यूरोपीय संघ के लिए हंगरी की अध्यक्षता क्या मायने रखती है- दुनिया जहान

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हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ऑर्बन एक ऐसे यूरोपीय नेता हैं, जो अन्य यूरोपीय नेताओं की तुलना में यूरोपीय संघ के मूल्यों का सबसे कम पालन करते हैं.
उन्होंने यूरोपीय संघ की तरफ़ से रूस के ख़िलाफ़ लड़ाई में यूक्रेन का समर्थन करने के प्रस्ताव को वीटो कर दिया था.
इतना ही नहीं ऑर्बन ने जलवायु परिवर्तन से निपटने की नीतियों की आलोचना की और यूरोपीय संघ की माइग्रेशन पॉलिसी में सुधार का भी विरोध किया.
उन्हें नीतियों में अड़ंगा डालने वाले नेता के रूप में देखा जाने लगा है.
लेकिन 1 जुलाई 2024 से हंगरी को छह महीने के लिए यूरोपीय संघ परिषद की अध्यक्षता मिल गई है.
यूरोपीय संघ की परिषद की अध्यक्षता इसके सदस्यों को बारी-बारी से दी जाती है. इस परिषद में संघ के सदस्य देशों के मंत्री बैठक करते हैं, जिसमें कानून और नीतियां बनाने पर चर्चा की जाती है और अहम फ़ैसले लिए जाते हैं.
बैठक का एक अहम मकसद सदस्य देशों के बीच समन्वय स्थापित करना भी है.
इस सप्ताह दुनिया जहान में हम यही जानने की कोशिश करेंगे कि यूरोपीय संघ के लिए हंगरी की अध्यक्षता क्या मायने रखती है?

चुनाव
यूरोपीय संघ 27 सदस्य देशों का संघ है. इसमें कई प्रशासनिक संस्थाएं हैं, लेकिन जिस संस्था का ज़िक्र अक्सर होता है वो है यूरोपीय संघ की संसद जो यूरोपीय संघ के कानून बनाती है.
संसद में सभी देशों के प्रतिनिधि होते हैं और उनकी संख्या देश के आकार यानी साइज़ के अनुसार तय होती है.
मिसाल के तौर पर पर यूरोपीय संघ की संसद में जर्मनी के 96 प्रतिनिधि हैं जबकि लग्ज़मबर्ग के सिर्फ 6 प्रतिनिधि हैं.

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पेरिस में यूरोपीय संघ की परिषद के वरिष्ठ पॉलिसी फ़ेलो पॉवेल जेर्का कहते हैं कि यूरोपीय संसद संघ की सबसे महत्वपूर्ण संस्था है.
वे कहते हैं, "यूरोपीय संसद विधायिका है जहां यूरोपीय संघ के कानून बनाए जाते हैं और नीतियां निर्धारित की जाती हैं. हर पांच साल बाद होने वाले यूरोपीय संसद के चुनाव महत्वपूर्ण होते हैं क्योंकि इससे आने वाले समय की नीतियां और यूरोप का रुख़ तय होता है."
यूरोप के तीस करोड़ मतदाता यूरोपीय संसद के लिए अपने प्रतिनिधि चुनते हैं.
पॉवेल जेर्का कहते हैं कि इन चुनावों में 700 से अधिक प्रतिनिधि चुने जाते हैं जो यूरोप की साझा नीति तय करते हैं. मिसाल के तौर पर यूक्रेन युद्ध पर यूरोप का रुख क्या हो या रूस से ख़तरे से कैसे निपटा जाए. यह सब यहीं तय किया जाता है.
मगर यूरोपीय संघ के इन चुनावों के नतीजों से सदस्य देशों में राजनीतिक माहौल से कुछ चिंता भी पनप रही है.
24 जून को हुए यूरोपीय संघ की संसद के चुनाव के दौरान फ़्रांस में अति दक्षिणपंथी नेशनल रैली पार्टी को 30 प्रतिशत वोट मिले जो कि राष्ट्रपति मैक्रों की रेनेसांस पार्टी को मिले वोटों से दोगुना थे.
उसी प्रकार जर्मनी में अति दक्षिणपंथी एफ़डी को करीब सोलह प्रतिशत वोट मिले, जबकि जर्मनी के चांसलर की सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी को चौदह प्रतिशत वोट मिले.

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पॉवेल जेर्का के अनुसार जर्मनी और फ़्रांस में धुर दक्षिणपंथी पार्टियों की सफलता का एक कारण वहां की सरकारों की नीतियों के प्रति आम लोगों की नाराज़गी है. इसलिए जर्मनी में वामपंथी और उदारवादी दलों की गठबंधन सरकार को और फ़्रांस में इमैन्यूएल मैक्रों की सरकार को नुकसान हुआ है.
आम तौर पर धुर दक्षिणपंथी दलों की प्राथमिकताएं मध्य पंथी दलों से अलग होती हैं. ऐसे में यूरोपीय संसद में उनकी संख्या बढ़ने से यूरोप की नीतियों पर क्या असर पड़ेगा?
इसके जवाब में पॉवेल जेर्का कहते हैं कि जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर यूरोपीय संघ अपना रवैया नरम कर सकता है वहीं प्रवासन या इमिग्रेशन के मुद्दे पर उसका रवैया अधिक कड़ा हो सकता है.
वे कहते हैं, "यहां यह याद रखना चाहिए कि यूरोपीय संसद में सांसद सात गुटों में बैठते हैं जो कि उनके अपने देश के आधार पर नहीं बल्कि राजनीतिक विचारधारा पर आधारित होते हैं. हंगरी द्वारा लोकतांत्रिक मूल्यों की अनदेखी करने की वजह से तीन साल पहले राष्ट्रपति ऑर्बन की पार्टी को यूरोपीय संसद के सबसे बड़े गुट यूरोपियन पीपल्स पार्टी से बाहर होने के लिए कह दिया गया था. वहीं ऑर्बन की राय कई मुद्दों पर ख़ासतौर पर यूक्रेन युद्ध को लेकर अन्य यूरोपीय देशों से अलग है."
विक्टर ऑर्बन का कहना है कि हंगरी के रूस के साथ हमेशा अच्छे आर्थिक संबंध रहे हैं. वो इस सहयोग को खत्म नहीं करना चाहते क्योंकि रूस और यूक्रेन के बीच का युद्ध हंगरी का युद्ध नहीं है.
पॉवेल जेर्का ने कहा, "उन्होंने रूस से तेल और गैस ख़रीदना जारी रखा है. वो रूसी राष्ट्रपति पुतिन से भी मिलते रहे हैं. इसलिए यूरोपीय राजनीति में वो अलग थलग हैं."
वे कहते हैं, "वो यूरोपीय संघ के लिए ऐसे फ़ैसले लेने में रोड़े अटका रहे हैं जहां संघ के भीतर सर्वसम्मति की ज़रूरत होती है. उनके इस व्यवहार को बुरा बर्ताव करार दिया जा रहा है."
उनके इस बर्ताव के बावजूद साल 2024 के अंत तक के लिए यूरोपीय परिषद की अध्यक्षता हंगरी को सौंप दी गई है. अब देखना यह है कि यूरोपीय नीतियों में हंगरी क्या भूमिका निभाता है?

'मेक यूरोप ग्रेट अगेन'
यूरोपीय परिषद के सदस्य यूरोप की नीतियों पर चर्चा के लिए समय भी तय करते है. आने वाले छह महीनों के लिए इस परिषद की अध्यक्षता हंगरी के पास होगी.
इस बारे में हमने बात की थ्यू न्यूजैन से जो बर्लिन स्थित पॉलिसी थिंक टैंक ज्याक डिलोर्स सेंटर की उपनिदेशक हैं.
उन्होंने कहा, "छह महीनों तक हंगरी परिषद का एजेंडा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा. किस बात पर चर्चा हो और किस बात पर नहीं? यह तय करने का अधिकार उसके पास होगा, जिससे उसकी स्थिति काफ़ी महत्वपूर्ण बन जाएगी. इसके अलावा हंगरी को संघ के दूसरे सदस्य देशों के साथ संबंधों को मजबूत करने का मौका मिलेगा.''
मगर यह हंगरी के लिए एक बड़ी चुनौती भी साबित हो सकता है क्योंकि जलवायु परिवर्तन और यूक्रेन को समर्थन करने जैसे कुछ मुद्दों को लेकर हंगरी और यूरोप के कुछ देशों के बीच मतभेद रहे है.
हंगरी ने ऐसे कई प्रस्तावों को वीटो कर दिया जो आसानी से पास हो सकते थे.
थ्यू न्यूजैन का मानना है कि हंगरी और दूसरे सदस्य देशों के बीच मतभेद रहे हैं. मिसाल के तौर पर यूक्रेन को यूरोपीय संघ में शामिल किए जाने और उसे सैन्य सहायता देने के अलावा रूस के ख़िलाफ़ प्रतिबंध के विषय पर भी मतभेद रहे हैं.

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वो कहती हैं कि कई बार देखा गया कि ऐसे फ़ैसले जिस पर बाकी 26 देश सहमत थे उन्हें हंगरी ने वीटो के ज़रिए रोक दिया जो विवाद का मुद्दा बन गया है.
वहीं यूरोपीय संघ ने हंगरी को मिलने वाली अरबों यूरो की सहायता राशि पर यह कहते हुए रोक लगा दी है कि हंगरी में पर्याप्त रूप से कानूनी तरीके से काम नहीं हो रहा है.
वहीं हंगरी के प्रधानमंत्री ऑर्बन ने अपना विरोध जताने के लिए यूरोपीय संघ के प्रस्तावों को वीटो कर दिया.
थ्यू न्यूजैन का मानना है कि इस राशि पर लगी रोक हटाने के लिए ऑर्बन यूरोपीय संघ के सदस्य देशों से रियायतें पाने के लिए वीटो का इस्तेमाल कर रहे हैं.
तो क्या यूरोपीय परिषद का अध्यक्ष पद मिलने के बाद हंगरी अरबों यूरो की सहायता राशि पर लगी रोक को हटा पाएगा?
थ्यू न्यूजैन का कहना है, "नहीं यह संभव नहीं है. यह पैसा हंगरी को तभी मिल सकता है जब उसका प्रशासन कानूनी तरीके से काम करना शुरू करेगा. सिर्फ परिषद की अध्यक्षता पाने से यह रकम उसे नहीं मिल सकती."
हंगरी को यूरोपीय संघ की परिषद की अध्यक्षता दिए जाने को लेकर कई सदस्य देशों को चिंता भी थी. मगर हो सकता है कि अब हंगरी को भी अपने रुख के बारे में दोबारा सोचने का मौका मिले.

यूरोपीय संघ में ऑर्बन के सहयोगी
आइए अब यह समझने की कोशिश करते हैं कि हंगरी के पीएम ऑर्बन को यूरोप के किन देशों से सहयोग मिल सकता है.
जब जॉर्जिया मेलोनी इटली की प्रधानमंत्री बनीं तो उन्हें और उनकी पार्टी ब्रदर्स ऑफ़ इटली को धुर दक्षिणपंथी माना जा रहा था और उनकी सोच ऑर्बन से मेल खा सकती थी.
लेकिन माइग्रेशन के मुद्दे पर जहां मेलोनी ने अन्य यूरोपीय देशों और उत्तर अफ़्रीकी देशों के साथ अधिक सहयोग का रास्ता चुना, वहीं ऑर्बन ने राष्ट्रवादी रुख़ अपनाया.
हंगरी का कहना है कि माइग्रेशन के मुद्दे पर हर देश अपनी नीति बनाए.
हंगरी की कोई जल सीमा नहीं है इसलिए उसके लिए माइग्रेशन को रोकने का रास्ता है कि वो ज़मीन पर अपनी सीमाओं पर प्रवेश के लिए कड़े नियंत्रण लागू कर दे.
ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में ग्लोबल एंड एरिया स्टडीज़ के लेक्चरर और कार्नेगी यूरोप के वरिष्ठ शोधकर्ता डिमीटार बाशेव कहते हैं कि माइग्रेशन के मुद्दे पर इटली और हंगरी अलग गुटों के साथ हैं.
वे कहते हैं, "इटली माइग्रेशन के मुद्दे पर साझा यूरोपीय प्रयास का समर्थन करता है और अवैध रूप से पहुंचे प्रवासियों को उत्तरी अफ़्रीकी देशों में भेजने का पक्षधर है, जबकि हंगरी इसका विरोध करता है."

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पोलेंड, हंगरी का सहयोगी था लेकिन पिछले साल पोलेंड में लॉ एंड जस्टिस पार्टी की हार के बाद मध्यपंथी डोनाल्ड टुस्क की पार्टी की सरकार आने के बाद ऑर्बन को वहां से मिलने वाला सहयोग बंद हो गया. मगर जर्मनी के साथ हंगरी के संबंध अच्छे रहे हैं.
डिमीटार बाशेव कहते हैं, "हालांकि कई मुद्दों पर हंगरी के पीएम ऑर्बन जर्मनी से सहमत नहीं हैं लेकिन जब वहां सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी की सरकार थी तब उनके जर्मनी के साथ अच्छे संबंध थे क्योंकि वो जर्मन निवेशकों को हंगरी में आकर्षित करने के लिए अच्छी सुविधाएं प्रदान कर रहे थे."
वे कहते हैं, "ख़ासतौर पर वाहन निर्माण उद्योग में यह दिखाई दे रहा था. इसलिए जर्मनी उन्हें बर्दाश्त कर रहा था जिसमे बड़े बदलाव की उम्मीद नहीं दिखती."
मगर विक्टर ऑर्बन और जर्मनी की धुर दक्षिणपंथी पार्टी के बीच ख़ास सहयोग नहीं हो सकता क्योंकि अधिकांश मुद्दों पर धुर दक्षिणपंथी दल दूसरों के साथ एकजुट नहीं हो पाते.
डिमीटार बाशेव कहते हैं, "एफ़डी एक राष्ट्रवादी पार्टी है जो हमेशा अपने देश के हितों को पड़ोसी देशों के हितों के उपर रखना चाहेगी, जिसकी वजह से पड़ोसियों के साथ उसका सकारात्मक एजेंडा नहीं बन पाएगा. धुर दक्षिणपंथी पार्टी के लिए दूसरों के साथ साझा एजेंडा बना पाना मुश्किल रहा है."

यूरोपीय संघ की विदेश नीति का भविष्य क्या होगा?
इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप की एक वरिष्ठ विश्लेषक मार्था म्यूचनिक मानती हैं कि लोग यूरोपीय संसद के लिए हुए चुनाव को गहरी रुचि से देख रहे थे. उम्मीद यह थी कि पिछली संसद में जो मध्यपंथी सोच वाली पार्टियों का महागठबंधन था वो बरकरार रहे.
वो कहती हैं कि अभी भी संसद में सबसे बड़ा गुट यूरोपियन पीपल्स पार्टी का है जो दक्षिण से मध्य की ओर झुकाव रखने वाले दलों का गुट है.
मार्था कहती हैं कि संसद में 56 प्रतिशत सांसद इसी गुट के हैं.
ऐसे में हंगरी और उसकी सोच से मेल खाने वाले धुर दक्षिणपंथी दल यूरोपीय संसद में कितना प्रभाव डाल पाएंगे?
मार्था कहती हैं, "गुट के सदस्यों के बीच किसी भी मुद्दे पर पूर्ण सहमति नहीं हैं. उनकी नीतियां घरेलू राजनीति और हितों से प्रेरित रही हैं. ऐसे में देखना होगा कि वो साथ मिल कर कैसे संसद में प्रभाव डालते हैं."
वे कहती हैं, "इन गुटों की एक विकसित विदेश नीति नहीं है और विदेश नीति पर उसके सदस्यों में आपस में मतभेद हैं. इसमें कुछ लोग रूस विरोधी हैं तो कुछ पुतिन के समर्थक हैं. कुछ सांसद चीन के पक्षधर भी हैं."

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चीन के मुद्दे पर आने से पहले एक बार माइग्रेशन के मुद्दे को देखते हैं. मार्था की राय है कि यह गुट माइग्रेशन के मुद्दे पर साथ नज़र आते हैं और माइग्रेशन या बाहरी देश के लोगों के यूरोप आने के संबंध में कड़े नियंत्रण चाहते हैं.
हंगरी किसी भी राजनीतिक गुट का हिस्सा नहीं है. ऐसे में वह यूरोपीय परिषद की अध्यक्षता की अपनी भूमिका किस प्रकार निभाएगा?
मार्था कहती हैं, "हंगरी के पीएम विक्टर ऑर्बन वही करते रहेंगे जो अब तक करते रहे हैं यानी वो यूरोपीय संसद की नीति निर्धारण की प्रक्रिया में अड़चन खड़ी करते रहेंगे. वो यूरोपीय संघ की विदेश नीति या अन्य नीतियों को बनने से रोक तो नहीं पाएंगे. यह नीतियां सर्वसम्मति से बनती है."
वे कहती हैं, "आम तौर पर जिस देश के पास यूरोपीय परिषद की अध्यक्षता होती है उसकी यह भूमिका भी होती है कि वो इस विषय में सदस्य देशों के बीच आम सहमति कायम करने के लिए प्रयास करे. हो सकता है कि हंगरी इसके लिए पूरी कोशिश ना करे."

ऐसा हो सकता है कि अध्यक्ष होने के नाते हंगरी अपनी भूमिका ठीक तरीके से ना निभाए, मगर हंगरी के प्रधानमंत्री विक्टर ऑर्बन की चीन के साथ बढ़ती व्यापारिक नज़दीकियां यूरोपीय संघ के लिए चिंता का विषय है क्योंकि इस समय चीन और यूरोपीय संघ के बीच इलेक्ट्रिक कारों के आयात के मुद्दे पर गंभीर विवाद चल रहा है.
ऑर्बन को दुनिया के दूसरे नेताओं से समर्थन की भी उम्मीद है. हंगरी के चुनावों के दौरान उन्होंने 'मेक यूरोप ग्रेट अगेन' का नारा दिया था.
ठीक उसी तरह जैसे अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 2016 के राष्ट्रपति चुनाव के दौरान 'मेक अमेरिका ग्रेट अगेन' का नारा दिया था.
इस साल के राष्ट्रपति चुनावों में ट्रंप फिर से मैदान में हैं. ऑर्बन को उम्मीद है कि ट्रंप की जीत से उन्हें मदद मिल सकती है. मगर यूरोप के दूसरे देशों की इस पर भी राय अलग है.
मार्था का कहना है कि यूरोपीय संघ के नेता ट्रंप की जीत की संभावना से कुछ चिंतित हैं. वे कहती हैं, "अगर हम उनके पहले कार्यकाल को देखें तो वो यूरोपीय संघ को महत्व नहीं देते थे और चाहते थे कि यूरोप के देशों के साथ अमेरिका द्विपक्षीय तौर पर संबंध कायम करे."
वे कहती हैं, "यूरोप की धुर दक्षिणपंथी पार्टियों की ट्रंप के बारे में अलग राय है लेकिन उन्हें ट्रंप की जीत से बल मिलेगा और यूरोपीय संघ के भीतर पहले से मौजूद मतभेद गहरे हो जाएंगे."
तो अब लौटते हैं अपने मुख्य प्रश्न की ओर- यूरोपीय संघ के लिए हंगरी की अध्यक्षता क्या मायने रखती है? अगले छह महीनों तक विक्टर ऑर्बन के हाथ कुछ बंधे रहेंगे.
इसकी एक वजह यह है कि यूरोपीय संसद इस दौरान प्रशासनिक मामलों में व्यस्त होगी और नीति निर्धारण पर ज्यादा चर्चा नहीं होगी.
वहीं ऑर्बन को उनके अपने देश में उभरते लोकप्रिय विपक्षी नेता पीटर माग्यार से कड़ी चुनौती मिल रही है, लेकिन फ़्रांस में राष्ट्रपति मैक्रों ने चुनावों की घोषणा कर दी है और वहां भी धुर दक्षिणपंथी पार्टी की जीत से ऑर्बन को बल मिल सकता है.
दूसरी ओर अमेरिका में राष्ट्रपति बाइडन और ट्रंप के बीच नवंबर में होने वाले चुनावों में कांटे का मुकाबला है. इन सभी चुनावों का असर ऑर्बन की महत्वाकांक्षाओं पर पड़ सकता है.
हमारे एक्सपर्ट डिमीटार बाशेव की राय है कि ऑर्बन जैसे नेता यूरोपीय संघ को तोड़ना नहीं चाहते बल्कि उसे हथिया कर अपनी विचारधारा में ढालना चाहते हैं और यूरोपीय परिषद की अध्यक्षता उसी दिशा में एक कदम हो सकता है.
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