ख़ुशी के मौक़े पर कुछ मीठा हो जाए मगर संभलकर, ख़ुशियां छीन भी सकती है शुगर

चीनी

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    • Author, सुशीला सिंह और पायल भुयन
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

दिल्ली में रहने वाली 15 साल की रिया (बदला हुआ नाम) गले, कांख और उंगलियों के जोड़ों की त्वचा पर पिगमेंटेशन यानी गहरे रंग के निशानों की परेशानी झेल रही थीं.

डर्मेटोलॉजिस्ट या त्वचा के डॉक्टर ने उन्हें एंडोक्राइनोलॉजिस्ट के पास रेफ़र किया.

जब रिया की जांच की गई तो भूखे पेट (फ़ास्टिंग) उनकी ब्लड शुगर 115 और नाश्ता करने के बाद 180 पाई गई.

डॉक्टरों के अनुसार फ़ास्टिंग ब्लड शुगर 100 तक और नाश्ता करने के बाद 140 तक सामान्य मानी जाती है.

रिया का इलाज कर रहे डॉ. सुरेंद्र कुमार कहते हैं, ''रिया जंक फ़ूड खाती थीं और साथ में उनके परिवार में डायबिटीज़ की भी हिस्ट्री थी. वो कसरत भी नहीं करती थीं. अगर माता-पिता में डायबीटिज़ हो तो बच्चे को होने के पचास फ़ीसदी चांस होते हैं.''

डॉक्टर बताते हैं कि रिया को इंसुलिन रेसिस्टेंस है.

यूनिवर्सिटी ऑफ़ कैलिफ़ोर्निया में पीडिएट्रिक एंडोक्राइनोलॉजिस्ट और 'शुगर, द बिटर ट्रूथ' के लेखक, जाने-माने अमेरिकी डॉक्टर रॉबर्ट लस्टिग का कहना है कि वयस्कों की बीमारी अब बच्चों में देखी जा रही है.

बच्चों में बड़ों जैसी बीमारियां

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वे कहते हैं, ''आजकल देखा जा रहा है कि बच्चों में बड़ों जैसी बीमारियां सामने आ रही हैं. जैसे टाइप 2 डायबिटीज़ और फ़ैटी लिवर.''

उनके अनुसार, 1980 के दशक में ये बीमारियां वयस्कों में मिलती थीं. फ़ैटी लिवर की बीमारी अमूमन उन्हें होती थी, जो शराब का सेवन करते थे.

लेकिन अब अमेरिका में 25 प्रतिशत बच्चों के लिवर में फ़ैट की समस्या है, जबकि बच्चे शराब नहीं पीते.

डॉक्टर रॉबर्ट लस्टिग बताते हैं कि 'ये देखा जा रहा है बच्चों को पहले शुगर से बनने वाली चीज़ें, जैसे कैंडी और चॉकलेट वगैरह उतनी नहीं मिलती थीं, जितनी अभी मिल रही हैं. अब उन्हें बहुत आसानी से ये सब मिल जाता है.'

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शरीर को किस लिए चाहिए कार्बोहाइड्रेट

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खाद्य पदार्थों में तीन घटक- कार्बोहाइड्रेट, फ़ैट और प्रोटीन होते हैं. इंसानी शरीर को ऊर्जा के लिए कार्बोहाइड्रेट की ज़रूरत होती है.

ये कार्बोहाइड्रेट कई प्रकार के खाद्य पदार्थों में प्राकृतिक तौर पर पाए जाते हैं. ये सबसे ज़्यादा फलों में मिलते हैं. शुगर एक कार्बोहाइड्रेट है.

शुगर के अलावा दूसरे सामान्य कार्बोहाइड्रेट, जैसे चावल या आटा भी जब हमारे शरीर में जाते हैं, तो हमारी आंतें उन्हें तोड़कर उनमें से ग्लूकोज़ निकालती हैं.

ये ग्लूकोज़ शरीर में ईंधन का काम करता है और इससे ऊर्जा मिलती है.

मुंबई में डायबिटीज़ केयर सेंटर में डॉक्टर राजीव कोविल और डॉ. सुरेंद्र कुमार इंसुलिन रेसिस्टेंस के बारे में समझाते हुए कहते हैं कि इंसुलिन हार्मोन हमारे शरीर में ड्राइवर का काम करता है. ये ग्लूकोज़ को किडनी और दिल समेत अन्य अंगों की कोशिकाओं में पहुंचाता है.

वो बताते हैं, ''जब इंसुलिन की मात्रा बढ़ती है तब ये काम करना बंद कर देती है. ऐसे में ग्लूकोज़ अन्य विकल्पों के ज़रिए प्रवेश करने की कोशिश करता है, जिससे कोशिकाओं में समस्याएं आती हैं. ऐसे में ग्लूकोज़ शरीर में फ़ैट के रूप में जमा होने लगता है और फिर दिक्कतें पेश आने लगती हैं.''

डॉक्टरों के अनुसार, इससे शरीर में शुगर लेवल बढ़ने लगता है और कई तरह की बीमारियां घर बनाने लगती है.

इससे डायबिटीज़, ब्लडप्रेशर, दिल की बीमारियां और यहां तक कि कैंसर होने का ख़तरा भी रहता है.

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शुगर या चीनी क्या है?

चीनी से बनीं चीज़ें

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इमेज कैप्शन, चीनी से बनीं चीज़ें

सर गंगाराम अस्पताल में एंडोक्राइनोलॉजी और मेटाबॉलिज़म विभाग के डॉ. सुरेंद्र कुमार बताते हैं कि शुगर कई तरह की होती है.

वह चीनी के बारे में बताते हैं कि यह प्रोसेस्ड होकर गन्ने से बनती है. इसमें कैलोरी और मिठास सबसे ज़्यादा होती है. इसे सुकरोज़ भी कहा जाता है.

शुगर के अन्य प्रकार ग्लूकोज़, लैक्टोज़, सुकरोज़ और फ्रक्टोज़ हैं.

डॉ सुरेंद्र कुमार कहते हैं, ''फलों में ग्लूकोज़ और फ्रक्टोज़ ज़्यादा होता है. वहीं डेयरी उत्पादों जैसे दूध और पनीर में लैक्टोज़ पाया जाता है. इसी तरह शहद और फलों में ग्लूकोज़ पाया जाता है और ये हानिकारक नहीं होता.''

वहीं, जिन चीज़ों में प्रोसेस्ड शुगर यानी सुकरोज़ डाली जाती है, अगर उन्हें अधिक मात्रा में लिया जाए तो ये नुक़सान पहुंचाती है.

Fruits

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इमेज कैप्शन, फल और सब्ज़ियों में फ़ाइबर, मिनरल्स और एंटीऑक्सिडेंट होते हैं.

फ़ाइबर कितना होना चाहिए?

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डॉक्टरों का कहना है कि प्राकृतिक शुगर वाले खाद्य पदार्थों को तरजीह देनी चाहिए, क्योंकि इनसे हमें और भी पोषक तत्व मिलते हैं. जहां फल और सब्ज़ियों में फ़ाइबर, मिनरल्स और एंटीऑक्सिडेंट होते हैं, तो वहीं डेयरी उत्पादों से हमें प्रोटीन और कैल्शियम मिलते हैं.

डॉ. राजीव कोविल कहते हैं, ''भारत का कोई भी क्षेत्र हो, लोग 75 से 80 प्रतिशत कार्बोहाइड्रेट लेते हैं. ये इनटेक दुनिया में सबसे ज़्यादा है. यहां लोगों का शुगर इनटेक भी ज़्यादा है.''

वे उदाहरण देते हुए कहते हैं कि अगर आप बाजरा और ज्वार जैसे अनाज खाते हैं तो उनमें ज़्यादा होता है. शरीर में इनका ब्रेकडाउन धीरे-धीरे होता है, जिससे शुगर को सही से अब्सॉर्ब करने में मदद मिलती है. ऐसी स्थिति में शरीर में शुगर अचानक नहीं बढ़ती. इसके विपरीत, गेंहू से बना आटा या मैदा तुरंत ब्रेकडाउन होकर शुगर में तब्दील हो जाता है, इसलिए उसे खाने के लिए मना किया जाता है.

तुरंत ज़्यादा मात्रा में शुगर लेने पर शरीर में इंसुलिन ज़्यादा बनने लगता है. इससे भूख ज़्यादा लगती है और ये एक चक्र बन जाता है. इसके बाद कई तरह की समस्याएं पैदा हो जाती हैं.

डॉ. राजीव कोविल बताते हैं, ''शुगर खाने से अन्य कार्बोहाइड्रेट की तुलना में शरीर को तुरंत ज़्यादा कैलोरी मिलती है. इससे हमें उर्जा भी मिलती हैं और ये खुशी भी देती है.''

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इमेज कैप्शन, डॉक्टर कहते हैं शुगर खाने एक तरह से ख़ुशी मिलती है.

ख़ुशी देती है शुगर

ख़ुशी के मौक़ों पर 'कुछ मीठा हो जाए' का ख़्याल आना लाज़िमी है. पूजा या त्योहार वगैरह में मिलने वाला प्रसाद भी अक्सर मीठा ही होता है.

शुगर हमारी मानसिक और शारीरिक सेहत के लिए अच्छी होती है. अगर इसे ग्लूकोज़ के रूप में लिया जाए तो हमें तुरंत ऊर्जा मिलती है और ख़ुशी का एहसास भी होता है.

डॉ. राजीव कोविल के अनुसार, ''हमारे मस्तिष्क का अस्सी फ़ीसदी काम ग्लूकोज़ पर निर्भर करता है. अगर शरीर को ये कम मात्रा में मिले तो चक्कर आने जैसी समस्याएं भी हो सकती हैं."

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वहीं, डॉ. सुरेंद्र कुमार कहते हैं, ''शुगर खाने से एक तरह की ख़ुशी भी मिलती है. जब हम इसे खाते हैं और एब्ज़ॉर्ब होकर हमारे मस्तिष्क में जाती है तो एन्डॉर्फ़िन हार्मोन रिलीज़ होता है, जिससे हमें ख़ुशी महसूस होती है. लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि हम बेतरतीब ढंग से मीठा खाना शुरू कर दें."

जानकारों का कहना कि ज़्यादा शुगर खाने से दिक्कत तब आती है, जब हम पर्याप्त शारीरिक श्रम या कसरत नहीं करते. फिर ये समस्याएं पैदा करने लगती है.

शुगर

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इमेज कैप्शन, एक दिन में औरतों को 25 ग्राम या 100 कैलोरी से ज़्यादा अतिरिक्त चीनी नहीं लेनी चाहिए.

कितना मीठा खाना चाहिए?

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वर्ल्ड ऑबेसिटी एटलस की साल 2023 में आई एक रिपोर्ट के मुताबिक़, साल 2035 तक दुनिया में 51 फ़ीसद या चार अरब लोग ज़्यादा वजन या मोटापे के शिकार होंगे.

वहीं बच्चों में मोटापा दोगुनी से ज़्यादा दर पर बढ़ेगा. रिपोर्ट के अनुसार, लड़कों के मुक़ाबले लड़कियों में मोटापे की दर दोगुनी से ज़्यादा होगी.

भारत की बात की जाए तो 2035 तक 11 प्रतिशत वयस्क मोटापे के शिकार होंगे और इससे अर्थव्यवस्था पर लगभग 13, 000 करोड़ रुपये का भार पड़ेगा.

अमेरिकन हार्ट एसोसिएशन के अनुसार, एक पुरुष को प्रतिदिन 36 ग्राम या 150 कैलोरी से ज़्यादा चीनी नहीं लेनी चाहिए.

वहीं, औरतों को 25 ग्राम या 100 कैलोरी से ज़्यादा चीनी नहीं लेनी चाहिए.

डॉ. राजीव कोविल बताते हैं कि अमूमन विकसित देशों में शुगर का इस्तेमाल ज़्यादा होता है, लेकिन भारत में भी इसे बहुत ज़्यादा इस्तेमाल किया जाता है.

वे बताते हैं कि 1980 के मध्य या 1990 के दशक में समृद्ध परिवार के लोगों में वजन बढ़ने या डायबिटीज़ की समस्या देखी गई थी. ऐसा इसलिए, क्योंकि उनके लिए खाना एक लग्ज़री या फिर आनंद लेने का माध्यम था. लेकिन अब पिछले 15 सालों से बच्चों को भी ऐसी ही समस्याओं से दो-चार होना पड़ रहा है, क्योंकि उन्हें खाद्य पदार्थों के कई विकल्प मिल रहे हैं.

'थ्रिफ़्टी जीनोटाइप' हाइपोथीसिस

नेशनल लाइब्रेरी ऑफ़ मेडिसिन में छपी जानकारी के अनुसार, कई दशकों पहले आबादी में ऐसे जीन विकसित हुए जो फ़ैट का भंडारण कर सकते थे.

दोनों ही डॉक्टर बताते हैं कि मानव शरीर में ये जीन उस वक्त विकसित हुए, जब लोगों को खाना मिलने में कठिनाई होती थी. ऐसे में, थ्रिफ्टी जीन वाले लोगों में खाने का भंडारण फ़ैट के रूप में होता था. सूखा पड़ने पर खाना न मिलने की स्थिति में शरीर इसी फ़ैट का इस्तेमाल ऊर्जा की ज़रूरतों के लिए कर सकता था.

डॉ. सुरेंद्र कुमार बताते हैं कि नॉर्थ अमेरिकन माउस (चूहा) इसका एक बेहतरीन उदाहरण है, जो साल में छह महीने खाता है और बाक़ी के छह महीने कुछ न खाकर भी जीवित रहता है.

लेकिन दोनों डॉक्टरों का कहना है कि इस जीन के जिस काम से हमें फ़ायदा पहुंचता था, अब उससे नुक़सान पहुंच रहा है. अब लोगों को न केवल खाना मिल रहा है बल्कि उनके पास खाने के कई विकल्प मौजूद हैं. फिर भी यह जीन पहले की ही तरह फ़ैट का भंडारण करता है. जबकि लोग जितना खाना खा रहे हैं, उसके मुक़ाबले वे फ़िज़िकल एक्टिविटी और कसरत भी बहुत कम कर रहे हैं.

चॉक्लेट

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इमेज कैप्शन, डॉक्टरों के अनुसार, ज़्यादा मीठा खाने से मोटापे के अलावा और भी बीमारियां हो सकती हैं.
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ज़्यादा मीठा खाने के नुक़सान

जानकारों का कहना है कि अधिक मात्रा में मीठा खाने से शरीर को कई तरह के नुक़सान होते हैं.

एक तो मोटापे की समस्या होती है और इसके बाद अन्य दिक्कतें भी पैदा होती जाती हैं, जैसे कि उच्च रक्तचाप, कॉलेस्ट्रोल, डायबिटीज़ और दिल वगैरह की अन्य बीमारियां.

लेकिन डॉक्टर ये भी स्पष्ट करते हैं कि ज़रूरी नहीं कि अधिक मीठा खाने पर सबसे पहले मोटापा ही हो. और समस्याएं भी पहले हो सकती हैं.

जैसे कि महिलाओं में पीसीओडी की समस्या हो सकती है, वहीं त्वचा में कालापन या पिगमेंटेशन आ सकता है.

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चीनी और कैंसर का नाता

Cancer scan

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इमेज कैप्शन, आर्टिफ़िशियल शुगर का लंबे समय तक इस्तेमाल करने से शरीर को नुक़सान हो सकता है.

डॉक्टरों के अनुसार, कैंसर का एक कारण शरीर में इंसुलिन की मात्रा अधिक होना भी है. लेकिन क्या कैंसर के मरीज़ को मीठा नहीं खाना चाहिए?

डॉ. राजीव कोविल कहते हैं कि ऐसे दिशानिर्देश नहीं आए हैं कि कैंसर के मरीज़ को शुगर छोड़ देनी चाहिए. लेकिन वह कहते हैं कि ये सही है कि अगर शरीर में हाई शुगर है तो कैंसर को अनुकूल माहौल मिलता है.

उनके अनुसार, कैंसर का मोटापे और डायबिटीज़ से नाता है, क्योंकि ऐसे मरीज़ों में कैंसर के मामले 20 प्रतिशत ज़्यादा हैं.

डॉ. सुरेंद्र कुमार कहते हैं कि अगर कैंसर के मरीज़ को डायबिटीज़ है या ग्लूकोज़ को बर्दाश्त न कर पाने के कारण ब्लड शुगर बढ़ने लगता है तो मीठा नहीं लेना चाहिए. लेकिन ऐसी दिक्कत नहीं है तो मरीज़ सीमित मात्रा में मीठा ले सकता है.

वह उदाहरण देते हुए समझाते हैं, "अगर कोई आइसक्रीम खाना चाहता है तो उसे एकसाथ पूरा स्कूप नहीं लेना चाहिए. उसे दिन में अलग-अलग समय पर स्कूप से एक-एक चम्मच लेकर आइसक्रीम खानी चाहिए. डायबिटीज़ के मरीज़ को भी ऐसा ही करना चाहिए."

इसकी वजह बताते हुए डॉ. सुरेंद्र कुमार कहते हैं, "कैंसर या डायबिटीज़ का मरीज़ दिन में अलग-अलग समय पर थोड़ी-थोड़ी आइसक्रीम खाएगा तो उसके शरीर में मौजूद इन्सुलिन उसे बर्दाश्त कर लेगा. लेकिन एकदम से शुगर की बड़ी मात्रा शरीर में जाएगी तो वह उसे संभाल नहीं पाएगा."

आर्टिफ़िशियल या चीनी, क्या है बेहतर?

ये देखा गया है कि जैम और ब्रेड जैसे कई पदार्थों में शुगर का इस्तेमाल होता है.

जानकार कहते हैं कि अगर जैम में सिर्फ़ फ्रक्टोज़ है और वो प्राकृतिक है तो वह हानिकारक नहीं होगा. लेकिन इसमें अलग से शुगर (चीनी) डाली गई है तो लंबे समय तक इसे खाने से नुक़सान पहुंच सकता है.

डॉक्टरों का ये भी कहना है कि इस तरह की चीज़ों को खाने से तसल्ली नहीं मिलती है और बार-बार उन्हें खाने की इच्छा होती है. फिर ये ऐसा चक्र बन जाता है कि शरीर पर बुरा असर पड़ने लगता है.

डॉक्टर कहते हैं कि शुगर फ्री चीज़ों, यानी जिनमें आर्टिफ़िशियल शुगर डाली जाती है, उनसे भी जितना हो सके, परहेज़ करना चाहिए. अगर डायबिटीज़ है तो शुगर फ्री विकल्प अपनाए जा सकते हैं.

डॉ. राजीव कोविल का कहना है कि उन्होंने महाराष्ट्र के स्वास्थ्य मंत्रालय को प्रस्ताव दिया है कि जिस तरह शाकाहारी और मांसाहारी खाद्य पदार्थों पर हरा और लाल गोलाकार निशान लगा होता है, उसी तरह डायबिटीज़ के मरीज़ों के लिए सुरक्षित खाने पर नीले रंग का निशान दिया जाए.

डॉक्टरों का कहना है कि भारत के लोगों में फ़ूड लेबल को लेकर जागरूकता की कमी तो है ही, साथ में हेल्थ लिटरेसी यानी स्वास्थ्य को लेकर बुनियादी चीज़ों की जानकारी की भी कमी है. वे खाने-पीने की चीज़ों की एक्सपायरी डेट तो पढ़ लेते हैं, लेकिन यह पढ़ने की ज़हमत नहीं उठाते कि उसमें क्या-क्या है. जबकि ये काम बहुत ही अहम होता है.

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