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सऊदी अरब और ईरान को लेकर इराक़ इतनी मेहनत क्यों कर रहा?
ईरान और सऊदी अरब की दुश्मनी क्या अब इतिहास बनने जा रही है? हालाँकि यह सवाल के रूप में भले ठीक है लेकिन इससे सहमत होना जल्दबाज़ी होगी.
लेकिन दोनों देशों ने आपस में बातचीत शुरू कर दी है. सऊदी सुन्नी शासित इस्लामिक देश है जबकि ईरान शिया शासित. दोनों देशों के बीच विवाद में एक कारण ये भी रहा है.
ईरान की सरकारी समाचार एजेंसी ईरना के मुताबिक़ ईरान के विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ख़ातिबज़ादेह ने कहा है, ''इराक़ की राजधानी बग़दाद में हमने सऊदी अरब की सरकार से पिछले कुछ महीनों में कई चरणों में बातचीत की है. द्विपक्षीय संबंधों को लेकर अच्छी बातचीत हुई है. खाड़ी की सुरक्षा को लेकर बातचीत में अच्छी प्रगति हुई है.''
ईरना के मुताबिक़ विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा कि इलाक़े की समस्या और टकरावों का समाधान आपस में व्यापक बातचीत के ज़रिए किया जा सकता है. उन्होंने कहा कि इस क्षेत्र की समस्या के समाधान के लिए किसी बाहरी पक्ष की ज़रूरत नहीं है.
ईरान सक्रिय क्यों?
ईरान मध्य-पूर्व में बाहरी हस्तक्षेप का विरोध करता रहा है. बुधवार को सऊदी अरब के किंग सलमान बिन-अब्दुल्लाज़ीज़ ने संयुक्त राष्ट्र की 76वीं आम सभा को संबोधित करते हुए कहा था, ''ईरान हमारा पड़ोसी देश है. हमें उम्मीद है कि शुरुआती बातचीत से भरोसा कायम करने के मामले में ठोस नतीजे की राह खुलेगी. ईरान के साथ संबंध अंतरराष्ट्रीय नियमों, संप्रभुता का आदर, किसी देश में बाहरी हस्तक्षेप नहीं करना और आतंकवाद का समर्थन देना बंद करने के आधार पर होगा.''
दोनों देशों के बीच बातचीत अप्रैल महीने में शुरू हुई थी. इराक़ के राष्ट्रपति ने कहा था कि इस वार्ता की मेज़बानी इराक़ कर रहा है.
ईरानी मीडिया के अनुसार, बग़दाद में मिलने के बाद न्यूयॉर्क में भी संयुक्त राष्ट्र की 76वीं आम सभा से अलग दोनों देशों के प्रतिनिधियों की मुलाक़ात हुई है. ईरानी मीडिया का कहना है कि 28 अगस्त को बग़दाद में ईरान के विदेश मंत्री हुसैन आमिर अब्दोल्लाहिअन के अलावा जॉर्डन, सऊदी अरब, तुर्की, कुवैत, मिस्र, क़तर और फ़्रांस के विदेश मंत्रियों के प्रतिनिधि शामिल हुए थे."
ईरानी मीडिया का ये भी कहना है कि इस बैठक में ईयू के विदेशी नीति के प्रमुख, अरब लीग, ओआईसी और जीसीसी के महासचिव भी शामिल हुए थे. ईरानी विदेश मंत्री ने इस बैठक में कहा कि ईरान पड़ोसी देशों से अच्छा संबंध चाहता है. मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने ये भी कहा था कि डिप्लोमैसी के ज़रिए ही समाधान खोजा जा सकता है.
इराक़ के पीएम क्या चाहते हैं?
इराक़ के प्रधानमंत्री मुस्तफ़ा अल-कादिमी के सूत्रों ने अमवाज मीडिया से कहा है कि एक समय तक बग़दाद कॉन्फ़्रेंस की कल्पना नहीं की जा सकती थी. इसमें शामिल लोगों ने विचार रखा है कि इस तरह की कॉन्फ़्रेंस हर साल अलग-अलग राजधानियों में होनी चाहिए. ईरानी मीडिया के अनुसार 21 सिंतबर को न्यूयॉर्क में इराक़ के राजदूत के आवास पर एक बैठक हुई है. अगली बैठक जॉर्डन में तय है.
ईरान में इब्राहिम रईसी के सत्ता में आने के बाद से सऊदी अरब से वार्ता को लेकर और उत्साह बढ़ा हुआ देखा जा रहा है. 25 अगस्त को ईरानी संसद ने इस बात की पुष्टि की थी कि ईरानी विदेश मंत्री अपने पहले विदेशी दौरे में 28 अगस्त को बग़दाद कॉन्फ़्रेंस में शामिल होने इराक़ गए थे.
इराक़ क्यों परेशान है?
कहा जा रहा है कि इराक़ के प्रधानमंत्री इस कॉन्फ़्रेंस के लिए काफ़ी मेहनत की थी. इसकी एक वजह ये भी बताई जा रही है कि इराक़ यह दिखाने की कोशिश कर रहा है कि वो अब लंबे समय तक बैटलग्राउंड नहीं बल्कि सेतु बनने की तमन्ना रखता है.
कहा जा रहा है कि इराक़ के राष्ट्रपति दूसरा कार्यकाल चाह रहे हैं और इसीलिए उन्होंने 12 सितंबर को ईरान का दौरा किया था ताकि समर्थन मिल सके. हालांकि इस दौरे में इराक़ के प्रधानमंत्री की मुलाक़ात ईरान के सर्वोच्च नेता अयतोल्लाह अली ख़मेनई से नहीं हुई थी जबकि 2003 से ये परंपरा रही है कि इराक़ के प्रधानमंत्री ईरान दौरे पर सर्वोच्च नेता से मिलते थे.
कहा जा रहा है कि कदिमी से ईरान के सर्वोच्च नेता का नहीं मिलना एक संदेश है कि ईरान इराक़ चुनाव में किसी भी नेता का पक्ष नहीं लेना चाहता है. कदिमी पर चुनाव को लेकर दबाव है. ईरान चाहता है कि कदिमी कुछ सकारात्मक घोषणाएं करें.
आने वाले अरबाइन तीर्थयात्रियों के लिए इराक़ ने ईरान से ज़्यादा लोगों के आने की अनुमति दे दी है. ईरानी मीडिया के अनुसार, ईरान और सऊदी के अधिकारी बग़दाद में जल्द ही फिर मिल सकते हैं. कहा जा रहा है कि ये मुलाक़ात 27-28 सितंबर को हो सकती है.
शिया कनेक्शन
इराक़ की बहुसंख्यक आबादी शिया ही है. जब तक सद्दाम हुसैन इराक़ की सत्ता में रहे तब तक यहां शिया हाशिए पर रहे. सद्दाम हुसैन सुन्नी मुसलमान थे. लेकिन 2003 के बाद से अब तक इराक़ के सारे प्रधानमंत्री शिया मुसलमान ही बने और सुन्नी हाशिए पर होते गए. 2003 से पहले सद्दाम हुसैन के इराक़ में सुन्नियों का ही वर्चस्व रहा. सेना से लेकर सरकार तक में सुन्नी मुसलमानों का बोलबाला था.
सद्दाम के दौर में शिया और कुर्द हाशिए पर थे. इराक़ में शिया 51 फ़ीसदी हैं और सुन्नी 42 फ़ीसदी लेकिन सद्दाम हुसैन के कारण शिया बहुसंख्यक होने के बावजूद बेबस थे. जब अमरीका ने मार्च 2003 में इराक़ पर हमला किया तो सुन्नी अमरीका के ख़िलाफ़ लड़ रहे थे और शिया अमरीका के साथ थे.
2003 के बाद से ईरान और इराक़ में क़रीबी बढ़ी है क्योंकि इराक़ के नेतृत्व में शिया अब आगे हैं और ईरान तो शिया मुल्क है ही.
2018 में अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान से परमाणु समझौता तोड़ दिया था. हालांकि बाइडन ने सत्ता में आने के बाद कहा था कि वो परमाणु समझौते को बहाल करना चाहते हैं लेकिन अभी तक कोई ठोस प्रगति नहीं हुई है.
ईरान और सऊदी में विवाद
सऊदी अरब और ईरान के बीच लंबे समय से टकराव चल रहा है. दोनों देश लंबे वक़्त से एक दूसरे के प्रतिद्वंद्वी हैं लेकिन हाल के दिनों में दोनों के बीच तल्खी और बढ़ी है. दोनों शक्तिशाली पड़ोसियों के बीच यह संघर्ष लंबे समय से क्षेत्रीय प्रभुत्व को लेकर चल रहा है.
दशकों पुराने इस संघर्ष के केंद्र में धर्म भी है. दोनों ही इस्लामिक देश हैं लेकिन दोनों सुन्नी और शिया प्रभुत्व वाले हैं. ईरान शिया मुस्लिम बहुल है, वहीं सऊदी अरब सुन्नी बहुल.
लगभग पूरे मध्य-पूर्व में यह धार्मिक बँटवारा देखने को मिलता है. यहाँ के देशों में कुछ शिया बहुल हैं तो कुछ सुन्नी बहुल. समर्थन और सलाह के लिए कुछ देश ईरान तो कुछ सऊदी अरब की ओर देखते हैं.
ऐतिहासिक रूप से सऊदी अरब में राजतंत्र रहा है. सुन्नी प्रभुत्व वाला सऊदी अरब इस्लाम का जन्म स्थल है और इस्लामिक दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण जगहों में शामिल है. लिहाजा यह ख़ुद को मुस्लिम दुनिया के नेता के रूप में देखता है.
हालांकि, 1979 में इसे ईरान में हुई इस्लामिक क्रांति से चुनौती मिली, जिससे इस क्षेत्र में एक नए तरह का राज्य बना- एक तरह का क्रांतिकारी धर्मतंत्र वाली शासन प्रणालि. उनके पास इस मॉडल को दुनिया भर में फैलाने का स्पष्ट लक्ष्य था. ख़ास कर बीते 15 सालों में, लगातार कुछ घटनाओं की वजह से सऊदी अरब और ईरान के बीच मतभेदों में बेहद तेज़ी आई है.
2003 में अमरीका ने ईरान के प्रमुख विरोधी इराक़ पर आक्रमण कर सद्दाम हुसैन की सत्ता को तहस नहस कर दिया. इससे यहां शिया बहुल सरकार के लिए रास्ता खुल गया और देश में ईरान का प्रभाव तब से तेज़ी से बढ़ा है.
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