असम में हिमंत बिस्वा सरमा के इस फ़ैसले से मुस्लिम ख़ुश हैं या ख़ौफ़ में हैं?

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- Author, दिलीप कुमार शर्मा
- पदनाम, गुवाहाटी से बीबीसी हिंदी के लिए
असम सरकार की कैबिनेट ने 18 जुलाई को असम मुस्लिम विवाह और तलाक़ पंजीकरण अधिनियम एवं नियम, 1935 को ख़त्म करने के लिए एक विधेयक को मंज़ूरी दे दी है.
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने पुराने क़ानून को निरस्त करने के लिए एक विधेयक पेश करने की भी घोषणा की है.
89 साल पुराने इस क़ानून को ख़त्म करने के बारे में असम सरकार का कहना है कि इसका उद्देश्य मुस्लिम समुदाय में बाल विवाह ख़त्म करने के साथ-साथ बहुपत्नी प्रथा को भी रोकना है.
असम सरकार अपने इस फ़ैसले को प्रगतिशील क़दम बता रही है. वहीं मुस्लिम परिवारों में इस क़दम को आशंका के साथ देखा जा रहा है.
55 साल की सुकितोन निसा के निकाह को 44 साल बीत चुके हैं. वो अपने पति नूरुल इस्लाम के साथ एक सुखी विवाहित जीवन जी रही हैं.

सुकितोन निसा असम के बोडोलैंड प्रादेशिक क्षेत्र के अंतर्गत तामुलपुर ज़िले के एक छोटे से गांव चिराकुंदी की रहने वाली हैं. उन्होंने अपने पति से असम सरकार के इस क़दम के बारे में सुना है.
मुस्लिम समाज में बाल विवाह के चलन के बारे में पूछने पर सुकितोन कहती हैं, "बाल विवाह पहले के ज़माने में होते थे. यह प्रथा केवल मुस्लिम समुदाय में ही नहीं थी, बाक़ी समुदाय के लोग भी बाल विवाह करते थे. लेकिन अब हमारे समाज के लोगों की सोच बदली है. अब शायद इक्का-दुक्का ही ऐसी शादियां हो रही होंगी."
मुसलमानों में बहुपत्नी प्रथा पर सुकितोन बताती हैं, "हमारी शादी को लंबा समय हो गया है और मेरी पांच बेटियों की भी शादियां हो चुकी है. इतने सालों में मेरे पति ने एक बार भी इस बात पर चर्चा नहीं की. पहले के ज़माने की बात अलग थी, अब ऐसा नहीं होता है."
सुकितोन के पति नूरुल इस्लाम स्थानीय कोर्ट में काम करते हैं. वो सरकार के फै़सले पर तो सवाल नहीं उठाते, लेकिन बाल विवाह और बहुविवाह के लिए समूचे मुस्लिम समाज पर उंगली उठाने को सही नहीं मानते हैं.
विधेयक को असम कैबिनेट की मंज़ूरी

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दूसरी ओर प्रदेश के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने विधानसभा के आगामी मानसून सत्र में पुराने क़ानून को निरस्त करने के लिए एक विधेयक पेश करने की घोषणा की है.
मुख्यमंत्री सरमा ने बीते गुरुवार को इस संदर्भ में कहा था, "असम मुस्लिम विवाह और तलाक़ पंजीकरण क़ानून बाल विवाह की इजाज़त देता है. इसलिए हम 1935 के इस अधिनियम और उसके नियमों को निरस्त करके असम निरसन विधेयक 2024 लेकर आएंगे. एक नया क़ानून लाया जाएगा जिसमें मुस्लिम विवाह का पंजीकरण सरकारी कार्यालयों में होगा. क़ानून के मुताबिक़, विवाह की जो सही उम्र है उसी के हिसाब से नए क़ानून में पंजीयन होगा."
असम में मुस्लिम विवाह और तलाक़ से जुड़े इस क़ानून को समाप्त करने की बात इस साल फ़रवरी से काफी चर्चा में है.
इससे पहले भी मुख्यमंत्री सरमा ने कहा था, "इस क़ानून में बाल विवाह पंजीकरण की अनुमति देने वाले प्रावधान शामिल थे, भले ही दूल्हा और दुल्हन 18 और 21 वर्ष की क़ानूनी उम्र तक नहीं पहुंचे हों, जैसा कि क़ानून में आवश्यक है."
राज्य सरकार ने असम मुस्लिम विवाह और तलाक़ पंजीकरण अधिनियम, 1935 को रद्द करने के साथ ही राज्य में 94 मुस्लिम विवाह रजिस्ट्रार यानी सरकारी क़ाज़ी के कामकाज को भी ख़त्म कर दिया है.
क़ानून ख़त्म होने के सवाल पर क्या कह रहे जानकार

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भले ही मुख्यमंत्री सरमा इस अधिनियम को निरस्त करने के पीछे मुस्लिम समाज में बाल विवाह को समाप्त करने की दलील दे रहे हैं, लेकिन उनकी राजनीति पर नज़र रखने वाले जानकार उनके इस क़दम को ध्रुवीकरण की राजनीति से भी जोड़कर देख रहे हैं.
गुवाहाटी हाई कोर्ट के वरिष्ठ वकील ए.आर. भुइयां का तर्क है कि अगर किसी क़ानून में कोई कमी है तो उसमें संशोधन किया जा सकता था, लेकिन केवल मुस्लिम समुदाय में बाल विवाह की बात कहकर इतने सालों से चले आ रहे क़ानून को ख़त्म करने के पीछे सरकार की मंशा पर संदेह पैदा हैता है.

मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) आवेदन अधिनियम, 1937 का ज़िक्र करते हुए वकील भुइयां कहते हैं, "शरीयत क़ानून की धारा 2 में बताया गया है कि भारत में शरिया क़ानून के कौन-कौन से विषय को मान्यता मिलेगी. इसमें मुस्लिम विवाह और तलाक़ की बात भी कही गई है."
"संसदीय क़ानून उसी शरिया लॉ के आधार पर बने हैं. शरिया लॉ में जब एक लड़की को मासिक धर्म शुरू हो जाते हैं तो उसे बालिग़ मान लिया जाता है. हालांकि इस बात को लेकर कई मतभेद हैं. मुसलमान लड़की की शादी की क्या उचित उम्र होनी चाहिए, इससे जुड़ा एक मामला सुप्रीम कोर्ट में भी विचाराधीन है."
वकील भुइयां पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट के एक मामले का भी ज़िक्र करते है. इसमें पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट की एकल पीठ ने जून 2022 में एक अहम फै़सले में कहा था कि 18 साल से कम उम्र की मुस्लिम लड़की अपनी मर्ज़ी से शादी करने के लिए स्वतंत्र है.

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वकील ए.आर. भुइयां कहते है, "अगर कोई मुस्लिम लड़की मासिक धर्म शुरू होने के बाद शादी करने का फ़ैसला करती है तो वो बाल विवाह नहीं कहलाएगा और न ही उस तरह के मामले में पॉक्सो क़ानून लगेगा. जब सुप्रीम कोर्ट में यह मामला लंबित है तो असम सरकार इस समय मुस्लिम लड़की की उम्र 18 करने का निर्णय ले रही है."
"यह एक तरह से क़ुरान के साथ-साथ मुस्लिम पर्सनल लॉ में भी सीधा हस्तक्षेप है. यह सरकार महज़ राजनीति कर रही है. एक प्रोपेगेंडा चलाया जा रहा है कि हम मुस्लिम महिलाओं की रक्षा कर रहे हैं, जबकि यह क़ानून ख़त्म होने के बाद मुसलमान औरतों की दिक़्क़तें बढ़ जाएंगी."
नव ठाकुरिया पिछले दो दशक से कई अखबारों और पत्रिकाओं में कॉलम लिखते रहे हैं.
असम कैबिनेट के इस फ़ैसले पर उनका कहना है कि सरकार नया क़ानून ला सकती है और इसमें कोई दिक्कत नहीं है. वो कहते हैं कि ऐसा फै़सला लेना सरकार के अधिकार क्षेत्र में आता है और वो ऐसा कर रही है.
ठाकुरिया कहते हैं, "वर्तमान क़ानून को रद्द करना और नए क़ानून बनाने को गलत या सही नहीं कहूंगा क्योंकि सरकार अपने अधिकार के दायरे में क़दम उठा रही है. लेकिन इस तरह के फ़ैसले पर राजनीतिक फ़ायदा लेने की बात तो होगी."

गुवाहाटी की रहने वाली 28 साल की मनीषा बेगम मुस्लिम महिलाओं के मसले पर राजनीति को लेकर चिंतित हैं.
मुसलमानों के विवाह और तलाक़ से जुड़े इस पुराने क़ानून को लेकर छिड़ी बहस पर वो कहती हैं, "सरकार बाल विवाह की जब भी बात करती है तो मुसलमानों का ही नाम लेती है, जबकि दूसरे समुदायों और ट्राइबल लोगों में भी बाल विवाह होता है."
"ये सरकार महज़ बाल विवाह के नाम पर एक मुद्दा बना रही है. अगर सरकार की नीयत बाल विवाह की समस्या का समाधान करना होता तो वो केवल एक समुदाय को निशाना नहीं बनाती."
सरकार का मक़सद धुव्रीकरण की राजनीति है: कांग्रेस

गुवाहाटी हाई कोर्ट के वरिष्ठ वकील और कांग्रेस नेता हाफ़िज़ रशीद अहमद चौधरी का कहना है कि इस क़ानून को रद्द करने के पीछे सरकार का मक़सद ध्रुवीकरण की राजनीति करना है.
हाफ़िज़ रशीद कहते हैं, "अगर सरकार को लग रहा था कि इस अधिनियम का दुरुपयोग हो रहा है तो वो इसमें संशोधन कर सकती थी. अगर इस क़ानून की आड़ में बाल विवाह हो रहा था तो सरकार को क़ाज़ी के ख़िलाफ़ कार्रवाई करनी चाहिए थी, उनका लाइसेंस रद्द करना चाहिए था. लेकिन सरकार इस क़ानून को लेकर जिस तरह की हवा बना रही है उसका इरादा पूरी तरह राजनीतिक ध्रुवीकरण का है."
असम विधानसभा में कांग्रेस के विपक्ष के नेता देवव्रत सैकिया की मानें तो असम सरकार बिना किसी अध्ययन के मुसलमानों के विवाह और तलाक़ के लिए नए क़ानून लाने की बात कर रही है.
देवव्रत का कहना है, "बाल विवाह केवल मुसलमानों का मुद्दा नहीं है. ट्राइबल लोगों समेत चाय जनजाति के लोगों में भी बाल विवाह होता है. लेकिन इस सरकार ने मुसलमानों के ख़िलाफ़ ज़्यादा कार्रवाई की. एक बड़े वर्ग को ऐसा समझाने की कोशिश हुई कि बाल विवाह केवल मुसलमानों में ही है. दरअसल यह सब कुछ राजनीतिक फ़ायदे के लिए ही किया जा रहा है."
मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा का कहना है कि 80 फ़ीसदी बाल विवाह अल्पसंख्यक समुदाय में होता है तो 20 फ़ीसदी बहुसंख्यक समुदायों में भी होता है लेकिन हमारे लिए यह समस्या धार्मिक नहीं, बल्कि सामाजिक है.
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आंकड़े क्या कहते हैं?

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2011 की जनगणना के मुताबिक़, असम में 34 फ़ीसदी आबादी मुसलमानों की है, जो राज्य की कुल जनसंख्या 3.12 करोड़ में से 1.06 करोड़ है.
लेकिन मुख्यमंत्री सरमा बीते कुछ दिनों से मीडिया के सामने कह रहे हैं कि इस समय राज्य में मुसलमानों की आबादी 1 करोड़ 40 लाख है. जबकि 2011 की जनगणना के बाद ऐसा कोई डेटा सामने आया नहीं है.
मुख्यमंत्री के अनुसार राज्य में प्रत्येक 10 साल में मुसलमानों की आबादी 16 फ़ीसदी बढ़ रही है.
मुख्यमंत्री कहते हैं, "असम में प्रत्येक 10 साल में 22 लाख मुसलमान बढ़ रहे हैं. इस लिहाज़ से 2041 तक राज्य में हिंदू और मुसलमानों की संख्या बराबर हो जाएगी और 2051 तक असम मुस्लिम बहुल राज्य बन जाएगा."
असम में ख़ासकर बंगाली मूल के मुसलमानों को लेकर हो रही राजनीति पर नज़र रखने वाले वरिष्ठ पत्रकार समीर के पुरकायस्थ कहते हैं, "दरअसल पिछले लोकसभा चुनाव में असम बीजेपी को कांग्रेस के मुक़ाबले कम वोट मिले है. इसके अलावा हिंदू बहुल जोरहाट सीट पर हुई हार सत्ता विरोधी लहर को दर्शाती है."
"अभी पांच विधानसभा सीटों पर उपचुनाव होने हैं लिहाज़ा मुख्यमंत्री इस क़ानून की आड़ में उससे पहले ध्रुवीकरण का पुराना फ़ॉर्मूला अपना रहे हैं."
बाल विवाह जैसी कुप्रथा ख़त्म करना हमारी प्राथमिकता: बीजेपी

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असम सरकार ने इस साल फ़रवरी में इस क़ानून को निरस्त करने का फ़ैसला करने के बाद ज़िला आयुक्त के ज़रिए राज्य के 94 मुस्लिम विवाह रजिस्ट्रारों द्वारा रखे गए पंजीकरण रिकॉर्ड को अपने क़ब्जे़ में ले लिया था.
सरकार ने अधिनियम निरस्त होने के बाद मुस्लिम विवाह रजिस्ट्रारों (सरकारी क़ाज़ी) को उनके पुनर्वास के लिए प्रत्येक को 2 लाख रुपए का एकमुश्त मुआवज़ा देने की बात कही गई थी. हालांकि, इस तरह के दावे भी सवालों के घेरे में हैं.
असम सरकार की तरफ से नियुक्त मुस्लिम विवाह-तलाक़ रजिस्ट्रार और सदर क़ाज़ी मौलाना फ़ख़रुद्दीन अहमद पिछले 25 साल से सरकारी क़ाज़ी के तौर पर काम कर रहे थे.
वो कहते हैं, "सरकार के इस क़ानून को रद्द करने के फ़ैसले से काफ़ी निराशा हुई है. बाल विवाह की जो बात कही जा रही है, हम विवाह पंजीयन के समय जन्म प्रमाण पत्र से लेकर उम्र से संबंधित सभी कागजातों की जांच करते हैं."
ऑल असम मुस्लिम मैरिज एंड डिवोर्स रजिस्ट्रार एंड क़ाज़ी एसोसिएशन के अध्यक्ष मौलाना अहमद कहते है, "अब लोगों को विवाह पंजीयन वगैरह करने में ज़्यादा तकलीफ़ होगी क्योंकि क़ाज़ी के सामने गांव से आए लोग भी खुलकर बात करते हैं लेकिन अब ज़िला आयुक्त कार्यालय जाना होगा, जो अब पंजीयन करवाने की लंबी प्रक्रिया का हिस्सा होगा."
"हम ऑल असम सरकारी क़ाज़ी एसोसिएशन के तहत सरकार से इस फै़सले पर पुनर्विचार करने का अनुरोध कर चुके हैं."
"सरकार ने हम लोगों का कामकाज बंद कर दिया है. दो लाख के मुआवजे़ के बदले सरकार हमें मैरिज रजिस्ट्रार कार्यालय में नियुक्ति दे ताकि विवाह-तलाक़ के मामलों में हम लोगों की मदद कर सकें."

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असम प्रदेश बीजेपी के वरिष्ठ नेता विजय कुमार गुप्ता इस क़ानून को रद्द करने की आड़ में सांप्रदायिक राजनीति करने के तमाम आरोपों को नकारते हैं.
विजय कुमार गुप्ता कहते हैं, "बाल विवाह जैसी कुप्रथा को ख़त्म करना हमारी सरकार की प्राथमिकता है. हम चाहते हैं कि मुसलमान समाज की बच्चियां पढ़ाई-लिखाई कर समाज में आगे बढ़ें. इसके अलावा जनसंख्या को भी नियंत्रित करना है."
"कई लोग बहुविवाह कर रहे हैं, इससे उनके समाज का विकास संभव नहीं है. कुछ लोग जनसंख्या को बढ़ाने में लगे हैं ताकि भारत का यह उत्तर पूर्वी हिस्सा मुस्लिम राज्य बन जाए. ऐसे इरादे से जो बच्चे पैदा करते रहे, वो जान लें कि सरकार ऐसा होने नहीं देगी. बाल विवाह, बहु विवाह और जनसंख्या को नियंत्रित करने के लिए ही यह उपाय किए जा रहे हैं."
इससे पहले मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा समान नागरिक संहिता का समर्थन करते हुए राज्य में बहुविवाह पर तत्काल प्रतिबंध लगाने की बात कह चुके हैं.
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