इसराइल: नेतन्याहू के दक्षिणपंथी सहयोगियों को लेकर क्यों ख़ौफ़ में हैं फ़लस्तीनी

    • Author, टॉम बेटमैन
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, हेब्रॉन

कुछ दिन पहले हेब्रॉन में यासिर अबु मरखिया के घर पर हमला हुआ. इस बारे में बात करने के लिए मैं उनके घर पहुंचा, लेकिन यासिर कुछ भी बताने की हालत में नहीं हैं.

उनके जांघ के बीच वाले संवेदनशील हिस्से में बेतहाशा दर्द था. हमले के दौरान अबु मरखिया को बुरी तरह पीटा गया था.

हमारे कैमरे ने अभी रिकार्डिंग शुरू ही की थी कि मेरे प्रोड्यूसर ने ज़ोर से आवाज़ लगाई, "भागो, यहूदी प्रदर्शनकारी पत्थरों से हमला कर रहे हैं."

जब तक हम इस फ़लस्तीनी परिवार के साथ बाहर भागे, तब तक गार्डन में दो इसराइली शख़्स दाख़िल हो चुके थे, उनके पीछे कुछ सैनिक भी थे.

इनमें से एक शख़्स हमारी तरफ बढ़ा और फ़लस्तीनी परिवार को देखते हुए चिल्ला कर बोला, "भाग जाओ, यहां से. छोड़ दो ये जगह."

लेकिन अबु मरखिया भागे नहीं बल्कि अपने फ़ोन के कैमरे में घटना का वीडियो बनाते हुए ख़तरे का सामना करने के लिए उस इसराइली शख़्स की तरफ बढ़े.

एक इसराइली सैनिक ने उन्हें रोकने की कोशिश की. इसी बीच इसराइली हमलावर ने आगे बढ़कर अबू मरखिया के पेट के निचले हिस्से में ज़ोर की लात मारी.

हम जिस परिवार का इंटरव्यू करने पहुंचे थे उस पर हुआ हमला वहां ख़ौफ के हालातों को बयां करता है. हेब्रॉन में रहने वाले फ़लस्तीनी बताते हैं कि इसराइल में हालिया चुनाव में बिन्यामिन नेतन्याहू की जीत के बाद वो लोग लगातार ऐसे हमलों की आशंका में जी रहे हैं.

इसराइल के चुनाव नतीजों में धुरदक्षिणपंथी विचारधारा को व्यापक जनसमर्थन मिला है. इसकी वजह से हेब्रॉन और दूसरी जगहों पर यहूदी बस्तियां बसाने का समर्थन करने वाली कट्टर राष्ट्रवादी ताकतें और मज़बूत हुई हैं.

इस कारण इसराइली समाज में पुरानी सांस्कृतिक लड़ाई फिर से तेज़ होने लगी है और विवादित क्षेत्रों में सेना की भूमिका बढ़ने को लेकर चर्चा शुरू हो गई है.

अबू मरखिया पर हमले के वक्त वहां काफी देर तक गतिरोध बना रहा. हमने अपना कैमरा बंद नहीं किया.

परिवार की मदद करने वाले एक फ़लस्तीनी कार्यकर्ता बडी वाएक कहते हैं, "इसराइली सैनिक फ़लस्तीनियों की सुरक्षा के लिए कुछ नहीं करते. इस तरह का हमला अगर किसी फ़लस्तीनी ने किया होता तो उसे या तो गोली मार दी जाती या फिर जेल में बंद कर दिया जाता."

बडी वाएक इस तरह के सुनियोजित भेदभाव के ख़िलाफ़ लगातार आवाज़ उठाते रहे हैं. वो बताते हैं, "वेस्ट बैंक के इलाक़े में बसाए गए इसराइली लोग अगर किसी फ़लस्तीनी बाशिंदों के ख़िलाफ़ हिंसा करते हैं, तो उनकी जवाबदेही शायद ही कभी तय की जाती है."

इसका उदाहरण हमने खुद अपनी आंखों से देखा. अबू मरखिया पर हमला करने वाला इसराइली शख़्स अपनी कार की तरफ बढ़ा तो मौक़े पर मौजूद सैनिक ने उसके साथ हाथ मिलाया और फिर बड़े आराम से अपनी कार में बैठकर वहां से चला गया.

वहीं अबू मरखिया उसी जगह पर नीचे गिरे हुए थे और उनके पड़ोसी उनकी मदद कर रहे थे.

इस घटना के बारे में हमने इसराइल डिफेंस फ़ोर्सेज के अधिकारियों से बात की. उन्होंने बताया कि सैनिकों का काम है फ़लस्तीनियों के खिलाफ़ हर तरह की हिंसा को रोकना और ज़रूरी हो तो अभियुक्त को पुलिस के पहुंचने तक हिरासत में रखना.

ये बात पुलिस भी कहती रही है कि वो यहूदी-फ़लस्तीनी बस्तियों को लेकर होने वाले झगड़े की जांच गंभीरता से करती है, लेकिन मानवाधिकार संगठनों से जुड़े लोग बताते हैं कि ये 'सफ़ेद झूठ है.'

हाशिये से मुख्यधारा तक

इस साल नवंबर में इसराइल में जो चुनाव हुए उनमें ज़ियोनिज़्म विचारधारा वाले धार्मिक और धुरदक्षिणपंथी गठबंधन ने 120 सदस्यों वाली संसद में 14 सीटों पर जीत हासिल की. ये गठबंधन प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू की नई सरकार में सबसे बड़ा और ताकतवर घटक बन गया है.

इसी गठबंधन के एक नेता इतमार बेन-ग्वेर को राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री और इसराइल पुलिस के साथ-साथ यहूदी कब्ज़े वाले वेस्ट बैंक का इंचार्ज बनाया गया है. इतमार यहूदी बस्तियां बसाने का समर्थन करने वाले कट्टर राष्ट्रवादी विचारधारा दल ओज़्मा येहूदीत के नेता हैं. ये पार्टी नस्लवाद और अरब विरोधी नीतियों की समर्थक है.

इतमार युवा यहूदियों के बीच काफी लोकप्रिय हैं. उन्होंने प्रदर्शनों के दौरान बंदूक लहराकर, 'विश्वासघाती' अरब लोगों को देश से बाहर प्रत्यर्पित करने का नारा लगाने वाले और 'पत्थर चलाने वाले फ़लस्तीनियों को सीधे गोली मारने' का एलान करने वाले नेता के रूप में जाने जाते हैं. उन्होंने खासी सुर्खियां बटोरी थीं.

इतमार नस्लवादी हिंसा भड़काने वाले बयान देने और एक यहूदी चरमपंथी समूह का समर्थन करने के आरोप में जेल जा चुके हैं. वो फ़लस्तीनी लोगों के बीच भी जाना पहचाना नाम है. वो हेब्रॉन की ही एक यहूदी बस्ती से आते हैं.

कल तक कट्टरपंथी राजनीति में हाशिये पर रहे इतमार अब राजनीति की मुख्यधारा में आ चुके हैं.

इसके बाद अब कई लोगों को एक नए और ख़तरनाक़ दौर की शुरूआत का डर सता रहा है. एक तरफ वेस्ट बैंक और यहूदी-अरब विवाद वाले दूसरे इलाक़ों में गिरफ्तारी के लिए सेना लगातार दबिश बढ़ा रही है, तो दूसरी तरफ फ़लस्तीन की तरफ से जवाबी हमले भी पहले से ज़्यादा ख़तरनाक होने की आशंका है.

हेब्रॉन में इसी साल एक विरोध प्रदर्शन के दौरान 16 साल के युवक समेत दो फ़लस्तीनी लोगों पर इसराइली सेना ने गोली चलाई थी. गोली लगने से दोनों की मौत हो गई थी.

इसके अलावा इसराइली सुरक्षाबलों पर चाकू से हमला करने की कोशिश में दो और लोगों की मौत हो चुकी है. एक इसराइली शख्स भी फ़लस्तीनी नागरिक के हमले में मारा जा चुका है, वहीं उस फ़लस्तीनी हमलावर मौक़े पर ही गोली मार दी गई.

जिस दिन हम यासिर अबु मरखिया पर हमले के बाद उनके घर पहुंचे थे उस दिन लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी को बेहतर समझने के लिए इसराइली शांति कार्यकर्ता हिंसा प्रभावित इलाक़ों में लिए दौरा कर रहे थे.

हेब्रॉन की गलियों में पसरी मनहूसियत

हेब्रॉन को देखें तो लगता है कि 'चेक प्वाइंट्स' से भरा हुआ शहर है, यहां जगह-जगह पर 'चेक नाके' बने हुए हैं. ये कब्ज़े को लेकर होने वाले संघर्षों का 'केंद्र' भी है.

शहर के केंद्र में बसी बस्ती में सैकड़ों इसराइली लोग रहते हैं, जिन्हें इसराइली सेना की कड़ी सुरक्षा के साथ राजनीतिक अधिकार हासिल हैं. वहीं बस्ती के चारों तरफ बने घरों में फ़लस्तीनी परिवार हैं जिन्हें न तो सुरक्षा हासिल है और न ही राजनीतिक अधिकार.

कई लोग इसे जबरन बसाई यहूदी बस्तियों के ठोस नमूने की तरह देखते हैं.

हेब्रॉन की ऐतिहासिक गलियों में मनहूसियत साफ़ दिखाई देती हैं. सेना की लगाई कंटीले बाड़ों, दीवारों और वॉच टावर के बीच के घर और दुकानों की कतारों के दरवाजे बंद दिखते हैं. इसे देखकर लगता नहीं कि यहां कभी फ़लस्तीनी लोग रहा करते थे.

आज इस पूरे इलाक़े में सिर्फ यहां रहने वाले बाशिंदे ही आ-जा सकते हैं. इसराइली सेना इसे स्टेराइल ज़ोन कहती है. उनकी दलील है कि सुरक्षा कारणों ये से बेहद ज़रूरी है.

हेब्रॉन आज धुरदक्षिणपंथी राजनीति और इसके नेताओं के लिए गढ़ बन चुका है. यहां इतमार जैसे नेताओं को तो ख़ूब वोट मिले ही हैं, इसमें बेज़लेल स्मोट्रिच और दूसरे धुरदक्षिणपंथी जैसे नेता भी है, जो देश के वित्त मंत्री के साथ वेस्ट बैंक की रोज़मर्रा की गतिविधियों पर नज़र रखने वाले प्रभारी बनाए जाने वाले हैं.

कहा जाए तो यहां रहने वाले फ़लस्तीनियों के जीवन पर इनका नियंत्रण रहने वाला है.

'फायरब्रांड नेता ही दुरुस्त कर सकते हैं'

एक पखवाड़े के डर और हिंसा के बाद इसराइली शांति कार्यकर्ता यहां फ़लस्तीनी लोगों के साथ एकजुटता दिखाने आए थे. चुनाव के कुछ हफ्ते बाद यहां यहूदियों का सालाना धार्मिक समारोह हुआ था, जिस दौरान इसमें शामिल सैकड़ों इसराइली युवाओं ने फ़लस्तीनियों के घरों पर हमले किए.

इसके बाद वाले सप्ताहांत में इसराइली डिफेंस फोर्सेस के एक सैनिक ने वामपंथी रुझान वाले एक इसराइली एक्टिविस्ट के साथ मार-पीट की. ये एक्टिविस्ट फ़लस्तीनियों का तरफ़दार था. वहीं एक वीडियो में एक दूसरा सैनिक इतमार जैसे धुरदक्षिणपंथी नेताओं की तारीफ़ करते देखा गया. वो कह रहा था, "ये फायरब्रांड नेता ही इस जगह को दुरुस्त कर सकते हैं."

इस इलाक़े के लिए संयुक्त राष्ट्र के दूत टॉर वेनेसलैंड ने हेब्रॉन में हुई हिंसा की कड़ी आलोचना की है. वहीं कुछ दिन पहले तक इसराइल के रक्षा मंत्री रहे बेन्नी गैंट्ज ने भी हिंसा की आलोचना की है. उन्होंने चुनावों के दौरान ही चेतावनी दी थी कि इतमार जैसे नेता से देश में आग लगा सकते हैं.

जिन लोगों पर हमला हुआ उनमें यासिर अबु मरखिया के साथ-साथ जिस दूसरे शख्स का घर तबाह हुआ, वो उनके पड़ोसी इमाद अबु शम्सिया थे.

ये दोनों बरसों से इसराइली मानवाधिकार संगठन ह्यूमन राइट्स डिफेन्डर्स के लिए काम करते रहे हैं. इस संगठन ने फ़लस्तीनियों के ख़िलाफ़ हो रही हिंसा की घटनाओं का दस्तावेज़ीकरण किया है. कार्यकर्ता मानते हैं कि इस कारण हमलावरों ने दोनों को निशाना बनाया गया.

हमले के बारे में इमाद अबु बताते हैं, "वो ठीक इसी जगह आकर जमा हुए और पागलों की तरह हम पर लगातार पत्थर फेंकने लगे. वो हमारे ख़िलाफ़ अभद्र भाषा में बात कर रहे थे और हमारी क़ौम को लेकर भी भद्दी बातें बोल रहे थे. वो नस्लभेदी नारे लगा रहे थे, कह रहे थे, 'अरब लोगों को मार डालो', 'ये घर इसराइल के हैं, इन्हें छोड़कर चले जाओ', 'हम अपने घर वापस ले लेंगे'."

इमाद अबु बताते हैं, "मेरे साथ मेरी पत्नी और बच्चे भी थे, हम काफी डर गए थे. उन लोगों की तादाद बहुत ज़्यादा थी. इतमार जैसे नेताओं के सरकार में आने के बाद हम और भी डर गए हैं. वो कई बार हमारे घर आ चुके हैं."

इमाद की बात को आगे बढ़ाते हुए अबू मरखिया कहते हैं, "चुनाव ख़त्म होने के बाद से हम पर हमले बढ़ गए हैं और ये हमले पहले से ज़्यादा ख़तरनाक हो चुके हैं."

कुछ दिन बाद वीडियो में दिख रहे उस इसराइली सैनिक को सज़ा हो गई, जिसने इतमार बेल-ग्वेर की तारीफ़ की थी. लेकिन इस पर इसराइल के राष्ट्रवादी धड़ों के बीच एक नया विवाद छिड़ गया. कुछ लोगों का कहना था कि देश के रक्षकों को ही सज़ा देने के लिए मिलिटरी नेतृत्व उदारवादी गुटों के सामने घुटने टेक रहा है.

जो लोग सैनिक के समर्थन में आए थे उनमें से एक खुद इतमार बेन-ग्वेर थे जिनका कहना था कि कार्यकर्ता के सैनिक को उकसाया था या उस पर हमला किया था. हालांकि उनके दावे के समर्थन में अब तक कोई सबूत नहीं मिले.

'अब वो पहले से ज़्यादा ताक़तवर हैं'

हेब्रॉन के कब्ज़े वाले इलाकों में इसराइली समाज में अति सक्रिय राष्ट्रवादियों और बचे खुचे शांति समर्थकों के बीच एक पुराना विवाद है जो लगातार बढ़ रहा है. मैंने खुद इस शहर में तनाव को उस वक्त बढ़ते हुए देखा जब इलाक़े के दौरे के लिए आए शांति कार्यकर्ताओं के सामने यहूदी बस्तियों के लोग जमा हो गए.

उस वक्त वहां यीशाई फ्लेशर भी मौजूद थे जो खुद को हेब्रॉन के बसाए गए यहूदी समुदाय का अंतरराष्ट्रीय प्रवक्ता बताते हैं. उनके सामने ही उनके समर्थक शांति कार्यकर्ताओं को "धोखेबाज़ और विश्वासघाती" कहते हुए नारे लगा रहे थे.

मैंने उनसे पूछा कि ये चिल्ला क्यों रहे हैं, क्या इस वजह से शहर में हो रहा भेदभाव उजागर नहीं हो रहा?

इसके जवाब में यीशाई ने कहा, "इन लोगों का मत अब पूरे इसराइल में अल्पमत बन चुका है. अगर इसराइल इसे कंट्रोल नहीं करेगा तो इस शहर में एक बार फिर से जिहादियों और हमास जैसे आतंकी संगठनों का राज कायम हो जाएगा. इस शहर के इस छोटे से टुकड़े में हमारी भूमि है. हमारा ट्राइबल लैंड. इसे हमें कंट्रोल करना ही चाहिए."

मैंने उन्हें टोकते हुए कहा कि ये तो नस्लवाद जैसी बात हुई. लेकिन यीशाई ने इसे ख़ारिज करते हुए कहा, "हम चाहते हैं कि अल्पसंख्यक सफल हों, वो आगे बढ़ें और उनका विकास हो. हमें अपने अल्पसंख्यकों से तब तक कोई शिकायत नहीं जब तक वो हमारा क़ानून मानते हैं और जिहाद में यक़ीन नहीं रखते."

यहूदी कब्ज़े वाले वेस्ट बैंक में क़रीब 30 लाख फ़लस्तीनी रहते है, जबकि पांच लाख यहूदी अलग-अलग बसाई गई बस्तियों में रहते हैं. अंतरराष्ट्रीय क़ानूनों के मुताबिक़ ये सारी यहूदी बस्तियां अवैध हैं, लेकिन इसराइल इसे मानने को तैयार नहीं.

इसके बाद जब हम दक्षिणपंथियों के जमावड़े से बाहर निकले, वहां तैनात सैनिकों ने हमसे कहा कि अगर हम शांति कार्यकर्ताओं के जमावड़े की तरफ गए तो फिर वापस नहीं लौट सकते.

हम वहां से आगे बढ़े और 'ब्रेकिंग द साइलेंस' नाम के समूह की सभा में पहुंचे. ये समूह पूर्व सैनिकों ने बनाया है जो हेब्रॉन में यहूदी बस्तियां बसाने का विरोध करता है. इस भीड़ में समूह की एक कार्यकर्ता ताल सागी से हमारी मुलाक़ात हुई.

सेना में अनिवार्य सेवा के नियम के तहत सागी की तैनाती हेब्रॉन में एक सैनिक के तौर पर हुई थी. वो कहती हैं कि वो यहां इसराइली डिफेन्स फोर्सेस और बसाए गए यहूदी लोगों के आपसी संबंधों को बेहतर तरीक़े से समझती हैं. वो बताती हैं कि यहां बसाए गए यहूदी मानते हैं कि 'सभी फ़लस्तीनी दुश्मन होते हैं'.

सागी बताती है "मैं जानती हूं इस शहर में सैनिक होने का मतलब क्या है. सैनिक होने के नाते आप यहूदी लोगों के साथ हर समय जुड़े रहते हैं. वो आपको खाना देते हैं, आपसे बातचीत करते हैं और आप इस तरह की बातें लगातार सुनते हैं. मैं खुद भी यहूदी बस्ती में पली-बढ़ी हूं, इसलिए ये सब बचपन से ही सुनने की आदी हूं कि 'फ़लस्तीनी हमारे लिए सबसे बड़ा ख़तरा हैं'."

चुनावों में धुरदक्षिणपंथी गठबंधन की जीत पर सागी कहती है, "इतमार जैसे नेताओं की जीत के बाद इन लोगों का हौसला और बढ़ गया है. ये जानते हैं सरकार में आने के बाद इनके हाथों में पहले से ज़्यादा ताक़त आ गई है. इसलिए ये कुछ भी कहने और करने के लिए हिम्मत जुटा लेते हैं"

जब हम लोगों से बातचीत कर रहे थे, इसराइली सैनिकों ने भीड़ को ये कहते हुए आगे बढ़ने से रोक दिया कि आगे 'क्लोज़ मिलिट्री ज़ोन' है. लेकिन संयोग से एक फ़लस्तीनी जिनसे हमें मुलाक़ात करती थी वो वहीं आ गए.

ये शख़्स थे इस्सा ऐमरो. ये जाने-माने कार्यकर्ता हैं और 'यूथ अगेंस्ट सेटेलमेंट' नाम के समूह के संस्थापक हैं. ये और इनका समूह इसराइली सेना और फ़लस्तीनी अथॉरिटीज़ दोनों की कार्रवाई का सख्त विरोध करते हैं. इन्हें कई बार इसराइली सेना ने गिरफ्तार किया है, वहीं फ़लस्तीनी अथॉरिटीज़ ने भी कई बार इन्हें पकड़ा है.

यूरोपीय संघ और संयुक्त राष्ट्र दोनों इस्सा की गिरफ्तारी की आलोचना कर चुके हैं. दोनों संगठनों ने उन्हें 'ह्यूमन राइट्स डिफेंडर' घोषित किया है.

इसराइली शांति कैंप में अपने भाषण के बाद इस्सा बताते हैं कि मौजूदा हालात की वजह से वो अपने ही घर न जाने को मजबूर हो गए हैं.

लेकिन जब हम उनसे बात कर रहे थे सादी वर्दी में चार इसराइली पुलिसकर्मी आए और उन्हें खींचते हुए वहां से ले गए. पुलिसकर्मियों ने उन्हें दीवार की तरफ धकेल दिया और उनकी तलाशी लेनी शुरू कर दी.

इनमें से एक वो पुलिसकर्मी भी था जो पहले हमें देख चुका था. तलाशी के बाद इस्सा को कहा गया उन्हें "न्याय में बाधा डालने के आरोप में उन्हें हिरासत में लिया जाता है".

फ़लस्तीनी घरों पर हमले और शांति कार्यकर्ता को हिरासत में लेने वाली घटना में जैसा हमने देखा, इस्सा भी मानते हैं कि प्रशासन जो कर रहा है वो शहर में यहूदी बस्तियों को बसाने की कवायद है.

वो मानते हैं कि शहर में यहूदी बस्तियां बसाने और उनकी रक्षा में जुटी सेना और पुलिस जैसी संस्थाएं नई सरकार के आने के बाद से और ताक़तवर हो गई हैं. इस्सा आगे कुछ नहीं बोल पाए, क्योंकि हिरासत में लेने के साथ कुछ घंटो के लिए उनकी आवाज़ दबा दी गई थी.

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)