ग्राउंड रिपोर्ट: औरंगज़ेब के पिता ने पूछा, ये कैसा जिहाद है?

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- Author, माजिद जहांगीर
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
"क्या आपको भी मेरे बेटे से हमदर्दी है!" ये पूछना था, 50 साल की औरंगज़ेब की मां का.
"नहीं, जो हमदर्दी और सदमा मुझे है वो किसी और को नहीं. माँ जैसी कोई नहीं दुनिया में. उसके जैसे बहादुर बच्चे आसानी से पैदा नहीं होते, लेकिन वो मेरी दुनिया को सूनी कर गया."
भारत प्रशासित कश्मीर के मेंडर, सीरा सैलानी गांव में जब मैं औरंगज़ेब के घर देर रात पहुंचा तो चारों तरफ़ मातम का माहौल था. महिलाएं और पुरुष दोनों ही अलग-अलग कमरों में बैठकर औरंगज़ेब को याद कर रहे थे.
औरंगज़ेब का घर सीमा से बहुत ही पास है. श्रीनगर से मेंडर के बीच की दूरी क़रीब 200 किलोमीटर है.

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परिवारवालों के चेहरों पर ग़ुस्सा साफ़ दिखाई दे रहा था. राज़ बेगम को अपने बेटे की मौत के बाद से पूरे कश्मीर से शिकायत है.
वो कहती हैं, "मुझे सभी कश्मीरियों से इसलिए शिकायत है, क्योंकि उन्होंने किन लुटेरों को वहां रखा है, बिजली गिरे उस कश्मीर पर, गोली लगे उस कश्मीर को, मेरा बच्चा मारा गया.
'अपने ही कश्मीरियों ने मारा'
राज़ बेगम रोते हुए कहती हैं, "मुसलमान मुसलमान को मार कर आज़ाद नहीं होता. वो बेगुनाह और मासूम बच्चा था. बच्चे को गाड़ी में बिठाकर ले गए और मार डाला."
बेटे को खोने के बाद राज़ बेगम बस दो ख़्वाहिशें बताती हैं, "एक बार उस ड्राइवर का चेहरा देख लूं, जिसने मेरे बेटे को गाड़ी में बिठा कर जंगल में पहुंचाया और फिर मार दिया."
"दूसरी ये कि मैं उस जगह को भी देखना चाहती हूं, जहां मेरे बेटे को मारा गया."

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"अफ़सोस इस बात का है कि उसे अपने ही कश्मीरियों ने मारा. उन्होंने मेरा घर सूना कर दिया".
"एक बार मिल जाएं तो उनसे पूछना चाहती हूं कि कुछ चाहिए था तो मुझसे मांगते, वो तो ख़ाली हाथ था. ख़ाली हाथ मारना आज़ादी नहीं है".
राज़ बेगम उस दिन को याद करती हैं जब औरंगज़ेब ने उनसे कहा था कि मैं आज घर आ रहा हूं.
वे कहती हैं, मैं ख़ुश थी कि बेटा आ रहा है. शाम चार बजे तक जब वो नहीं आया तो फ़ोन किया और उसका फ़ोन बंद आ रहा था.
बीते गुरुवार को औरंगज़ेब का दक्षिणी कश्मीर के ज़िला पुलवामा के कलमपोरा में अपहरण हुआ था. अपहरण के कुछ घंटों बाद ही उनकी लाश 10 किलोमीटर की दूरी पर मिली.
'अगर ये जिहाद था, तो हम तैयार हैं'
अगले ही दिन सोशल मीडिया पर एक वीडियो सामने आया जिसमें चरमपंथी औरंगज़ेब को प्रताड़ित कर रहे थे.
औरंगज़ैब कुछ साल पहले ही भारतीय सेना में भर्ती हुए थे. उनका एक और भाई सेना में है.

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औरंगज़ेब की बहन ताबीना कहती हैं, "जिस दिन घर में भाई की लाश आई उस दिन दिमाग़ में ये ही ख़्याल आया कि काश उसकी जगह मैं मर गई होती, वो मेरी लाश को दफ़नाते."
इतना कहते ही ताबीना कुछ बोल नहीं पातीं और रोने लगती हैं.
कुछ देर बाद वो शांत होती हैं और कहती हैं कि मैं चाहती हूं कि जो हाल मेरे भाई का हुआ, उनका भी वही हाल हो.
औरंगज़ेब के 55 वर्षीय पिता मोहम्मद हनीफ़ कहते हैं कि अगर वो सच्चा मुसलमान होता और जिहाद करता, तो हम भी उसके साथ जिहाद करने को तैयार हैं, लेकिन मुसलमान मुसलमान को कभी नहीं मारता. छुपकर हमला करना बुज़दिली है.

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वे आगे कहते हैं, ''क़ुरान में लिखा है, मुसलमान का मुसलमान को मारना कौन-सा जिहाद है! एक बच्चे को मारना कौन सा जिहाद है! वे ऐसा क्यों करवा रहे हैं!''
'इंसाफ़ नहीं तो फांसी लगा लूंगा'
मोहम्मद हनीफ़ कहते हैं कि मुझ पर क्या बीत रही हैं वो तो बस मैं और मेरा ख़ुदा ही जानता है.
मोहम्मद हनीफ़ कहते हैं कि मुझे इंसाफ़ चाहिए.
वे कहते हैं, ''मैं चाहता हूं महबूबा मुफ़्ती और शेख साहिब (शेख अब्दुल्लाह और उनका परिवार पर हमला करते हुए) मुझे जल्द से जल्द इंसाफ़ दिलाएं. बाक़ी रही सुरक्षा की बात या पीएम मोदी की बात तो उनको मैंने 72 घंटों का समय दिया है, अगर 72 घंटों के अंदर फ़ैसला नहीं आया तो मैं आप के दरबार में आकर फांसी लगा लूंगा और अपने पूरे परिवार को भी लटका दूंगा."
हनीफ़ कहते है, ''मुझे बताएं कि मेरे बेटे ने कौन सी ग़लती की थी. अगर कोई ग़लती की थी वो मुझे फ़ोन करके बताते मैं आ जाता. फिर आमने-सामने बात होती.''

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वे कहते हैं, ''मैंने मीडिया वालों के सामने हाथ जोड़कर कहा कि ख़ुदा के लिए मेरे बेटे को मत मारो. वो रोज़े से है, लेकिन उन ज़ालिमों ने कुछ नहीं सुना."
आख़िरी बार औरंगज़ेब से फ़ोन पर बात करने के उस लम्हे को याद करते हुए हनीफ़ कहते हैं, "जिस दिन उनके साथ ये घटना हुई. उस दिन सुबह 10:45 पर उनके पास कॉल आया और कहने लगा कि मैं यहाँ से निकल गया हूं."
"थोड़ी देर में ही वो चिल्लाने लगा कि गाड़ी रोको, गाड़ी रोको, गाड़ी रोको. 12 मिनट तक इसी तरह की आवाज़ आई, लेकिन गाड़ी नहीं रुकी."
ग़रीबी के कारण फ़ौज में होते हैं भर्ती
वो कहते हैं, ''एक फ़ौजी बेटा जब छुट्टी पर घर आता है तो वह बहुत ख़ुशी होती है. आप को पता है कि फ़ौज क़ैद की तरह होती है. कोई ख़ुशी से नौकरी नहीं करता.''

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शरीफ़ बताते हैं कि वे ग़रीब लोग हैं, औरंगज़ेब भी उसी ग़रीबी से लड़ रहे थे. पहले पेट पूजा फिर देश की पूजा. अगर पेट में कुछ होगा ही नहीं तो देश की सेवा कौन करेगा.
"महबूबा मुफ़्ती, शेख साहेब और प्रधानमंत्री जी, जो करते हैं सिर्फ अपने लिए करते हैं, गरीब के लिए कोई कुछ नहीं करता."
औरंगज़ेब के मामा मोहम्मद शरीफ़ कहते हैं, ''अगर महबूबा मुफ़्ती, फ़ारूख़ अब्दुल्लाह या उमर अब्दुल्लाह कुछ कर नहीं पा रहे हैं तो वे कश्मीर को छोड़ दें. अगर वो हमारे लिए कुछ कर नहीं सकते तो हमें मरवाते क्यों हैं! एक महीने तक सीज़फ़ायर किया गया, क्यों!''
ईद पर पूरा परिवार औरंगज़ेब का इंतज़ार कर रहा था. लेकिन ईद का दिन यूं गुज़रेगा, किसी ने सोचा भी नहीं था.
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