पीएम नरेंद्र मोदी ने लाल क़िले से जो कहा, लोकसभा चुनाव से पहले उन दावों में कितना दम?

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- Author, दिलनवाज़ पाशा
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
77वें स्वतंत्रता दिवस के मौक़े पर नरेंद्र मोदी ने भारत के प्रधानमंत्री के रूप में दसवीं बार लाल क़िले से भाषण दिया.
उन्होंने देशवासियों को ‘परिवारजन’ कहकर संबोधित किया और परिवारवाद पर चोट की, अपनी सरकार की उपलब्धियाँ गिनाईं, भारत के सामने खड़ी चुनौतियों पर बात की और देश के लोगों को कई बड़े सपने दिखाए.
ये अगले लोकसभा चुनाव से पहले प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी का लाल किले से अंतिम भाषण था.
प्रधानमंत्री ने ये भी स्पष्ट रूप से कहा कि वो अगली बार भी यहीं खड़े होकर भाषण देंगे, यानी वो लोकसभा चुनाव जीतकर फिर वापस आएँगे.

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विश्लेषक मानते हैं कि इस भाषण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने स्पष्ट राजनीतिक संदेश दिए.
वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव कहते हैं, “उन्होंने अगले चुनाव को ध्यान में रखकर घोषणाएँ की और जैसा कि उनका स्वभाव है, बड़े सपने दिखाने का. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हमेशा ही एक विशाल, आकर्षक और लुभावना विज़न सामने रखते हैं और उन्होंने ऐसा ही किया भी, और बहुत प्रभावी और ऊर्जावान ढंग से किया. इसमें कोई शक नहीं है कि उनकी भाषण शैली बहुत प्रभावी है.”
लोकसभा चुनावों से पहले पीएम मोदी को इतना भरोसा होने पर राहुल देव कहते हैं, “कोई भी योद्धा हो, वो रण में विश्वास के साथ ही उतरता है, लेकिन एक प्रधानमंत्री के रूप में उनके औचित्य पर विचार करने की गुंज़ाइश है. वो किसी चुनावी रण में नहीं थे, एक प्रधानमंत्री के रूप में बोल रहे थे, वो चाहते तो इस शैली से बच सकते थे.”
वरिष्ठ पत्रकार नीरजा चौधरी भी मानती हैं कि प्रधानमंत्री मोदी के भाषण से ये स्पष्ट हो गया है कि अगला चुनाव मोदी बनाम अन्य होगा.
नीरजा कहती हैं, “मोदी एक अच्छे वक्ता तो हैं ही. 10 साल बाद भी एक प्रधानमंत्री के रूप में उनका लोकप्रिय होना और इस भरोसे के साथ ये कह पाना कि वो अगले साल फिर पीएम होंगे और झंडा लहराएँगे, ये बड़ी बात है. उनके भाषण से आज ये स्पष्ट हो गया है कि अगला चुनाव नरेंद्र मोदी बनाम अन्य होगा.”
लाल किले से राजनीति?

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लेकिन ये सवाल भी उठ रहा है कि क्या राष्ट्र के नाम संदेश को एक राजनीतिक संदेश बनाना उचित है.
प्रधानमंत्री के भाषण पर वरिष्ठ पत्रकार हेमंत अत्री कहते हैं, “लाल क़िले की प्राचीर पर जो 70 साल में पारंपरिक भाषण दिए जाते हैं, उससे अलग था. ये पूरा चुनावी भाषण था और पीएम मोदी चुनावी मोड में आ चुके हैं. बोलते हुए पीएम मोदी भूल जाते हैं कि वे लाल क़िले से बोल रहे हैं, संसद में बोल रहे हैं या फिर किसी पार्टी या राजनीतिक रैली में बोल रहे हैं.
उनके लिए हर भाषण का मतलब वोट मांगना है. ये पहले कभी नहीं देखा गया. आज उन्होंने कमाल कर दिया कि अभी चुनाव नहीं हुए और उन्होंने एलान कर दिया कि वे अगली बार लाल क़िले पर झंडा फहराएँगे. इस तरह की चीज़ पहले कभी नहीं हुई. ये बहुत पवित्र अवसर होता है. यहाँ पर आप पिछले काम की उपलब्धि गिनवाते हैं और आगे का रोडमैप बताते हैं.”
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भाषण में विपक्ष को भी निशाने पर लिया. पीएम मोदी ने अपने भाषण में विपक्षी दलों के गठबंधन 'इंडिया' और कांग्रेस पर भी बिना नाम लिए तंज़ कसा.
परिवारवाद का ज़िक्र करते हुए पीएम मोदी ने कहा, ''देश के लोकतंत्र में एक बीमारी आई है- परिवारवादी पार्टी. इनका एक ही मंत्र है- परिवार को, परिवार के लिए, परिवार के द्वारा.''
वो बोले- ''देश के विकास के लिए ज़रूरी है कि इनसे मुक्ति मिले. समाजिक न्याय को किसी ने तबाह किया है तो वो तुष्टिकरण ने किया है.''
हालांकि वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव मानते हैं कि प्रधानमंत्री ने विपक्ष पर ऐसा तीखा हमला नहीं किया जैसा वो करते रहे हैं.
राहुल देव कहते हैं, “लाल क़िले से दिए गए भाषण में विपक्ष के लिए ऐसी कटुता प्रधानमंत्री मोदी की भाषा में नहीं थी जैसे उन्होंने संसद में अविश्वास प्रस्ताव के जवाब में दिए भाषण में दिखाई थी, लेकिन ये ज़ाहिर है कि उन्हें विपक्ष की आलोचना तो करनी ही थी. कांग्रेस या विपक्ष का प्रधानमंत्री होता तो वह भी आलोचना करता ही.”
इस सवाल को खारिज करते हुए राजनीतिक विश्लेषक और दिल्ली यूनिवर्सिटी में प्रोफ़ेसर संगीत रागी कहते हैं, "इस भाषण को राजनीति बताना देखने का एक नज़रिया है. उनके विरोधियों को ये बातें राजनीतिक एजेंडा ही लगेंगी.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ एक बेहद आक्रामक विपक्ष है जो बेरोज़गारी, पिछले नौ-साल के कामकाज के सवाल उठाता है और बेतुकी बातें करता है.
लेकिन तथ्य ये है कि भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में है और जल्द ही पाँच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने जा रहे हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण के एक हिस्से में इसी आलोचना का जवाब दिया है."
‘भ्रष्टाचार, परिवारवाद और तुष्टीकरण’’

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तर्क दिया कि 2047 में भारत को एक विकसित राष्ट्र बनाने के लिए ईमानदारी, पारदर्शिता और निष्पक्षता ज़रूरी है.
उन्होंने भ्रष्टाचार, परिवारवाद और तुष्टीकरण को देश की सबसे बड़ी बुराई बताया और कहा कि इन्हें देश से ख़त्म करने की ज़रूरत है.
इस भाषण से ये तय हो गया है कि आगामी चुनाव में भ्रष्टाचार, परिवारवाद और तुष्टीकरण बीजेपी के मुद्दे होंगे.
इससे पहले भी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लाल क़िले से अपने भाषणों में भ्रष्टाचार और परिवारवाद पर चोट करते रहे हैं.
पिछले साल दिए अपने भाषण में भी उन्होंने भ्रष्टाचार और परिवारवाद को देश की सबसे बड़ी चुनौती बताया था.
राहुल देव कहते हैं, “ये उचित होता कि ये कहते समय ये ध्यान रखा जाता कि इससे पहले जिन्हें वो स्वयं भ्रष्टाचारी बता रहे थे, 70 हज़ार करोड़ के भ्रष्टाचार का आरोप लगा रहे थे, उन्हें अपनी पार्टी में लिया और उनकी पार्टी में भी और सरकार में भी ऐसे लोग हैं जिन पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लग चुके हैं, जब वो दूसरी पार्टी में थे. ये कैसी बात है कि उनकी पार्टी में आते ही सभी भ्रष्टाचारी नहीं रहते हैं.”
“परिवारवाद की बात करें तो ये भी देखा जाए कि प्रधानमंत्री के सत्ताधारी गठबंधन में जो पार्टियां हैं उनमें से कितनी खुले तौर पर परिवारवादी हैं. अगर वो परिवारवाद के ख़िलाफ़ कटुता दिखा रहे हैं तो उन्हें स्वयं के आचरण में भी ये दिखाना चाहिए और ये साबित करना चाहिए कि वो इन कसौटियों को अपने आप और अपनी पार्टी और सरकार पर भी सख़्ती से लागू करते हैं और किसी भी ऐसे व्यक्ति को अपने साथ नहीं रखेंगे जो भ्रष्ट या परिवारवादी है.”

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ये सवाल भी उठता है कि क्या परिवारवाद पर चोट करने की बात करना एक खोखला दावा है.
हेमंत अत्री कहते हैं, “ वे परिवारवाद की बात करते हैं, लेकिन आज उनके सामने अनुराग ठाकुर बैठे थे, अमित शाह बैठे हुए, उनके बेटे जय शाह बीसीसीआई में हैं. राजनाथ सिंह बैठे थे जिनके बेटे विधायक हैं. तमाम ऐसे लोग थे जो परिवारवाद का प्रोडक्ट हैं.”
प्रधानमंत्री ने जिस परिवारवाद की बात की उसकी व्याख्या करते हुए संगीत रागी कहते हैं, "पारिवारिक पार्टी होने और परिवार के किसी सदस्य के राजनीति में आने से अंतर है.
प्रधानमंत्री किसी एक नेता के बेटे या परिजन के राजनीति में आने की बात नहीं कर रहे थे बल्कि वो उन राजनीतिक पार्टियों की बात कर रहे थे जो एक परिवार के इर्द-गिर्द ही खड़ी हैं."
रागी कहते हैं, " मुलायम सिंह यादव की पार्टी, लालू प्रसाद यादव की पार्टी, नवीन पटनायक की पार्टी, उद्धव ठाकरे की शिवसेना, शरद पवार की एनसीपी, ये सभी पार्टियाँ इसी परिवारवाद का उदाहरण हैं."
हालांकि भाजपा की कई ऐसी सहयोगी पार्टियां है जो किसी एक परिवार या नेता पर ही केंद्रित हैं. चिराग पासवान, ओम प्रकाश राजभर, अनुप्रिया पटेल जैसे कई नेता इसके उदाहरण है.
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संगीत रागी ऐसे नेताओं को साथ लेने को बीजेपी की मजबूरी बताते हुए कहते हैं, “भाजपा ने 2014, 2019 और अब आगामी चुनाव में सामाजिक समीकरणों को तवज्जो दी है. जिस आदर्श राजनीति की हम कल्पना करते हैं उसे ज़मीन पर नहीं किया जा सकता. भाजपा के लिए नतीजे अधिक महत्वपूर्ण हैं.
जिन परिवारवादी पार्टियों की बात की जा रही है उन्हें साथ रखना भाजपा की राजनीतिक मजबूरी है, लेकिन इसका मतलब ये नहीं है कि भाजपा का अंतिम लक्ष्य इन्हें बढ़ावा देना है.”
भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ पीएम मोदी क्या बोले
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भ्रष्टाचार के ख़िलाफ़ बोलते रहे हैं. इससे पहले उन्होंने चर्चित जुमला दिया था- ‘ना खाऊंगा और ना खाने दूंगा’.
लाल क़िले से अपने पुराने भाषणों में भी वो ‘कांग्रेस के दौर के भ्रष्टाचार’ की बात करते रहे हैं.
नीरजा चौधरी कहती हैं, “प्रधानमत्री भ्रष्टाचार की बात करते हैं, हाल ही में आई सीएजी की रिपोर्ट ने कई घोटालों का ज़िक्र किया है. प्रधानमंत्री रोज़गार को लेकर बड़ी बातें करते हैं लेकिन आज भी बेरोज़गारी चरम पर है. देश में टमाटर ढाई सौ रुपये किलो तक बिका है, ऐसे में ये साफ़ है कि बड़ी-बड़ी बातों और ज़मीनी सच्चाई में फर्क है.”
हेमंत अत्री भी मानते हैं कि प्रधानमंत्री ने भ्रष्टाचार रोकने के लिए कुछ ठोस नहीं किया है.
अत्री कहते हैं, “पीएम मोदी ने भ्रष्टाचार की बात की, लेकिन सीएजी ने इस बार भ्रष्टाचार की पोल खोली है. कई अखबारों ने इसे कवर किया है. भारत माला प्रोजेक्ट में 75 हजार किलोमीटर सड़क बन रही है, जिसमें प्रति किलोमीटर दस करोड़ करोड़ रुपए ज़्यादा ख़र्च है. आयुष्मान भारत में एक नंबर से कई कई लाख लोग जुड़े हुए हैं. पीएम के प्रचार पर कितना ख़र्च हो रहा है उस पर नहीं बोले.”

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नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में तुष्टीकरण को बुराई बताते हुए इसे भारत के राष्ट्रीय चरित्र पर दाग़ कहा है.
तुष्टीकरण का मतलब होता है किसी एक ख़ास वर्ग को ख़ुश करने के लिए नीतियाँ बनाना और राजनीतिक क़दम उठाना.
राहुल देव कहते हैं, “तुष्टीकरण की बात करके प्रधानमंत्री ने सीधा निशाना देश के अल्पसंख्यकों, ख़ासकर मुसलमानों को बनाया है. जनसंघ के समय से ही तुष्टीकरण का मुद्दा उठाया जाता रहा है और ये शब्द उनके ध्येय वाक्य जैसा रहा है. उन्होंने अल्पसंख्य शब्द का इस्तेमाल तो नहीं किया लेकिन इशारा उनका स्पष्ट था. अगर वो इससे बचते तो ये कम विभाजक बात होती.”
संगीत रागी मानते हैं कि प्रधानमंत्री ने भारतीय राजनीतिक व्यवस्था में चले आ रहे तुष्टीकरण की बात करके एक बड़ा काम किया है.
संगीत रागी कहते हैं, "प्रधानमंत्री का इशारा मुसलमानों के तुष्टीकरण की तरफ़ था, उनके कहने का मतलब ये है कि जब आप एक समुदाय का तुष्टीकरण करते हैं तो सामाजिक न्याय को कमज़ोर करते हैं. 80 प्रतिशत पासमांदा मुसलमानों वंचित हैं. इस तुष्टीकरण की बात करके प्रधानमंत्री ने एक बड़े सवाल को उठाया है. देश की बड़ी जनसंख्या को ये लगता है कि धर्म-निरपेक्षता मुस्लिम तुष्टीकरण पर आकर खड़ी हो गई. जिस तुष्टीकरण ने भारत की राष्ट्रीय चेतना और सामाजिक न्याय को कमज़ोर किया है प्रधानमंत्री उसी की बात कर रहे थे."
रागी कहते हैं, "मोदी अगर मंदिर जाते हैं तो पसमांदा मुसलमानों के पास भी जाते हैं, अहमदिया मुसलमानों के पास भी जाते हैं, मध्य पूर्व जाते हैं तो वो मस्जिद भी जाते हैं."
बड़े-बड़े सपनों वाला भारत

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पीएम मोदी ने कहा, ''मैं पसीना भी बहाता हूँ, तो आपके लिए बहाता हूँ. सपने भी देखता हूँ, तो आपके लिए देखता हूँ.''
वो कहते हैं- हमारे नसीब में देश के लिए मरने का मौक़ा नहीं है लेकिन हमारे लिए देश के लिए जीने से बड़ा कोई अवसर नहीं है. हमें पल-पल देश के लिए जीना है.
पीएम मोदी ने 2047 तक भारत को विकसित देश बनाने की बात कही और इसके लिए देश के लोगों का आशीर्वाद मांगा.
नीरजा चौधरी मानती हैं कि प्रधानमंत्री मोदी ने देश के लोगों के साथ उस भरोसे को बरकरार रखने की कोशिश की, जो सत्ता में आने के बाद उन्होंने बनाया है.
नीरजा कहती हैं, “प्रधानमंत्री ने लोगों को संबोधित करते हुए देशवासी नहीं बल्कि मेरे परिवारजनों कहा. प्रधानमंत्री के कहने का मतलब ये था कि देश ही उनका परिवार है और जो भी वो कर रहे हैं देश के लिए कर रहे हैं. उन्होंने ये भरोसा देने की कोशिश भी की कि मैं हूँ ना. चाहें जो भी हो मैं हूँ.”

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देश की अर्थव्यवस्था के बारे में पीएम मोदी ने दावा किया कि 10 साल में देश की अर्थव्यवस्था को 10वीं से उठाकर पाँचवीं अर्थव्यवस्था बनाया गया.
भारत को विकसित देश बनाने की बात करते हुए पीएम मोदी ने कहा, ''मैं आज आपसे कुछ मांगने आया हूं. 2047 में भारत का तिरंगा विकसित भारत का तिरंगा होना चाहिए. रत्तीभर भी पीछे नहीं हटना है. जो देश सोने की चिड़िया कहा जाता था, वो फिर से क्यों ना खड़ा हो जाए. 2047 में मेरा देश विकसित देश बनकर रहेगा. ये बात मैं अपने देश के संसाधनों, सामर्थ्य और 30 की उम्र से कम लोगों के दम पर कह रहा हूं.''
नीरजा चौधरी कहती हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी सत्ता में रहने के दस साल बाद भी इस भरोसे के साथ बात कर पा रहे हैं.
नीरजा चौधरी कहती हैं, “भविष्य का नज़रिया प्रधानमंत्री ने दिखाया है, सपने दिखाए हैं. ये बहुत ज़रूरी भी हैं क्योंकि इससे लोगों में उम्मीद बंधती हैं. प्रधानमंत्री लोगों में आशा और हिम्मत पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं. लेकिन ठीक इसी समय ये आईना दिखाना भी ज़रूरी है कि देश में आज आम व्यक्ति की, असंगठित क्षेत्र में काम कर रहे लोगों की, बेरोज़गारों की क्या स्थिति है. अगर प्रधानमंत्री ने बेरोज़गारी पर बात की होती, ये बताया होता कि वो इससे कैसे जुझेंगे तो और बेहतर होगा.”
नीरजा कहती हैं, “नरेंद्र मोदी की एक ख़ासियत है कि वो बड़े सकारात्मक तरीक़े से भव्य चीज़ों की बातें करते हैं. वो कहते हैं कि क्या हम देश की ग़रीबी को मिटा सकते हैं. आज का भाषण भी ऐसा ही था. उन्होंने युवाओं की बात की, महिलाओं की बात की. आम आदमी के मन में एक सवाल ज़रूर आएगा कि इन बड़ी-बड़ी बातों से क्या मेरी निजी ज़िंदगी में भी बदलाव आया है.”

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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने भाषण में कहा कि जब देश से ग़रीबी कम होती है तब मध्यम वर्ग की शक्ति बढ़ती है.
उन्होंने कहा, “मैं वादा करता हूँ कि भारत अगले पाँच सालों में दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होगा.”
पिछले साल एस एंड पी ग्लोबल और मोर्गन स्टेनली की रिपोर्ट में भारत की अर्थव्यवस्था के 2030 तक जापान और जर्मनी से आगे निकलने की उम्मीद ज़ाहिर की गई थी.
इन रिपोर्टों में कहा गया था कि भारत की आर्थिक प्रगति के पीछे विनिर्माण (उत्पादन) में निवेश, बढ़ता डिजीटल इंफ्रास्ट्रक्रर और ऊर्जा क्षेत्र में परिवर्तन है.

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भारत सरकार का अनुमान है कि इस साल विकास दर 6 से 6.5 प्रतिशत तक रहेगी. इसका मतलब ये है कि भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल रहेगा.
हालांकि विश्लेषक मानते हैं कि भारत का ये आर्थिक विकास देश में सभी लोगों तक समान रूप से नहीं पहुंच रहा है.
हेमंत अत्री कहते हैं, “140 करोड़ लोगों में से 83 करोड़ लोग फ्री अनाज पर जी रहे हैं. आपने आज कहा कि आज साढ़े तेरह करोड़ लोगों को ग़रीबी से बाहर निकाल दिया. अगर आप सरकारी आंकड़े देखेंगे तो वो कुछ और कह रहे हैं कि तीस करोड़ लोग दोबारा ग़रीबी के नीचे आ गए हैं. आज भारत जो विश्व में पाँचवीं सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति है उसका कारण है देश की डेमोग्राफी. ये देश बहुत बड़ा है. अमेरिका दुनिया की सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति है वहाँ प्रति व्यक्ति आय 80 हजार प्रति वर्ष और भारत में प्रति व्यक्ति सालाना आय ढाई हजार डॉलर है. अगर तीसरी भी आप बन जाएँगे और 83 करोड़ लोग फ्री अनाज पर जी रहे हैं तो उस महाशक्ति बनने का क्या मतलब है.”
हेमंत अत्री कहते हैं, “पीएम की समस्या है कि बड़ी बड़ी चीजें कहते हैं लेकिन जब परिणाम की बात आती है तो दिखाने के लिए कुछ नहीं होता. उदाहरण के लिए उन्होंने क्या आज बताया कि सवा नौ साल के शासन में कितने स्मार्ट सिटी बना दिए, कितने किसानों की आय दोगुनी कर दी. 2022 तक हर घर पर छत आनी थी. दो करोड़ रोजगार हर साल दिए जाने थे. कितने बुलेट ट्रेन चल पड़ीं. उन्होंने इसमें से कुछ नहीं बताया. ये हक़ीक़त है. पीएम ने ग़रीबी, भुखमरी, अन्याय, सांप्रदायिक दंगे पर बात नहीं की. चीन पर एक शब्द नहीं कहा.”
इस आलोचना को खारिज करते हुए रागी कहते हैं, “लोग बेरोज़गारी का सवाल उठाते हैं लेकिन जो परस्पर विकास प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार में हुआ है उसे नज़रअंदाज़ करते हैं. प्रधानमंत्री मोदी ने ग़रीबों को घर दिया है, शौचायल दिया है और पीने का साफ़ पानी दिया है. उन्होंने आम लोगों को सम्मानित जीवन दिया है. आज भारत पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था, सर्वाधिक विदेशी निवेश भारत आ रहा है.”
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