क्या वाकई इंसान के लिए ख़तरा हैं मशीनी दिमाग़?

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- Author, रिचर्ड ग्रे
- पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर
बनावटी अक़्ल यानी मशीनें और रोबोट आज इंसान के लिए ख़तरा बताए जा रहे हैं. वो हम से बेहतर काम कर के, हमारी नौकरियां छीन रहे हैं. बहुत सी ऐसी ज़रूरतें हैं जो आज इंसान के बजाय मशीनें पूरी करती हैं.
अब तो वैज्ञानिक रोबोटिक जीवनसाथी और सेक्स पार्टनर बनाने में भी जुटे हुए हैं. कुछ लोग तो ये भी आशंका जता रहे हैं कि आने वाले वक़्त में ये आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस यानी मशीनी दिमाग़ इंसानियत के लिए ही ख़तरा बन जाएंगे.
दुश्मन नहीं, दोस्त हैं मशीनें
मगर बनावटी अक़्ल के ये विरोधी लोग भी मानते हैं कि आज की तारीख़ में मशीनों ने हमारी ज़िंदगी को बहुत बेहतर बना दिया है. रोबोट ऐसे बहुत से काम आसानी से करते हैं, जो इंसान के लिए पेचीदा और मुश्किल होते हैं.
बीबीसी ने हाल ही में दुनिया भर के ऐसे जानकारों से बात की जो आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस यानी मशीनी दिमाग़ की ख़ूबियों से वाक़िफ़ हैं. उन्होंने बताया कि ये मशीनें कैसे हमारी मददगार बन गई हैं.
अमरीका की कार्नेगी मेलॉन यूनिवर्सिटी के प्रोफ़ेसर ताएको कनाडे कहते हैं कि मशीनें हमारी दुश्मन नहीं, दोस्त हैं. वो ऐसे अक़्लमंद हैं, जिनमें सहने की ढेर सारी ताक़त होती है, जो एक पैटर्न को पकड़ सकते हैं. वो इंसानों से काफ़ी बेहतर समझ रखते हैं.

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बीमारियों से लड़ रही मशीनें
दुनिया भर में अरबों ऐसे लोग हैं, जो कान के पास मच्छर की भनभनाहट से खीझ जाते हैं. ये मच्छर मौत का फ़रिश्ता भी साबित हो सकता है. एडीस एजिप्टी नाम का मच्छर अफ्रीका से आज पूरी दुनिया में फैल गया है. वो डेंगू से लेकर ज़ीका और चिकनगुनिया जैसी बीमारियां फैलाता है. हर साल 128 देशों में क़रीब 39 करोड़ लोग डेंगू के शिकार होते हैं.
डोमिनिकन रिपब्लिक के कंप्यूटर इंजीनियर रीनर मल्लोल कहते हैं कि छोटा सा मच्छर बहुत बड़ा शैतान है. रीनर ने मलेशिया के डॉक्टर धेसी राजा के साथ मिलकर ऐसी मशीन बनाई है जो ये बता सकती है कि कहां पर ज़ीका या डेंगू जैसी बीमारी महामारी के तौर पर फैल सकती है.
इस मशीन का नाम उन्होंने आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस इन मेडिकल एपिडेमोलॉजी (Aime) रखा है. ये मशीन डेंगू के हर नए केस के वक़्त और जगह का हिसाब रखती है. मशीन को ये जानकारी स्थानीय अस्पतालों से मिलती है.
साथ ही ये मशीन हवा की दिशा, नमी, तापमान और आबादी के दबाव का भी हिसाब रखती है. इन आंकड़ों की बिनाह पर ये मशीन बताती है कि किन इलाक़ों में डेंगू महामारी का रूप धर सकती है.
इस मशीन का मलयेशिया और ब्राज़ील में ट्रायल बेहद कामयाब रहा है. मशीन ने बीमारियों को लेकर जो भविष्यवाणी की, वो 88 फ़ीसद तक सही रही हैं. एइम ने तीन महीने पहले महामारी की भविष्यवाणी कर दी थी. यहां तक कि ये सिस्टम उस जगह को भी बता सकता है जहां से बीमारी की शुरुआत होगी. ये दायरा चालीस मीटर तक सही या ग़लत हो सकता है.
एइम का इस्तेमाल ज़ीका और चिकनगुनिया की महामारी की पहले से जानकारी हासिल करने के लिए भी किया जा रहा है.
इसी तरह माइक्रोसॉफ्ट कंपनी प्रोजेक्ट प्रीमॉनिशन चला रही है. इसमें वो ड्रोन के ज़रिए मच्छरों के ठिकाने तलाशती है. फिर रोबोट और ट्रैप मशीन के ज़रिए इन्हें पकड़ती है. इन मच्छरों के डीएनए और उन जानवरों के डीएनए सैंपल लेती है, जिन्हें इन मच्छरों ने काटा होता है. इस से जमा आंकड़ों की मदद से ये पता लगाया जाता है कि कितनी बार मच्छर के काटने से कोई बीमारी हो सकती है.

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बंदूक से भी लड़ रही हैं मशीनें
अमरीका में हाल ही में लास वेगास शहर में एक सिरफिरे ने अंधाधुंध गोली चलाकर 59 लोगों को मार डाला. अमरीका में सिर्फ़ एक साल में यानी पिछले साल ही 15 हज़ार लोग ऐसी हिंसा के शिकार हुए. तमाम विकसित देशों में बंदूक की वजह से किसी भी देश में हुई ये सबसे ज़्यादा मौतें हैं.
ऐसी शूटआउट और बंदूक से जुड़े अपराधों की निगरानी के लिए एजेंसियां अब तकनीक की मदद ले रही हैं.
द शॉटस्पॉटर सिस्टम एक ऐसा तरीक़ा है, जिसमें सेंसर के ज़रिए किसी भी इलाक़े में बंदूक चलने की आवाज़ को 45 सेकेंड के भीतर पुलिस को बताया जाता है. ये सिस्टम एक 25 मीटर से भी कम के दायरे में बंदूक की गोली चलने की आवाज़ की जानकारी अधिकारियों को देता है, ताकि अपराध को बढ़ने से रोका जा सके.
मशीन की मदद से इस सिस्टम में दर्ज आवाज़ की पड़ताल होती है. ताकि ये पता लगाया जा सके कि बंदूक वाक़ई चली है या नहीं. ये भी पता चल जाता है कि किसी एक शख़्स ने गोली चलाई या फिर कई बंदूकों से गोली चली. हथियार यानी बंदूक, राइफ़ल या मशीनगन का भी पता चल जाता है.
अमरीका, दक्षिण अमरीका और दक्षिण अफ्रीका के 90 शहरों में इस सेंसर का इस्तेमाल हो रहा है. इससे छोटे सिस्टम भी लगाए गए हैं, जो गोलीबारी की घटनाओं की निगरानी करते हैं. हाल ही में व्हाइट हाउस में भी ऐसे सेंसर लगाए गए हैं.
शॉटस्पॉटर के सीईओ रैल्फ़ क्लार्क कहते हैं कि आगे चलकर उनके सिस्टम का और भी बेहतर इस्तेमाल हो सकता है. इस मशीन से जमा हुए आंकड़ों की बुनियाद पर ये भी अंदाज़ा लगाया जा सकता है कि आगे चलकर कब गोलीबारी की घटनाएं होने का डर है. इन आंकड़ों की मदद से पुलिस का काम आसान हो जाएगा.

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अकाल से भी लड़ रहा आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस
पूरी दुनिया में क़रीब 80 करोड़ लोग कसावा की जड़ों से अपना पेट भरते हैं. ये जिमीकंद जैसी सब्ज़ी होती है. इसे आलू की तरह खाया जा सकता है. इसका आटा भी तैयार हो सकता है. कसावा की जड़ों से तैयार आटे से रोटियां और केक भी बनाए जाते हैं. ये उन जगहों पर भी पैदा हो सकता है, जहां दूसरी फसलों की पैदावार नहीं होती.
आज की तारीख़ में कसावा दुनिया में पैदा होने वाली छठी बड़ी फ़सल है. दिक़्क़त ये है कि कसावा जल्दी ही बीमारियों का भी शिकार हो जाता है. पूरी की पूरी फ़सल बर्बाद हो जाती है.
अब युगांडा की राजधानी कंपाला की यूनिवर्सिटी एक रिसर्च कर रही है. इससे जुड़े एक्सपर्ट इस कोशिश में हैं कि कसावा को बीमारियों का शिकार होने रोकने की कोई मशीन बना सकें.
इस प्रोजेक्ट का नाम है एमक्रॉप्स. स्थानीय किसान कसावा के बीमार पौधों की तस्वीरें लेकर वैज्ञानिकों को देते हैं. फिर वैज्ञानिक उन तस्वीरों को देखकर किसानों को बीमारी के खात्मे का तरीक़ा बताते हैं.
ये सिस्टम आज की तारीख़ में कसावा की फ़सल में होने वाली बीमारियों की 88 फ़ीसद तक सटीक भविष्यवाणी कर सकता है. इससे बीमारी को फैलने से रोका जा सकता है. ऐसा करके लोगों को भुखमरी का शिकार होने से बचाया जा रहा है.
आगे चलकर इस सिस्टम का इस्तेमाल केले की फ़सल को होने वाली बीमारियों का पता लगाने में भी किया जाएगा.
कैंसर और नेत्रहीनता से लड़ रही स्मार्ट मशीनें
दुनिया भर में हर साल क़रीब 88 लाख लोग कैंसर से मर रहे हैं. हर साल क़रीब डेढ़ करोड़ लोगों में कैंसर की बीमारी का पता चल रहा है. फिर भी हम कैंसर को शुरुआती दौर में पकड़ने में अक्सर नाकाम होते हैं. अगर शुरुआती दौर में ही कैंसर का पता चल जाए, तो इससे होने वाली मौतों की तादाद काफ़ी कम हो सकती है.
अब गूगल का डीपमाइंड और आईबीएम, कैंसर का जल्द पता लगाने के लिए स्मार्ट मशीनें तैयार करने में जुटे हैं. डीपमाइंड ने इसके लिए ब्रिटेन की नेशनल हेल्थ सर्विस और लंदन के यूनिवर्सिटी कॉलेज हॉस्पिटल्स से हाथ मिलाया है. इनकी मदद से मशीनों को कैंसर के मरीज़ों के इलाज की ट्रेनिंग दी जा रही है.
ये मशीनें गर्दन और सिर में उन हिस्सों का पता लगाती हैं, जो कैंसर के शिकार होने से बचे हुए हैं. डीपमाइंड लंदन के मूरफील्ड आई हॉस्पिटल के साथ मिलकर लोगों की आंख की रौशनी जाने के कारणों की तलाश करने की कोशिश कर रहा है.
डीपमाइंड हेल्थ के प्रमुक डोमिनिक किंग कहते हैं कि हमारी मशीन जो आंकड़े जमा करती है उसकी मदद से आंखों की रौशनी को लेकर अंदाज़े लगाए जा सकते हैं. ये पता लगाया जा सकता है कि आगे चलकर किसी को आंख की क्या दिक़्क़त हो सकती है.
किंग के मुताबिक़ आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस की मदद से आंखों के मरीज़ों का डॉक्टर ज़्यादा बेहतर तरीक़े से इलाज कर पाएंगे. उन लोगों की पहचान हो सकेगी जिन्हें फौरी मदद की ज़रूरत होगी.
आईबीएम ने भी हाल ही में वाटसन आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस पर काम करने का एलान किया है. वाटसन की मदद से लोगों में कैंसर का 96 फ़ीसद तक सही पता लगाया जा सकेगा. फिहलाल 55 अस्पतालों के डॉक्टर इसका ट्रायल कर रहे हैं.
इसकी मदद से स्तन, फेफड़ों, आंतों, अंडाशय और प्रॉस्टेट कैंसर का पता लगाने की कोशिश हो रही है.
बिजली सप्लाई में मशीनों का अहम रोल
हाल ही में अमरीका में एक के बाद एक आए दो भयंकर तूफ़ानों के बाद एक बहस छिड़ी हुई है. सवाल ये उठाया जा रहा है कि क्या मशीनों की मदद से साफ-सुथरी बिजली बनाई और सप्लाई की जा सकती है. इसका मक़सद तूफ़ानी मुसीबतों के दौरान अबाध बिजली सप्लाई बनाए रखना तो है ही. साथ ही बिजली बनाने से पर्यावरण को होने वाले नुक़सान को भी कम करने की कोशिश की जा रही है.
दुनिया भर में तमाम लोग ऐसी बिजली की चाहत रखते हैं जो रिन्यूएबल सोर्स यानी पानी, बिजली, हवा और सूरज की रौशनी से बनती हो. कोयले, तेल या गैस से बनने वाली बिजली पर्यावरण को नुक़सान पहुंचाती है.
लेकिन ये काम चुनौती भरा है. बिजली का बेजा इस्तेमाल रोकना होगा. साथ ही स्मार्ट मीटर के ज़रिए खपत की निगरानी भी ज़रूरी है. इस काम में मशीनों का इस्तेमाल बढ़ रहा है.

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बिजली खपत की निगरानी के लिए स्मार्ट सिस्टम
ऐसे डिजिटल एनर्जी मॉनिटर बनाए जा रहे हैं, जो घर में बिजली की खपत की निगरानी रखते हैं. इसके आधारत पर आंकड़े जमा किए जाते हैं. ताकि ये पता लगाया जा सके कि किस सीज़न में ज़्यादा बिजली चाहिए और कब इसकी कम ज़रूरत होती है.
ये काम सिर्फ़ इंसानों के बस का नहीं है. इसीलिए बिजली खपत की निगरानी के लिए स्मार्ट सिस्टम लगाए जा रहे हैं. स्कॉटलैंड की राजधानी एडिनबरा में स्थित हेरियट वॉट यूनिवर्सिटी ऐसे ही सिस्टम पर काम कर रही है. इस काम में यूनिवर्सिटी के रिसर्चर, अपसाइड एनर्जी नाम की स्टार्टअप कंपनी की मदद भी ले रहे हैं.
इस सिस्टम की मदद से बिजली की खपत को लेकर जो आंकड़ा तैयार होगा, उससे भविष्य के लिए काफ़ी मदद मिलेगी. जब कम खपत होती है, उस वक़्त बिजली को बचाकर, ज़्यादा ज़रूरत के वक़्त इस्तेमाल किया जा सकेगा.
जैसे सुबह के वक़्त लोग ज़्यादा बिजली इस्तेमाल करते हैं. कॉफ़ी बनाने से लेकर ऑफ़िस की तैयारी तक तमाम कामों में बिजली की ज़्यादा ज़रूरत होती है. वहीं दोपहर और शाम के वक़्त कम बिजली चाहिए होती है. हां, दिन ढलने के बाद दोबारा बिजली की खपत बढ़ जाती है.
हेरियट वॉट यूनिवर्सिटी में इस प्रोजेक्ट पर काम करने वाले वैलेंटिन रोबू तो ये भी कहते हैं कि उनके तैयार किए हुए सिस्टम से बिजली की मांग बी कम की जा सकती है. जैसे कि घरों में रखे रेफ्रिजरेटर को इस सिस्टम की मदद से रिमोट कंट्रोल किया जा सकता है. जब फ्रिज ज़्यादा ठंडा हो जाता है, तब उसकी बिजली बंद करके, बिजली की मांग काफ़ी कम की जा सकती है.
इन मिसालों से साफ़ है कि मशीनें उतनी भी बुरी नहीं. इंसान ने जो अक़्लमंद मशीनें बनाई हैं, वो हमारे बहुत काम आ रही हैं.
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