हिमाचल प्रदेश: गोकशी की अफ़वाह पर कैसे फैला उन्माद और मुसलमानों के ख़िलाफ़ क्यों है एक तबक़ा? - ग्राउंड रिपोर्ट

नाहन में बिगड़े सांप्रदायिक सौहार्द का असर बाज़ार पर दिख रहा है. मुसलमान दुकानदारों की दुकानें बंद हैं.

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    • Author, सौरभ चौहान
    • पदनाम, नाहन (हिमाचल प्रदेश) से, बीबीसी हिंदी के लिए

हिमाचल प्रदेश में सिरमौर ज़िले के नाहन में कथित गोकशी को लेकर उग्र प्रदर्शन हुआ था जिसके बाद मुस्लिम समुदाय के लोगों की कुछ दुकानों में तोड़फोड़ हुई थी.

अब इस घटना के बारे में शनिवार को पुलिस जांच में पता चला है कि गोकशी जैसी कोई घटना हुई ही नहीं थी.

क्या है ये पूरा मामला?

दरअसल हिमाचल प्रदेश के सिरमौर ज़िला मुख्यालय नाहन में बुधवार को प्रदर्शनकारियों की एक भीड़ ने मुस्लिम समुदाय से जुड़े लोगों की चार दुकानों में तोड़फोड़ कर हंगामा किया.

'जय श्री राम' का नारा लगाती यह भीड़ कथित गोकशी की घटना को लेकर आक्रोशित थी. सोशल मीडिया पर भी इस मामले ने काफी तूल पकड़ा.

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बुधवार को हंगामा होने के तीन दिन बाद तक इस मामले में कोई पुख़्ता जानकारी नहीं थी. स्थानीय पुलिस भी उत्तर प्रदेश पुलिस की रिपोर्ट के इंतज़ार में बैठी थी.

उत्तर प्रदेश पुलिस के एक अधिकारी ने बीबीसी हिंदी से बात करते हुए कहा, "जावेद के घर पर पुलिस के जवान गए थे वहां आसपास भी पूछताछ की गयी. मौके पर गोकशी जैसी कोई घटना नहीं पायी गयी."

उत्तर प्रदेश के शामली ज़िले के एक युवक जावेद बीते 10 वर्षों से नाहन में रेडीमेड कपड़ों का व्यापर कर रहे थे. ईद के त्यौहार पर वह शामली अपने घर गए हुए थे.

स्थानीय पुलिस के अनुसार ईद के दिन क़ुर्बानी वाली तस्वीर जावेद ने अपने व्हाट्सऐप स्टेटस पर अपलोड की जिसे नाहन के हिन्दू संगठन से जुड़े कुछ लोगों ने देख लिया.

उसे देखकर यहां के लोगों ने यह अंदाज़ा लगा लिया कि जावेद ने गोकशी करने के बाद बहुसंख्यक समाज को आहत करने के उद्देश्य से यह तस्वीर जानबूझकर अपलोड की है.

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जिस दिन यह तस्वीर अपलोड हुई उस दिन इस मामले पर नाहन में कोई हंगामा तो नहीं हुआ लेकिन हिन्दू संगठनों द्वारा सख़्त कार्रवाई की मांग की जा रही थी.

इन संगठनों ने बीते बुधवार को बाज़ार बंद करने का आह्वान किया. इसी बीच हिन्दू संगठनों के कुछ लोगों ने जिनके साथ व्यापर मंडल के भी लोग शामिल थे, मिलकर बड़ा चौक बाज़ार में एक जुलूस निकाला. इस दौरान पुलिस फोर्स की शहर में तैनाती कर दी गई.

स्थानीय लोग उस घटना को याद करते हुए बताते हैं कि जुलूस जैसे-जैसे रानी ताल की ओर बढ़ा वैसे-वैसे प्रदर्शन उग्र होता गया.

जब यह जुलूस जावेद और उसके रिश्तेदारों की दुकानों के पास पहुंचा तो वहां प्रदर्शनकारियों ने तोड़फोड़ शुरू कर दी.

देखते ही देखते इन आक्रोशित लोगों ने दुकानों में पड़ा सामान बाहर फेंकना शुरू कर दिया. काफी सामान लूटकर ले गए. वहां पुलिस फोर्स मौजूद थी लेकिन इतनी भीड़ को काबू नहीं कर सकी. इस घटना का वीडियो भी वायरल हो रहा है.

वैसे क़ुर्बानी की घटना- जिसकी तस्वीर अपलोड की गयी थी, नाहन में नहीं बल्कि शामली में हुई, इस बात का पता बुधवार को प्रारंभिक जांच में ही चल चुका था. लेकिन तब तक नाहन में यह अफ़वाह फैल चुकी थी कि गो हत्या हुई है और उस अफ़वाह का असर यह रहा कि आक्रोशित भीड़ ने चुनिंदा दुकानों पर हमला कर दिया.

एक अफ़वाह से माहौल हुआ अशांत

अख़बार पढ़ रहे एक बुज़ुर्ग

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बुधवार शाम होते-होते हिंदू संगठनों का प्रदर्शन तो शांत हो गया लेकिन मुस्लिम समुदाय के लोगों में डर के साथ-साथ आक्रोश भी घर कर गया कि आख़िर प्रदर्शनकारियों ने इतनी बड़ी घटना को अंजाम क्यों दिया?

नाहन के एक प्रतिष्ठित शिक्षाविद प्रोफ़ेसर अमर सिंह चौहान बताते हैं कि एक अफ़वाह के चलते इतना कुछ हो गया, और भी गंभीर घटना घट सकती थी.

वो बताते हैं, “इतनी असहिष्णुता समाज के लिए अच्छी नहीं है. एक सभ्य समाज में संयम होना ज़रूरी है. अब आप देखिए जिस प्रदर्शन का मक़सद पुलिस पर दबाव डालकर क़ानूनी कार्रवाई करवाना था उसी प्रदर्शन में शामिल लोगों ने क़ानून तोड़ा. ऐसे भीड़ तंत्र से किसी का भी लाभ नहीं होता. सभी को चाहे वह किसी भी धर्म का हो सभ्यता का परिचय देना चाहिए.”

अमर सिंह चौहान को इस बात का भी अफ़सोस है कि इस घटना से ना केवल नाहन में सौहार्द बिगड़ा बल्कि देवभूमि का भी नाम ख़राब हुआ है. वे ये सवाल भी पूछते हैं कि जिन लोगों का नुक़सान हुआ, जिन्हें अपना काम छोड़कर जाना पड़ा, उनकी भरपाई कौन करेगा?

वहीं अंजुमन इस्लामिया संगठन के अध्यक्ष बॉबी अहमद बताते हैं कि अब पुलिस ने ही कह दिया है कि गोकशी जैसी कोई घटना नहीं हुई. हालांकि वह मानते हैं कि आर्थिक और मानसिक तौर पर लोगों को काफ़ी नुक़सान हुआ है.

उन्होंने बताया, “जब से नाहन में हंगामा हुआ है तब से कम से कम मुस्लिम समुदाय के 16 लोग शहर छोड़ चुके हैं. कुछ डर के कारण और कुछ को दुकान मालिकों ने जगह खाली करने को कहा है. सभी उत्तर प्रदेश के शामली और सहारनपुर के रहने वाले हैं.”

नुक़सान की भरपाई का सवाल

शिक्षाविद प्रोफ़ेसर अमर सिंह चौहान

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इन लोगों के नुक़सान की भरपाई कौन करेगा, इसका जवाब अभी किसी के पास नहीं हैं.

हिमाचल प्रदेश सरकार के एक अधिकारी नाम न छापने की शर्त पर कहते हैं, "ग़लती दोनों तरफ से हुई, ऐसी विचलित कर देने वाली तस्वीर प्रचारित करना सही नहीं था. वहीं बहुसंख्यक समाज को समझदारी से काम लेना चाहिए था. मान लो गोकशी हुई भी होती तो दोनों- जावेद और प्रदर्शनकारियों में क्या अंतर रह जाता. अब बात आती है भरपाई की तो दो सवाल हैं. पहला कि माल का जो नुक़सान हुआ उसे कौन भरेगा और दूसरा जो सामाजिक ताना बाना बिखरा है उसकी भरपाई कैसे होगी."

इसी का जवाब नाहन में रहने वाले 83 वर्षीय प्रोफेसर सुरेश कुमार जोशी बताते हैं, "ऐसी घटनाएं बहुत आहत करने वाली हैं. देवभूमि में ऐसी घटनाओं की कोई जगह नहीं है. आप देखिये एक अफ़वाह से कितना नुक़सान हो गया. समाज में कुछ वर्षों से ऐसा माहौल बन गया है कि छोटी- छोटी बातों पर लोग उन्मादी हो जाते हैं. ऐसे में हमें संयम बरतने की ज़रूरत है."

"मैं सिर्फ़ यही कहूँगा कि भगवान सबको सन्मति दे. अब ज़िम्मेदारी सरकार पर है. इस मामले में सख़्त कार्रवाई हो, चाहे ग़लती किसी से भी हुई हो. जिसका जो भी नुक़सान हुआ उसकी भरपाई होनी चाहिए और जिसने नुक़सान किया उसे दंडित किया जाना चाहिए."

पूरे मामले पर सिरमौर की पुलिस ने क्या कहा?

नाहन

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सिरमौर ज़िले के पुलिस अधीक्षक रमन कुमार मीणा कहते हैं, "जावेद के ख़िलाफ़ धार्मिक भावनाओं को आहत करने की प्राथमिकी दर्ज की गयी है. वहीं भीड़ के ख़िलाफ़ भी दंगा फ़साद करने को लेकर मामला दर्ज किया गया है. शीघ्र ही दोषियों की पहचान की जाएगी."

उन्होंने यह भी बताया, "उत्तर प्रदेश पुलिस का बयान देखा है, आधिकारिक जवाब आने के बाद आगे की कार्रवाई की जाएगी. पुलिस ने इस घटना को उग्र होने से रोका."

क्या पुलिस की मौजूदगी में आरोपी की दुकान में तोड़फोड़ हुई? इस सवाल के जवाब में पुलिस अधीक्षक रमन कुमार मीणा ने कहा, "यह सब अचानक हुआ. फिर भी पुलिस ने घटना पर काबू पा लिया. सोशल मीडिया पर एक छोटी सी क्लिप ही वायरल हुई थी. पुलिस ने बड़ी सूझबूझ के साथ काम किया है. लेकिन फिर भी यदि कहीं किसी प्रकार की कोताही की बात सामने आती है तो कार्रवाई की जाएगी."

जिन लोगों को नुक़सान हुआ है, उनकी भरपाई कौन करेगा इसके जवाब में मीणा बताते हैं, "पुलिस क़ानून के अनुसार काम करेगी. प्रदर्शनकारियों पर भी मामला दर्ज है और जांच की जा रही है कि तोड़फोड़ करने वाले, दुकान का सामान फेंकने और ले जाने वाले कौन लोग थे."

यूपी पुलिस ने गो हत्या को नकारा

शामली पुलिस ने शनिवार को जावेद को धार्मिक भावनाएं भड़काने के आरोप में गिरफ़्तार कर लिया

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शामली के पुलिस अधीक्षक अभिषेक ने कहा, "जांच में पाया गया कि कोई भी प्रतिबंधित मवेशी नहीं काटा गया है. लेकिन जिस तरह से वीभत्स तस्वीर अपलोड की गयी है उसको देखते हुए आरोपी के ख़िलाफ़ उपयुक्त धाराओं में मामला दर्ज करने के आदेश दिए गए हैं."

शामली पुलिस ने शनिवार को जावेद को धार्मिक भावनाएं भड़काने के आरोप में गिरफ़्तार कर लिया.

वैसे नाहन में बड़ा चौक में जगन्नाथ मंदिर के पास एक छोटी दुकान चला रहे एक हिन्दू बुज़ुर्ग ने नाम न छापने की शर्त पर बताया, "उस दिन जो भी हुआ वह अच्छा नहीं हुआ. मैं जावेद को जानता हूँ लेकिन जब सुना कि उसने ऐसा कुछ किया है तो बहुत बुरा लगा. अब लोग यह कह रहे हैं कि गाय नहीं थी कुछ और था. जो फोटो उसने लगाई थी वो सबको दिखाने वाली तस्वीर नहीं थी. लेकिन हमारे लोगों का व्यवहार भी कम ग़लत नहीं था."

उन्होंने यह भी बताया, "किसी को यह नहीं पता था कि जावेद ने यह हरकत कहाँ की? ना ही यह पता है कि काटने वाला जानवर कौन सा है? एक बात पता चली कि गाय काट दी और सबने शोर मचा दिया."

यह साझा करते हुए इन बुज़ुर्ग ने कहा कि 'हमारी पहचान गोपनीय रखना मैं बुज़ुर्ग आदमी हूँ इस उम्र में किस-किस से लड़ता फिरूंगा.'

घटना के अगले दिन नाहन शहर शांत था लेकिन मुस्लिम समुदाय के लोगों में एक अजीब सा डर देखने को मिला. इनमें से कुछ लोग जावेद से भी नाख़ुश थे लेकिन "मॉब जस्टिस" का डर साफ़ देखा जा सकता था. घटना के बाद लोगों में है दहशत.

मुसलमानों में डर

बॉबी

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इस पूरे घटनाक्रम पर जावेद के चचेरे भाई साबिज़ से फोन पर बात हुई. उनका कहना है, "यह पूरी घटना एक अफ़वाह की वजह से हुई है. सब कह रहे हैं कि गोकशी हुई लेकिन यह पता कैसे चला? अब तो पुलिस ने भी कह दिया कि ऐसा कुछ नहीं था. एक फ़ोटो देखी और आरएसएस से जुड़े लोगों ने उसे गोहत्या का नाम दे दिया. इतना बड़ा प्रदर्शन कर दिया. दुकानों का सामान तोड़ा. कुछ लोग सामान लूट कर ले गए. हमारा क्या कसूर था और यदि जावेद ने सच में कुछ ग़लत किया तो क्या इन लोगों का यह तरीक़ा सही था? मैं अपने परिवार के साथ मुश्किल से नाहन से भागा हूँ."

यह पूछने पर कि क्या वह अब शामली से वापस लौटेंगे? साबिज़ ने इस सवाल के जवाब में कहा, "इस घटना के बाद मकान मालिक ने दुकान खाली करने को कह दिया है. कुछ लोग अब हमको वहां (नाहन) नहीं रहने देना चाहते हैं. उन्हीं लोगों ने मकान मालिक पर दबाव डाला कि हमें दुकान न दें. हमारे मालिक भले आदमी हैं लेकिन लोगों के दबाव की वजह से वो मजबूर हैं."

साबिज़ और कुछ अन्य लोगों का शुरू से दावा था कि गोहत्या हुई ही नहीं है. उत्तर प्रदेश पुलिस की रिपोर्ट आने के बाद सिरमौर की पुलिस का इंतज़ार भी ख़त्म हो गया कि आख़िर पूरा मामला क्या था.

वैसे गुरुवार को भी फिर प्रदर्शन न हो जाए, इस आशंका से कुछ मुस्लिम दुकानदारों ने अपनी दुकानें बंद ही रखीं. जावेद की दुकान के नज़दीक ही कपड़े की दुकान लगाने वाले इमरान ने उस दिन से अपनी दुकान बंद कर दी थी.

उन्होंने शुक्रवार (21 जून) को दुकान लगायी. कपड़े की गठरी खोलते हुए इमरान बताते हैं, "उस दिन बाज़ार बंद था, वरना जिस तरह भीड़ का आक्रोश था उस हिसाब से और भी ज्यादा नुक़सान हो सकता था."

मुसलमान दुकानदार

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जहाँ यह हंगामा हुआ उसके साथ लगती गार्गी गली के प्लम्बर इरफ़ान अहमद किसी से फोन पर बात करते हुए बता रहे थे कि अब स्थिति पहले से सामान्य है.

इरफ़ान बताते हैं, "मैं दो दिन काम पर नहीं गया. हमारे और लोग भी घरों में ही रहे. बुधवार को पता चला कि जावेद और उसके चचेरे भाई साबिज़ और दो अन्य लोगों की दुकानों में तोड़फोड़ हुई है. हम यहाँ दादा के समय से रह रहे हैं, यहाँ कभी ऐसा कुछ नहीं हुआ."

गुरुवार को देर शाम शहर के बीचों-बीच दरगाह पर अंजुमन इस्लामिया संगठन के बॉबी अहमद दिन में हुई पीस कमेटी की बैठक के बारे में आपस में साथियों से चर्चा कर रहे थे.

बॉबी कहते हैं, "इस पूरे घटनाक्रम से किसी को कुछ हासिल नहीं हुआ बस ग़रीब लोगों का नुक़सान हुआ चाहे वो किसी भी धर्म के रहे हों. बाज़ार बंद रहा तो उसका नुक़सान तो सबको हुआ. जो तोड़फोड़ हुई और मुस्लिम समुदाय के लिए जो बातें कही गईं उससे सामाजिक ताना-बाना तहस-नहस हुआ है इसकी भरपाई होना बहुत मुश्किल है."

वो ये भी कहते हैं, "अगर किसी ने कुछ ग़लत काम किया है तो उसकी सज़ा उसे ज़रूर मिलनी चाहिए. अगर गोकशी हुई है तो सज़ा मिलनी चाहिए, लेकिन सज़ा तय कौन करेगा? सज़ा देने का हक़ मुझे या आपको नहीं है. इस तरह से तो ग़लत प्रथा शुरू हो जाएगी जो कि बहुत गंभीर बात है. कल के दिन आप मेरे साथ कुछ ग़लत करेंगे तो क्या मैं आपके घर आकर तोड़फोड़ करूँगा?"

हिमाचल में मुसलमानों की आबादी

वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार हिमाचल प्रदेश में कुल 1.50 लाख मुस्लिम आबादी है जो यहां की कुल आबादी का 2.18 प्रतिशत है. सिरमौर ज़िले में लगभग 30,000 के आसपास मुस्लिम रहते हैं.

नाहन निवासी रफ़ीक़ कहते हैं, "वायदे तो किये जाते हैं कि कार्रवाई होगी, मुआवज़ा मिलेगा लेकिन कभी कार्रवाई नहीं होती. इस मामले में भी क्या ही कार्रवाई होगी? हमारा दो तीन दिन का रोज़गार गया. हमारे समुदाय के ख़िलाफ़ जो माहौल बना उसका नुक़सान भी हम जैसे ग़रीबों को उठाना पड़ेगा. अब आप बताइए कौन करेगा इसकी भरपाई?."

शुक्रवार की सुबह शहर में अलग अलग जगह योग दिवस मनाया गया. लोग अपनी दिनचर्या में व्यस्त थे जैसे पिछले दिनों कुछ हुआ ही न हो.

नाहन के गुन्नू घाट इलाक़े में रहने वाले अशफ़ाक़ ख़ान इस सब के पीछे किन्हीं और कारणों की ओर इशारा करते हैं.

वो कहते हैं, "कोई भी ऐसा कुछ देखेगा तो उसकी धार्मिक भावनाएं ज़रूर आहत हो सकती हैं लेकिन बग़ैर पूरी जानकारी हासिल किए क़ानून हाथ में लेने के पीछे और भी कारण हैं. जो लोग यहाँ उत्तर प्रदेश के शामली, सहारनपुर, मुरादाबाद व अन्य ज़िलों से पिछले कुछ सालों में काम करने आये हैं स्थानीय व्यापारी वर्ग उनसे ख़ुश नहीं हैं. इन्हें जब भी मौका मिलता है ये इन लोगों को बाहर निकालने की फ़िराक़ में रहते हैं."

गुरुवार को सिरमौर के ज़िलाधीश और पुलिस अधीक्षक ने "पीस कमेटी" की एक बैठक बुलाई थी जिसमे सबकी बातों को सुना गया.

एक अधिकारी ने बताया कि बैठक में कुछ लोगों ने सहारनपुर और आसपास के लोगों को यहाँ से बाहर करने की बात भी की. जिस पर ज़िलाधीश ने कहा कि यह क़ानूनन उचित नहीं है, अगर किसी से कोई समस्या है या संदेह है तो उसे किराए पर घर न दें.

'बाहरी कारोबारी दे रहे हैं प्रतिस्पर्धा'

ज़िलाधिकारी

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इमेज कैप्शन, सिरमौर के ज़िलाधिकारी सुमित खिम्टा दावा करते हैं कि अब मामला ख़त्म हो गया है और इलाक़े में शांति है.

दोपहर के समय गुन्नू घाट से बड़ा चौक की तरफ लोग इस मामले की चर्चा कर रहे थे.

दर्ज़ी का काम करने वाले मोहम्मद उस्मान का कहना है कि उनका काम अच्छा और सस्ता है इस कारण कुछ स्थानीय लोग नाख़ुश ज़रूर हैं लेकिन ग्राहक ख़ुश हैं. अब एकाएक ऐसी बातें हो रही हैं जो कि ठीक नहीं है.

वो कहते हैं, "व्यपार में प्रतिस्पर्धा तो होती है लेकिन उसे इस तरह से ख़तरनाक रूप देना बिलकुल ग़लत है. आप ही बताइये इस सब का हमारे बच्चों पर क्या असर पड़ेगा?"

गुन्नू घाट मोहल्ले में रहने वाली अमीना बताती हैं, "जिस दिन यह हंगामा हुआ उस दिन से बच्चों को बाहर नहीं भेजा है. कोई किसी भी धर्म का हो लेकिन हर कोई अपने बच्चों के लिए एक बेहतर जीवन चाहता है. ये दोनों घटनाएं सही नहीं थीं. इन घटनाओं से हमारे बच्चों पर गहरा असर पड़ा है. सभी में दहशत का माहौल है."

ऐसा भी नहीं हैं कि हिंसक प्रदर्शनकारियों को बहुसंख्यक समाज के सभी लोग सही मान रहे हैं.

किराने की दुकान चलाने वाले दीपक गुप्ता कहते हैं, "ग़लतियां दोनों तरफ़ से हुई हैं. जावेद को ऐसा करने से पहले इससे होने वाले नुक़सान के बारे में सोचना चाहिए था. वह गाय थी या नहीं थी लेकिन तस्वीर विचलित करने वाली थी. ग़लती हमारे भी समाज की है कि उन्होंने बिना जांच पड़ताल किये इसको सीधा सांप्रदायिक रंग दे डाला. इस सब से हिन्दू मुस्लिम समाज के बीच की खाई और बढ़ गयी."

सिरमौर के ज़िलाधीश सुमित खिम्टा बीबीसी से बात करते हुए कहते हैं, "अब मामला शांत है. गुरुवार को नाहन में सभी समुदायों के प्रतिनिधियों की एक बैठक बुलाई गयी. जिसमें शान्ति की अपील की गई. पुलिस अपनी कार्रवाई कर रही है. स्थानीय लोग इस कार्रवाई से संतुष्ट हैं."

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