अरब के देशों में मोदी सरकार की नीति की इतनी चर्चा क्यों?

    • Author, रजनीश कुमार
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

पिछले हफ़्ते रविवार को सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस और प्रधानमंत्री मोहम्मद बिन सलमान के साथ अमेरिका, भारत और यूएई के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की मुलाक़ात को काफ़ी अहम माना जा रहा है.

कहा जा रहा है कि खाड़ी के देशों में अमेरिका अपनी रणनीति में भारत को ख़ासा तवज्जो दे रहा है.

अरब वर्ल्ड में भारत की नई संभावनाओं की बात कही जा रही है. थिंक टैंक द विल्सन सेंटर में साउथ एशिया इंस्टीट्यूट के निदेशक माइकल कगलमैन ने अमेरिकी पत्रिका फॉरन पॉलिसी में लिखा है कि सऊदी अरब में तीनों देशों के एनएसए ने मिलकर जो प्रस्ताव रखा है, उससे यह संकेत मिलता है कि भारत और यूएई इंडो पैसिफिक के अलावा मध्य-पूर्व में चीन के प्रभाव को रोकने के लिए मिलकर काम करने की ओर बढ़ रहे हैं.

माइकल कगलमैन ने लिखा है, ''बाइडन प्रशासन का मानना है कि कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट के ज़रिए ही मध्य-पूर्व में चीन के बढ़ते प्रभाव को रोका जा सकता है.''

पश्चिम एशिया में उथल-पुथल का दौर चल रहा है. अरब के देश आपसी शत्रुता भुला फिर से साथ आ रहे हैं.

ईरान और सऊदी क़रीब आ रहे हैं तो सीरिया को फिर से अरब लीग में शामिल कर लिया गया है.

सऊदी अरब के किंग ने सीरिया के राष्ट्रपति बशर अल-असद को अरब लीग समिट में शामिल होने के लिए रियाद बुलाया है.

दूसरी तरफ़ ईरान, तुर्की और सीरिया के विदेश मंत्री रूस पहुँचे हैं.

साल 2011 में सीरिया में शुरू हुए गृह युद्ध के बाद इस तरह की पहली उच्चस्तरीय बैठक है.

कहा जा रहा है कि रूस तुर्की और सीरिया के बीच संबंध सामान्य कराने की कोशिश कर रहा है.

ऐसे में भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल का अमेरिका और यूएई के एनएसए के साथ सऊदी अरब में मिलना मायने रखता है.

एशिया सोसाइटी पॉलिसी इस्ंटीट्यूट के सीनियर फ़ेलो सी राजा मोहन ने लिखा है कि खाड़ी के देशों में भारत और अमेरिका की गर्मजोशी भारत की पारंपरिक नीति से बिल्कुल अलग है.

उन्होंने लिखा है कि मध्य-पूर्व में नेहरू की नीति रही थी कि भारत यहाँ अमेरिका का विरोध करे या उससे दूरी बनाकर रखे.

I2U2 में भारत का शामिल होना

लेकिन 2021 में अमेरिका के नेतृत्व में I2U2 में शामिल होकर भारत ने ख़ुद पर थोपे वैचारिक वर्जना को तोड़ दिया था. I2U2 में इसराइल, इंडिया, यूएई और अमेरिका शामिल हैं.

सी राजामोहन ने लिखा है, "मध्य-पूर्व में अमेरिका से हाथ मिलाना एकमात्र वर्जना नहीं थी, जिसे मोदी सरकार ने अपनी विदेश नीति में तोड़ी है. भारत ने उस विचार को भी ख़ारिज कर दिया कि इसराइल के साथ दोस्ती खुल कर नहीं दिखानी है. मोदी सरकार ने अरब के दो अहम देशों सऊदी अरब और यूएई के साथ असहज संबंध को भी ठोस रणनीतिक साझेदारी में तब्दील कर दिया है."

"कुछ साल पहले तक खाड़ी के सुन्नी किंगडम में भारत का अमेरिका और इसराइल के साथ आना कल्पना के तौर पर भी ख़ारिज कर दिया जाता. लेकिन अब भारत इस इलाक़े में अमेरिका, यूएई और सऊदी अरब के साथ खुल कर सामने आ रहा है."

गल्फ़ में अमेरिका एकमात्र पश्चिमी शक्ति नहीं है जिसके साथ भारत काम कर रहा है. गल्फ़ में फ़्रांस भी भारत का अहम साझेदार बनकर उभरा है. यूएई और फ़्रांस के साथ भारत त्रिपक्षीय वार्ता कर रहा है.

सी राजामोहन का कहना है, ''मध्य-पूर्व में नेहरू के ऐतिहासिक जियोपॉलिटकल भूमिका से पीछे हटने के कारण पाकिस्तान एंग्लो-अमेरिकन रणनीति में अहम बन गया था.''

लेकिन जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी में सेंटर फ़ॉर वेस्ट एशियन स्टडीज़ के प्रोफ़ेसर एके महापात्रा को ऐसा नहीं लगता है कि नेहरू की नीति के कारण पाकिस्तान अरब में पश्चिम के देशों के लिए ख़ास बना हुआ था.

महापात्रा कहते हैं, "सोवियत यूनियन ने 1979 में जब अफ़ग़ानिस्तान पर हमला किया तो अमेरिका, सऊदी अरब और पाकिस्तान मिल कर इस हमले को चुनौती दे रहे थे. क्या नेहरू को इस लड़ाई में सोवियत यूनियन के ख़िलाफ़ हो जाना चाहिए था? सऊदी अरब के सुन्नी कट्टरपंथ से पाकिस्तान का क्या संबंध रहा है, यह किसी से छुपी बात नहीं है. मुझे नहीं लगता है कि इसमें नेहरू की नीति की कोई ग़लती थी. तब हालत बिल्कुल अलग थे और अब हालात बिल्कुल अलग हैं."

इसराइल से दोस्ती

महापात्रा कहते हैं, "मोदी की मध्य-पूर्व नीति में खुल कर इसराइल के साथ आना बदली विश्व व्यवस्था के अनुरूप तो है ही बीजेपी के लिए घरेलू राजनीति में भी यह मुफीद है. जब इस्लामिक देश इसराइल के साथ अब्राहम एकॉर्ड के तहत रिश्ते सामान्य कर रहे थे तो भारत क्यों पर्दे के पीछे रहता. मोदी सरकार की तो इसराइल से वैचारिक क़रीबी भी है. मनमोहन सिंह की सरकार गठबंधन सरकार थी, इसलिए उनकी मजबूरी थी. इसी मजबूरी की वजह से वह इसराइल के साथ खुलकर नहीं आते थे. बीजेपी के साथ ऐसी कोई मजबूरी नहीं थी.''

शीत युद्ध के दौरान भारत ने किसी भी खेमे में नहीं रहने का फ़ैसला किया था और गुटनिरपेक्ष आंदोलन को आगे बढ़ाया था. पाकिस्तान और सऊदी अरब खुलकर अमेरिकी खेमे में थे. हालांकि बाद में भारत की गुटनिरपेक्षता सोवियत यूनियन की ओर झुकी मालूम होती है. 1955 में बग़दाद पैक्ट, इलाके़ में कम्युनिस्ट ख़तरों से बचने के लिए बना था. बग़दाद पैक्ट में ब्रिटेन, इराक़, ईरान और तुर्की के साथ पाकिस्तान भी अहम हिस्सा था.

बग़दाद पैक्ट को तब डिफ़ेंसिव ऑर्गेनाइज़ेशन कहा गया था. इसमें पाँचों देशों ने अपनी साझी राजनीति, सेना और आर्थिक मक़सद हासिल करने की बात कही थी.

यह नेटो की तर्ज़ पर ही था. 1959 में बग़दाद पैक्ट से इराक़ बाहर हो गया था. इराक़ के बाहर होने के बाद इसका नाम सेंट्रल ट्रीटी ऑर्गेनाइज़ेशन कर दिया गया था. बग़दाद पैक्ट को भी सोवियत यूनियन के ख़िलाफ़ देखा गया. दूसरी तरफ़ भारत गुटनिरपेक्षता की बात करते हुए भी सोवियत यूनियन के क़रीब लगता था.

सऊदी अरब और पाकिस्तान की दोस्ती के बारे में साल 2008 में ब्रुकिंग्स इंटेलिजेंस प्रोजेक्ट के सीनियर फ़ेलो और निदेशक ब्रुस रिडल ने लिखा था कि 1960 के दशक से अरब वर्ल्ड के बाहर पाकिस्तान को सऊदी अरब से जितनी मदद मिली, उतनी किसी को नहीं मिली.

पाकिस्तान का अप्रासंगिक होना

मिसाल के तौर पर मई 1998 में पाकिस्तान जब यह तय कर रहा था कि भारत के पाँच परमाणु परीक्षणों का जवाब देना है या नहीं, तब सऊदी अरब ने पाकिस्तान को हर दिन 50 हज़ार बैरल तेल मुफ़्त में देने का वादा किया था. इससे पाकिस्तान को परमाणु परीक्षण के बाद पश्चिमी देशों के आर्थिक प्रतिबंधों से लड़ने में काफ़ी मदद मिली थी.

अगर पाकिस्तान मध्य-पूर्व में पश्चिम समर्थित गुटों में अब भी प्रासंगिक बना रहता तो भारत इस इलाक़े में पश्चिम के लिए शायद ही इतना अहम बनता.

प्रोफ़ेसर महापात्रा को लगता है कि गल्फ़ की जियोपॉलिटिक्स जिस तरीक़े से बदल रही है, उसमें पाकिस्तान अब अप्रासंगिक हो गया है. पाकिस्तान को 1950 के दशक में एक उदार मुस्लिम राष्ट्र के रूप में देखा जाता था, लेकिन अब उसकी पहचान कट्टर इस्लामिक अतिवाद से सहानुभूति रखने वाले के रूप में बन चुकी है. बदलती जियोपॉलिटिक्स में पाकिस्तान अब पश्चिम के लिए अप्रासंगिक हो गया है और वह चीन के साथ खड़ा है. दूसरी तरफ़ पश्चिम और चीन के रिश्ते लगातार तल्ख़ हो रहे हैं.

जेएनयू में मध्य एशिया और रूसी अध्यययन केंद्र में असोसिएट प्रोफ़ेसर राजन कुमार कहते हैं कि मोदी सरकार ने गल्फ़ के बदलते समीकरण को ठीक से समझा है और इसी हिसाब से सार्थक क़दम उठाए हैं.

राजन कुमार कहते हैं कि जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने के बाद खाड़ी के इस्लामिक देशों का चुप रहना बताता है कि चीज़ें बदल चुकी हैं. ये वही सऊदी अरब है, जो कश्मीर पर पाकिस्तान के साथ रहता था.

नौ मई को इसराइल के विदेश मंत्री एली कोहेन नई दिल्ली आए थे. कोहेन ने इस दौरे में कहा कि भविष्य में अरब के ट्रेन के ज़रिए भारत का सामान इसराइल के हाफ़िया पोर्ट आएगा.

कॉन्फ़ेडरेशन ऑफ़ इंडियन इंडस्ट्री की ओर से आयोजित इंडिया-इसराइल बिज़नेस फ़ोरम को संबोधित करते हुए एली कोहेन ने कहा था, "हमारा विज़न है कि इसराइल, खाड़ी के अरब देश और भारत पूरब से पश्चिम का दरवाज़ा बनें. भारत के सामान अरब के पोर्ट पर आएंगे और यहाँ से ट्रेन के ज़रिए इसराइल के हाफ़िया पोर्ट पहुँचेंगे और फिर यहाँ से यूरोप भेजे जाएंगे."

कहा जा रहा है कि भारत मध्य-पूर्व का ब्रेडबास्केट बनना चाहता है और इसराइल को भारत के इस लक्ष्य में अहम सहयोगी माना जा रहा है.

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