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बृजभूषण शरण सिंह के मामले में अन्य राज्यों के पहलवानों ने क्यों साध रखी है चुप्पी?
- Author, सुशीला सिंह & जान्हवी मुले
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
- दिल्ली के जंतर मंतर पर प्रदर्शन कर रहे पहलवान भारतीय कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह की गिरफ़्तारी की मांग कर रहे हैं
- पहलवान 23 अप्रैल से दूसरी बार धरने पर बैठे हैं
- विनेश फोगाट, बजरंग पुनिया और साक्षी मलिक की अगुवाई में धरना-प्रदर्शन हो रहा है
- इन पहलवानों ने बृजभूषण सिंह पर यौन शोषण और 'तानाशाही रवैए' जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं
- बृजभूषण शरण सिंह ने इन आरोपों को बेबुनियाद बताया है
- इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर दिल्ली पुलिस ने एफ़आईआर दर्ज कर ली है
- पहलवानों ने इस मामले में दर्ज की गई दो एफ़आईआर पर अतिरिक्त प्रमुख मेट्रोपोलिटन मजिस्ट्रेट के सामनेतुरंतजाँच को लेकर याचिका डाली है
- कुछ खिलाड़ी, विपक्षी पार्टियाँ, खाप पंचायत और किसान संगठन इन पहलवानों का समर्थन कर रहे हैं
- इस बीच बुधवार को एक नाबालिग़ पहलवान ने सीआरपीसी के सेक्शन 164 के तहत मजिस्ट्रेट के सामने अपना बयान दर्ज करा दिया है
इस साल की शुरुआत में जब पहली बार भारत के तीन चर्चित पहलवानों ने भारतीय कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह पर गंभीर आरोप लगाए तो खेलों की दुनिया में जैसे भूचाल आ गया.
बृजभूषण सिंह ने ख़ुद पर लगे आरोपों को बेबुनियाद बताया, वहीं ये खिलाड़ी इस बात पर अड़े रहे कि उनके ख़िलाफ़ कार्रवाई हो.
इसके बाद खेल मंत्रालय ने एक जाँच कमेटी बनाई, लेकिन कोई कार्रवाई न होने पर पहलवान फिर जंतर-मंतर पर धरना दे रहे हैं.
इस बीच ये मामला जहाँ कोर्ट में पहुँच चुका है, वहीं भारतीय कुश्ती महासंघ भी दो हिस्सों में बँटती नज़र आ रही है.
इस बात की भी चर्चा हो रही है कि ये मुद्दा खिलाड़ियों का होने की बजाए राजनीतिक और हरियाणा बनाम उत्तर प्रदेश बन गया है.
इस बीच दिल्ली पुलिस ने बताया है कि कुश्ती खिलाड़ियों की शिकायत पर रेसलिंग फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडिया के अध्यक्ष बृज भूषण शरण सिंह का बयान दर्ज किया गया है और उनसे कुछ दस्तावेज़ मांगे गए हैं.
इस मामले की जांच के लिए स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम का भी गठन किया गया है जिसमें चार महिला पुलिस अधिकारियों समेत छह पुलिस टीमें काम करेंगी.
जंतर-मंतर पर बैठे खिलाड़ियों के समर्थन में निशानेबाज़ अभिनव बिंद्रा, टेनिस खिलाड़ी सानिया मिर्ज़ा, मुक्केबाज़ विजेंदर कुमार और पूर्व क्रिकेटर कपिल देव ट्वीट कर चुके हैं.
कपिल देव ने ट्वीट किया था, ''क्या इन्हें कभी इंसाफ़ मिल पाएगा?''
बहस इस बात पर भी हो रही है कि हरियाणा से आए इन पहलवानों के मामले में अन्य राज्य के कुश्ती खिलाड़ी क्यों चुप्पी साधे हुए हैं?
स्पोर्ट्स स्टार में एडिटोरियल कंसल्टेंट विजय लोकपल्ली के अनुसार, ''यौन शोषण की बात खुलकर कहना आसान नहीं है और जंतर-मंतर पर जिस तरह से खिलाड़ी बैठे हैं, वो बहुत हिम्मत का काम है. इसे मैं आंदोलन कहूँगा. हालाँकि इसे राजनीतिक कहा जा रहा है, लेकिन आम जनता और किसान इसे समर्थन कर रहे हैं, तो ये कैसे कहा जा सकता है?''
वे मानते हैं कि ये एक क़ानूनी लड़ाई है और जैसे-जैसे प्रक्रिया आगे बढ़ेगी, उसके मुताबिक़ कार्रवाई की जाएगी.
विजय लोकपल्ली के मुताबिक़ वे पहली बार खिलाड़ियों का इतने बड़े स्तर पर आंदोलन देख रहे हैं, हालाँकि इससे पहले भी खिलाड़ी और खेल संगठन अलग-अलग मामलों में कोर्ट पहुँचे हैं.
हाल ही में टेबल टेनिस खिलाड़ी मनिका बत्रा के नेशनल कैंप न जाने पर उन्हें एशियन चैंपियनशिप में शामिल नहीं किया गया था, जिसके बाद उन्होंने टेबल टेनिस फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडिया के ख़िलाफ़ कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया और जीत हासिल की थी.
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उत्तर प्रदेश के खिलाड़ियों और फ़ेडरेशन का क्या कहना है?
उत्तर प्रदेश कुश्ती संघ के महासचिव प्रेम मिश्रा कहते हैं कि बृजभूषण सिंह के ख़िलाफ़ हो रहा प्रदर्शन ग़लत है, क्योंकि वे हर खिलाड़ी की मदद करते हैं.
वे बताते हैं, ''उनका एक कॉलेज है, जहाँ हज़ारों की संख्या में लड़कियाँ पढ़ती हैं. वहीं कुश्ती में यूपी की कई लड़कियाँ हैं, लेकिन किसी ने ऐसे आरोप नहीं लगाए हैं. ये एक इंसान को बदनाम करने की कोशिश हो रही है. जंतर-मंतर पर बैठी महिला कुश्ती खिलाड़ी का सपोर्ट करने हरियाणा के अन्य पहलवान क्यों नहीं आ रहे हैं.''
वो धरना-प्रदर्शन की वजह बृजभूषण शरण सिंह की ओर से लागू किए गए नियमों को बताते हैं.
प्रेम मिश्रा बताते हैं, ''पहले खिलाड़ी इंडिया टीम में चयन के लिए होने वाले कैंप में आने की बजाए सीधे ट्रायल देते थे, लेकिन बृजभूषण सिंह को लगा कि इससे अच्छे खिलाड़ियों को मौक़ा नहीं मिल पाता था.''
वे कहते हैं, ''मान लीजिए, कोई खिलाड़ी कुश्ती में 65 किलोग्राम वज़न वर्ग में ओलंपिक के लिए क्वालिफ़ाई कर जाता है, तो इस खिलाड़ी को इसी वज़न वर्ग में नेशनल स्तर पर जो खिलाड़ी जीता है, उससे मुक़ाबला करना होगा. अगर ओलंपिक के लिए क्वालिफ़ाई किया हुआ खिलाड़ी इसमें हार जाता है, तो उसे 15 दिन बाद फिर ट्रायल के लिए मौक़ा दिया जाएगा.''
इस ट्रायल में जीत के बाद ही ओलंपिक के लिए क्वालिफ़ाई किया हुआ खिलाड़ी टीम इंडिया में शामिल हो पाएगा.
प्रेम मिश्रा सवाल पूछते हैं कि क्या ये नाजायज़ प्रक्रिया है? क्या प्रतिभा के हिसाब से खिलाड़ियों को मौक़ा देना और ये नियम बनाना ग़लत बात है? उनका दावा है कि विरोध कर रहे खिलाड़ियों की नाराज़गी इसी बात से है.
मेलबर्न में हुई कॉमेनवेल्थ रेसलिंग चैम्पियनशिप में रजत पदक जीतकर आने वाले वरुण कुमार कहते हैं कि वो साल 2007 से कुश्ती से जुड़े हुए हैं.
वे बताते हैं कि बृजभूषण सिंह ने कैंपों में अनुशासन पर ज़ोर दिया और कई बार कार्रवाई भी की है, जो इन खिलाड़ियों को पसंद नहीं थी.
भारतीय खेल प्राधिकरण या साई के दो बड़े सेंटर हैं- एक सोनीपत और दूसरा लखनऊ.
महिलाओं के लिए लखनऊ सेंटर है, तो सोनीपत सेंटर लड़कों के लिए है.
वरुण कुमार कहते हैं, ''इन पहलवानों की इस बात को लेकर भी नाराज़गी थी कि सेंटर अलग-अलग क्यों किया जा रहा है. और ऐसा करने का कारण ये था कि सोनीपत में हम सब एक साथ अभ्यास करते थे और उसी दौरान अनुशासन की कमियाँ नज़र आईं और कुश्ती पर भी असर पड़ने लगा. इसी के बाद बृजभूषण जी ने महिला और पुरुष खिलाड़ियों के सेंटरों में बदलाव लेने का फ़ैसला किया."
वरुण बताते हैं- हले कुश्ती में राष्ट्रीय प्रतियोगिता तक नहीं होती थी, लेकिन बृजभूषण सिंह ने इसकी शुरूआत की. खिलाड़ियों को हर प्रकार की सुविधा भी दी जाने लगी और केवल फ़ोकस स्पोर्ट्स पर करने को कहा गया.''
प्रेम मिश्रा कहते हैं, ''पहले राष्ट्रीय प्रतियोगिता में नंबर वन आने वाले राज्य अगले नेशनल्स में दो टीमें लेकर जा सकते थे, इससे उस राज्य का दबदबा बन रहता था. इस नियम में बदलाव किया गया, ताकि अन्य राज्यों के खिलाड़ियों को भी मौक़ा मिल सके.''
दूसरी ओर नाम न बताने की शर्त पर एक महिला कुश्ती खिलाड़ी कहती हैं कि इस मामले में एफ़आईआर दर्ज हो चुकी हैं और अब ये खिलाड़ी कह रहे हैं गिरफ़्तारी होनी चाहिए.
वो कहती हैं कि एशियन गेम्स आने वाले हैं और ऐसे में इन खिलाड़ियों को अब आगे की कार्रवाई का इंतज़ार करना चाहिए और खेल पर फ़ोकस करना चाहिए.
हालाँकि बीबीसी से बातचीत में विनेश फोगाट कह चुकी है, "हम पहलवानी कैसे कर सकते हैं, अगर वो (बृजभूषण शरण सिंह) बाहर हैं. हमने आवाज़ उठाई है ना. हमारे परिवार इतने परेशान हैं. उन (बृजभूषण शरण सिंह के) पर जो एक्ट लगे हैं, उसमें उनकी गिरफ़्तारी बनती है या नहीं बनती? अगर उसकी जगह कोई नॉर्मल इंसान होता, उसकी गिरफ़्तारी होती या नहीं?"
कौन हैं बृजभूषण शरण सिंह
बृजभूषण शरण सिंह उत्तर प्रदेश के क़ैसरगंज से बीजेपी के सांसद हैं और भारतीय कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष भी हैं.
वे पाँच बार बीजेपी से और वर्ष 2009 में एक बार समाजवादी पार्टी से सांसद रह चुके हैं.
गोंडा से आने वाले बृजभूषण सिंह पहलवानी भी करते थे.
वर्ष 1980 में छात्र राजनीति से क़दम रखने वाले बृजभूषण शरण सिंह गोंडा, क़ैसरगंज और बलरामपुर संसदीय क्षेत्रों का प्रतिनिधित्व कर चुके हैं.
अयोध्या में हुए राम मंदिर आंदोलन से उग्र 'हिंदुत्व छवि' के लिए पहचाने जाने वाले बृजभूषण शरण सिंह साल 2011 में भारतीय कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष बने.
अन्य राज्यों के फ़ेडरेशन की राय
बीबीसी ने जिन-जिन फ़ेडरेशंस से बात की, उनमें से अधिकतर का कहना है कि ये क़ानूनी मामला है और इस मामले को राजनीतिक रंग दिया जा रहा है.
चंडीगढ़ यूटी रेसलिंग एसोसिएशन के राजेश शर्मा कहते हैं कि वे इस मामले में कुछ नहीं कहना चाहेंगे और वे कोर्ट के फ़ैसले का इंतज़ार करेंगे.
वहीं गुजरात स्टेट रेसलिंग एसोसिएशन के अध्यक्ष आईडी नानावटी कहते हैं कि हरियाणा के खिलाड़ी काफ़ी मज़बूत होते हैं और वहाँ की राज्य सरकार अन्य राज्यों की तुलना में अपने खिलाड़ियों को काफ़ी सुविधाएँ देती है.
उनका कहना है कि जिस तरह के आरोप बृजभूषण शरण सिंह पर लगाए जा रहे हैं, वो बेबुनियाद हैं और ये वर्चस्व की लड़ाई है.
आईडी नानावटी कहते हैं, ''हरियाणा चाहता है कि रेसलिंग फ़ेडरेशन का पद उसे मिले, क्योंकि वहीं से कुश्ती के खिलाड़ी ज़्यादा आते हैं. पिछली बार दीपेंदर हुड्डा ने चुनाव लड़ा था, लेकिन नहीं जीते. बृजभूषण का कार्यकाल तो ख़त्म हो ही रहा था, चुनाव होते और कोई न कोई जीतता. तो ये लोग चुनाव लड़े, कोई रोक नहीं रहा लेकिन ऐसे सस्ते आरोप नहीं लगाने चाहिए.''
तो वहीं छत्तीसगढ़ रेसलिंग एसोसिएशन के अध्यक्ष जगन्नाथ यादव कहते हैं कि ये राजनीतिक मुद्दा बनाया जा रहा है, लेकिन पिछले पाँच सालों में कुश्ती में कई सुधार हुए हैं, जिसे नकारा नहीं जा सकता.
वे बताते हैं कि ये कोर्ट का मामला है, इसमें उन्हें या राज्य के खिलाड़ियों के बोलने की ज़रूरत क्या है, क्योंकि जाँच चल रही है.
हिमाचल प्रदेश रेसलिंग एसोसिएशन के महासचिव जगदीश के अनुसार इस ख़बर के आते ही उन्होंने एसोसिएशन में शामिल सभी लड़कियों से बात की, लेकिन उन्होंने किसी प्रकार के यौन उत्पीड़न से इनकार किया.
वे कहते हैं, ''इस मुद्दे के बाद अब पेरेंट्स बहुत डरे हुए हैं कि कहीं उनके बच्चे के साथ ग़लत न हो जाए. हालाँकि ये राजनीतिक मुद्दा है. अब आप सोचिए सरकारी जाँच कमेटी में बबीता थी और वो कहती है कि जाँच रिपोर्ट के बाद बबीता से ज़बरदस्ती हस्ताक्षर कराए गए. ये बताओ कि ये कैसे संभव है. ये सारी बातें गोलमोल नज़र आती हैं.''
जगदीश ये भी कहते हैं कि हरियाणा से ही सारे खिलाड़ी हैं और वहाँ कल्चर भी कुश्ती का है लेकिन हरियाणा फ़ेडरेशन ने कभी नेशनल प्रतियोगिता नहीं कराई.
हालाँकि होना ये चाहिए था कि राज्य की फ़ेडरेशन को वहाँ नेशनल मुक़ाबले कराने चाहिए ताकि अन्य खिलाड़ियों को पता चलता कि उनके खिलाड़ियों की क्या ख़ासियत है और अन्य खिलाड़ियों को भी सीख मिलती.
दक्षिण भारत के पहलवानों का क्या कहना है?
जहाँ महाराष्ट्र की मिट्टी को कुश्ती के लिए जाना जाता है, वहीं दक्षिणी राज्यों में कुश्ती का चलन कम है.
बीबीसी ने कर्नाटक, तेलंगाना और महाराष्ट्र के कुश्ती संघ, कुछ पहलवान और पत्रकारों से बात की.
इनमें से ज़्यादातर लोगों ने कहा कि वे इस मुद्दे को ज़्यादा गहराई से नहीं जानते, इसलिए इस पर टिप्पणी नहीं करना चाहेंगे.
वहीं महाराष्ट्र में कुश्ती कई समस्याओं से जुझ रही है.
पिछले साल भारतीय कुश्ती महासंघ ने अलग-अलग कारणों की वजह से महाराष्ट्र, कर्नाटक और हरियाणा के फ़ेडरेशन की मान्यता रद्द कर दी थी.
हालाँकि जब कोर्ट में मामला पहुँचा, तो महाराष्ट्र की राज्य कुश्तीगीर परिषद की मान्यता को बहाल किया गया
कुश्ती प्रसारक और कुश्ती-मल्ल विद्या ग्रुप के प्रमुख गणेश मानुगडे बताते हैं, ''महाराष्ट्र में कुश्ती तो गुट में बँट गई है, ऐसे में उसका नेतृत्व कौन करेगा इसे लेकर ही असमंजस की स्थिति है.''
वे बताते हैं, ''कुश्ती से जुड़े लोग इसे हरियाणा बनाम यूपी देख रहे हैं और किसी का पक्ष नहीं लेना चाहते हैं. कोई पहलवान इसलिए नहीं बोलना चाहता क्योंकि उन्हें करियर के प्रभावित होने का डर है.''
जागरूकता लाने की ज़रूरत
गणेश मानुगडे कहते हैं कि ऐसे कई खिलाड़ी हैं, जिन्हें यौन उत्पीड़न की समझ नहीं होती और उन्हें पता नहीं होता कि इस मुद्दे को कैसे उठाया जाए.
वो बताते हैं- ये देखा गया है कि महाराष्ट्र में बड़ी संख्या में महिला कुश्ती खिलाड़ी आने लगी हैं. उन्हें प्रतिस्पर्धा के लिए तैयार किया जाता है, जिसमें उन्हें पुरुष खिलाड़ी के साथ अभ्यास कराया जाता है. ऐसे में अगर उनके साथ किसी प्रकार का दुर्व्यवहार होता है, तो उन्हें इसके बारे में उन्हें जागरूक किया जाना चाहिए ताकि वे अपने अधिकारों के बारे में जान सकें.
नाम न बताने की शर्त पर एक वरिष्ठ कोच कहते हैं कि वाकई अगर इन खिलाड़ियों के साथ यौन उत्पीड़न हुआ है, तो आगे जाकर ये ध्यान देना ज़रूरी है कि प्रशिक्षक और अभिभावक भी अलर्ट रहें.
वहीं विजय लोकपल्ली बताते हैं कि स्पोर्ट्स अथॉरिटी के किसी भी कैंप से पहले खिलाड़ियों और कोच की वर्कशॉप होती है, जिसमें बताया जाता है कि क्या करना चाहिए और क्या नहीं करना चाहिए.
वो कहते हैं कि जब भी महिला खिलाड़ियों के साथ पुरुष कोच जाते हैं, तो महिला एसिटेंट कोच साथ में रहती हैं. ताकि अगर कोई आरोप लगें, तो कम से कम दो कोच रहें.
ये मामला सामने आने के बाद अब ये और गंभीर तरीक़े से होगा और मंत्रालय की तरफ़ से भी निर्देश गए हैं कि ऐसे मामले सामने नहीं आने चाहिए.
वहीं राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने खेल और युवा मंत्रालय, भारतीय खेल प्राधिकरण, बीसीसीआई, भारतीय कुश्ती महासंघ और कई राष्ट्रीय खेल संघों को नोटिस भेजा है.
इन्हें ये नोटिस उन रिपोर्टों पर भेजा गया है, जिनमें ये कहा गया है कि इन संगठनों की अपनी आंतरिक शिकायत समिति (आईसीसी) नहीं है या कुछ के पास समिति तो है, लेकिन वो उचित तरीक़े से काम नहीं कर रही है.
इस बीच पहलवानों का प्रदर्शन जारी है और उन्होंने सरकार को 21 मई तक इस मुद्दे के समाधान के लिए अल्टीमेटम दिया गया है. प्रदर्शन कर रहे पहलवानों का कहना है कि अगर सरकार कोई फ़ैसला नहीं लेती, तो बड़ा फ़ैसला किया जाएगा.
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