इसराइली मंत्री के अल-अक़्सा मस्जिद जाने पर भड़के इस्लामिक देश, इसराइल बोला- धमकी से डरेंगे नहीं

इसराइल के राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री और धुर-दक्षिणपंथी नेता इतमार बेन गिवीर ने मंगलवार को यरुशलम में अल-अक़्सा मस्जिद के परिसर का दौरा किया.

इसे फ़लस्तीनी प्रशासन ने "उकसावे" वाला क़दम बताया है. ये दौरा इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि बिन्यामिन नेतन्याहू के प्रधानमंत्री बने अभी एक सप्ताह भी पूरा नहीं हुआ है और इसराइल-फ़लस्तीनियों के बीच दशकों से जारी विवाद फिर से गहराने लगा है.

सऊदी अरब, यूएई सहित कई अन्य मुस्लिम देशों के साथ चीन ने इस दौरे पर आपत्ति जताई है और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक बुलाई है.

अल-अक़्सा मस्जिद को मक्का-मदीना के बाद इस्लाम में तीसरा सबसे पवित्र स्थल माना जाता है. वहीं, यहूदियों के लिए भी ये सबसे पवित्र जगह मानी जाती है.

जॉर्डन ने वेस्ट बैंक और पूर्वी यरुशलम पर सन् 1948 से लेकर 1967 में हुए छह दिनों तक युद्ध से पहले तक राज किया था.

इस युद्ध के बाद इसराइल ने इस क्षेत्र पर आधिपत्य स्थापित कर लिया था.

हालांकि, जॉर्डन और इसराइल के बीच हुई शांति संधि के तहत यरुशलम के ईसाई और मुस्लिम धार्मिक स्थलों की निगरानी का अधिकार जॉर्डन को मिला.

यहूदी मस्जिद परिसर में जा सकते हैं लेकिन उनके प्रार्थना करने पर रोक है. इसलिए इतमार बेन गिवीर के इस दौरे को फ़लस्तीनी यथास्थिति बदलने की कोशिश के तौर पर देख रहे हैं.

इसराइली मंत्री इतमार बेन गिवीर सुरक्षा घेरे के साथ इस परिसर में पहुँचे थे.

फ़लस्तीन के विद्रोही गुट हमास से मिली चेतावनियों के बीच इस दौरे के बाद बेन गिवीर ने ट्वीट किया, "टेंपल माउंट सबके लिए खुला है. हमारी सरकार हमास की धमकियों के सामने आत्मसमर्पण नहीं करेगी."

वहीं, फ़लस्तीनी क्षेत्र के प्रधानमंत्री मोहम्मद श्तेयाह ने इस दौरे को "मस्जिद को यहूदी मंदिर" में बदलने की कोशिश बताया है.

ये दौरा बिना किसी अप्रिय घटना के पूरा हुआ लेकिन इसके बाद इसराइल और फ़लस्तीनी प्रशासन के बीच पहले से जारी टकराव के और बढ़ने की आशंका जताई जा रही है.

अल-अक्सा मस्जिद इतनाज़रूरी क्यों?

ये पहली बार नहीं है, जब यरुशलम स्थित अल अक़्सा मस्जिद इसराइल और फ़लस्तीन के बीच विवाद का अखाड़ा बनी हो.

बीते साल भी यहां फ़लस्तीनियों और इसराइली सुरक्षाबलों के बीच झड़प हुई थी और फिर हमास और इसराइल के बीच संघर्ष शुरू हो गया था.

यहां ये जानना ज़रूरी है कि अल-अक़्सा मस्जिद इसराइल और फ़लस्तीनियों दोनों के लिए इतना अहम क्यों है.

दरअसल, पूर्वी यरुशलम में स्थित यह यहूदियों की सबसे पवित्र जगह है और इस्लाम में भी इसे तीसरे सबसे पवित्र स्थल के रूप में माना जाता है.

यहूदियों के लिए 'टेंपल माउंट' और मुसलमानों के लिए 'अल-हराम अल शरीफ़' के नाम से मशहूर पावन स्थल में 'अल-अक़्सा मस्जिद' और 'डोम ऑफ़ द रॉक' भी शामिल है.

'डोम ऑफ़ द रॉक' को यहूदी धर्म में सबसे पवित्र स्थल का दर्जा दिया गया है. पैग़ंबर मोहम्मद से जुड़े होने के कारण 'डोम ऑफ़ द रॉक' को मुसलमान भी पावन स्थल मानते हैं.

इस धार्मिक स्थल पर ग़ैर-मुसलमानों की प्रार्थना पर पाबंदी लगी हुई है.

इस परिसर का प्रबंधन जॉर्डन के वक्फ़ द्वारा किया गया जाता है, जबकि सुरक्षा इंतज़ामों पर इसराइल का नियंत्रण है.

लंबे समय से यहाँ केवल मुस्लिम ही नमाज़ पढ़ सकते हैं और कुछ विशेष दिनों में ही ग़ैर-मुस्लिमों को परिसर में प्रवेश की इजाज़त है लेकिन वे यहां प्रार्थना नहीं कर सकते..

दौरे पर भड़के मुस्लिम देश

सऊदी अरब के विदेश मंत्रालय ने इसराइली मंत्री के दौरे को 'भड़काऊ' बताते हुए इसकी निंदा की है. साथ ही फ़लस्तीन के प्रति अपने समर्थन वाले रुख़ को दोहराया है.

सऊदी ने कहा है कि इसराइली मंत्री का ये क़दम अंतरराष्ट्रीय शांति प्रयासों को कमज़ोर करने वाला है, जो धर्म संबंधित विषयों में अंतरराष्ट्रीय सिद्धांतो और मानदंडों का उल्लंघन करता है.

जॉर्डन ने भी इसराइल के मंत्री के दौरे की कड़ी निंदा की है और इसे अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों का उल्लंघन करार दिया है. विदेश मंत्री सिनान मजाली ने एक बयान में कहा है, "इस क़दम के गंभीर परिणामों के लिए सिर्फ़ और सिर्फ़ इसराइल ज़िम्मेदार होगा."

जॉर्डन ने विरोध जताने के लिए इसराइल के राजदूत को भी तलब किया है.

वहीं, लेबनान के सशस्त्र अतिवादी गुट हिज़बुल्लाह के नेता हसन नसरल्लाह ने कहा है कि यरुशलम में अल-अक़्सा मस्जिद में दशकों से चली आ रही यथास्थिति का कोई भी उल्लंघन केवल फ़लस्तीनी इलाक़ों में नहीं बल्कि इस पूरे क्षेत्र में विस्फोट का कारण बन सकता है.

गज़ा पट्टी को लेकर अहम मध्यस्थ की भूमिका निभाने वाले मिस्र के विदेश मंत्रालय ने इस दौरे को कब्जे वाले फ़लस्तीनी क्षेत्रों और आस-पास के इलाक़ों में सुरक्षा और स्थिरता पर नकारात्मक असर डालने वाली कार्रवाई बताया है.

वहीं, ईरान ने इस दौरे के बाद इसराइल को मुस्लिम देशों की प्रतिक्रिया का सामना करने की चेतावनी दी है.

ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता नासिर कनानी ने कहा है, "अल अक़्सा सहित फ़लस्तीन के पवित्र स्थानों में ये हरकत अंतरराष्ट्रीय नियमों के उल्लंघन का एक उदाहरण है और मुसलमानों के मूल्यों का अपमान है. ऐसा करने पर मुस्लिम देशों की प्रतिक्रिया का सामना करना होगा."

संयुक्त अरब अमीरात ने बयान जारी कर अल-अक़्सा मज्सिद परिसर में "खतरनाक और उकसावे भरे उल्लंघनों को रोकने" पर ज़ोर दिया है. इसके अलावा यूएई ने इसराइली अधिकारियों से 'गतिरोध कम करने' और इस क्षेत्र में तनाव बढ़ाने वाले किसी भी क़दम से बचने को कहा है.

गुरुवार को हो सकती है सुरक्षा परिषद की बैठक

यूएई और चीन ने तनाव बढ़ने की चेतावनियों के बीच इसराइली मंत्री के अल-अक़्सा मस्जिद के दौरे पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की बैठक बुलाई है.

समाचार एजेंसी रॉयटर्स ने कई अधिकारियों के हवाले से बताया है कि सुरक्षा परिषद की बैठक गुरुवार को हो सकती है.

इसराइल के क़रीबी माने जाने वाले अमेरिका ने भी इस यात्रा को लेकर चिंता ज़ाहिर की है और यथास्थिति बरकरार रखने को कहा है.

अमेरिका के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता नेड प्राइस ने कहा, "हम यथास्थिति को बदलने की क्षमता रखने वाले किसी भी एकतरफ़ा कार्रवाई से चिंतित हैं."

उन्होंने कहा, "यथास्थिति को बदलने वाली किसी भी तरह की एकतरफ़ा कार्रवाई अस्वीकार्य है. अमेरिका यरुशलम के पवित्र स्थल के मामले में ऐतिहासिक यथास्थिति को बनाए रखने के अपने रुख़ पर बना हुआ है."

अल अक़्सा की यथास्थिति बदलने की कोशिश?

इस्लामिक सहयोग संगठन यानी ओआईसी ने इसराइली मंत्री के दौरे को अल-अक़्सा मस्जिद की मौजूदा स्थिति को बदलने की कोशिश बताया है.

गिवीर के दौरे की निंदा करते हुए ओआईसी ने कहा है, "ये अल-अक़्सा मस्जिद की मौजूदा ऐतिहासिक और क़ानूनी स्थिति को बदलने के लिए इसरायल के प्रयासों का हिस्सा है."

"ये मुसलमानों की भावनाओं को उकसाने के लिए किया गया है और अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों का उल्लंघन करता है."

हमास ने दी थी "लाल रेखा न पार" करने की चेतावनी

फ़लस्तीन के अतिवादी गुट हमास ने इतमार बेन गिवीर के दौरे से पहले ही चेतावनी दी थी कि इस तरह की कार्रवाई 'लाल लक़ीर' पार करने के समान होगी.

गावीर ओत्ज़मा यहूदित (यहूदी शक्ति) पार्टी के नेता हैं. गावीर लंबे समय से ये कहते आ रहे हैं कि वो इस पवित्र स्थल के नियमों को बदलना चाहते हैं ताकि यहूदियों को भी यहां प्रार्थना करने का अधिकार मिले.

समाचार एजेंसी एएफ़पी के अनुसार, हमास ने इस दौरे को 'अपराध' बताते हुए कहा है कि ये पवित्र स्थल हमेशा "फ़लस्तीनी, अरब और इस्लाम" से जुड़ा रहेगा.

गावीर ने अपने दौरे पर यहां प्रार्थना की या नहीं इस बारे में कोई जानकारी नहीं मिली है.

दौरे के बाद बेन गिवीर ने ट्वीट किया, "टेंपल माउंट सबके लिए खुला है और अगर हमास सोचता है कि वो मुझे डरा देगा, तो उन्हें समझ जाना चाहिए कि अब समय बदल चुका है. हम ऐसी सरकार हैं जो हमास की धमकियों के आगे आत्मसमर्पण नहीं करती. टेंपल माउंट इसराइल के लोगों के लिए सबसे महत्वपूर्ण स्थल है. हम मुसलमानों और ईसाइयों के प्रार्थना की आज़ादी को मानते हैं लेकिन यहूदियों को भी उस जगह जाने का हक है."

बीते साल नवंबर में हुए चुनावों के दौरान बेन गावीर ने कहा था कि वो बेन्यामिन नेतन्याहू से इस पवित्र स्थल पर यहूदियों को 'बराबर हक' दिए जाने की मांग करेंगे.

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