (बीम) कहा जाता था.
इसके ऊपर इमारतों के पत्थर रखे जाते थे.
वेनिस गणराज्य ने जल्द ही अपने जंगलों की रक्षा शुरू कर दी ताकि निर्माण और जहाज़ बनाने के लिए पर्याप्त लकड़ी उपलब्ध रहे.
इटली के नेशनल काउंसिल फॉर रिसर्च के बायोइकोनॉमी इंस्टीट्यूट के रिसर्च डायरेक्टर निकोला मक्कियोनी बताते हैं, "वेनिस ने पेड़ों की खेती यानी सिल्वीकल्चर की अवधारणा ही ईजाद की थी."
वेनिस अकेला शहर नहीं है जो अपनी नींव के लिए लकड़ी के खंभों पर निर्भर है लेकिन कुछ ख़ास बातें हैं जो इसे अनोखा बनाती हैं.
एम्सटर्डम भी ऐसा ही एक शहर है जो आंशिक रूप से लकड़ी के खंभों पर बना है.
वहां (और उत्तरी यूरोप के कई शहरों में) ये खंभे सीधा नीचे तक जाकर ठोस चट्टान (बेडरॉक) को छूते हैं और लंबे स्तंभों या टेबल के पैरों की तरह काम करते हैं.
अमेरिका के इलिनॉय विश्वविद्यालय में आर्किटेक्चर के प्रोफे़सर थॉमस लेस्ली कहते हैं, "यह तरीक़ा तब ठीक है जब चट्टान सतह के क़रीब हो."
वह बताते हैं कि मिशिगन झील के किनारे, जहां वह रहते हैं, वहां चट्टान ज़मीन से क़रीब 100 फीट (30 मीटर) नीचे है.
थॉमस लेस्ली बताते हैं, "इतने लंबे पेड़ ढूंढना मुश्किल होता है. कहा जाता है कि 1880 के दशक में शिकागो में लोगों ने एक पेड़ के तने के ऊपर दूसरा तना रखकर नींव बनाने की कोशिश की थी, लेकिन आप समझ सकते हैं कि इस तरीक़े ने काम नहीं किया. आख़िरकार उन्हें पता चला कि असली ताक़त मिट्टी और खंभों के बीच बनने वाले घर्षण (फ्रिक्शन) में है."
इस सिद्धांत का आधार है मिट्टी को मज़बूत बनाना- जितने ज़्यादा खंभे एक जगह गाड़े जाएंगे, उतना ही ज़्यादा घर्षण पैदा होगा और इमारत की नींव मज़बूत होगी.

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इस तकनीक को वैज्ञानिक रूप से हाइड्रोस्टैटिक प्रेशर कहा जाता है.
थॉमस लेस्ली के अनुसार, जब बहुत सारे खंभे पास-पास गाड़े जाते हैं, तो मिट्टी उन्हें कसकर पकड़ लेती है.
वेनिस की लकड़ी की नींव भी इसी सिद्धांत पर काम करती है- ये खंभे ठोस चट्टान तक नहीं पहुंचते, बल्कि मिट्टी के घर्षण की वजह से इमारतों को थामे रखते हैं. यह तरीक़ा बहुत पुराना है.
पहली सदी के रोमन इंजीनियर और वास्तुकार विट्रुवियस ने भी इस तकनीक का ज़िक्र किया था- रोमन लोग पुल बनाने के लिए पानी में डूबे लकड़ी के खंभों का इस्तेमाल करते थे.
चीन में भी वॉटर गेट्स इसी तकनीक से बनाए जाते थे.
एज़्टेक लोगों ने मैक्सिको सिटी में यही तरीक़ा अपनाया था, जब तक कि स्पेनिश विजेताओं ने उनकी प्राचीन नगरी को तोड़कर उसी जगह कैथोलिक कैथेड्रल नहीं बना दिया.
प्यूज़्रिन बताते हैं, "एज़्टेक अपने पर्यावरण में निर्माण करना स्पेनिश लोगों से कहीं बेहतर जानते थे. स्पेनिश लोगों ने बाद में जो कैथेड्रल बनाया, वह अब असमान रूप से धंस रहा है."
वह ईटीएच में एक कक्षा पढ़ाते हैं जिसमें मशहूर भू-तकनीकी (जिओ-टेक्निकल) विफलताओं का अध्ययन किया जाता है.
उनके मुताबिक़, "मैक्सिको सिटी का यह कैथेड्रल और पूरी मैक्सिको सिटी नींव से जुड़ी हर ग़लती का जीवंत उदाहरण है."

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लकड़ी सड़ती क्यों नहीं?
डेढ़ हज़ार साल से ज़्यादा पानी में रहने के बाद भी वेनिस की नींव अब तक मज़बूती से टिकी हुई है. हालांकि यह पूरी तरह से नुक़सान रहित नहीं है.
करीब 10 साल पहले, पादोवा और वेनिस विश्वविद्यालयों की एक टीम (जिसमें फॉरेस्टी, इंजीनियरिंग और सांस्कृतिक धरोहर विभाग शामिल थे) ने शहर की नींव की स्थिति का अध्ययन किया.
उन्होंने 1440 में बनी फ्रारी चर्च के घंटाघर से जांच शुरू की, जो एल्डर लकड़ी के खंभों पर बना है.
फ्रारी घंटाघर हर साल लगभग 1 मिलीमीटर (0.04 इंच) धंसता जा रहा है- यानी अब तक क़रीब 60 सेंटीमीटर (24 इंच) नीचे जा चुका है.
मक्कियोनी बताते हैं कि चर्च या अन्य इमारतों के मुक़ाबले घंटाघरों का वज़न कम क्षेत्र में केंद्रित होता है, इसलिए वे ज़्यादा तेज़ी से धंसते हैं - बिलकुल ऊंची एड़ी वाले जूते की तरह.
टीम ने पाया कि लकड़ी में कुछ नुक़सान तो हुआ है (यह बुरी ख़बर थी), लेकिन पानी, मिट्टी और लकड़ी का मिला-जुला सिस्टम अब भी इसे संभाले हुए है (यह अच्छी ख़बर थी).
उन्होंने यह मिथक भी तोड़ा कि लकड़ी इसलिए नहीं सड़ती क्योंकि वह ऑक्सीजन-रहित (एनेरोबिक) स्थिति में है.
दरअसल, बैक्टीरिया लकड़ी पर हमला करते हैं, भले ही वहां ऑक्सीजन न हो. लेकिन बैक्टीरिया का असर फफूंद और कीड़ों की तुलना में बहुत धीमा होता है, जो ऑक्सीजन की मौजूदगी में सक्रिय रहते हैं.
इसके अलावा, पानी लकड़ी की उन कोशिकाओं (सेल्स) को भर देता है जिन्हें बैक्टीरिया ख़ाली कर देते हैं, इससे लकड़ी का आकार बना रहता है.
टीम के सदस्य इज़्ज़ो कहते हैं, "क्या चिंता की कोई बात है? हां और नहीं दोनों. लेकिन इस तरह का शोध जारी रहना चाहिए."
वे बताते हैं कि दस साल पहले सैंपल लिए जाने के बाद अब तक नए नमूने नहीं जुटाए गए हैं, क्योंकि यह प्रक्रिया बहुत कठिन है.
मक्कियोनी कहते हैं, "हमें नहीं पता कि ये नींव और कितनी सदियों तक चलेंगी, लेकिन जब तक पर्यावरण जैसा है वैसा बना रहेगा, वे टिकी रहेंगी. यह सिस्टम इसलिए काम करता है क्योंकि यह लकड़ी, मिट्टी और पानी- इन तीनों का कॉम्बिनेशन है."
मिट्टी ऑक्सीजन को दूर रखती है, पानी लकड़ी की कोशिकाओं का आकार बनाए रखता है और लकड़ी इमारत को थामे रखने के लिए ज़रूरी घर्षण देती है.
'बेहद ख़ूबसूरत'
19वीं और 20वीं सदी में नींव बनाने के लिए लकड़ी की जगह पूरी तरह सीमेंट ने ले ली थी.
लेकिन हाल के वर्षों में लकड़ी से निर्माण का चलन फिर से बढ़ा है- यहां तक कि अब लकड़ी से गगनचुंबी इमारतें भी बनाई जा रही हैं.
प्रोफे़सर थॉमस लेस्ली कहते हैं, "आज लकड़ी को फिर से एक बेहद ख़ास और आधुनिक सामग्री के रूप में देखा जा रहा है और इसके पीछे वाजिब वजहें हैं."
लकड़ी कार्बन को सोखती है, यह प्राकृतिक रूप से नष्ट हो जाती है और अपनी लचीली संरचना की वजह से इसे भूकंप-रोधी सामग्रियों में से एक माना जाता है.
वेनिस अकेला ऐसा शहर नहीं है जिसकी नींव लकड़ी पर टिकी है,
प्रोफे़सर प्यूज़्रिन कहते हैं, "लेकिन यह एकमात्र ऐसा शहर है जहां यह घर्षण-आधारित तकनीक बड़े पैमाने पर इस्तेमाल हुई और जो आज भी पूरी तरह सुरक्षित और अविश्वसनीय रूप से सुंदर है."
उनका कहना है, "इन इमारतों को उन लोगों ने बनाया था जिन्होंने न सॉइल मेकैनिक्स पढ़ी थी, न ही भू-तकनीकी (जिओ-टेक्निकल) इंजीनियरिंग. फिर भी उन्होंने ऐसा कुछ बना दिया जिसके बारे में हम आज सिर्फ़ सपना देख सकते हैं और जो इतने लंबे समय तक टिक सका."
*इस कहानी में इस्तेमाल की गई तस्वीरें केवल कलात्मक उद्देश्य से बनाई गई हैं. वेनिस की असली नींव में लकड़ी के खंभे बहुत घने लगाए गए हैं और उनमें शाखाएं नहीं होतीं.
बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित
















