डिप्रेशन का इलाज कर सकती है सिर के भीतर लगी ये छोटी मशीन

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- Author, मिशेल रॉबर्ट्स
- पदनाम, हेल्थ एडिटर, बीबीसी न्यूज़
अमेरिकी वैज्ञानिकों का मानना है कि सिर के भीतर माचिस के आकार का एक इलेक्ट्रिक डिवाइस इंप्लांट कर डिप्रेशन के गंभीर मामलों का इलाज किया जा सकता है. उन्होंने एक मरीज़ में इस प्रयोग के आशाजनक परिणाम मिलने के बाद ये दावा किया है.
36 साल की महिला मरीज़ सारा ने एक साल पहले इस डिवाइस को लगवाया था और वो कहती हैं कि इसके बाद उनकी ज़िंदगी बदल गई. उनके सिर में लगा ये डिवाइस हमेशा "चालू" रहता है और तभी मस्तिष्क की मदद करता है जब उसे इसकी ज़रूरत पड़ती है.
इस प्रयोग की जानकारी जाने माने स्वास्थ्य जर्नल 'नेचर' में दी गई है.
वैसे सैन फ्रांसिस्को की कैलिफ़ोर्निया यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने ज़ोर देकर कहा है कि ये कहना अभी जल्दबाज़ी होगी कि यह डिवाइस सारा जैसे दूसरे गंभीर रोगियों की भी मदद कर सकता है.
मगर उन्हें सफल होने को लेकर पूरा भरोसा है और वो आगे और भी परीक्षणों की योजना बना रहे हैं.

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डिप्रेशन सर्किट
सारा इस प्रायोगिक उपचार को हासिल करने वाली डिप्रेशन की पहली मरीज़ हैं. पिछले कुछ सालों में उनके कई इलाज असफल रहे. उन्हें अवसाद-रोधी दवाओं और इलेक्ट्रोकोनवल्सिव थेरेपी से कोई फायदा नहीं हुआ.
सारा के अनुसार, ''इस सर्जरी को कराना कठिन लग सकता है. पर मैं जो अंधेरा महसूस कर रही थी, उससे किसी भी तरह की राहत पाने की संभावना कहीं बेहतर उपाय थी. मैंने इलाज के सभी संभव विकल्प आज़मा लिए थे.''
वो कहती हैं, "मेरे रोजाना की ज़िंदगी में काफी प्रतिबंध थे. मैं हर दिन प्रताड़ित होती थी. मुश्किल से हिल-डुल पाती थी या कुछ कर पाती थी."
इस सर्जरी के दौरान उनके सिर में कुछ छोटे छेद किए गए, जिसमें कि तारों को फिट किया जा सके. इससे उनके दिमाग की निगरानी होती और उन्हें समय-समय पर उत्तेजित किया जाता. बैटरी और पल्स जनरेटर वाले बॉक्स को उनकी खोपड़ी और बालों के नीचे वाली हड्डी में दबा दिया गया.
ऐसा करने में एक पूरा दिन लग गया. और ऐसा होने तक वो बेहोश थीं. सारा कहती हैं कि जब वो उठी, तो उन्होंने ख़ुद को उत्साहित महसूस किया.
वो कहती हैं, "इंप्लांट के पहली बार चालू करते ही मेरा जीवन बेहतर होने लगा. फिर से मेरा जीवन सुखी हो गया. कुछ ही हफ़्तों में, दिमाग से आत्मघाती विचार गायब हो गए.''
सारा कहती हैं, "जब मैं अवसाद की गहराई में थी, तो मैंने केवल ख़राब चीजें ही देखीं.''
लेकिन उस सर्जरी के एक साल बाद सारा अब किसी दुष्प्रभाव के बिना स्वस्थ हैं. वो कहती हैं, "इस डिवाइस ने मेरे डिप्रेशन को मुझसे दूर रखा है. इससे मुझे अपना सर्वश्रेष्ठ पाने और जीवन को फिर से बनाने में मदद मिली है."
डिवाइस चालू रहने पर भी वो उन्हें महसूस नहीं हो पाती. लेकिन वो कहती है, "मैं आपको बता सकती हूं कि सतर्कता और ऊर्जा के भाव या सकारात्मक सोच का अनुभव होने के चलते 15 मिनट के भीतर ये डिवाइस बंद हो जाएगी."

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यह डिवाइस कैसे काम करती है?
कैलिफ़ोर्निया यूनिवर्सिटी की मनोचिकित्सक और शोधकर्ता डॉ. कैथरीन स्कैनगोस ने बताया कि सारा के दिमाग में "डिप्रेशन सर्किट" का पता लगाने की वजह से यह खोज संभव हो सकी.
वो कहती हैं, "हमें वेंट्रल स्ट्रिएटम नाम के एक हिस्से का पता चला जहाँ किसी उत्तेजना के होने से उनके भीतर डिप्रेशन की भावनाएँ ख़त्म हो गईं. हमें दिमाग के एक और क्षेत्र का पता चला जहाँ की गतिविधि से ये बताया जा सकता था कि उनके लक्षण कब सबसे गंभीर थे."
वैज्ञानिकों का कहना है कि इलाज के इस तरीके की जांच करने और ये पता लगाने के लिए कि क्या इससे गंभीर डिप्रेशन के मरीज़ ठीक हो सकते हैं, अभी और शोध करने की ज़रूरत है.

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'अभी लंबा रास्ता तय करना है'
डॉ. स्कैनगोस ने, इस इलाज के ट्रायल के लिए दो और मरीज़ भर्ती किए हैं और वे नौ अन्य रोगियों को भी भर्ती करना चाहती हैं.
वो कहती हैं, "हमें पता करने की जरूरत है कि डिप्रेशन वाले ये सर्किट हर मरीज़ में कैसे अलग-अलग होते हैं. इस काम को बार-बार दोहराया भी जाता है.''
डॉ. स्कैनगोस ने बताया, "उपचार होने पर किसी व्यक्ति का बायोमार्कर या ब्रेन सर्किट समय के साथ बदलता है या नहीं, हमें ये भी देखने की ज़रूरत होती है.''
वो कहती हैं, "हमें नहीं पता था कि हम उनके डिप्रेशन का इलाज कर पाएंगे, क्योंकि वो बहुत गंभीर मामला था. इसलिए नतीजे देखकर हम काफी उत्साहित हैं. ऐसे मामलों के लिए इस इलाज की बहुत ज़रूरत है."
वहीं इस डिवाइस को फिट करने वाले न्यूरोसर्जन डॉ. एडवर्ड चांग ने कहा, "साफ कर दूं कि ये इस विधि के असरदार होने के बारे में नहीं बताता. वास्तव में अभी इस काम का पहला प्रदर्शन हुआ है. स्थायी इलाज के रूप में इस तरीके को मान्यता दिलाने के पहले हमें अभी बहुत काम करना होगा.''
ब्रिटेन के यूनिवर्सिटी कॉलेज लंदन के एक न्यूरोसाइंटिस्ट प्रोफेसर जोनाथन रोइज़र ने बताया, "हालांकि इस तरह का इलाज हमेशा गंभीर रोगियों का ही हो सकता है.''
"इस बात की संभावना है कि यदि अन्य रोगियों पर इसका ट्रायल हो, तो अलग हिस्सों का पता लगाने की ज़रूरत होगी. ऐसा इसलिए कि हर इंसान के लक्षण अलग-अलग होते हैं.''
प्रोफेसर रोइज़र कहते हैं, "इस मामले में एक ही मरीज़ था. इसका पता तो बाद में ही चल पाएगा कि ये आशाजनक परिणाम क्लीनिकल ट्रायल में भी मिल पाते हैं या नहीं."
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