इसराइल जिस समझौते से ख़ुश था, उसका असर अरब में ऐसा क्यों

अरब दुनिया और इसराइल के बीच की शत्रुता 1967 में छह दिनों के भीषण युद्ध के बाद से और बढ़ गई थी.

इस युद्ध में इसराइल की जीत हुई थी. अरब देशों को एकजुट होकर भी हार का सामना करना पड़ा था.

इस बात को अब लगभग 55 साल बीत चुके हैं. लेकिन आज भी अरब देशों और इसराइल के आपसी संबंधों में कटुता कम होती नहीं दिख रही है.

दुनिया की सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाले देश इंडोनेशिया से लेकर सबसे समृद्ध मुस्लिम मुल्कों में गिने जाने वाले क़तर के आज भी इसराइल के साथ राजनयिक संबंध नहीं हैं.

ट्रंप ने कराया था समझौता

इसराइल के सबसे बड़े रणनीतिक पार्टनर अमेरिका ने अरब दुनिया और इसराइल के बीच संबंध सुधारने की दिशा में पहल शुरू की थी.

ट्रंप प्रशासन के दौर में शुरू हुई इस पहल के तहत संयुक्त अरब अमीरात, मोरक्को, सूडान और बहरीन ने साल 2020 में 'अब्राहम अकॉर्ड' पर हस्ताक्षर किए थे. इसके बाद इन देशों ने इसराइल से राजनयिक रिश्ता कायम करने का फ़ैसला किया था.

बाइडन सरकार की ओर से भी इस्लामिक देशों के इसराइल से राजनयिक संबंध कायम करवाने की कोशिश की गई लेकिन कामयाबी नहीं मिली थी.

पिछले साल क़तर में आयोजित हुए फ़ुटबॉल वर्ल्ड कप में इन कोशिशों का दूसरा पहलू भी सामने आया.

फ़ुटबॉल के मैदानों और उनसे बाहर जो कुछ दिखा, उससे पहले उन आंकड़ों की बात करते हैं जोस दूसरी हक़ीक़त दिखाते हैं.

संयुक्त अरब अमीरात ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया है कि साल 2021 में इसराइल से संयुक्त अरब अमीरात पहुंचने वाले पर्यटकों की संख्या 97 हज़ार से ज़्यादा थी.

साल 2022 में 2021 की तुलना में इसराइली पर्यटकों की संख्या में 157 फ़ीसद की बढ़ोतरी दर्ज की गई है.

संयुक्त अरब अमीरात के समाज पर भी इसका असर पड़ता दिख रहा है.

जर्मनी के पब्लिक ब्रॉडकास्टर डी डब्ल्यू ने अपनी एक रिपोर्ट में बताया है कि भारी संख्या में इसरायली पर्यटकों के संयुक्त अरब अमीरात और ख़ासकर दुबई पहुंचने की वजह से वहां के समाज में तब्दीली आती दिख रही है.

बदलता संयुक्त अरब अमीरात

दुबई के यहूदी सामुदायिक केंद्र ने अबु धाबी पर्यटन की ज़िम्मेदारियां संभालने वाले अधिकारियों के साथ एक अनुबंध किया है. इसके तहत होटलों और खानपान केंद्रों को कोशर (यहूदी विधि सम्मत) खान-पान के लिए ट्रेनिंग दी जानी है.

इसके साथ ही बीते महीने दुबई में खाड़ी देशों का पहला कोशर सुपर-मार्केट खोला गया है, जहां जाकर दुबई में रहने वाले यहूदी अपने धार्मिक रीति रिवाज़ों के मुताबिक़ खाने-पीने का सामान ले सकते हैं.

संयुक्त अरब अमीरात इसराइल से आने वाले पर्यटकों के साथ-साथ इसराइली प्रवासियों के लिए भी ख़ुद को तैयार कर रहा है. इसमें यहूदी धर्म के मुताबिक़, धार्मिक बाथ मिखवा का निर्माण शामिल है. इसके साथ ही दुबई में एक यहूदी स्कूल बनाया जा रहा है. यहां के स्थानीय रबाई लेवी डकमैन किसी सेलिब्रिटी से कम नहीं हैं.

लेकिन दुबई में रहने वाले इसराइली लोगों को भी स्थानीय रीति रिवाजों को ध्यान रखने की सलाह दी गई है.

इनमें सार्वजनिक रूप से एक दूसरे को किस करने और सड़क पर लाइन क्रॉस करने से बचने की सलाह शामिल है.

ये भी बताया गया है कि दुबई में चिल्लाना न सिर्फ़ असभ्य बल्कि अनुचित माना जाता है. किसी को भी गाली देने, अपमानित या परेशान करने पर जेल या निर्वासन की सज़ा दी जा सकती है.

बढ़ रहा है व्यापार

अब्राहम समझौते के बाद संयुक्त अरब अमीरात और इसराइल के बीच व्यापार बढ़ने के संकेत भी मिल रहे हैं.

अर्थशास्त्री मानते हैं कि इस समझौते की वजह से इन दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़ने की संभावनाएं काफ़ी ज़्यादा हैं. इसराइल जहां तकनीक और सैन्य तकनीक के क्षेत्र में मजबूत है.

वहीं, संयुक्त अरब अमीरात खाड़ी देशों में दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है. वह तेल से हटकर दूसरे क्षेत्रों में बढ़ने की कोशिश करता दिख रहा है.

दुबई स्थित डेटा एवं आर्थिक शोध फर्म एल्गोरिद्म रिसर्च की संस्थापक केतकी शर्मा ने बीबीसी के साथ बातचीत में बताया है कि अगले पांच सालों में दोनों देशों में व्यापार दस अरब डॉलर के पार चला जाएगा.

उन्होंने कहा है, "ये समझौता 2020 में हुआ था और इतने कम समय में ही इसने दोनों देशों के बीच व्यापार काफ़ी बढ़ा दिया है."

वह संयुक्त राष्ट्र की ओर से जारी उस आंकड़े की ओर इशारा करती हैं जिसके मुताबिक़ साल 2020 से 2021 में इसराइल का संयुक्त अरब अमीरात को निर्यात 7.4 करोड़ डॉलर से बढ़कर 38.4 करोड़ डॉलर हो गया है.

केतकी शर्मा ने बताया कि "दोनों देशों के बीच कृषि, क्लीन एनर्जी, साइबर सुरक्षा और स्मार्ट शहर जैसे क्षेत्रों में समझौते हुए हैं. दोनों देशों के बीच 2022 की शुरुआत में एक मुक्त व्यापार समझौते पर भी हस्ताक्षर किए गए थे, जिसके बाद दोनों देशों के बीच ख़रीदे-बेचे जाने वाले 96% सामान शुल्क मुक्त हो गए हैं."

लेकिन जनता में दूरियां बरकरार

इसराइल और संयुक्त अरब अमीरात के बीच व्यापारिक गठजोड़ भले ही मज़बूत होता दिख रहा हो.

लेकिन इसराइल और अरब देशों की जनता के बीच आपसी रिश्तों पर नज़र डालें तो सरकारों के बीच पनपते इस रिश्ते की दरारें नज़र आती हैं.

उदाहरण के लिए, इसराइल से दुबई समेत दूसरे अरब मुल्कों में पहुंचने वाले पर्यटकों की संख्या बढ़ती दिख रही है लेकिन अरब मुल्कों से इसराइल पहुंचने वाले पर्यटकों की संख्या अभी भी हज़ारों में ही है.

इसराइल के प्रतिष्ठित अख़बार हारेत्ज़ में प्रकाशित ख़बर के मुताबिक़, मार्च 2022 बाद से संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन और मोरक्को से कुल मिलाकर 3600 पर्यटक इसराइल पहुंचे हैं.

यही नहीं क़तर में हुए फ़ुटबॉल मैच के दौरान जो मंजर देखने को मिला, उसके बाद इस समझौते पर सवाल खड़े हुए हैं. टूर्नामेंट कवर करने आए इसराइली मीडिया को अरब देशों के फ़ुटबॉल प्रेमियों के बहिष्कार का सामना करना पड़ा.

फ़लस्तीनियों के लिए समर्थन

क़तर की सार्वजनिक जगहों पर फ़लस्तीनियों के समर्थन में पोस्टर नज़र आए. यही नहीं, स्टेडियम के बाहर इसराइली पत्रकारों के सामने फ़लस्तीन के समर्थन में नारेबाजी और फ़लस्तीनी प्रशासन के झंडे लहराए गए.

इराक़ और अरब देशों को कवर करने वाले अमवाज मीडिया ने लिखा है, ''फ़ीफ़ा वर्ल्ड कप में फ़लस्तीनियों के समर्थन में जो सेंटिमेंट दिखा, वह पर्यवेक्षकों के लिए हैरान करने वाला है. यह इसराइल और अमेरिका के लिए भी हैरान करने वाला रहा.

कई लोग अब्राहम समझौते की सीमाओं को समझने में नाकाम रहे थे. कहा जा रहा था कि अरब में इसराइल की स्वीकार्यता बढ़ रही है, लेकिन फ़ीफ़ा वर्ल्ड कप में अरब देशों के आम लोगों के बीच बिल्कुल उलट स्थिति थी.''

अमवाज मीडिया ने लिखा है कि इन चारों देशों ने सरकार के स्तर पर इसराइल से औपचारिक रिश्ते भले कायम कर लिए हैं, लेकिन वहाँ के आम लोगों की प्रतिक्रिया कुछ और ही है. अरब के बाक़ी देशों में भी इसराइल को लेकर नाराज़गी कम नहीं हुई है.

इसके साथ ही अमवाज मीडिया ने लिखा कि 'इसराइल अरब देशों की सरकारों के साथ शांति कायम कर रहा है, यह अलग चीज़ है, लेकिन अरब के आम लोगों के बीच इसराइल को लेकर क्या राय है, यह दूसरी बात है. यह बात स्पष्ट हो गई है कि अरब के जिन देशों ने इसराइल से रिश्ते सामान्य किए हैं, उससे वहाँ के आम लोग सहमत नहीं हैं.''

इस पूरे मामले पर अमवाज मीडिया से यूनिवर्सिटी ऑफ़ डेनवर में सेंटर फ़ॉर मिडिल ईस्ट स्टडीज़ के निदेशक डॉक्टर नादेर हाशमी ने कहा है, ''वर्ल्ड कप में अरब के लोगों और खिलाड़ियों के बीच फ़लस्तीनियों के प्रति सहानुभूति बताती है कि अरब की सरकारों और आम लोगों के बीच इसराइल को लेकर अलग-अलग राय है.

अब्राहम समझौता आम लोगों के बीच बुरी तरह से अलोकप्रिय हो रहा है. अरब देशों में जैसे-जैसे खुलापन बढ़ेगा और लोकतंत्र आएगा वैसे-वैसे अब्राहम समझौता और कमज़ोर पड़ेगा. अरब के आम लोग चाहते हैं कि फ़लस्तीनियों को बराबर का हक़ मिले.''

मध्य-पूर्व के मीडिया में कहा जा रहा है कि क़तर में वर्ल्ड कप का आयोजन अरब के प्रशंसकों के लिए मौक़ा था कि वे इसराइल से रिश्ते सामान्य करने के मामले में खुलकर बोलें. फ़लस्तीनियों की तरह अरब के बाक़ी देशों के लोगों को इसराइलियों से आमना-सामना नहीं होता है.

ऐसे में वर्ल्ड कप उनके लिए एक मौक़ा था कि इसराइलियों के मुँह पर अपना विरोध दर्ज कराएं. अरब के आम लोगों के मन में यह बात भी थी कि अगर वे ऐसा करेंगे तो ग्लोबल मीडिया के ज़रिए पूरी दुनिया को अपना विरोध बता पाएंगे.

अरब न्यूज़ ने लिखा है कि इसराइली मीडिया के सामने अरब के आम लोगों का जवाब काफ़ी वायरल हुआ है. 18 नवंबर का एक वीडियो वायरल हुआ है, जिसमें क़तर के एक व्यक्ति ने इसराइली टीवी चैनल के रिपोर्टर से बात करने से इनकार कर दिया.

इसके दो दिन बाद एक और वीडियो की चर्चा हुई जिसमें लेबनान के लोगों ने इसराइली पत्रकारों से बात करने से इनकार कर दिया.

एक व्यक्ति ने चैनल 12 के रिपोर्टर से कहा, ''इसराइल के लिए कोई जगह नहीं है. सारा फ़लस्तीन है.''

इसराइलियों से नफ़रत?

क़तर में फ़ुटबॉल वर्ल्ड कप के दौरान अरब प्रशंसकों की ओर से इसराइल का बहिष्कार काफ़ी विवादों में रहा था. इसराइल के पत्रकारों ने सोशल मीडिया पर इसे लेकर कड़ी प्रतिक्रिया भी दी.

इसराइल के पत्रकार राज़ शेचिंक ने 26 नवंबर को ट्विटर पर एक वीडियो शेयर किया था जिसमें अरबी लोग फ़लस्तीनी झंडा लिए हुए हैं और इसराइली पत्रकार का विरोध कर रहे हैं.

इसमें महिलाएं और पुरुष दोनों शामिल हैं. लोग कह रहे हैं कि इसराइल कहीं नहीं है, सारा इलाक़ा फ़लस्तीनी है.

इस वीडियो में 'एक नौजवान पत्रकार से पूछ रहा है, ''आप कहाँ से हैं? पत्रकार ने कहा कि इसराइल से. इतना सुनते ही वह नौजवान फ़लस्तीनी झंडा लिए आगे बढ़ जाता है और कहता है कि मैं इसराइल को देश नहीं मानता हूँ. केवल फ़लस्तीन है.

इसी दौरान बुर्के़ में दो लड़कियां आती हैं और वे भी वही बात दोहराती हैं. फिर मोरक्को के प्रशंसक आते हैं और वे भी इसराइली पत्रकार से बात करने से इनकार कर देते हैं.

मोरक्को के प्रशंसक से इसराइली पत्रकार कहता है कि आपके देश ने तो इसराइल के साथ शांति समझौते पर हस्ताक्षर किया है. इस पर मोरक्को के प्रशंसक कहते हैं, कोई इसराइल नहीं है. केवल फ़लस्तीन है.''

इसराइली पत्रकार इसी दौरान एक इसराइली नागरिक से बात करता है तभी पीछे से आकर लोग फ़लस्तीन का नारा लगाने लगते हैं. नारे में लोग कहते हैं- कोई इसराइल नहीं है. केवल फ़लस्तीन है.

इसराइल के पत्रकार राज़ शेचिंक ने ट्विटर पर इस वीडियो को पोस्ट करते हुए लिखा था कि, ''मैं कुछ लिखना नहीं चाहता हूँ. आप ख़ुद ही सुन लीजिए. हम हमेशा एक पत्रकार के रूप में रहते हैं. यह एक खेल का महा आयोजन है, लेकिन यहाँ जो कुछ भी चल रहा है, उसे मैं शेयर नहीं कर सकता. हम लोगों को लेकर यहाँ पर्याप्त नफ़रत है.''.

इसराइल को क्यों स्वीकार नहीं करती अरब जनता

लेकिन सवाल ये उठता है कि ओबामा से लेकर ट्रंप और बाइडन सरकारों की ओर से लगातार की जाती कोशिशों के बावजूद भी अरब देशों की जनता इसराइल को स्वीकार क्यों नहीं कर पाती.

इस सवाल का इसराइली जवाब इसराइली प्रधानमंत्री रहे यित्ज़हाक शमीअ के उस बयान में मिलता है जो उन्होंने अब्राहम समझौते जैसे ही एक दूसरे समझौते ओस्लो अकॉर्ड के बाद दिया था.

इस समझौते का मकसद भी इसराइल और उसके पड़ोसियों के बीच शांति कायम करवाना था.

इस समझौते पर शमीअ ने साल 1996 में कहा था - 'ये समंदर भी पहले जैसा समंदर है और अरब भी पहले जैसे अरब हैं.'

शमीअ का ये बयान भले ही दो दशक से ज़्यादा पुराना हो गया हो लेकिन इसराइली राजनीति में इसकी झलक आज भी देखी जा सकती है.

इस सवाल पर अरब देशों की जनता का जवाब उन ओपिनियन पोल में मिलता है जो अब्राहम समझौते से ठीक पहले किया गया था.

अरब सेंटर फॉर रिसर्च एंड पॉलिसी स्टडीज़ ने 13 देशों में एक ओपिनियन पोल करवाया था जिसका मकसद अरब देशों की जनता का मन भांपना था.

वॉशिंगटन पोस्ट में प्रकाशित ख़बर के मुताबिक़, इस पोल में सामने आया था कि सऊदी अरब, कुवैत, और क़तर में दस फीसद से भी कम जनता उनकी सरकारों के इसराइल के साथ करार का समर्थन करती है.

सऊदी अरब में ये आंकड़ा सिर्फ़ छह फीसद था. यही नहीं, आम लोगों के साथ-साथ और कुछ ख़ास हस्तियों ने भी सोशल मीडिया पर इस तरह के करारों का मुखर विरोध दर्ज किया जिसके बाद सरकारों को कार्रवाई तक करनी पड़ी.

अमेरिकी थिंक टैंक विल्सन सेंटर ने इस मुद्दे पर किए एक प्रकाशित एक विश्लेषण में पाया है कि 'अरब देशों की जनता इस तरह के समझौतों का विरोध इसलिए करती है क्योंकि उसे लगता है कि इन समझौतों से सिर्फ़ इसराइल को फायदा होता है. और उनकी सोच अतार्किक भी नहीं है क्योंकि इससे पहले हुए मिस्र और जॉर्डन समझौते में भी ऐसे प्रावधान नहीं थे जिनके आधार पर फ़लस्तीन और इसराइल के बीच दो राष्ट्र समझौता हो सके.'

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कॉपी- अनंत प्रकाश

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