असम में ट्रांसजेंडर छात्रा को 'बिकिनी वाली तस्वीरों के कारण' स्कूल से निकालने का पूरा मामला जानिए

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- Author, दिलीप कुमार शर्मा
- पदनाम, गुवाहाटी से बीबीसी हिंदी के लिए
"उस रात प्रिंसिपल ने फ़ोन पर 'घिनौना और शर्मनाक' जैसे दो शब्द कहे थे जिन्हें मैं आज तक नहीं भुला पा रही हूं और शायद कभी ना भूल पाऊं. एक शिक्षक ऐसी प्रतिक्रिया देंगे, मैंने ऐसी उम्मीद कभी नहीं की थी."
"यह एक तरह से मेरे अस्तित्व पर हमला था. मुझे गहरा सदमा लगा है."
इतना कहते ही 17 साल की ट्रांसजेंडर छात्रा कुछ पल के लिए ख़ामोश और उदास हो जाती हैं.
गुवाहाटी के एक प्राइवेट स्कूल में 11वीं क्लास में पढ़ने वाली इस छात्रा का आरोप है कि उन्होंने कुछ दिन पहले अपने इंस्टाग्राम पर बिकिनी वाली कुछ तस्वीरें पोस्ट की थीं, जिसके बाद उन्हें स्कूल छोड़ने के लिए कहा गया.
उन्हें कथित तौर पर स्कूल से निकालने का यह मामला इस समय काफ़ी चर्चा में है.
छात्रा की मां ने इस कथित भेदभाव के ख़िलाफ़ असम राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग से शिकायत की है.
(इस छात्रा के साथ यौन उत्पीड़न के अनुभव विचलित करने वाले हो सकते हैं.)
इसके साथ ही मां ने असम के मुख्यमंत्री को इस घटना के संदर्भ में एक खुला पत्र लिखा है.
हालांकि स्कूल के प्रिंसिपल ने इन आरोपों को बेबुनियाद बताते हुए बीबीसी से कहा कि तस्वीरों में "अश्लीलता" थी और उन्होंने केवल सोशल मीडिया से उन्हें 'हटाने का अनुरोध' किया था.


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ख़ुशी के लिए पोस्ट की थीं तस्वीरें
सोशल मीडिया पर बिकिनी वाली तस्वीरों को पोस्ट करने के बारे में छात्रा ने कहा, "मैंने ये तस्वीर 9 जून को ली थी जब हम अपने परिवार के साथ छुट्टी मनाने गए थे. इस दौरान स्विमिंग पूल के पास कुछ तस्वीरें क्लिक की थीं जिसे मैंने अपने इंस्टाग्राम पर पोस्ट किया था."
वे कहती हैं, ''मैंने अब तक लोगों के जो ताने सहे हैं उससे मैं खुद को लेकर बहुत असुरक्षित महसूस करती रही हूं. मैं खुद को सकारात्मक और ख़ुश महसूस कराना चाहती थी."
"मैंने एक पल के लिए भी नहीं सोचा कि इन तस्वीरों को सोशल मीडिया पर पोस्ट करने के बाद मेरे जीवन में भूचाल आ जाएगा."
इस छात्रा के अनुसार, 10 जून की रात को करीब 9 बजे प्रिंसिपल ने फ़ोन किया और वो डाँटने लगे.
वो बताती हैं, ''मैं बहुत घबरा गई थी. मैंने फ़ोन अपनी मां को दे दिया. फ़ोन स्पीकर पर था और उधर से प्रिंसिपल बोल रहे थे कि मैं बेशर्म और घिनौनी हूं.''
"ये दो शब्द आज भी मेरे कानों में गूंज रहे हैं. क्योंकि ये शब्द किसी अशिक्षित या फिर आम व्यक्ति के नहीं थे."

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क्या कहती हैं छात्रा की मां
छात्रा की मां ने नाराज़गी जताते हुए कहा कि मेरी बेटी की तस्वीरों को लेकर प्रिंसिपल ने उन्हें या फिर उनके पति को फ़ोन करने की बजाय बेटी के नंबर पर फ़ोन किया."
उनके मुताबिक, "प्रिंसिपल ने तस्वीरों पर आपत्ति जताई और तस्वीरों के लिए 'अर्द्ध नग्न' जैसे शब्दों का प्रयोग किया."
मां के आरोपों के अनुसार, "प्रिंसिपल ने कहा कि 'कल स्कूल आकर उसे स्कूल से निकाल लीजिए. आपने जो भी एडमिशन फ़ीस दी है, वह वापस कर दी जाएगी.'"
मां बताती हैं कि फ़ोन आने के बाद से ही उनकी बेटी मायूस हो गई और दूसरे दिन उन्हें अपनी बेटी को मनोचिकित्सक के पास काउंसलिंग के लिए ले जाना पड़ा.
उनका आरोप है कि जब वे अगले दिन प्रिंसिपल से मिलने स्कूल गईं तो उनके बातचीत का रवैया ठीक नहीं था.
वे बताती हैं, "काफ़ी मनाने के बाद स्कूल प्रिंसिपल ने उनके सामने तीन शर्तें रखीं और कहा कि अगर छात्रा स्कूल में पढ़ना चाहती हैं तो उसे ट्रांसजेंडर समुदाय छोड़ना होगा. अपने शरीर पर बने टैटू को मिटाना होगा और स्कूल में मनोचिकित्सक से काउंसिलिंग लेनी होगी."
छात्रा की मां सवाल उठाती हैं, "कोई भी अभिभावक अपने बच्चे को ऐसी शर्तों के तहत क्यों स्कूल भेजेगा? जब वहां आपके बच्चे के लिए लोगों के दिल में नफ़रत भरी हो."

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स्कूल का क्या कहना था?
स्कूल के प्रिंसिपल का कहना था कि स्कूल को छात्रा की लैंगिक पहचान से कोई समस्या नहीं है. साथ ही छात्रा की मदद के लिए स्कूल ने काउंसिल के ज़रिए मनोवैज्ञानिक सहायता प्रदान भी की थी और अपने छात्रों, शिक्षकों को भी जागरूक किया.
वे कहते हैं, ''जब छात्रा नौवीं और दसवीं क्लास में थी, तब सब कुछ सामान्य था. लेकिन 11वीं क्लास में प्रवेश करने के बाद उसने चेहरे पर छेद करवा लिया और अपने शरीर पर टैटू बनवा लिया.''
प्रिंसिपल के अनुसार- छात्रा के सोशल मीडिया पर अर्ध-नग्न तस्वीरें अपलोड करने के बाद कई अभिभावकों ने इस पर आपत्ति जताई थी और कुछ ने लिखित में शिकायत भी की थी.
वे बताते हैं कि ये तस्वीरें वायरल हो रही थीं और उन्होंने छात्रा के अभिभावक को ये तस्वीरें हटाने को कहा था लेकिन अभिभावकों ने इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार बताते हुए खारिज कर दिया.
इसी के बाद स्कूल ने सख़्ती बरतते हुए कहा कि या तो वो तस्वीरें वापस ले लें या स्कूल छोड़ सकते हैं.
ये कौन तय करेगा कि कैसी तस्वीरें सोशल मीडिया पर डाली जा सकती हैं?
सोशल मीडिया पर इस तरह की तस्वीरों को पोस्ट करने को लेकर एलजीबीटी एक्टिविस्ट हरीश अय्यर कहते हैं कि उन्हें इन तस्वीरों में कुछ आपत्तिजनक नहीं दिखाई देता.
वे कहते हैं, ''जब छात्रा ने खुद की और अपनी मां की सहमति से बिकिनी वाली तस्वीर सोशल मीडिया पर डाली है तो इसमें किसी को क्यों दिक्कत होनी चाहिए? मुझे लगता है कि हमें अपनी नैतिकता को बच्चों के ऊपर थोपना नहीं चाहिए."

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एडमिशन के दौरान छात्र की पहचान लड़का थी
दरअसल ये छात्रा चौथी क्लास से इस स्कूल में पढ़ रही है और उस समय उनका दाखिला एक लड़के के रूप किया गया था. इस बात को छात्रा के अभिभावक और स्कूल प्रशासन दोनों ही स्वीकार करते हैं.
लेकिन नौवीं क्लास में छात्रा ने औपचारिक रूप से अपने माता-पिता के ज़रिए स्कूल प्रशासन को अपनी लैंगिक पहचान बताई थी.
इस स्कूल में अपने अनुभव के बारे में छात्रा कहती हैं, "मेरे स्कूल का अनुभव बहुत ख़राब रहा. क्लास 9वीं में मेरे साथ पढ़ने वाले एक लड़के ने सबके सामने पीछे से आकर मेरा अंडरगारमेंट्स खोल दिया था. यह यौन हमला क्लास रूम में शिक्षक की मौजूदगी में हुआ था."
वे आरोप लगाती हैं कि उन्होंने इस बारे में टीचर से भी शिकायत की थी. इस मामले के बाद टीचर उस छात्र को कक्षा से बाहर ले गए थे, कुछ कहा और फिर मामला रफ़ा दफ़ा हो गया.
छात्रा बताती है, ''मुझे इस घटना के बाद काफ़ी सदमा लगा था और इसके बाद मैंने नियमित रूप से स्कूल जाना बंद कर दिया था. मैं स्कूल में छेड़छाड़ के कारण टॉयलेट तक नहीं जाती थी. मेरी क्लास तीसरी मंज़िल पर थी और मुझे स्कूल ने ग्राउंड फ्लोर पर अभिभावकों के लिए बने टॉयलेट का उपयोग करने को कहा था.’’

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जेंडर बदलने के बाद स्कूल के दोस्तों ने दूरी बना ली
छात्रा बताती हैं कि चौथी क्लास से जो बच्चे उनके दोस्त बने थे, वो धीरे-धीरे उनकी पहचान की वजह से दूरी बनाते चले गए.
जब उन्होंने अपनी पहचान लड़की के तौर पर नौंवी क्लास में बताई तो धीरे-धीरे नज़रिया बदलने लगा. क्योंकि नौवीं क्लास में जब छात्रा ने अपना जेंडर बदला तो स्कूल की तरफ से उन्हें जेंडर यूनिफॉर्म के तौर पर हाउस यूनिफॉर्म पहन कर स्कूल आने को कहा गया.
छात्रा हाउस यूनिफॉर्म में टी-शर्ट और पैंट पहनकर स्कूल जाती थी.
वो कहती है, "मैं पूरे हफ्ते हाउस यूनिफॉर्म पहनती थी. जबकि हाउस यूनिफार्म सभी छात्रों को केवल एक दिन शनिवार को ही पहनना पड़ता था. लेकिन दसवीं से मैंने लड़की की यूनिफॉर्म (स्कर्ट एंड शर्ट) पहनना शुरू कर दिया क्योंकि मुझे लगा कि मुझे लड़की की यूनिफॉर्म पहननी चाहिए."
छात्रा आरोप लगाती है कि क्लासरूम में चिढ़ाना और पीछे से हिजड़ा कहना- ये सब कुछ आए दिन होता था.
वे बताती हैं, "दसवीं में मेरे बोर्ड थे, मुझे मेरे साथ पढ़ने वाले कुछ बच्चों के माता-पिता फ़ोन पर गालियां देते थे. उनसे दूर रहने के लिए कहते थे. जब मैंने दसवीं में स्कर्ट- टी शर्ट पहनना शुरू किया तो मुझ पर भद्दी टिप्पणियां की जातीं. मुझे खुद से नफ़रत होने लगी थी लेकिन मेरे माता-पिता हमेशा साथ खड़े रहें."
हालांकि स्कूल प्रिंसिपल इन आरोपों को बेबुनियाद बताते हैं.
वो कहते हैं, "जब छात्रा ने चौथी क्लास में एडमिशन लिया था तब उनका जेंडर लड़का था. लेकिन अभिभावकों ने जब नौवीं क्लास में जेंडर बदलने की बात कही तो हमने उनकी पूरी मदद की. हमें उनके जेंडर को लेकर कोई दिक़्क़त नहीं है बल्कि हमने उन्हें स्कूल में अच्छा माहौल देने के लिए जागरूकता कार्यक्रम भी किए."
छात्रा की मां दावा करती हैं कि उनकी बेटी के जेंडर बदलने से जुड़ी तमाम जानकारियां स्कूल को लिखित में दी गई. यहां तक कि टैटू बनाने से पहले स्कूल प्रशासन को इसका कारण बताया गया था.
छात्रा की मां कहती हैं, "मेरी बेटी के मानसिक स्वास्थ्य से निपटने में मदद के लिए मनोचिकित्सक की सलाह पर उनके शरीर पर टैटू बनवाया गया था. एक पुरुष शरीर में पैदा हुई मेरी बच्ची ने संघर्ष का यह जीवन नहीं चुना, जहां उसे उसके वास्तविक स्वरूप के कारण परेशान किया जा रहा है और उससे नफ़रत की जा रही है."

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असम के समाज का एलजीबीटीक्यू को लेकर क्या रवैया है
स्कूल वाली घटना पर प्रतिक्रिया देते हुए असम राज्य ट्रांसजेंडर कल्याण बोर्ड की एसोसिएट वाइस चेयरपर्सन रितुपर्णा कहती हैं, "ऐसी घटनाएं स्वीकार्य नहीं हैं. छात्रा मानसिक आघात का सामना कर रही है. हमने ट्रांसजेंडर कल्याण बोर्ड की ओर से स्कूल को पहले ही एक पत्र जारी कर दिया है."
इस तरह के कई मामलों में पीड़ितों की काउंसलिंग करने वाली मनोचिकित्सक प्रियंका भट्टाचार्जी कहती हैं कि ट्रांसजेंडर बच्चों को ज़्यादा संवेदनशीलता से पेश आना चाहिए.
उनके अनुसार, इन बच्चों के मन में इस बात को लेकर हमेशा डर बना रहता है कि कोई उन पर हमला कर देगा क्योंकि जिस तरह से उनके साथ छेड़छाड़ होती है उससे डर बैठ जाता है. ये भी देश के नागरिक हैं. इन्हें भी समान अधिकार है और वैसे ही इज़्ज़त मिलनी चाहिए.
रितुपर्णा बताती हैं कि भारत के अन्य राज्यों के मुकाबले असम के समाज में काफ़ी खुलापन है. लेकिन एक-दो ऐसी नकारात्मक घटनाएं हो जाती हैं जिससे समाज के रवैए पर सवाल खड़े हो जाते हैं.

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असम राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग का क्या कहना है
इस घटना की सुनवाई कर रहे असम राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग के अध्यक्ष श्यामल सैकिया ने बताया, "ट्रांसजेंडर छात्रा के अभिभावक 26 जून को शिकायत लेकर आयोग में आए थे. पीड़ित परिवार के पक्ष के बाद अब स्कूल प्रिंसिपल का पक्ष भी सुना जाएगा और अगर इसमें छात्रा के साथ भेदभाव हुआ है तो आगे की कानूनी प्रक्रिया की जाएगी."
भारत में ट्रांसजेंडर्स की आबादी क़रीब 20 लाख के आस-पास होने का अनुमान है.
हालांकि कार्यकर्ताओं का कहना है कि यह संख्या इससे ज़्यादा है.
साल 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को तीसरे जेंडर के तौर पर मान्यता दी थी और समान अधिकार प्राप्त होने की बात कही थी. वहीं उनके लिए ट्रांसजेंडर व्यक्ति (अधिकार संरक्षण) अधिनियम, 2019 क़ानून भी है.
लेकिन इस तरह के मामले का सामने आना क्या दिखाता है?
इस बात का जवाब देते हुए गुवाहाटी में ह्यूमन राइट्स लॉ नेटवर्क की निदेशक देबास्मिता घोष कहती हैं, "ट्रांस व्यक्ति को अपनाने को लेकर अभी समाज के रवैये में ज्यादा बदलाव नहीं हुआ है. कई मामले तो ऐसे हैं जहां पिता अपने ट्रांस बच्चे को अपनाने के लिए तैयार नहीं हैं. कानून ज़रूर बना है लेकिन यह एक मनोवैज्ञानिक प्रक्रिया है और जब तक लोग संवेदनशील नहीं होंगे, इस समुदाय का संघर्ष खत्म नहीं होगा."
इस मामले में अपनी बेटी के लिए न्याय पाने के लिए लड़ रही मां चाहती हैं कि स्कूल इस ग़लती के लिए सार्वजनिक रूप से माफ़ी मांगे.
उन्होंने मुख्यमंत्री को लिखे पत्र में कहा है, "ब्रह्मपुत्र जितने विशाल सपने रखने वाली मेरी बेटी ने भेदभाव और पूर्वाग्रह की पराकाष्ठा का सामना किया है. फिर भी, वह अडिग है और समाज में योगदान देने की आकांक्षा रखती है."
महत्वपूर्ण जानकारी-
मानसिक समस्याओं का इलाज दवा और थेरेपी से संभव है. इसके लिए आपको मनोचिकित्सक से मदद लेनी चाहिए, आप इन हेल्पलाइन से भी संपर्क कर सकते हैं-
समाजिक न्याय एवं आधिकारिता मंत्रालय की हेल्पलाइन- 1800-599-0019 (13 भाषाओं में उपलब्ध)
इंस्टीट्यूट ऑफ़ ह्यमून बिहेवियर एंड एलाइड साइंसेज-9868396824, 9868396841, 011-22574820
हितगुज हेल्पलाइन, मुंबई- 022- 24131212
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेंटल हेल्थ एंड न्यूरोसाइंस-080 - 26995000
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