विनेश फोगाट: पिता की मौत, मां के कैंसर, लंबे बाल का शौक और चैंपियन बनने की कहानी

    • Author, सौरभ दुग्गल
    • पदनाम, बीबीसी पंजाबी के लिए

मई 2003 में फोगाट बहनों में सबसे बड़ी गीता फोगाट ने कुश्ती के एशियन कैडेट चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीता था.

ये महावीर फोगाट के प्रशिक्षण की पहली अंतरराष्ट्रीय सफलता थी. उस समय पूरे बलाली गांव ने उनकी इस जीत का जश्न मनाया.

उस वक़्त महावीर के छोटे भाई राजपाल ने अपनी आठ साल की बेटी विनेश के लिए भी ऐसा ही स्वागत का सपना देखा था. विनेश ने उस समय कुश्ती बस शुरू ही की थी.

अब 21 साल बाद विनेश भारतीय नारी शक्ति की प्रतीक बन गई हैं. शनिवार को पेरिस से दिल्ली लौटने पर उनका सम्मान किसी नायिका की तरह किया गया.

विनेश फोगाट 'बीबीसी इंडियन स्पोर्ट्सवुमेन ऑफ़ द ईयर अवॉर्ड 2022' की नॉमिनी रह चुकी हैं.

'बीबीसी इंडियन स्पोर्ट्सवुमन ऑफ़ द ईयर' अवॉर्ड का मक़सद भारतीय महिला खिलाड़ियों और उनकी उपलब्धियों को सम्मानित करना, महिला खिलाड़ियों की चुनौतियों पर चर्चा करना और उनकी सुनी-अनसुनी कहानियों को दुनिया के सामने लेकर आना है.

दिल्ली अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से लेकर 120 किलोमीटर दूर उनके गांव बलाली तक उनके हजारों प्रशंसकों की लाइन लगी थी जो उनकी एक झलक पाने के लिए बेताब थी.

हरियाणा के किसी भी एथलीट, यहां तक ​​कि ओलंपिक में पदक जीतने वालों का भी इतना भव्य स्वागत नहीं हुआ था. अगर आज राजपाल होते तो वो अपने सपने को पूरा होते देख बेहद खुश होते.

जब-जब विनेश भारत को गौरवान्वित करती हैं तब-तब अपनी बेटी के लिए अलग रास्ते का सपना देखने वाले उनके स्वर्गीय पिता, उनकी मां प्रेमलता और उनके ताऊ और कोच महावीर को उसका श्रेय दिया जाना चाहिए.

महावीर फोगाट ने परिवार के दबाव और अपनी बीमारी के बावजूद अपने भाई के सपने को जिंदा रखा.

इन सबने मिलकर एक ऐसे चैंपियन को तैयार किया जिसमें हर मोड़ पर मुश्किलों का सामना करने का हौसला था.

बलाली नहीं पूरे देश की बेटी

इस बार विनेश फोगाट ओलंपिक में मेडल से चूक गईं, लेकिन पूरे देश ने उनकी उपलब्धियों का जश्न मनाया.

पेरिस ओलंपिक में 50 किलो भार वर्ग में फ़ाइनल तक सभी तीन मुक़ाबले जीतने के बावजूद, विनेश को फ़ाइनल से पहले वेट-इन में 100 ग्राम अधिक वज़न होने के कारण अयोग्य घोषित कर दिया गया था.

2012 लंदन ओलंपिक में हिस्सा लेने वाली पहली भारतीय महिला पहलवान गीता फोगाट ने कहा, "विनेश सिर्फ़ बलाली की नहीं पूरे देश की बेटी है."

महावीर फोगाट और उनके नेतृत्व में ट्रेनिंग करने वालों पर लिखी गई क़िताब ‘अखाड़ा’ के लिए मेरे साथ इंटरव्यू में विनेश फोगाट ने कहा था, "जब मैंने अपने पिता को खोया तब मैं पहली क्लास में थी."

"वो हमेशा चाहते थे कि मैं एक चैंपियन पहलवान बनूं. जब गीता ने कैडेट एशियाई चैंपियनशिप में ख़िताब जीता और गांव में उसका गर्मजोशी से स्वागत किया गया, तो मेरे पिता ने कहा कि वह मेरे लिए भी ऐसा ही चाहते हैं."

"जब मैंने, प्रियंका और रीतु के साथ 2009 एशियन कैडेट चैंपियनशिप में गोल्ड मेडल जीता तो गांव में हमारा भी गर्मजोशी से स्वागत किया गया. उस पल मुझे अपने पिता की इच्छा याद आ गयी."

"वे जहां भी होंगे उनका आशीर्वाद मेरे साथ है. मैं अपनी हर जीत पर उनके आशीर्वाद को याद करती हूं."

'ताऊ ने मुझे पिता की कमी महसूस नहीं होने दी'

अक्टूबर 2000 में तथाकथित पुरुष-प्रधान खेल कुश्ती में अपने परिवार की बेटियों को ओलंपिक विजेता बनाने का सपना देखने वाले महावीर कहते हैं, "पेरिस ओलंपिक में विनेश का प्रदर्शन शानदार था."

"यह दुर्भाग्य था कि वह फ़ाइनल में नहीं खेल सकी. लेकिन मेरे लिए वो हमेशा एक चैंपियन ही रहेगी."

महावीर की तरह राजपाल भी अपनी बेटियों के मामले में काफी प्रगतिशील थे. उन्होंने अपने बेटों और बेटियों में कोई अंतर नहीं किया.

विनेश ने बताया था, "जब हमारी मां हमें घर का काम करने के लिए कहती थीं तो वो हमारे भाई हरविंदर को डांट देते थे. वो सुनिश्चित करते थे कि हमें बगैर ध्यान भटकाए अपना पूरा ध्यान कुश्ती पर केंद्रित करना है. अगर हमारी मां को मदद की ज़रूरत होती तो वह हरविंदर को बताती थीं हमें नहीं."

विनेश याद करती हैं, "स्कूल के दौरान मैं अक्सर लड़कियों और यहां तक ​​कि लड़कों से भी लड़ लेती थी. हमारी दादी ने हमें सलाह दी कि हम लड़ाई-झगड़ा न करें, लेकिन अगर कोई हमें धमकाता है, तो हमें उसका मुक़ाबला करना चाहिए."

"चाहे वह लड़का हो या लड़की, मैंने कभी किसी को खुद पर धौंस जमाने नहीं दिया. इसकी वजह से अक्सर लड़ाई होती थी. मेरे पिता को इस बात का गर्व था कि उनकी लड़कियां लड़कों से कम नहीं हैं. पिता के गुज़रने के बाद हमारे ताऊ जी ने भी हमें उसी तरह पाला. उन्होंने मुझे कभी पिता की कमी महसूस नहीं होने दी."

पिता के निधन से विनेश की दुनिया कैसे बदल गई?

विनेश के पिता की मृत्यु 25 अक्टूबर 2003 को दिवाली से एक सप्ताह पहले करवा चौथ के दिन हो गई थी. करवा चौथ के दिन भारतीय महिलाएं अपने पति की लंबी उम्र की कामना करते हुए व्रत रखती हैं.

प्रेमलता को शायद ही पता था कि व्रत तोड़ने के एक घंटे पहले उनके पति दुनिया को अलविदा कह देंगे.

राजपाल हरियाणा रोडवेज़ में बस चलाने की नौकरी करते थे. उस दिन वो अपनी नौकरी से बलाली-दादरी रूट पर बस चलाकर घर लौटे थे और घर के बाहर बैठे हुए थे. राजपाल के बेहद क़रीबी चचेरे भाई जो मानसिक तौर पर अस्थिर थे, उन्होंने राजपाल को गोली मार दी थी.

दोनों के बीच कोई बातचीत नहीं हुई थी. अचानक चचेरे भाई ने उन्हें गोली मार दी. पहली गोली राजपाल के सीने में लगी और दूसरी उनके सिर में. मौके़ पर ही उनकी मौत हो गई.

विनेश की मां प्रेमलता कहती हैं, "ये मेरा आख़िरी करवा चौथ था. मैं टूट गई थी."

उस दिन के मंज़र को याद कर वो कहती हैं, "मेरे पति का शरीर खू़न से लथपथ था और उस वक्त मेरी आंखों के सामने मेरे बच्चों के चेहरे घूम रहे थे."

"मैं तबाह हो गई थी, मुझे नहीं पता था कि क्या करूँ. मुझे लगा कि मेरी जीवन का कोई मकसद नहीं है. लेकिन फिर मुझे एहसास हुआ कि मुझे अपने बच्चों के लिए जीना है, उनके सामने उनका पूरा भविष्य पड़ा है."

विनेश हमेशा अपने मां के बलिदान को याद करती है और खुद को एक वर्ल्ड चैंपियन के तौर पर गढ़ने में अपनी मां की कोशिशों का धन्यवाद करना नहीं भूलतीं.

मां को कैंसर

2004 के मध्य में विनेश के परिवार को पता चला कि प्रेमलता को कैंसर है.

प्रेमलता कहती हैं, "विनेश के पिता की मृत्यु के बाद मेरी तबीयत ख़राब रहने लगी. जब हालत ज़्यादा ख़राब हो गई तो मैंने भिवानी के डॉक्टर को दिखाया. जांच के दौरान पता चला कि मुझे गर्भाशय का कैंसर है."

"डॉक्टर ने बताया कि यह शरीर में फैल चुका है और मेरे पास केवल एक या दो साल बचे थे. उस समय मेरे बच्चे बहुत छोटे थे और मैं उनके भविष्य को लेकर चिंतित थी. मैं उनके लिए जीना चाहता थी."

बलाली गांव में कुछ फोगाट परिवारों के अलावा सांगवांग कबीले का भी प्रभाव है. फोगाट परिवार के क़रीबी हरविंदर सांगवान नाम के एक युवा उस दौरान जोधपुर में पढ़ाई करते थे.

बलाली में फोगाट परिवार के कुछ ही घर हैं. ये गांव सांगवान खाप के वर्चस्व वाला है. हरविंदर एक सांगवान परिवार को जानते थे जिसका एक सदस्य जोधपुर(राजस्थान) मेडिकल कॉलेज में पढ़ रहे थे. उनका नाम भी हरविंदर था.

विनेश के भाई अपनी मां को जांच के लिए वहां लेकर गए. वहां छात्र हरविंदर ने उन्हें कैंसर विभाग के प्रमुख से मिलवाया.

प्रेमलता ने कहा, "हरविंदर सांगवान एक अच्छे छात्र थे और शिक्षकों के साथ उनका अच्छा तालमेल था. जब मैं वहां के प्रमुख डॉक्टर से मिली, तो उन्होंने मुझसे पूछा कि मैं कितने साल जीना चाहती हूं. मैंने तुरंत उत्तर दिया- 'पांच साल'. मैंने कहा कि तब तक मेरे बच्चे बड़े हो जाएंगे और वो अपना ख्याल रख सकेंगे."

"डॉक्टर ने मुझे आश्वस्त किया और कहा कि मुझे चिंता करने की ज़रूरत नहीं है. मैं अपने बच्चों के साथ रहूंगी. उस डॉक्टर और भगवान की कृपा का शुक्रिया, मैं बच्चों के साथ हूं."

अगले महीने से प्रेमलता ने बलाली से लगभग 75 किलोमीटर दूर, रोहतक में पोस्ट ग्रेजुएट इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज में नियमित कीमोथेरेपी ली.

उन्होंने कहा, "जोधपुर में डॉक्टर ने मुझसे कहा कि मुझे चार हफ्ते की कीमोथेरेपी की ज़रूरत है. हरविंदर सांगवान मुझे पहले दो सेशन के लिए रोहतक ले गए, लेकिन उसके बाद मैंने अकेले यात्रा की."

विनेश को चैंपियन बनाने में महावीर फोगाट की भूमिका

प्रेमलता कहती हैं, "अपने बच्चोंं के ट्रेनिंग शेड्यूल में मैं बाधा नहीं डालना चाहती थी इसलिए मैं अकेली वहां जाया करती थी. मेरी एकमात्र इच्छा थी कि वे खेलों में सफल हों और वे सफल भी हुए. यह सब केवल महावीर के कारण ही संभव हो सका."

"अगर वे लड़कियों के साथ सख्ती नहीं करते, तो मुझे नहीं लगता कि उनमें से किसी ने वह हासिल किया होता जो आज हासिल किया है."

प्रेमलता और उनकी दो बहनों दया कौर और निर्मला की शादी फोगाट परिवार में हुई थी. बड़ी बहन दया महावीर की पत्नी हैं और छोटी निर्मला की शादी उनके सबसे छोटे भाई सज्जन से हुई है. इसलिए, महावीर माता और पिता दोनों तरफ से राजपाल के बच्चों के रिश्तेदार हैं.

पेरिस में विनेश की टीम ने अंतिम वेट-इन के लिए विनेश का वज़न कम करने की हरसंभव कोशिश की, यहां तक ​​कि कुछ अतिरिक्त ग्राम कम करने के लिए उनके बाल भी काटे गए. लेकिन इसका फायदा नहीं हो सका.

खेल में अपने शुरुआती वर्षों के दौरान विनेश हमेशा लंबे बाल रखने का सपना देखती थीं. किशोर अवस्था में प्रवेश के बाद से ही वो अपनी उम्र की और लड़कियों की तरह लंबे बाल रखना चाहती थीं.

लेकिन सख्त टास्क मास्टर महावीर फोगाट ने अपने सभी छह ट्रेनी के लिए सख्त नियम बनाए थे. इन ट्रेनी में उनकी चार बेटियां (गीता, बबीता, रीतु और संगीता) और दो भतीजियां (विनेश और प्रियंका) शामिल हैं.

लंबे बाल रखने का शौक

महावीर के लिए कुश्ती एक ग्रामीण खेल था जो उनकी संस्कृति में गहराई से जुड़ा था. इसमें कुछ परंपराओं का पालन करना होता है जिनमें से एक है छोटे बाल रखना. छोटे बालों का रखरखाव भी आसान था.

विनेश याद करती हैं, "2015 में, मैं पांच महीने के लिए एक ट्रेनिंग कैंप में थी. उस समय ताऊ जी वहां नहीं थे. मेरा सपना लंबे बाल रखने का था. हालांकि मैं बहुत ज़्यादा स्टाइल के पक्ष में नहीं थी. किस्मत अच्छी थी और मुझे शिविर में लंबे बाल रखने का मौक़ा मिला."

वो कहती हैं, "जब घर जाने का समय हुआ और हम कैंप से निकले तो मेरे बाल कंधे को छू रहे थे. मुझे उम्मीद थी कि ताऊ जी को आपत्ति नहीं होगी."

"'जब हमने दोबारा ट्रेनिंग शुरू की तो तो पहले दो या तीन सत्रों में उन्होंने मेरे बालों के बारे में एक शब्द भी नहीं कहा. लेकिन मैं जानती थी कि ये तूफ़ान से पहले की शांति है."

तीसरे दिन शाम के ट्रेनिंग सेशन में उन्होंने मुझसे मेरे लंबे बालों के बारे में पूछा. मैंने अपना सिर नीचे झुका लिया और चुप रही. लेकिन उन्होंने एक शब्द भी नहीं कहा.

उन्होंने बस पूछा और आख़िरकार मुझे अपने बाल लंबे करने की इजाज़त दे दी.

महावीर फोगाट ने कहा, "उसके लिए ओलंपिक पदक का मेरा सपना अभी भी अधूरा है. लेकिन विनेश ने खेल के लिए जो किया वो बेमिसाल है."

"पेरिस में उनका प्रदर्शन ओलंपिक पोडियम पर पदक लेने से भी बढि़या तरीके से याद किया जाएगा. उन्होंने पूरे देश को गौरवान्वित किया है."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित

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