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इसराइल को खाड़ी देशों के साथ गहराते रिश्तों से क्या हो रहा है हासिल?
- Author, पवन सिंह अतुल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
पिछले साल सितंबर में राजनयिक संबंधों के बहाल होने के बाद इसराइल के प्रधानमंत्री नेफ्टाली बैनेट संयुक्त अरब अमीरात के दौरे पर पहुंचे हैं. इस पहले आधिकारिक दौरे को मध्य-पूर्व से लेकर पश्चिमी ताक़तों तक, सभी बड़े ध्यान से देख रहे हैं.
इसराइल 1948 में अपने गठन के बाद से ही खाड़ी के देशों को एक कांटे की तरह चुभता रहा है. कई युद्ध हुए लेकिन हर बार इसराइल ने अपनी ताक़त का लोहा मनवाया. इस अदावत का नतीजा ये था कि इसराइल क्षेत्रीय सहयोग से वंचित ही नहीं बल्कि अलग-थलग रहा.
अब खाड़ी के देशों और इसराइल के बीच नए दौर की हवाएं बह रही हैं. इस पृष्ठभूमि में दौरा एक नए युग की शुरूआत जैसा है. लेकिन इसकी तैयारी पिछले साल ही शुरु हो गई थी.
इसराइल के प्रधानमंत्री कार्यालय ने कहा है कि दोनों देश "आर्थिक और क्षेत्रीय मुद्दों पर बातचीत के लिए मिल रहे हैं." लेकिन बात इतनी आम नहीं है. ये एक नए युग की शुरुआत है. जिसका पहला क़दम पिछले साल वॉशिंगटन में रखा गया था.
ट्रंप की पहल पर नई शुरुआत
पिछले साल जब सारी दुनिया कोरोना महामारी की शिकंजे में थी तब मध्य-पूर्व में एक नए भविष्य को गढ़ने का प्रयास हो रहा है. उस वक़्त के अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इन कोशिशों के केंद्र में थे.
15 सितंबर 2020 के दिन इसराइल के एक उच्च-स्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के साथ एक शांति समझौते पर हस्ताक्षर किए थे. सात दशकों के दुश्मनों के बीच बर्फ़ का पिघलना कई लोगों के लिए अविश्वनीय ख़बर थी.
इस शांति समझौते का गवाह बनने बहरीन के विदेश मंत्री भी पहुँचे थे. बाद में उन्होंने भी इसराइल के साथ राजनयिक संबंध शुरु करने की डील पर हस्ताक्षर किए. इसके बाद कुछ और खाड़ी देशों ने भी इसराइल की दोस्ती का हाथ बढ़ाया. यूएई और बहरीन के बाद मोरक्को और सूडान ने भी इसराइल के साथ राजनयिक रिश्ते कायम किए.
आज से 20 वर्ष पहले ये सोचना असंभव था कि सात दशकों के दुश्मन, अमेरिकी पहल पर, एक टेबल पर होंगे.
यूएई को क्या फ़ायदा?
अमेरिकी हथियारों के बलबूते यूएई, खाड़ी के देशों में एक क़िस्म की मिलिट्री पॉवर है. बीबीसी के मध्य-पूर्व संपादक जेरेमी बोवेन के अनुसार अमेरिका ने यूएई को अत्याधुनिक F-35 फ़ाइटर और EA-18G ग्रोउलर इलेक्ट्रॉनिक वॉरफ़ेयर एयरक्राफ्ट देने का वादा किया था.
यूएई को यक़ीन है कि इसराइल से संबंध मज़बूत होते हैं तो अमेरिका से ये सारे अत्याधुनिक हथियार भी मिल सकते हैं. यूएई के सेना लीबिया और यमन में छिड़े गृहयुद्ध में तैनात हैं लेकिन उसका सबसे बड़ा और ताक़तवर दुश्मन, फ़ारस की खाड़ी के उस पार, शिया-बहुल मुल्क़ ईरान है.
भारतीय विदेश सेवा के रिटायर अधिकारी पिनाक रंजन चक्रबर्ती काहिरा, जेद्दा, रियाद और तेल अवीव में काम कर चुके हैं. खाड़ी के देशों की सियासत और कूटनीतिक चालों से वाकिफ़ चक्रबर्ती कहते हैं कि यूएई अपने मौजूदा शासक शेख़ मोहम्मद बिन ज़ाएद अल-नेहयान की अगुवाई में एक महत्वाकांक्षी देश है.
तो क्या इसराइल के साथ संबंधों में पहल से यूएई का खाड़ी क्षेत्र में रुतबा बढ़ेगा?
पिनाक चक्रबर्ती कहते हैं, "शेख़ ज़ाएद एक विज़नरी लीडर हैं. वे आउट ऑफ़ द बॉक्स वाली सोच रखते हैं. वो ऐसा करते रहते हैं. उन्होंने जम्मू-कश्मीर में निवेश करने का ऐलान किया है. लेकिन उनके ऐसे क़दम कई देशों को पसंद नहीं हैं. दिलचस्प ये है कि सऊदी अरब भी इसराइल के साथ संबंध सुधारने के विषय पर यूएई का समर्थन करता है. वो ख़ुद खुलकर सामने नहीं आ पाता लेकिन इस रवैये के कारण थोड़े अलग हैं."
व्यापार में संभावनाएं
इसराइल की राजधानी तेल अवीव में रह रहे भारतीय पत्रकार हरेंद्र मिश्रा कहते हैं कि ईरान का परमाणु कार्यक्रम खाड़ी के देशों और इसराइल को करीब तो ला रहा है लेकिन ये इसराइल और यूएई, दोनों ही के लिए, आर्थिक तौर पर फ़ायदे का सौदा भी हैं.
तेल अवीव से फ़ोन पर हरेंद्र मिश्रा ने बीबीसी हिंदी को बताया, "सितंबर 2020 में हुए समझौते के बाद खाड़ी के देशों में पहली बार छुट्टियां मनाकर लौटे इसराइली लोगों से मेरी बात हुई है. उनका कहना है कि उन्हें वहां व्यापार बहुत अधिक संभावनाएं दिखीं हैं. आर्थिक संबंधों को लेकर लोगों में बड़ा उत्साह है "
पिनाक चक्रबर्ती कहते हैं कि मध्य पूर्व में हवा निश्चित तौर पर बदल रही है. जानकार ये भी कहते हैं कि यूएई और बहरीन के इसराइल के साथ संबंधों पर सऊदी अरब की भी सहमति है.
अगर हवा बदल रही है तो इसमें खाड़ी के सबसे ताक़तवर और प्रभावशाली देश सऊदी अरब की क्या भूमिका है? यमन के गृहयुद्ध में उलझे सऊदी अरब की चिंता भी ईरान ही है. यमन में हूथी विद्रोहियों को ईरान की पूरी मदद पहुंचती है. विश्लेषकों का मानना है कि मध्य-पूर्व में आ रहे बदलावों में, पर्दे के पीछे ही सही सऊदी अरब की भी भूमिका है.
इसराइल का गणित
खाड़ी देशों के साथ संबंध सुधरने या बेहतर होने से इसराइल को क्या मिलेगा? साल 1979 से मिस्र और जॉर्डन के साथ इसराइल के रिश्ते पहले से ही हैं लेकिन उनमें इतनी गर्मजोशी कभी नहीं रही है. फ़लस्तीनी मुद्दे पर अक्सर तल्ख़ बयानबाज़ियां सामने आती रही हैं.
पूरे क्षेत्र में दोस्तों को तलाशते, दशकों से अलग-थलग रहे इसराइल के लिए ये नई शुरुआत मील के पत्थर की तरह है. दूसरी और अहम वजह ईरान है. लेकिन ईरान के लिए खाड़ी के कुछ देशों और इसराइल में ये गर्मजोशी एक सिरदर्द का सबब है. ईरान का सिरदर्द, इसराइल को सुकून ही पहुंचाएगा.
बीबीसी संवाददाता जेरेमी बोवेन कहते हैं, "इसराइल ईरान को अपना नंबर वन दुश्मन मानता है.नेतन्याहू (पूर्व इसराइली पीएम) ने कई बार ईरान की तुलना नाज़ियों से भी की है. यही वजह है कि पहले यूएई को दिए जाने वाले हथियारों पर इसराइल ने अपनी आपत्ति कम कर दी थी."
विश्लेषकों में इस बात पर भी सहमति है कि इसराइल और खाड़ी के देशों में आ रही नज़दीकियों की एक महत्वपूर्ण वजह ईरान है.
पिनाक चक्रबर्ती ने बताया,"ईरान के परमाणु हथियारों के विषय पर सऊदी अरब,यूएई और इसराइल तीनों चिंतित रहते हैं. इसराइल तो ईरान के साथ वियना में हो रही न्यूक्लियर वार्ताओं तक का विरोध करता है. उसका कहना है कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम में इतना आगे निकल गया है कि इन वार्ताओं का कोई अर्थ नहीं."
लेकिन इसराइल को इसमें अपनी अर्थव्यवस्था के लिए बाज़ार भी दिख रहा है. इसराइल में रह रहे पत्रकार हरेंद्र मिश्रा ने बताया कि इसराइल के लिए ये संबंध और प्रधानमंत्री का दौरान, राजनीतिक और आर्थिक रूप से काफ़ी अहम हैं.
वे कहते हैं, "यूएई का इसराइल के साथ कूटनीतिक संबंध बनाने का फ़ैसला काफ़ी चौंकाने वाला था.उसके बाद कुछ और देशों से भी रिश्ते जुड़े हैं. इसराइल का सबसे बड़ा फ़ायदा ये है कि अब उसकी क्षेत्रीय आइसोलेशन ख़त्म हो गई है. इन रिश्तों में एक गर्मजोशी देखी जा रही है. जॉर्डन और मिस्र के साथ पहले से संबंध तो थे पर उनमें ये गर्माहट नहीं थी."
ईरान और परमाणु हथियारों पर चिंता
ऐसा माना जाता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ परमाणु डील को इसराइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू के दवाब में रद्द किया था. और ट्रंप के ही सुझाव पर नेतन्याहू ने 15 सितंबर 2020 को व्हाइट हाउस में यूएई के साथ डील साइन की थी.
अब ऑस्ट्रिया की राजधानी वियना में पश्चिमी देश एक बार ईरान से परमाणु डील करना चाहते हैं जिसके तहत ईरान गारंटी देगा कि वो परमाणु हथियारों नहीं बनाएगा.
लेकिन इसराइल का कहना है कि ईरान परमाणु हथियार बनाने की दिशा में इतना आगे बढ़ गया है कि उससे बातचीत करने का कोई अर्थ नहीं. खाड़ी के देश भी ईरान के परमाणु कार्यक्रम से चिंतित रहते हैं. हरेंद्र मिश्रा कहते हैं कि जहां तक ईरान का सवाल है, दोनों पक्षों के हित एक समान हैं.
हरेंद्र मिश्रा ने कहा,"खाड़ी के देशों में ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर काफ़ी भय है. और इसराइल तो ईरान के परमाणु कार्यक्रम को अपने अस्तित्व के लिए ख़तरा मानता ही है. इसराइल साफ़ कह चुका है कि वो इस कार्यक्रम को विफल करने के लिए कोई भी ज़रूरी क़दम उठाने के लिए तैयार है. कहा तो यहां तक जाता है कि भले ही कूटनीतिक संबंध न हों, पर पहले से ही खाड़ी के देश गुपचुप तरीके से इसराइल के संपर्क में रहते थे. इसकी वजह ईरान का डर था."
साल के भीतर बदल गया सबकुछ
पिछले साल सितंबर 2020 को हुए समझौते से पहले कोई भी इसराइली जहाज़ खाड़ी के किसी देश के वायु क्षेत्र से नहीं उड़ सकता था. लेकिन बीते एक साल में हर दिन कई फ़्लाइट्स इसराइल से दुबई जैसे व्यस्त हवाई अड्डों पर का रुख़ कर रही हैं.
इन उड़ानों हज़ारों इसराइली पर्यटक पहली बार खाड़ी के देशों में छुट्टियां मनाने पहुंच रहे हैं. दुनिया में टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में एक प्रमुख केंद्र बन चुका इसराइल अब इन मुल्क़ों में व्यवसाय की संभावनाएं खोज रहा है.
हरेंद्र मिश्रा कहते हैं कि एक साल के दौरान संबंधों में बड़ी प्रगाढ़ता आई है.
मिश्रा कहते हैं, "मुझे यहां इसराइल में अधिकारियों ने बताया है कि इस बार एक अहम मुद्दा जिसपर दोनों देश बात कर रहे हैं वो है फ़्री ट्रेड एग्रीमेंट. एक ओर भारत के साथ इसराइल के फ़्री ट्रेड एग्रीमेंट की बात 10-15 साल से चल रही है. और दूसरी ओर यूएई के साथ एक साल के भीतर ही बात यहां तक पहुंच गई है. महज़ एक साल के रिश्तों में दोनों देशों के नागरिक बिना वीज़ा के एक-दूसरे देश की यात्रा कर सकते हैं. यूएई का हर आदमी यहां बिना वीज़ा के आ सकता है. इसराइली नागरिक बिना वीज़ा के वहां जा सकता है."
खाड़ी के देशों और इसराइल के बीच पिघलती बर्फ़ के कारण, इस क्षेत्र में एक अवसर भारत को भी मिल सकता है.
इसी साल 11 अक्तूबर को भारत, इसराइल, संयुक्त अरब अमीरात और अमेरिका के विदेश मंत्रियों की मुलाक़ात को मध्य-पूर्व में एक नए सामरिक और राजनीतिक ध्रुव के रूप में देखा जा रहा है. कूटनीतिक हलकों में इन देशों के साथ आने को 'न्यू क्वॉड' या नया 'क्वॉडिलैटरल सिक्यॉरिटी डायलॉग' कहा जा रहा है.
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