मोहम्मद अली से लेकर विनेश फोगाट और बजरंग पुनिया तक, खिलाड़ियों का गुस्सा और विरोध का तरीका

    • Author, शारदा उगरा
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए

बीते साल 2023 में पदकों और प्रशंसा के अलावा भारतीय खेल को ऐसे दृश्य भी देखने को मिले, जैसा इतिहास में पहले कभी नहीं देखे गए थे.

पहलवान बजरंग पुनिया और विनेश फोगाट ने अपने सरकारी सम्मान 'खेल रत्न' और 'अर्जुन पुरस्कार' दिल्ली में फुटपाथ पर छोड़ दिए. दोनों पहलवानों ने पुलिस से इसे प्रधानमंत्री को सौंपने का अनुरोध किया. 18 जनवरी को पहलवानों के विरोध-प्रदर्शन के एक साल पूरा हो गया.

एथलीटों ने विरोध-प्रदर्शन के लिए हमेशा अनूठा तरीका अपनाया है और सबसे बड़े मंच और सबसे ज्यादा देखे जाने वाले खेल आयोजनों को ही चुना है, जैसे ओलंपिक, फीफा विश्व कप, अमेरिका में सुपरबाउल, ग्रैंड स्लैम टेनिस टूर्नामेंट या अन्य खेलों में विश्व चैंपियनशिप.

पिछले साल 13 दिसंबर को पाकिस्तान के ख़िलाफ़ टेस्ट मैच शुरू होने से पहले, अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद ने ऑस्ट्रेलियाई बल्लेबाज़ उस्मान ख्वाजा को वो जूते पहनकर खेलने की इजाज़त देने से इनकार कर दिया, जिन पर, ‘सभी ज़िंदगियां बराबर हैं’ और ‘आज़ादी एक मानवाधिकार है’ लिखा था.

आईसीसी के फ़ैसले पर सवाल

खिलाड़ियों के लिए आईसीसी का कोड ऑफ कन्डक्ट इस बात की इजाज़त नहीं देता. वो ऐसे किसी संदेश का प्रदर्शन नहीं कर सकते हैं, जो ‘राजनीतिक, धार्मिक या नस्लवाद की गतिविधियों से जुड़े हों’.

इसके कुछ दिनों बाद, जब उस्मान ख्वाजा ने अपने जूतों पर लिखे शब्दों के बजाय, ऐसा स्टिकर इस्तेमाल करने की इजाज़त मांगी, जिन पर शांति का प्रतीक कहे जाने वाले कबूतरों और जैतून की शाखा वाले चिह्न बना हो, तो भी उन्हें जवाब में इनकार ही मिला. आईसीसी ने कहा कि उन्होंने ऐसा इसलिए किया क्योंकि उस्मान ख्वाजा ने उनको जो अर्ज़ी भेजी थी, उसमें ‘मध्य पूर्व’ शब्द का इस्तेमाल किया गया था.

मगर इससे पहले, 2021 के आख़िरी में आईसीसी ने खिलाड़ियों को इस बात की इजाज़त दे दी थी कि वो 2020 से 2021 के दौरान चलाए ‘ब्लैक लाइव्स मैटर’ आंदोलन के समर्थन में खेल के मैदान में ‘घुटनों के बल झुककर’ अपना समर्थन जता सकते हैं. तब आईसीसी ने कहा था कि अगर खिलाड़ी ‘अधिक समतामूलक समाज के लिए उचित ढंग से अपना समर्थन जताएं’ तो उसे इस बात से कोई दिक़्क़त नहीं है.

उस्मान ख्वाजा के साथ हुए बर्ताव पर टिप्पणी करते हुए वेस्टइंडीज़ के महान खिलाड़ी और पूर्व तेज़ गेंदबाज़ माइकल होल्डिंग ने कहा था कि एक संगठन के तौर पर अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट परिषद ने अपना ‘दोगलापन’ और ‘नैतिक सिद्धांत वाला संगठन न होने की असलियत’ को ही उजागर किया है. होल्डिंग की इस बात से असहमत नहीं हुआ जा सकता है.

अब ये साफ है कि खेल संगठन अपने ही बुने हुए जाल में फंसा महसूस कर रहे हैं. एक तरफ़ तो ये संगठन अपने आपको खुले ज़हन वाला और तरक़्क़ीपसंद दिखाना चाहते हैं. इसके लिए वो ऐसा कोई भी संदेश देने के लिए अपने मंच का इस्तेमाल होने देते हैं, जिससे अपने साझीदारों और प्रायोजकों के साथ उनके रिश्तों पर असर पड़ता हो.

वहीं दूसरी ओर, वो उस वक़्त सत्ता में बैठी ताक़तों के साथ भी अपने रिश्ते अच्छे बनाए रखना चाहते हैं.

विरोध का मंच

अपने संदेश को ज़्यादा से ज़्यादा असरदार बनाने के लिए खिलाड़ी, हमेशा से दुनिया के सबसे बड़े मंचों और सबसे ज़्यादा देखे जाने वाले खेल आयोजनों का इस्तेमाल करते आए हैं. फिर चाहे वो ओलंपिक हो, फुटबॉल का वर्ल्ड कप, अमरीका का सुपरबॉल मुक़ाबला, टेनिस के ग्रैंड स्लैम टूर्नामेंट या फिर किसी दूसरे खेल की विश्व चैंपियनशिप ही क्यों न हो.

फिर भी, खिलाड़ियों के विरोध जताने के सबसे ज़्यादा चर्चित और सोशल मीडिया पर ‘वायरल’ घटनाओं और खिलाड़ी किसी मक़सद के लिए कितनी क़ुर्बानी देने के बीच काफ़ी अंतर देखने को मिलता रहा है. यही वजह है कि भारत के पहलवानों का विरोध-प्रदर्शन ख़ास तौर से दिलचस्प हो जाता है.

अगर हम खेल के मैदान में या खिलाड़ियों के किसी ख़ास मक़सद से जताए गए दुनिया के पांच सबसे बड़े विरोधों की बात करें, तो जो पहली दो घटनाएं ज़हन में आती हैं, वो 1960 के दशक की हैं.

मुहम्मद अली ने किया सेना में भर्ती होने से इनकार

पहली घटना तो उस शख़्स से जुड़ी है, जो बाद में जाकर अमरीका का सबसे मशहूर और पसंद किया जाने वाला खिलाड़ी बना, ख़ास तौर से अपने देश के बाहर. 1967 में वर्ल्ड हेवीवेट बॉक्सिंग चैंपियन मोहम्मद अली ने वियतनाम युद्ध के लिए अमेरिकी सेना में भर्ती होने से इनकार कर दिया था.

मोहम्मद अली ने कहा था, ''मैं यहां से दस हज़ार किलोमीटर दूर जाकर बेगुनाह लोगों की हत्या में मददगार नहीं बनूंगा…मेरी वियतनाम से कोई लड़ाई नहीं है.''

मोहम्मद अली को ये पता था कि वो लड़ने के लिए जंग के अग्रिम मोर्चे पर नहीं भेजे जाएंगे, बल्कि वो फौजियों का हौसला बढ़ाने के लिए अपने देश के दूत की तरह सफ़र करेंगे. फिर भी मोहम्मद अली ने नतीजों की परवाह न करते हुए, अमेरिकी फौज में भर्ती होने से इनकार कर दिया.

इस वजह से मोहम्मद अली से वर्ल्ड चैंपियन का खिताब छीन लिया गया. उनके बॉक्सिंग करने पर प्रतिबंध लगा दिया गया, जिसकी वजह से मोहम्मद अली की पेशेवर ज़िंदगी के तीन बेहतरीन साल उनके हाथ से निकल गए.

काले लोगों से भेदभाव का विरोध

मोहम्मद अली के इस विरोध के एक साल बाद, खेल के मैदान में अश्वेतों के अधिकारों की लड़ाई का एक और प्रदर्शन देखने को मिला था. 1968 के मेक्सिको ओलंपिक खेलों के दौरान, जब 200 मीटर की दौड़ के मेडल बांटे जा रहे थे, तब विजेत टॉमी स्मिथ और तीसरे स्थान पर रहे जॉन कार्लोस पोडियम पर बिना जूते पहने ही चढ़ गए.

उन दोनों ने बस एक एक काला मोज़ा और एक काला दस्ताना पहन रखा था. जब अमरीका का राष्ट्र गान बजाया गया, तो टॉमी स्मिथ और जॉन कार्लोस, दोनों ने अपने दस्ताने पहने हुए हाथ उठाए और फिर ब्लैक पॉवर का प्रतीक बन चुकी सलामी दी. उन दोनों खिलाड़ियों ने अपने मुल्क में अफ्रीकी अमरीकी मूल के लोगों के साथ होने वाले नस्लवादी भेदभाव और आर्थिक असमानता के प्रति विरोध जताया था.

स्मिथ और कार्लोस का समर्थन, उस दौड़ में सिल्वर मेडल जीतने वाले ऑस्ट्रेलिया के पीटर नॉर्मन ने भी किया था. उन्होंने भी अपने जैकेट पर मानव अधिकारों का प्रतीक चिह्न लगाया हुआ था.

विरोध जताने की वजह से टॉमी स्मिथ और जॉन कार्लोस को ओलंपिक खेलों से निलंबित कर दिया गया था. यही नहीं, दोनों खिलाड़ियों के विरोध-प्रदर्शन को 'ओलंपिक की बुनियादी भावना जान-बूझकर किया गया हिंसक उल्लंघन' बताते हुए, उनके ओलंपिक में खेलने पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया था.

दोनों ही खिलाड़ियों की मीडिया ने भी आलोचना की थी और अमेरिका के खेल प्रतिष्ठानों ने भी उनका बहिष्कार कर दिया था. उनके इस साहसिक क़दम की तारीफ़ तो कई दशकों बाद जाकर की गई थी.

ब्राज़ील का लोकतंत्र प्रेमी फुटबॉलर

दुनिया के सबसे पसंदीदा खेल की सबसे ज़्यादा चाही जाने वाली टीम के एक खिलाड़ी ने दिखाया था कि खेल के मंचों का इस्तेमाल किस तरह किया जा सकता है. ब्राज़ील के मिडफील्डर सुकरात, फुटबॉल लेकर अपने देश लौटते थे, जहां उस वक़्त फौजी हुकूमत थी.

उनकी टी-शर्ट पर नारे लिखे होते थे. ब्राज़ील में पहले बहुदलीय चुनाव 1982 में हुए थे. उससे पहले सुकरात की टी-शर्ट पर लिखा था: 15 को वोट करो. 1983 में एक और मैच के दौरान सुकरात बहुत बड़ा सा बैनर लेकर खेल के मैदान में दाख़िल हुए थे. उस पर लिखा था, 'जीत हो या मात, हमेशा लोकतंत्र के साथ'.

1986 में मैक्सिको में खेले गए फुटबॉल वर्ल्ड कप के दौरान, सुकरात ने अपने एक मोज़े से ही हेडबैंड बना लिया और उस पर लिखा, "मेक्सिको अभी भी अपने मेज़बानों के साथ एकजुटता से खड़ा है, जो पिछले साल आए भूकंप से तबाह हो गए थे."

वर्ल्ड कप में सुकरात के हेडबैंड हर मैच में कोई न कोई संदेश देने वाले हुआ करते थे. लीबिया पर अमरीकी हमले की आलोचना करते हुए सुकरात ने हेडबैंड पर लिखा था,‘इंसाफ़ चाहिए,आतंकवाद नहीं, हिंसा नहीं’.

सुकरात के इन बाग़ी तेवरों की वजह से फीफा बेहद आशंकित हो गया था. उसने खिलाड़ियों के कपड़ों और यहां तक कि अपने शरीर पर भी कोई सियासी या निजी संदेश देने पर रोक लगाने वाले नियम लागू करने शुरू कर दिए. आज तो दुनिया भर के फुटबॉल क्लब और लीग खिलाड़ियों को फलस्तीन के साथ एकजुटता दिखाने तक के लिए दंडित कर रही हैं. अगर आज सुकरात ज़िंदा होते तो वो 70 बरस के बेहद नाराज़ बुज़ुर्ग खिलाड़ी होते.

राष्ट्रगान के समय खड़े ही नहीं हुए कॉलिन कैपरनिक

हाल के सालों में खेल के मंच पर सबसे नाटकीय और असरदार विरोध प्रदर्शन उस समय हुआ था, जब 2016 में एक अमेरिकी फुटबॉल खिलाड़ी कॉलिन कैपरनिक ने उस वक़्त खड़े होने से इनकार कर दिया था, जब उनके देश का राष्ट्र गान बजाया जा रहा था.

उनके इस विरोध की वजह से अमेरिका में पुलिस की बर्बरता और अश्वेतों की मौत के ख़िलाफ़ पूरी दुनिया में विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गए थे. हालांकि, अमेरिकी फौज के सैनिकों के सम्मान में कैपरनिक ये कहते हुए घुटनों के बल झुक गए थे, 'मैं ऐसे झंडे या देश के प्रति सम्मान जताने के लिए खड़ा नहीं होने जा रहा, जो अश्वेतों और रंग वाले लोगों पर ज़ुल्म ढाता है.'

इसके बाद, कैपरनिक की अपनी टीम के खिलाड़ियों से लेकर दूसरे देशों के फुटबॉलरों तक, पूरी दुनिया के खिलाड़ियों के बीच विरोध जताने के लिए घुटनों के बल झुकने की मुद्रा ख़ूब चलन में आ गई.

बास्केटबॉल, फुटबॉल, क्रिकेट, हॉकी और आइस हॉकी ही नहीं, तमाम अन्य खेल खेलने वाले खिलाड़ियों ने भी विरोध के कैपरनिक के इस तरीक़े को अपनाया और दोहराया. अधिकारियों और संगठनों की तमाम चेतावनियां भी उनको रोक पाने में नाकाम रहीं.

जब 2020 के टोक्यो ओलंपिक के दौरान खिलाड़ियों ने घुटने के बल झुककर विरोध जताया तो अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति ने पहले तो सोशल मीडिया पर ऐसी तस्वीरें दिखाने पर रोक लगा दी थी. लेकिन, बाद में समिति ने ये सोचकर अपना इरादा बदल लिया कि इससे खिलाड़ी रुकने वाले तो हैं नहीं. हालांकि कैपरनिक के पहली बार घुटनों के बल झुककर प्रदर्शन की शुरुआत करने के बाद से किसी भी एनएफएल टीम ने उन्हें अपने यहां नहीं रखा.

ऊपर हमने विरोध की जिन घटनाओं का ज़िक्र किया, उनमें से सुकरात की मिसाल को छोड़ दें, तो ज़्यादातर घटनाएं पश्चिमी देशों के खिलाड़ियों से जुड़ी हैं. इनमें से ज़्यादातर मामलों में विरोध की वजह भी पश्चिमी देशों की घटनाएं ही थीं.

ईरान में महसा अमीनी की मौत पर खिलाड़ियों का गुस्सा

सितंबर 2022 में सही तरीक़े से हिजाब न पहनने पर पुलिस हिरासत में ली गई 22 साल की युवती महसा अमीनी की मौत के बाद, पूरे ईरान में हज़ारों लोग विरोध जताने के लिए सड़कों पर उतरे थे. ईरान की सरकार ने इन प्रदर्शनकारियों पर ख़ूब सख़्ती की, फिर भी विरोध-प्रदर्शनों का सिलसिला रुका नहीं. ईरान के बहुत से खिलाड़ियों ने अपने यहां की कट्टरपंथी सरकार के खिलाफ़ विरोध जता रहे लोगों के प्रति समर्थन जताने के तमाम तरीक़े ईजाद कर लिए थे.

ईरान की तमाम टीमों, जैसे कि फीफा वर्ल्ड कप की टीम, उसकी वॉलीबॉल, वाटर पोलो और बीच फुटबॉल टीम के खिलाड़ियों ने तरह-तरह से अपना विरोध दर्ज कराया. कभी उन्होंने अपने मुल्क का क़ौमी तराना नहीं गाया या फिर कभी उन्होंने गोल होने का जश्न नहीं मनाया. और कभी सड़कों पर उतर रहे प्रदर्शनकारियों का समर्थन करते हुए, बाल काटने की नक़ल करने वाले हाव-भाव से विरोध दर्ज कराया.

एक महिला खिलाड़ी ने तो चढ़ाई करते वक़्त अपने सिर से हिजाब को नीचे खिसका दिया, तो शतरंज की एक खिलाड़ी ने बिना सिर ढके ही मुक़ाबले में हिस्सा लिया. अपनी हुकूमत के 'नैतिकता' वाले क़ानूनों की आलोचना करने वाले दूसरे खिलाड़ियों से या तो पूछताछ की गई, या फिर उन्हें जेल में डाल दिया गया. वहीं कराटे के एक पूर्व राष्ट्रीय चैंपियन को तो ऐसे जुर्म के लिए मौत की सज़ा दी गई, जो उसने किया ही नहीं था.

भारतीय पहलवानों का विरोध-प्रदर्शन इनमें से किसी भी खांचे में फिट नहीं बैठता. फिर भी वो इन सभी बाग़ी खिलाड़ियों के साथ उसूल की एक डोर से बंधे हैं. वो उसूल हैं, इंसाफ़ की मांग. इससे बाक़ी सारे बाग़ी खिलाड़ियों से उनका रिश्ता अपने आप जुड़ जाता है.

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