पहलवानों ने गंगा में मेडल बहाने का इरादा कैसे बदला

सुशीला सिंह

बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

हरिद्वार में मंगलवार को हर की पौड़ी पर अलग नज़ारा था.

जहाँ आमतौर पर सैकड़ों की संख्या में लोग गंगा आरती में शामिल होने के लिए इकट्ठा होते हैं, वहाँ वे उन पहलवानों को देखने पहुँचे थे, जो अपने वर्षों की मेहनत को गंगा में बहाने आए थे.

अपने मेडल गंगा में बहाने के लिए साक्षी मलिक, विनेश फोगाट, बजरंग पुनिया समेत कई बड़े खिलाड़ी शाम में हरिद्वार पहुँचे.

हाथों में मेडल लिए पहलवान भावुक थे वहीं सैकड़ों की भीड़ से घिरे इन पहलवानों को नरेश टिकैत मनाने की कोशिश कर रहे थे.

भारतीय किसान यूनियन के नेता नरेश टिकैत की पहल के बाद इन पहलवानों ने अपना फ़ैसला टाल दिया.

बीबीसी से बातचीत में बीकेयू के नेता राकेश टिकैत ने बताया कि उन्हें पहलवानों के ट्वीट के ज़रिए जानकारी मिली कि वे गंगा में अपने मेडल प्रवाहित करने के लिए हरिद्वार जा रहे हैं.

दरअसल पिछले एक महीने से ज़्यादा समय से दिल्ली के जंतर मंतर पर पहलवान भारतीय कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष और बीजेपी सांसद बृजभूषण शरण सिंह की गिरफ़्तारी की मांग कर रहे हैं

विनेश फोगाट, बजरंग पुनिया और साक्षी मलिक की अगुवाई में धरना-प्रदर्शन हो रहा था.

इन पहलवानों ने बृजभूषण सिंह पर यौन शोषण और 'तानाशाही रवैेए' जैसे गंभीर आरोप लगाए थे जिन्हें सांसद ने बेबुनियाद बताया और पहलवानों को नार्को टेस्ट की चुनौती दी.

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद एफ़आईआर दर्ज हो चुकी है.

कैसे टला फ़ैसला?

राकेश टिकैत बताते हैं कि पहलवानों का गंगा में मेडल बहाने का निर्णय उनका अपना था और इस बारे में उनसे कोई बात नहीं हुई थी.

लेकिन जैसे ही उन्हें इसके बारे में पता चला, उन्होंने यूनियन की टीम को आगाह किया और टीम को देरहादून से लेकर हर की पौड़ी पर काम के लिए लगा दिया.

उनके अनुसार,'' इसके बाद टिकैत साहब (नरेश टिकैत) गाँव से गए और खिलाड़ियों को समझाया कि ये देश की संपत्ति है और आप भी देश की धरोहर हो ऐसा न करो. और आगे क्या करना है इस बारे में पाँच दिनों में फ़ैसला लिया जाएगा.''

नज़रिया

भारतीय खेल के इतिहास में शायद ये पहली बार हुआ है जब खिलाड़ियों ने ऐसा क़दम उठाया है.

लेकिन इसको लेकर अलग-अलग राय है.

जानकारों के अनुसार खिलाड़ियों के पक्ष से देखा जाए, तो ये सही लगता है कि उन्हें न्याय नहीं मिला इसलिए उन्होंने अपने मेडल गंगा में बहाने का फ़ैसला लिया.

वहीं दूसरा नज़रिया ये है कि खिलाड़ियों ने जब इतनी मेहनत से वो मेडल भारत के लिए जीते, तो वो ऐसा क़दम उठाकर उसका निरादर कैसे कर सकते हैं?

'द हिंदू' अख़बार में डिप्टी एडिटर राकेश राव का कहना है कि खिलाड़ियों के मुद्दों से मेडल का कोई लेना-देना नहीं है.

वे कहते हैं, ''मुझे उनकी सोच पर रहम आता है. उन्होंने अपनी कड़ी मेहनत से देश के लिए मेडल जीता. ऐसा करके वो कहीं न कहीं अपनी मेहनत, उस देश का जिसने खिलाड़ियों के लिए इतना कुछ किया है, मेडल जिससे उन्हें एक पहचान मिली है, उन सबका अपमान करते.''

वो कहते हैं कि एक खिलाड़ी का सपना होता है कि वो पोडियम पर खड़ा हो चाहे उसे मेडल कोई भी मिले.

ऐसे में मेडल को फेंकने, जंतर मंतर पर धरना देने आदि से समस्या का हल नहीं हो सकता है.

दूसरी ओर राकेश टिकैत कहते हैं , ''40 दिनों से ज़्यादा से धरने पर बैठे इन पहलवानों ने लोगों का प्यार देखा था, पुलिस का प्यार देखा लेकिन जैसे उनके टेंट तोड़े गए, उन्हें पकड़ा गया वे उससे काफ़ी आहत थे इसलिए मेडल को गंगा में डालने का फ़ैसला लिया.''

इसी बात को आगे बढ़ाते हुए खेल पत्रकार नौरिस प्रीतम कहते हैं कि उनकी खिलाड़ियों के साथ पूरी संवेदना है और ये सरकार को समझना होगा कि ये सभी खिलाड़ी ब्रैंड एंबेसडर हैं और इन्होंने देश के लिए मेडल जीते हैं.

वे कहते हैं, ''आप सोचिए 40 दिन से ज़्यादा समय से ये खिलाड़ी अपने घर की सुविधाओं को छोड़कर टेंट में रह रहे हैं. जहाँ मच्छर हैं, शौच की सुविधा नहीं है. तो क्या इन्हें झुंझलाहट नहीं हो रही होगी. क्या इनका सब्र का बाँध नहीं टूटेगा.''

नौरिस प्रीतम कहते हैं- मैं खिलाड़ियों के मेडल गंगा में बहाने की बात से सहमत नहीं हूँ, लेकिन सरकार को ये सोचना होगा कि ये नौबत क्यों आई.

मेडल को गंगा में बहाने के फ़ैसले पर विवाद

वरिष्ठ खेल पत्रकार विजय लोकपल्ली का कहना है कि इन खिलाड़ियों का ये क़दम उठाना दुर्भाग्यपूर्ण है.

वे कहते हैं, "एक ज़माने में जब खिलाड़ियों के पास पैसे नहीं होते थे तो वे कहते थे कि मेडल बेच देंगे लेकिन इन पहलवानों के गंगा में मेडल बहाने की कोशश करना इससे युवा खिलाड़ियों को ग़लत संदेश जाएगा कि इतने नामी गिरामी ये क़दम उठा रहे हैं, तो उनका भविष्य क्या होगा. लेकिन ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि उन्होंने ये फ़ैसला लिया."

वहीं चर्चा इस बात की भी हो रही है एक महीने से ज़्यादा समय से जंतर मंतर पर बैठ कर न्याय की गुहार लगा रहे इन मेडल विजेता पहलवानों पर ना महिला और बाल विकास मंत्री स्मृति ईरानी कुछ बोलीं और ना ही देश के प्रधानमंत्री की तरफ़ से कोई आश्वासन आया.

मंगलवार को स्मृति ईरानी ने एक निजी चैनल से बातचीत में कहा कि वो अब से दो तीन घंटे पहले बबीता फोगाट के साथ बैठी हुई थीं.

उनके अनुसार, ''क्या बबीता जैसी विश्व विख़्यात पहलवान ऐसे किसी के साथ बैठी होगी, जिन्होंने किसी का शोषण किया होगा. वो भी उन लोगों के साथ जिन्होंने उन्हीं के परिवार का शोषण किया होगा.''

वे कहती हैं कि किसी को शाम छह बजे मेडल बहाना था, लेकिन आठ बजे तक नहीं बहाया ये विषय नहीं है.

स्मृति ईरानी इस बातचीत में कहती हैं, ''जो लोग क़ानून जानते हैं वो इस बात को समझते हैं कि जब जाँच चल रही होती है, उसमें हस्तक्षेप करके महिला के ख़िलाफ़ ही जाना एक पद्धति बन गया है. जो मैं नहीं करना चाहती. न्याय प्रक्रिया और जाँच निष्पक्ष रूप से चले इसी से महिला की मदद हो सकती है. वो महिला को निष्पक्ष जाँच से क्यों वंचित करना चाहते हैं.''

लेकिन वरिष्ठ खेल पत्रकार प्रदीप मैगज़ीन कहते हैं कि इस मामले में यौन उत्पीड़न के आरोप लगे जिसमें एक नाबालिग़ का बयान भी था लेकिन सोचिए सुप्रीम कोर्ट के कहने पर एफ़आईआर दर्ज हुई, तो ऐसे में निराश हताश खिलाड़ी कितना जाँच का इंता़ार करें.

उनके अनुसार, ''अब आप ये सोचिए एफ़आईआर दर्ज हो गई है लेकिन अभी तक इस मामले में बृजभूषण सिंह से पूछताछ तक नहीं हुई है. और खिलाड़ियों को प्रदर्शन करने से रोका जा रहा है और मामले दर्ज कर दिए गए हैं.''

''ये साफ़ दिखाई देता है कि एक आदमी को बचाने की कोशिश हो रही है. तो क्या ये कहा जा सकता है कि क़ानूनी कार्रवाई सही हो रही है?''

विजयलोकपल्ली कहते हैं कि भारतीय ओलंपिक संघ की अध्यक्ष पीटी उषा नाराज़ पहलवानों से मिलने गईं थीं, लेकिन उसके बाद क्या हुआ वो पूरे देश ने देखा.

वे आगे कहते हैं, ''सानिया मिर्ज़ा के अलावा किस महिला खिलाड़ी को आपने इन पहलवानों के पक्ष में बोलते हुए देखा है. हम पुरुष क्रिकेट टीम की बात करते हैं , महिला क्रिकेट टीम क्यों इनके समर्थन में अब तक नहीं आई ये बताइए.''

उनके अनुसार, ''अगर 15 महिला क्रिकेटर या खिलाड़ी इनके पक्ष में खड़ी हो जाएँगी, तो इनके आंदोलन को सोचिए कितना बल मिलेगा. क्योंकि अभी क़ानूनी कार्रवाई चल रही है तो सरकार की अपनी मजबूरी हो सकती हैं लेकिन अन्य खिलाड़ी तो समर्थन दे सकती हैं.''

क्या राजनीतिक हो रहा है आंदोलन?

विभिन्न राजनीतिक दल जैसे आप, कांग्रेस, राष्ट्रीय लोकदल और भारतीय किसान यूनियन इन पहलवानों के समर्थन में खड़े दिखाई दिए.

वहीं जंतर मंतर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ नारेबाज़ी भी सुनाई दी.

इसके बाद इस बात पर भी बहस तेज़ होने लगी कि पहलवानों का ये प्रदर्शन राजनीतिक रूप ले रहा है.

हालाँकि टोक्यो ओलंपिक के कांस्य पदक विजेता बजरंग पुनिया ने बग़ैर किसी का नाम लिए स्पष्ट कहा कि कुछ लोग उनके आंदोलन को अलग दिशा में ले जाने की कोशिश कर रहे हैं.

राकेश टिकैत सवाल उठाते हुए कहते हैं कि ये आंदोलन कैसे राजनीतिक हो सकता है?

उनका कहना था कि जब सत्ता पक्ष इस मुद्दे पर कुछ नहीं कर रही है तो विपक्ष का काम होता है कि जब कोई मामला है तो वो उस मुद्दे को उठाए. लेकिन ये बताइए कि कौन सी राजनीतिक पार्टी इन पहलवानों की मदद कर रही है?

जाँच रिपोर्ट

बीबीसी से बातचीत में पहलवान वरुण कुमार कहते हैं कि नाराज़ पहलवानों को मेडल बहाने की सोचने की बजाए जाँच रिपोर्ट का इंतजार करना चाहिए था.

वरूण कुमार मेलबर्न में हुई कॉमेनवेल्थ रेसलिंग चैम्पियनशिप में रजत पदक जीत कर आए हैं.

साल 2007 से कुश्ती से जुड़े रहे वरुण कुमार बीबीसी से बातचीत में कहते हैं, ''इन खिलाड़ियों का कहना है कि इन्हें सरकार पर विश्वास नहीं है लेकिन देश और कोर्ट पर है, ऐसे में जब न्यायालय का फ़ैसला नहीं आ जाता तब तक इन्हें न्यायप्रणाली पर विश्वास रखना चाहिए था.''

साथ ही वे खिलाड़ियों के साथ 28 मई को हुई कार्रवाई को सही ठहराते हैं.

उनके मुताबिक़ 28 मई को पहलवानों को शांतिपूर्ण तरीके से अपना प्रदर्शन जारी रखना चाहिए था क्योंकि उस दिन नए संसद भवन का उदघाटन भी था. ऐसे में पुलिस ने क़ानून व्यवस्था को क़ाबू में करने के लिए जो कार्रवाई की, वो सही थी.

दरअसल 28 मई को जहाँ नई संसद भवन का उद्घाटन होना था, वहीं इसी दिन खिलाड़ियों ने महिला महापंचायत का आयोजन करने और संसद तक मार्च करने का फ़ैसला किया था.

लेकिन पुलिस का कहना था कि 28 मई को महत्वपूर्ण दिन था क्योंकि इस दिन नई संसद का उद्घाटन था. इसलिए उन्हें इसकी इजाज़त नहीं दी गई थी.

दिल्ली पुलिस की डीसीपी सुमन नलवा का कहना था, ''पहलवान हमसे जो मांगते थे , हम उन्हें देते थे. हमने शुरू से उनका सहयोग किया. इंडिया गेट जैसी संवेदनशील जगह पर कैंडल मार्च निकालने की अनुमति दी.''

''लेकिन 28 मई अहम दिन था. उन्हें अनुमति नहीं थी इसके बावजूद वे नई संसद की तरफ उल्लंघन करते हुए गए, बैरिकेड तोड़े, तमाशे किए इसलिए हमने उन्हें हिरासत में ले लिया था.''

हालाँकि बाद में उन्हें छोड़ दिया गया था.

जानकारों के अनुसार खिलाड़ियों का मुद्दा काफ़ी अहम था, जिस पर जाँच के लिए ओवरसाइट कमेटी बनाई गई.

खेल पत्रकार राकेश राव का कहना है कि पूरे देश की संवेदना खिलाड़ियों के साथ है लेकिन ये अपने मुद्दे से भटक रहे हैं.

उन्होंने कहा- खिलाड़ियों को ये समझना होगा कि देश में क़ानून व्यवस्था है और उन्हें न्याय प्रणाली के फ़ैसले का इंतज़ार करना चाहिए.

खेल पत्रकार नौरिस प्रीतम कहते हैं कि कोई भी व्यक्ति , खिलाड़ी न्यायप्रणाली में अपना भरोसा तभी दिखाएगा जब उसे प्रक्रिया आगे बढ़ती दिखाई दे. लेकिन क्या ऐसा हो रहा है. ऐसे में इन खिलाड़ियों का ग़ुस्सा जायज़ है.

इधर खिलाड़ियों का समर्थन कर रहे किसान नेता राकेश टिकैत का कहना है कि पाँच दिनों में अगले क़दम पर फ़ैसला लिया जाएगा.

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