ग्राउंड रिपोर्ट हापुड़: गाय, मुसलमान और हत्यारी भीड़ का सच

- Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, मदापुर मुस्तफ़ाबाद, हापुड़ से लौट कर
मिट्टी पर पड़े कत्थई धब्बों से साफ़ है कि यहां किसी का ख़ून बहा है, इसमें भी विवाद नहीं कि हत्यारी भीड़ ने एक और आदमी को मार डाला, मारा गया व्यक्ति मुसलमान है और गाय का होना या न होना विवाद के केंद्र में है.
जहाँ ये घटना हुई है उस मदापुर गांव के निवासी कह रहे हैं कि मोहम्मद क़ासिम को गाय चुरा काटने के नाम पर मारा गया. पुलिस एफ़आईआर में इसे 'रोड रेज' का मामला बताया गया है.
भीड़ ने 60 साल के एक बुज़र्ग समीउद्दीन को भी बुरी तरह से पीटा. पिछले दो दिनों से वो अस्पताल में भर्ती हैं.
घटना राजधानी दिल्ली से क़रीब 65 किलोमीटर दूर उत्तर प्रदेश के हापुड़ ज़िले की है.

गाय चराई पर पुराना झगड़ा
मोहम्मद वकील खेती और पशुपालन करने वाले समीउदीन के भतीजे हैं. वे कहते हैं, "चाचा उस दिन, अपने खेत से जानवर के लिए चारा लेने गए थे. क़ासिम कहीं से आ रहा था और चूंकि वो उन्हें जानता था इसलिए समीउद्दीन से बातचीत करने उनके खेतों में आ गया."
पास के राजपूत बहुल गांव बझैड़ा ख़ुर्द से अक्सर ढोर (गाय) चराई के लिए इधर निकल आते हैं. मदापुर मुस्तफ़ाबाद जो मुसलमान बहुल गाँव है, वहाँ रहने वालों के मुताबिक़ उन्हें जानबूझकर चरने के लिए इस तरफ़ हांक दिया जाता है.
दूसरी ओर, मदापुर मुस्तफ़ाबाद के लोगों का कहना है कि उन पर आरोप लगता है कि वो गाय-बछड़ों को मारकर खा जाते हैं.

"किसान के खेत को जब नुक़सान होगा तो किसान इनको भगाएंगे या घेरेंगे या नहीं घेरेंगे? इन लोगों ने ये मामला बना दिया कि इन्होंने जानवरों को अपने खेत में बांध रखा है," समीउद्दीन के रिश्ते के भाई प्यारे मोहम्मद कुछ झल्लाकर सवाल करते हैं.
चारा लेने गये समीउद्दीन की भैंस उनके भतीजे के मुताबिक़ वहां पहले से ही मौजूद थी और साथ में था मवेशियों का धंधा करनेवाला क़ासिम.
क़रीब के खेतों में दो और लोग काम कर रहे थे, लेकिन जब उन्होंने बझैड़ा ख़ुर्द की तरफ़ से भीड़ को उधर आते देखा तो वो वहां से भाग खड़े हुए. लेकिन क़ासिम और समीउद्दीन भीड़ के हत्थे चढ़ गए.

लाल रंग की वो टूटी चप्पल
मुस्लिम-बहुल मदापुर मुस्तफ़ाबाद और राजपूतों का बझैड़ा ख़ुर्द गांव बिल्कुल पास-पास बसे हैं. गांव में मंदिर, मस्जिद, दुकान, मकान, खेत-खलिहान सब आस पास हैं.
मोहम्मद वकील हमें नहर के उस पार समीउद्दीन के उस खेत में ले गए जहां भीड़ ने उनके चाचा और क़ासिम को बुरी तरह पीटा, जिसमें 45 साल के कासिम की मौत हो गई.

शीशम, पोपलार और जामुन के पेड़ों के बीच मौजूद खेत की मिट्टी पर ख़ून के धब्बे अभी भी साफ़ दिखते हैं और दिखती है लाल रंग की वो चप्पल जिसका फ़ीता निकल गया है- शायद भागने की कोशिश में या फिर किसी के पैर से दबकर.
ये किसकी चप्पल है, क़ासिम की या समीउद्दीन की, ये नहीं मालूम.
पुलिस ने बझैड़ा ख़ुर्द के दो लोगों को हत्या, क़त्ल के इरादे से हमला, बलवा और हथियारों के साथ दंगा करने (भारतीय दंड संहिता की धारा 302, 307, 147, 148) के आरोप में गिरफ़्तार किया है. दोनों फ़िलहाल न्यायिक हिरासत में हैं.

'भैंस ख़रीदने निकले थे'
पुलिस अधीक्षक संकल्प शर्मा के मुताबिक़, "पुलिस को लगता है कि ये दोनों भीड़ को भड़काने वालों में थे."
बझैड़ा खुर्द और मदापुर मुस्तफ़ाबाद से दूर पिलखुआ शहर के सिद्दीक़पुरा मुहल्ले में है क़ासिम का घर, दो मंज़िला मकान में किराये का एक कमरा.
अफ़सोस ज़ाहिर करने वालों के आने का सिलसिला जारी है जिन्हें घर के सामने की गली में लगी कुर्सियों पर बिठाया जाता है.
मवेशियों की ख़रीद-बिक्री का धंधा करने वाले कासिम के भाई मोहम्मद नदीम बताते हैं कि उनके पास किसी का फ़ोन आया कि "आपके भाई को मार के 100 नम्बर की जिप्सी में रखा है," नदीम जब अस्पताल पहुँचे तो उनके भाई कासिम की मौत हो चुकी थी.
कासिम के भाई ने बताया कि "वे घर से 60-70 हज़ार रुपए लेकर निकले थे, उन्हें किसी ने कहा था कि भैंसें अच्छी क़ीमत पर मिल जाएँगी उसके बाद लोगों ने उन्हें घेरकर मार दिया."

पोस्टमॉर्टम के बाद क़ासिम का शव उनके परिवार को रात 2.30 बजे सौंप दिया गया और मंगलवार सुबह उन्हें दफ़न भी कर दिया गया, लेकिन उनके परिवार वालों का कहना है कि उन्हें एफ़आईआर दर्ज नहीं करने दिया गया है.
मोहम्मद सलीम के मुताबिक़, "पुलिस कह रही है कि एक केस में वो दो मुक़दमे दर्ज नहीं करेंगे."
सलीम को ये आशंका है, जो उनके मुताबिक़ उन्होंने पुलिस से भी व्यक्त किया है कि अगर हमले में घायल समीउद्दीन और दूसरा पक्ष "अगर समझौता कर लें तो हम तो बीच के रह गए, न इधर के, न उधर के."

कासिम के भाई सलीम का कहना है कि "पुलिस ने मुझे मामले में मुख्य गवाह बनाने का आश्वासन दिया है".
18 जून को हुई इस घटना में जो एफ़आईआर दर्ज हुई है वो यासीन नाम के एक व्यक्ति ने दर्ज कराई है, यह एफ़आईआर अज्ञात लोगों के ख़िलाफ़ है जिसमें कहा गया है कि बझैड़ा की तरफ़ से आते हुए किसी मोटरसाइकिल सवार ने उनके भाई समीउद्दीन को टक्कर मारी और उनके भाई के विरोध करने पर बझैड़ा के 25-30 लोग वहां जमा हो गए और उन्होंने समीउद्दीन और क़ासिम की लाठी-डंडों से पिटाई कर दी.

इमेज स्रोत, AMAR UJALA
19 जून के 'अमर उजाला' अख़बार के पहले पन्ने पर इस घटना की ख़बर छपी है, अख़बार में गाय और बछड़े की तस्वीर है, अख़बार ने इसे 'घटनास्थल से बरामद गोवंश' बताया है और तस्वीर में पुलिसवाले भी दिखाई दे रहे हैं. अख़बार ने बताया कि "मौक़े से दो गाय और एक बछिया बरामद की गई."

ना गाय मिली, ना कोई हथियार
सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल हो रहा है जिसमें बुरी तरह से घायल क़ासिम को कुछ लोग घेरकर खड़े हैं और उसमें 'दो मिनट और न पहुंचते तो गाय कटी-कटाई मिलती', 'तीन गाय खूंटे से बांध रखी हैं', जैसी बातें हो रही हैं.
ख़ुद को बझैड़ा ख़ुर्द का निवासी बताने वाले राम कुमार कश्यप कहते हैं, "कुछ औरतें चारा लाने खेतों में गई थीं, उन्होंने आकर बताया कि चार आदमी गायों को लेकर जा रहे हैं, इधर से लोग गए तो उन लोगों ने फ़ायरिंग शुरू कर दी, दो तो भाग गए और दो घेरे में आ गए..."
मगर पुलिस का कहना है कि उसे घटनास्थल से न कोई गाय मिली और न ही गोकशी से जुड़े किसी तरह के हथियार.

पेशे से ट्रक ड्राइवर मोहम्मद यासीन अपने घायल भाई समीउद्दीन के साथ हापुड़ के एक प्राइवेट अस्पताल में डेरा डाले हैं.
जब एफ़आईआर कराने वाले मोहम्मद यासीन से पूछा गया कि गाँव के लोग, हिंदू और मुसलमान दोनों कह रहे हैं कि यह घटना गाय की वजह से हुई है जबकि एफ़आईआर में गाय का ज़िक्र नहीं है और रिपोर्ट रोडरेज की लिखवाई गई है, ऐसा कैसे हुआ? इसके जवाब में उन्होंने कहा, "मैं तो लेट आया था, गांव में भी और थाने में भी ...जैसे जैसे वो लोग बोलते गए, वैसे-वैसे लिखकर साइन हो गए मेरे."
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