जम्मू-कश्मीर सरकार का संघर्षविराम प्रस्ताव कितना जायज़

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- Author, राधा कुमार
- पदनाम, कश्मीर पर गठित वार्ताकार समिति की पूर्व अध्यक्ष
कश्मीर के लिए साल 2018 के शुरुआती पांच महीने बेहद भयावह और डरावने रहे हैं.
इस दौरान मरने वाले आम नागरिकों, सुरक्षा बलों, और चरमपंथियों की संख्या बीते दशक इसी दौरान हुई हत्याओं से भी ज़्यादा रही है.
वापसी का रास्ता पीछे छूटा
कश्मीर में चरमपंथी और इसके जवाब में होने वाली कार्रवाइयों में हिंसा उस स्तर तक बढ़ चुकी है जहां से पीछे मुड़ना मुश्किल है.
जम्मू-कश्मीर में इस समय सांप्रदायिक और वैचारिक आधार पर ध्रुवीकरण हो चुका है.
तमिलनाडु से कश्मीर की वादियों में घूमने आए एक युवा पर्यटक की पत्थरबाजी में मौत होने की घटना हो या जम्मू में बलात्कार के मामले में हुई शर्मनाक लामबंदी, ये बताते हैं कि समाज किस तरह पागलपन की ओर जा रहा है.

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भारत के प्रति बेरुखी का भाव उस तरह है जैसे 1990 में हुआ करता था जब घाटी में चरमपंथ ने अपने पैर पसारने शुरू किए थे.
हालांकि पाकिस्तान के लिए ये एक अच्छी ख़बर लगती है, जिसका सिविल और मिलिट्री तंत्र कश्मीर में अशांति चाहता है. लेकिन भारत के बाकी हिस्सों में इसका असर, पाकिस्तान के ख़िलाफ़ विरोध के और बढ़ने में हुआ है जो उस मुल्क के लिए बुरी ख़बर है.

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इस संघर्ष में किसकी जीत?
इस संघर्ष को कोई भी जीत नहीं सकता, फिर भी गुरिल्ला चरमपंथी, भारत और पाकिस्तान, कोई भी इसे मानने के लिए तैयार नहीं हैं.
ऐसा प्रतीत होता है कि खून-खराबे को ही अंतिम समाधान मान लिया गया है और शायद हर पक्ष ने खुद को समझा लिया है कि अगर इस संघर्ष में जीत नहीं भी हासिल कर सकते हैं तो कम से कम दूसरे पक्ष का भीषण नुकसान तो कर ही सकते हैं.
ऐसी ख़राब स्थिति में आशा की कोई छोटी सी किरण भी कहीं से दिखाई नहीं पड़ रही.

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मुख्यमंत्री महबूबा मुफ़्ती ने रमज़ान के दौरान जिस तरह संघर्ष विराम का प्रस्ताव दिया है उसे सभी पार्टियों के प्रतिनिधियों का समर्थन हासिल है.
इस तरह मुफ़्ती सरकार ने दिल्ली में बैठे हुए नीति बनाने वालों के बीच अपनी पहुंच बनाई है.

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संघर्ष विराम पर क्या बोलेंगे मोदी?
अभी ये देखना बाकी है कि प्रधानमंत्री मोदी इस पर क्या प्रतिक्रिया देते हैं. लेकिन इसमें थोड़ा शक है कि सीज़फायर के प्रस्ताव का शानदार अंदाज में स्वागत किया जाएगा.
हालांकि, इस पर सबसे ज़्यादा उत्साह से भरी प्रतिक्रिया तो उन कश्मीरियों की होगी जो साल 2014 के बाद अब आकर थोड़ी राहत की सांस लेंगे.
लेकिन इस प्रस्ताव में एक पेच है.
मुफ़्ती ने जिस एकतरफ़ा सीज़फायर का प्रस्ताव रखा है उसकी घोषणा साल 2000 के नवंबर में वाजपेयी सरकार ने की थी.

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सुरक्षाबलों को कौन बचाएगा?
मुफ़्ती सरकार के इस प्रस्ताव पर चीफ़ ऑफ़ आर्मी स्टाफ़ जनरल रावत ने पूछा है कि इस बात की गारंटी कौन देगा कि सुरक्षा बलों को हमलों से बचाया जाएगा. ये सवाल ग़लत नहीं है.
साल 2000 में एकतरफा युद्धविराम के दौरान पहले तीन महीनों में सुरक्षा बलों पर हमलों की संख्या में तेज़ी से इजाफ़ा हुआ. हालांकि, चरमपंथियों से लेकर पाकिस्तान पर भी हिंसा ख़त्म करने को लेकर लोगों का दबाव था. दबाव बनाने वालों में वो तबका भी शामिल था जो आज़ादी की बात करता है.

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लेकिन आज के समय में चरमपंथियों पर उस तरह का बेहद कम दबाव है.
जनरल रावत ने ठीक ही कहा है कि एकतरफा युद्ध विराम की स्थिति में सुरक्षाबलों पर हमलों की संख्या बढ़ेगी.
लेकिन उन्हें खुद से ये भी पूछना चाहिए कि सेना और सरकार ऐसे हमलों की संभावनाएं रोकने के लिए क्या-क्या कर सकती है.
ऐसे कई हमले सिर्फ़ इसलिए सफल हुए क्योंकि सुरक्षा बलों की सुरक्षा में ढिलाई बरती गई और यहां तक कि तब भी जब वो अपनी बैरकों की सुरक्षा में लगे थे ख़राब उपकरण और काम करने की ख़राब स्थितियों से उनका ध्यान भंग हुआ.
वाजपेयी के दौर का संघर्ष-विराम
साल 2000 में युद्धविराम के दौरान सुरक्षाबल में हताहतों की संख्या बढ़ी क्योंकि तब लगातार हो रहे हमलों को लेकर वाजपेयी सरकार की तैयारियों में कमी थी. इसके साथ ही वादी में तैनात भारतीय सेना की टुकड़ियों के कामकाज में ढिलाई का होना भी एक वजह थी (मुहैया संसाधनों के अभाव में वो वैसे भी कमजोर थे). इसके अलावा यहां की परिस्थिति तो समस्या थी ही.

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वाजपेयी के दौर में जब युद्धविराम हुआ था तब कई स्तरों पर मसलन पाकिस्तान-भारत, भारत सरकार-अलगाववादी गुरिल्ला नेताओं-आज़ादी के समर्थक सिविलियन नेताओं, भारत और पाकिस्तान सरकारों के बीच, सिविल सोसाइटी ग्रुप और यहां तक कि बिजनेस ग्रुप के बीच शांति कायम करने के लिए बातचीत चल रही थी.
वाजपेयी संघर्ष विराम के दौरान शांति के लिए हो रही वार्ताओं के राजनीतिक लाभों की बात करके हिंसा को कम करने में सफल हुए.
लेकिन अब वो स्थिति जा चुकी है और उसकी जगह सांप्रदायिक तनाव, गुस्से और नफ़रत ने ले ली है.
अगर किसी तरह के संघर्ष विराम की बात की जाती है, जिसका असर भी दिखे, तो इसे मोदी मंत्रिमंडल और अलगाववादियों के बीच वार्ता, भारत और पाकिस्तान के बीच वार्ता और जमीन पर राज्य के प्रशासन और विपक्षी पार्टियों के सहयोग से ही संभव होगा.
शायद इस संबंध में पीछे के रास्ते से बातचीत का दौर चल रहा है और उनके नतीजे जल्दी सामने आएंगे. अभी इस समय सिर्फ आशा की जा सकती है. रमजान को अब बस पांच दिन बचे हुए हैं और मैं आशा कर रही हूं.
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